Sustain Humanity


Monday, March 2, 2020

नई दिल्ली के जंतर मन्तर पर लेखकों,  कलाकारों, बुद्धिजीवियों के जमावड़े से देश नहीं बदलने वाला है। धर्मांध मनुस्मृति राष्ट्रवाद और मुक्तबाजार में उपभोक्तावाद और आत्मध्वंस के इस जमाने में साहित्यकारों, खासकर हिंदी साहत्यकारों, बुद्धिजीवियों, कलाकारों का जात धर्म भाषा नस्ल क्षेtr में बंटी राजनीति की कठपुतली जनता पर कोई असर होनेवाला नही है।

मुझे अफसोस है कि 25- 26 को दिल्ली में होने के बावजूद अपने मित्रों से में मिल नही सका। वे तमाम लोग कामयाब और नामी लोग हैं। मेरे मिलने न मिलने से उनकी सेहत पर कोई असर भी नहीं पड़नेवाला।

पहली मार्च को जंतर मंतर पर देशभर के बुद्धिजीवियों के जमावड़े का समर्थन करने के बावजूद मैं उसमें शामिल नहीं सका। कुछ न होता तो कुछ महान चेहरों के साथ अपना चेहरा भी दर्ज हो जाता। इतना तो जरूर होता और शायद लोगों को दिमाग पर जोर डालना पड़ता कि मैं भी लिखने पढ़ने वाली बिरादरी में कहीं न कहीं हूँ और मेरी राजनीति पर शक किगूँजेश नहीं होती।

जंतर मंतर या जेएनयू से देश फिरभी बदलने वाला नहीं है। दिल्ली में सारे दंगाई माफिया डॉन का डेरा है।

पूर्वोत्तर भारत और दक्षिण भारत के लोग, कश्मीर के लोगों को इसी दिल्ली से घृणा है। बंगाल में भी लोग सत्ता और पूंजी की भाषा बन चुकी हिंदी से नफरत है, जो बाजार और राजनीति की भाषा है और हिंदुत्व के हिंदी हिन्दू हिंदुस्तान एजेंडा के तहत नफरत और दंगे की भाषा भी है। मीडिया और शोशल मीडिया में जिसका जलवा हम रोज़ देख रहे हैं।

हमारी बौद्धिक अकादमिक पत्रिकाओं, विश्विद्यालयों,विशेषज्ञों, साहित्यकारों , पत्रकारों, कलाकारों और तमाम पेशेवर बुद्धिजीवियों को आम जनता की भाषा और संस्कृति में आये बदलाव Kई परवाह नही है। आम जनता को सम्बोधित करने की गरज नहीं है। एक दूसरे की पीठ खुजलाकर क्रांतियां हो रही है और राजकाज, राजनीति,अर्थव्यवस्था और समाज में मारी जा रही जनता के बीच जड़ों में जाकर अम्न चैन मुहब्बत भाईचारा की जनसंस्कृति को खाद पानी देने की मशक्कत के बजाय मुफ्त नें हीरो हीरोइन बनने की उत्कट अश्लील आकांक्षा अति प्रबल हो गयी है।

दिल्ली में दंगा रुक है तो इसमें हमारी कोई भूमिका नहीं है। दंगा जिहोंने करवाया, उन्होंने अपनी योजना और एजेंडा के मुताबिक ही दंगा रुकवा दिया। जब चाहे फिर शुरू करवा देंगे। तकलीफ दिल्ली में दंगा हो जाने का है। दिल्ली में तो 1984 में भी दंगे हुए। पूरा उत्तर प्रदेश दंगा प्रदेश बन गया है, जहां से बाकायदा देशविदेश दंगे का कारोबार धूम धड़ाके के साथ चलता है। इसे रोकने की भी सोचें। कश्मीर घाटी के मुसलमानों को कैद करके, Rअममन्दिर बनवाकर, आरक्षण खत्म करके,जनसंख्या नियंत्रण कानून बनाकर आप नमान चैन की बात कर रहे हैं, संविधान और कानून की बात कर रहे हैं। यह भी हिंदुत्व की ही कुलीन मनुस्मृति राजनीति है।

सामाजिक सम्बन्ध और अम्न चैन, सामाजिक संरचना अर्थ व्यवस्था और उतपादन प्रणाली में उत्पादन सम्बन्धों से  बनते है। देश को मुक्त बाजार बनाने का आप 1991 से अबतक विरोध नहीं कर सकें। जल जंगल जमीन से बेदखली के खिलाफ कुछ नही उखाड़ सके, सारे के सारे श्रम कानून खत्म कर दिए गए, आप सिरे से खामोश रहे।सारे कायदे  कानून बदल दिए गए, खत्म कर दिए गए, संविधान बदल जाता रहा, आपकी मोटी मलाईदार चमड़ी में कोई हलचल नही हुई। आदिवासियों, किसानों, मजदूरों, दलितों और स्त्रियों का आखेट चलता रहा और आप वृंदगान में सावधान खड़े रहे। 1986 में नागरिकता कानून बदलकर भारत की नागरिकता के लिए मां बाप का जन्मथन भारत में होना अनिवार्य बनाकर भारत विभाजन के शिकार लोगों से नागरिकता छीन ली गयी और 2003 में एनआरआई नागरिकता बनाकर दस्तावेजों की अनिवार्यता तय करके एनआरसी, एनपीआर और आधार की जमीन तैयार करने के हिंदुत्व एजेंडे पर लम्बी खामोशी के बाद अब का से। आपकी नींद तब कगी है जब किसान, मजदूर,   छात्र, युवा,व्यपारी सारे के सारे अर्थव्यवस्था और उतिपडन प्रणाली आए बाहर हो गए, रोज़गार आजीविका से बेदखल हो गए।

ऐसे बेरोज़गार बेदखल लोगों के पास। अब सिर्फ धर्म है या फिर नशा है या फिर टीवी चैनल और मोबाइल है। उनकी नज़रों में आप दो कौड़ी के हैं और धर्म रक्षक राष्ट्रवादी टीवी के चीखते चिल्लाते दंगाई एंकर और उ के राजनीतिक आका सुपर हीरो हैं। वे उनके असर में हैं। आपकी कोई बात, आपकी कोई दलील, आपकी विचारधारा, आपकी प्रतिबद्धता उनको कहीं स्पर्श नहीं करती। आप राजधानियों से निकलकर गांव देहात के असली भारत के एकबार दर्शन तो कर लें। जो अब दंगाइयों का अजेय किला है।
ढाई सौ सालों के, 1757 से लेकर अबतक जारी किसान आंदोलन, आजादी के पहले के मजदूर आंदोलन, सत्तर के दशक के छात्र युवा आंदोलन, भक्ति आंदोलन से लेकर अब तक के तमाम समाजिक सांस्कतिक आंदोलनों के इतिहास से हमें इन दंगाइयों से निबटने का रास्ता निकलना होगा।

भारत की अर्थ व्यवस्था में गांव और किसान , मेहनतकश जनता की बहाली के बिना आप देश बदल नहीं सकते।

15 मार्च को उत्तराखण्ड के रुद्रपुर से महज 15 किमी दूर  दिनेशपुर में हम इन्हीं सवालों से जूझेंगे। उम्मीद है कि जंतर मंतर में फोटो खिंचवाने लोग भी तशरीफ़ लाएं। हम करीब सौ गांवों के किसानों को और मेहनतकश जनता को इस सम्वाद में शामिल होने का निनी तौर पर न्योता दे रहे हैं।

आपको भी न्योता है।

प्रेरणा अंशु के वार्षिकोत्सव में 15 मरसह को पधारे म्हारो देश। दिनेशपुर।

Sunday, March 1, 2020

उत्तराखण्ड में जल जंगल जमीन कारपोरेट कम्पनियों को सौंपने का एक और कारनामा। अपने ही खेत पर कम्पनियों के लिए बंधुआ खेती करेंगे किसान।
इसीतरह बंगाल के महान मनीषियों ने ईस्ट इंडिया कम्पनी के राज में नील की खेती को किसानों के लिए लाभदायक बताने में भारत से लेकर इंग्लैंड में महारानी के दरबार तक में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी थी। किसान अनाज तक उगा नहीं सकते थे।
निलकर साहबों की वापसी धूम धड़ाके से हो रही है।
इस बंधुआ खेती के खिलाफ नील विद्रोह से भारत मे
किसामन विद्रोह औऱ आन्दोलनपन का सिलसिला शुरू हुआ जो आज भी जारी है। उत्तराखण्ड के रंग बिरंगे हुक्मरान इतिहास शायद नहीं पढ़ते। कमाने से फुर्सत नहीं मिलती।
बनारस से मुक्ता जी ने लिखा है कि एनडीटीवी ने मेरे लिखे पर कोई खबर बनाई है। मैन नहीं देखी।
मैंने एनडीटीवी या कोई टीवी चैनल दिल्ली में रहते हुए देखा नहीं। फ़ेसबुक पोस्ट से हो सकता है लिया हो। 1984 में 31 अक्तूबर को इंदिरा की हत्या की खबर पिताजी ने एनडी तिवारी के  सरकारी आवास पर सुनी तो वे सीधे अस्पताल पहुंच गए थे। इंदिराजी को उन्होंने गोलियों से छलनी देखा था। दंगा शुरू हो गया था। तिवारीजी उन्हें अस्पताल से निकालकर अपने घर ले गए थे।वहीं से उन्होंने सिखों का नरसंहार को देखा और आखिरी सांस तक वह मंजर नहीं भूले। में मेरठ से दैनिक जागरण निकाल रहा था और दिल्ली, पश्चिम उत्तर प्रदेश और बाकी देश के दंगों से घिरा हुआ था।
आपरेशन ब्लू स्टार के वक्त में रांची में प्रभात खबर में था। स्वर्ण मंदिर में सैन्य कार्रवाई का तब नभाटा के राजेन्द्र माथुर और जनसत्ता के प्रभाष जोशी जोरदार ढंग से समर्थन कर रहे थे। सिखों के  सेना में विद्रोह के वक्त भी में रांची नें था।
पूरा मीडिया तब हिन्दू हो गया था। आज की तरह। संघ परिवार का हिंदुत्व तब सिखों के खिलाफ था।दिल्ली और बाकी देश में कांग्रेस और संघ परिवार ने ही सिखों का नरसंहार कराया था। राजीव गांधी को 1984 के चुनाव में हिन्दू हितों के नाम ढंग परिवार ने खुला समर्थन दिया था और इसीके बदले में राजोव गांधी ने राम मंदिर का ताला खुलवाकर भारत को हिन्दुराष्ट्र बना देने की शुरुआत की थी।
मेरठ में मलियाना और हाशिमपुरा नरसंहार भी हमने देखें। तब मेरठ मेडिकल कालेज में पिताजी tb का इलाज करा रहे थे।
मुक्ताजी ने व्हाट्सएप्प पर लिखा है
NDTV par khabare mil rahi thi aapane aankho dekha haal bataya..84 ke dango me mai Delhi me Harinagar me rahati thi jo dango ki giraft me tha . Do chote bacho ke saath mai swayam bhuktbhogi thi.
31 अक्टूबर 1984 को श्रीमती इंदिरा गांधी को गोली लगने पर पिताजी पुलिन बाबू अस्पताल में उन्हें देखने पहुंच गए थे। वे नारायणदत्त तिवारी के घर थे। तिवारीजी ही उन्हें अपने साथ अस्पताल से लाये थे।दिल्ली में रहकर उन्होंने भारत विभाजन का जख्म दुबारा दिलोदिमाग में ताजा करके घर लौटे थे।में तब मेरठ दजनिक जागरण में था और रात दिन सिखों के नरसंहार से घिरा हुआ था।
मेरठ में मलियाना और हाशिमपुरा नरसंहार के वक्त भी में मेरठ में था। पिताजी तब मेरठ मेडिकल केलेज में टीबी के इलाज के लिए भर्ती थे। शहर सेना के हवाले था और अस्पताल में दो चार मरीजों मेंपिताजी भी थे।
मैंने अपने पिता को भारत विभाजन का दर्द बार बार झेलते हुए लहूलुहान होते देखा है।
इसबार पिता हमारे बीच नहीं हैं। 25 को में दिल्ली पहुंचा। 26 को जहांगीरपुरी से लेकर आजादपुर तक देर रात तक भतीजी कृष्णा की शादी में दौड़ता रहा। बारात को मुंबई वाली ट्रेन डाइवर्ट हो जानी की वजह से आगरा उतरकर दिल्ली आने पड़ा। 27 को विदाई थी। सुबह 9 बजे की ट्रेन थी मुंबई जाने वाली। रदद् हो गयी।बेटी, दामाद और बारात को बस से मुंबई रवाना करना पड़ा।
अब मैं पत्रकार नहीं हूं। शुक्र है कि नहीं हूं। दंगा भड़काने में राजनीति का जितना हाथ है, उससे कम पत्रकारिता का नहीं है। मेरठ दंगों पर लिखे मेरे लघु उपन्यास उनका मिशन इडिपर केंद्रित है। मेरा कहानी संग्रह अंडे सेंटे लोग इन्हीं मुद्दों पर केंद्रित है।
घर की बड़ी बेटी का वववाह था औऱ मेरी चारों तरफ दिल्ली जल रही थी। में हवाओं में इंसानी  गोश्त जलने की बू से परेशान था। कानों में हड्डियां छिटकने की आवाजें आ रही थीं। खून की नदियों से घिरा हुआ था।
मेरे पिता, उनकी पीढ़ी के लोग ज़िंदा होते तो उन्हें फिर भारत विभाज का शिकार होना पड़ता। शुक्र है कि वे नहीं है।

शुक्र है कि मैं 27 को ही मौत, नफरत और दंगों की वह राजधानी पीछे छोड़ आया है।
फिरभी चैन नहीं है,गांव भी अब राजनीति, घृणा और हिंसा की राजधानी का सेल बन गया है।
बेहतर होता कि हम लोग भी मर जाते।
मरे नहीं है, लेकिन यकीनन मार दिए जाएंगे।

Tuesday, February 11, 2020

एक अंग्रेजी अखबार में गिरिराज किशोर की गलत तस्वीर पर हिंदी के लेखक पत्रकार तीखी प्रतिक्रिया व्यक्त कर रहे हैं। कहा जा रहा है कि अंग्रेजी वाले हिंदी की परवाह नहीं करते और वे किसी गिरिराज किशोर को नहीं जानते।
भारत में अंग्रेजी ज्ञान विज्ञान की नही सत्ता की भाषा है और इसलिए आम जनता भी आजकल हिंदी को तिलांजलि देकर अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम के घटिया स्कूलों में भेजने लगी है। जहां टीचर इस लायक भी नहीं होते की कोई विषय जानते समझते हों। ज्ञान विज्ञान के लिए नहीं , अछि नौकरी पाने के लिए लोग हिंदी छोड़ रहे हैं।
असमिया, ओड़िया, बंगला, पंजाबी, मराठी, तमिल, कन्नड़, मलयालम, तेलुगु में किसी भी बड़े साहित्यकार को लोग न सिर्फ जानते हैं,उन्हें पढ़ते भी हैं।
हिंदी वालो को अपनी भाषा, अपने साहित्य, अपनी संस्कृति अपने नायकों की कितनी परवाह है?
हिंदी पढ़े लिखे लोग अखबारों के अलावा कौन सा साहित्य पढ़ते हैं। कवियों के नाम कबीरदास सूरदास से आगे वे कितना जानते हैं?
गिरिराज किशोर या हिंदी के किसी भी आधुनिक साहित्यकार को कितने लोग जानते है?
उनका साहित्य कौन पड़ता है?
हिंदी के नाम खाने कमांड वालों में से कितने लोगों गिरमिटिया पढा है?
भारत तो क्या दुनियाभर की किसी भाषा के साहित्य और साहित्यकार से उस भाषा को जानने पढ़नेवाले लोग इतने अनजान नहीं होते।
आजादी से पहले हिंदी की इतनी दुर्गति नहीं होती थी। तब स्वतन्त्रता मनग्राम की भाषा थी हिंदी देशभर में, अहिन्दी भाषी प्रदेशों में भी। तब हिंदी न राजनीति, न सत्ता और न बाजार की भाषा थी। तब यह सही मायने में जनभाषा थी।हिंदी के नाम खाने कमानेवालों की जमात तब तैयार नहीं हुई थी।
हिंदी के आलोचकों, सम्पादकों और प्रकाशकों ने सरकारी खरौद के भरोसे किताबें किसी भी भाषा के मुकाबले ज्यादा महंगी करके हिंदी को आमलोगों के लिए लिखने पढ़ने की भाषा रहने नही दिया।
एकाधिकार कुलीन वर्चस्व के कारण आम लोगों के हिंदी में पढ़ने लिखने का कोई मौका नहीं है।
हिंदी अखबारों से साहित्य का नाता दशकों पहले खत्म हो गया है। उनमें साहित्य या साहित्यकारों की कोई चर्चा नहीं होती। बंगला, मराठी, ओड़िया, पंजाबी, असमिया, तमिल, तेलगु,कन्नड़, मलयालम में अखबारों में साहित्य और साहित्यकफोन के बारे में आम जनता को सिलसिलेवार जानकारी देते हैं।
अब टीवी के चीखते चिल्लाते एंकर ही हिंदी जनता के नायक हैं और घृणा, हिंसा, अपराध, भ्र्ष्टाचार के माफिया ही हिन्दीवालों के महानायक हैं
हम खुद हिंदी के साहित्य और साहित्यकार की चर्चा नहीं करते, उन्हें नहीं पहचानते तो कैसे उम्मीद पालते हैं कि अंग्रेजी में उन्हें पहचान जाए।

Monday, October 14, 2019

पुलिनबाबूःएक जनप्रतिबद्ध यायावर की आधी अधूरी कथा

पुलिनबाबूःएक जनप्रतिबद्ध यायावर की आधी अधूरी कथा
पलाश विश्वास
पुलिनबाबू मेरे पिता का नाम है।उनके जीते जी मैं उन्हें कभी नहीं समझ सका। उनके देहांत के बाद जिनके लिए वे तजिंदगी जीते रहे, खुद उनके हकहकूक के लिए देशभर के शरणार्थी आंदोलनों से उलझ जाने की वजह से उनके कामकाज के तौर तरीके की व्यवाहारिकता अब थोड़ा समझने लगा हूं।
पुलिनबाबू चरित्र से यायावर थे लेकिन किसान थे और किसानों के नेता थे। वे हवा हवाी नहीं थे और उनके पांव मजबूती से तराई की जमीन से लेकर उत्तराखंड के पहाड़ों पर जमे हुए थे।वे जड़ों से जुड़े हुए इंसान थे और जड़ों से कटे हुए मुझ जैसे इंसान के लिए उन्हें समझना बहुतआसान नहीं रहा है।मेहनतकशों के हकहकूक के लिए वे जाति ,धर्म और भाषा की कोई दीवार नहीं मानते थे।
फिरभी वे शरणार्थियों के देशभर में निर्विवाद नेता थे।विभाजन पीड़ित ऐसे एकमात्र शरणार्थी नेता जिन्होंने मुसलमानों को भारत विभाजन के लिए कभी जिम्मेदार नहीं माना और उत्तर प्रदेश और अन्यत्र भी वे बेझिझक दंगापीड़ित मुसलमानों के बीच जाते रहे जैसे वे देश भर में शरणार्थियों के किसी भी संकट के वक्त आंधी तूफान कैंसर वगैरह वगैरह की परवाह किये बिना भागते रहे आखिरी सांस तक।वे जोगेन मंडल के अनुयायी बने रहे आजीवन,जबकि बंगाल में जोगेन मंडल को विभाजन का जिम्मेदार माना जाता है।
उन्होंने भारत विभाजन कभी नहीं माना और जब चाहा तब बिना पासपोर्ट और बिना वीसा सीमा पार करते रहे तो किसीने उन्हें रोका भी नहीं।मेरे लिए बिना पासपोर्ट और बिना वीसा सीमापार जाना संभव नहीं है और पिता के उस अखंड भारत की राजनीतिक सीमाओं को भी मानना संभव नहीं है।उन्होंने मरत दम तक इस महादेश को अखंड माना तो हमारे लिए खंड खंड देश स्वीकार करना भी मुश्किल है।
भारत विभाजन उन्होंने नहीं माना लेकिन पूर्वी बंगाल से खदेड़े गये तमाम शरणार्थियों को उन्होंने जाति धर्म भाषा लिंग निर्विशेष जैसे अपना परिजन माना वैसे ही उन्होंने पश्चिम पाकिस्तान से आये सिख पंजाबी शरणार्थियों को भी अपने परिवार में शामिल माना।उन्हींकी वजह से तराई और पहाड़ के गांव गांव में हमें इतना प्यार मिलता रहा है।पहाड़ के लोगों को उन्होंने हमेशा शरणार्थियों से जोड़े रखने की कोशिश की है और कुल मिलाकर यही उनकी राजनीति रही है।पहाड़ से हमारे रिश्ते की बुनियाद भी यही है।जो कभी टस से मस नहीं हुई है।
पुलिनबाबू अखंड भारत के हर हिस्से को अपनी मातृभूमि मानते थे और मनुष्यता की हर भाषा को अपनी मातृभाषा मानते थे।वे आपातकाल में भी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के दफ्तर में बेहिचक घुस जाते थे और जब तक जीवित रहे हर राष्ट्रपति, हर प्रधानमंत्री ,हर मुख्य.मंत्री,विपक्ष के हर नेता के साथ उनका संवाद जारी था।
सर्वोच्च स्तरों पर संपर्कों के  बावजूद अपने और अपने परिवार के हित में उन संबंधों को उन्होंने कभी भुनाया नहीं।वे हमारे लिए टूटे फूटे छप्परोंवाले घर छोड़ गये और आधी जमीन आंदोलनों में खपा गये।हम भी उनकी कोई मदद नहीं कर सके। इसलिए उनसे कोई शिकायत हमारी हो नहीं सकती।हम सही मायने में उनके जीते जी न उनका जुनून समझ सकें और न उनका साथ दे सकें। फिरभी हम ऐसा कुछ भी कर नहीं सकते,जिससे उनके अधूरे मिशन को कोई नुकसान हो।कमसकम इतना तो हम कर ही सकते हैं और वही कोशिश हम कर रहे हैं।
उनका कहना था कि हर हाल में सर्वोच्च स्तर पर हमारी सुनवाई सुनिश्चित होनी चाहिए ।उनका कहना था कि इन दबे कुचले लोगों का काम हमें खुद ही करना है।हमारी योग्याता न हो तो हमें अपेक्षित योग्यताएं हासिल करनी चाहिए। संसाधनों के बारे में उनका कहना था कि जनता के लिए जनता के बीच काम करोगे तो संसाधनों की कोई कमी होगी नहीं।जुनून की हद तक आम जनता की हर समस्या से टकराना उनकी आदत थी।उन्होंने सिर्फ शरणार्थियों के बारे में कभी सोचा नहीं है।उनका मानना था कि स्थानीय तमाम जन समुदायों के साथ मिलकर ही शरणार्थी अपनी समस्याओं को सुलझा सकते हैं।शरणार्थियों को बाकी समुदायों से जोड़ते रहना उनका काम था।
पुलिनबाबू अलग उत्तराखंड राज्य के तब पक्षधर थे जब उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के कार्यकर्ता की हैसियत से हम अलग राज्य की मांग बेमतलब मानते थे।वे पहाड़ और तराई के हकहकूक के लिए अलग राज्य अनिवार्य मानते थे।वे मानते थे कि उत्तराखंड में अगर तराई नहीं रही तो यूपी में बिना पहाड़ के समर्थन के तराई में बंगाली शरणार्थियों को बेदखली से बचाना असंभव है।तराई और पहाड़ को भूमाफिया के शिकंजे से बचाने के लिए वे हिमालय के साथ तराई को जोड़े रखने का लक्ष्य लेकर हमेशा सक्रिय रहे।यह मोर्चाबंदी उन्हें हमेशा सबसे जरुरी लगती रही है।
वे हिमालय को उत्तराखंड और यूपी में बसे बंगाली शरणार्थियों का रक्षाकवच और संजीवनी दोनों मानते थे।उनका यह नजरिया महतोष मोड़ आंदोलन के वक्त तराई के साथ पूरे पहाड़ के आंदोलित होने से जैसे साबित हुआ वैसे ही अलग उत्तराखंड राज्य बनने के बाद पुलिन बाबू के देहांत के तुरंत बाद सत्ता में आयी पहली केसरिया सरकार के तराई के बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता छीनने के खिलाफ पहाड़ और तराई की आम जनता के शरणार्थियों के पक्ष में खड़े हो जाने के साथ हुएकामयाब आंदोलन के बाद से लेकर अब तक वह निरंतरता जारी है।
मैंने आजीविका और नौकरी की वजह से 1979 में नैनीताल और पहाड़ छोड़ा, लेकिन पुलिनबाबू का उत्तराखंड के राजनेताओं के अलावा जनपक्षधर कार्यकर्ताओं जैसे शेखर पाठक,राजीव लोचन साह और गिरदा से संबंध 2001 में उनकी मौत तक अटूट रहे।कभी भी किसी भी मौके पर वे नैनीताल समाचार के दफ्तर जाने से हिचके नहीं।न हमारे पुराने तमाम साथियों से उनके संवाद का सिलसिला कभी टूटा।
पुलिनबाबू हर हाल में पहाड़ और तराई के नाभि नाल का संबंध अपने बंगाली और सिख शरणार्थियों,आम किसानों,बुक्सा थारु आदिवासियों के हक हकूक की लड़ाई और पहाड़ के आम लोगों के हितों के लिए बनाये रखने के पक्ष में थे।उन्हीं की वजह से पहाड़ से हमारा रिश्ता न कभी टूटा है और न टूटने वाला है।
तराई के भूमि आंदोलन में पुलिनबाबू किंवदंती हैं और हमेशा तराई में भूमिहीनों, किसानों और शरणार्थियों की जमीन,जान माल की हिफाजत के लिए वे पहाड़ और तराई की मोर्चाबंदी अनिवार्य मानते थे।इसके लिए उन्होंने गोविंद बल्लभ पंत और श्याम लाल वर्मा से लेकर डूंगर सिंह बिष्ट,प्रताप भैय्या,रामदत्त जोशी और नंदन सिंह बिष्ट तक हर पहाड़ी नेता के साथ काम करते रहे और आजीवन उनकी खास दोस्ती नारायणदत्त तिवारी और केसी पंत से बनी रही।
सत्ता की राजनीति से उनके इस तालमेल का मैं विरोधी रहा हूं हमेशा जबकि उनका कहना था कि विचारधारा से क्या होना है, जब हम अपने लोगों को बचा नहीं सकते।अपने लोगों को बचाने के लिए बिना किसी राजनीति या संगठन वे अकेले दम समीकरण साधते और बिगाड़ते रहे हैं।जिन लोगों के साथ वे खड़े थे,उनके हित उनके लिए हमेशा सर्वोच्च प्राथमिकता पर होते थे।
हम इसे मौकापरस्ती मानते रहे हैं और वोटबैंक राजनीति के आगे आत्मसमर्पण भी मानते रहे हैं।वैचारिक भटकाव और विचलन भी मानते रहे हैं।इस वजह से उनके आंदोलनों में हमारी खास दिलचस्पी कभी नहीं रही है।इसके विपरीत,उनके समीकरण के मुताबिक तराई के हकहकूक के लिए पहाड़ के हकूकूक की साझा लड़ाई और भू माफिया के खिलाफ राजनीतिक गोलबंदी जरुरी थी।वे तराई के बड़े फार्मरों के खिलाफ हैरतअंगेज ढंग से तराई के सिखों,पंजाबियों,बुक्सों और थारुओं, देशियों और मुसलमानों को गोलबंद करने में कामयाब रहे थे।
ढिमरी ब्लाक की लड़ाई पुलिनबाबू  बेशक हार गये थे और उनके तमाम साथी टूट और बिखर गये थे लेकिन उन्होंने हार कभी नहीं मानी और आखिरी दम तक वे ढिमरी ब्लाक की लड़ाई लड़ रहे थे।
अब जबकि तराई के अलावा उत्तराखंड का चप्पा चप्पा भूमाफिया के शिकंजे में कैद है और उसका कोई प्रतिरोध शायद इसलिए नहीं हो पा रहा है कि पहाड़ और तराई की वह मोर्चाबंदी नहीं है,जिसे वे हर कीमत पर बनाये रखना चाहते थे ,ऐसे में उनकी पहाड़ के साथ तराई की मोर्चाबंदी की राजनीति समझ में आने लगी है,जिसके लिए उन्होंने तराई में,खास तौर पर बंगाली शरणार्थियों के विरोध की परवाह भी नहीं की।
उनकी इस रणनीति की प्रासंगिकता अब समझ में आती है कि कैसे बिना राजनीतिक प्रतिनिधित्व के वे न सिर्फ अपने लोगों की हिफाजत कर रहे थे बल्कि शरणार्थी इलाकों के विकास की निरंतरता बनाये रखने में भी कामयाब थे।उनके हिसाब से यह उनकी व्यवहारिक राजनीति थी,जो हमारी समझ से बाहर की चीज रही है।वे हमेशा कहते थे जमीन पर जनता के बीच रहे बिना और उनके रोजमर्रे के मुद्दों से टकराये बिना विचारधारा का किताबी ज्ञान कोई काम नहीं आता।हम उनसे वैचारिक बहस करने की स्थिति ही नहीं बना पाते थेक्योंकि वे विचारों पर नहीं,मुद्दों पर बात करते थे।हम अपनी विश्वविद्यालयी शिक्षा के अहंकार में समझते थे कि विचारधारा पर बहस करने के लिए जरुरी शिक्षा उनकी नहीं है।
पुलिनबाबू अंबेडकर और कार्ल मार्क्स की बात एक साथ करते थे और यह भी कहते थे कि नागरिकता छिनने की स्थिति में किसी शरणार्थी की न कोई जाति होती है और न उसका कोई धर्म होता है जैसे उसकी कोई मातृभाषा भी नहीं होती है।वे अस्मिता राजनीति के विरुद्ध थे और एक मुश्त कम्युनिस्ट और वामपंथी दोनों थे लेकिन मैनें उन्हें कभी किसी से कामरेड या जयभीम कहते कभी नहीं सुना।
हमारे तमाम पुरखों की तरह उनके बारे में कोई आधिकारिक संदर्भ और प्रसंग उपलब्ध नहीं हैं।पुलिनबाबू नियमित डायरी लिखा करते थे।रोजाना सैकड़ों पत्र और ज्ञापन राष्ट्रपति,प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्रियों, मंत्रियों, राजनेताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं को देशभर के शरणार्थियों,किसानों और मेहनतकशों की तमाम समस्याओं को लेकर दुनियाभर के समकालीन मुद्दों पर लिखा करते थे।
वे पारिवारिक कारणों से स्कूल में कक्षा दो तक ही पढ़ सके थे और पूर्वी बंगाल में तेज हो रहे तेभागा आंदोलन के मध्य भारत विभाजन से पहले रोजगार की तलाश में बंगाल आ गये थे।फिरभी आजीवन वे तमाम भाषाओं को सीखने की कोशिश में लगे रहे। तमाम पत्र और ज्ञापन वे हिंदी में ही लिखा करते थे और मेरे कक्षा दो पास करते न करते उन पत्रों और ज्ञापनों का मसविदा मुझे ही तैयार करना होता था।इससे मेरे छात्र जीवन तक देश भर में उनकी गतिविधियों में मेरा साझा रहा है।लेकिन भारत विभाजन से पहले और उसके बाद करीब सन 1960 तक की अवधि के दौरान जो घटनाएं हुई, वे जाहिर है कि मेरी स्मृतियों में दर्ज नहीं हैं।
उनके बारे में उनके साथियों से ही ज्यादा जानना समझना हुआ है और वह जानकारी भी बहुत आधी अधूरी है।
मसलन हम अब तक यही जानते रहे हैं कि 1956 में  बंगाली विस्थापितों के पुनर्वास के लिए रुद्रपुर में हुए आंदोलन के सिलसिले में दिनेशपुर की आम सभा में उन्होंने कमीज उतारकर कसम खाई ती कि जब तक एक भी शरणार्थी का पुनर्वास बाकी रहेगा,वे फिर कमीज नहीं पहनेंगे।उन्होंने मृत्युपर्यंत कमीज नहीं पहनी।पिछले दिनों कोलकाता के दमदम में निखिल भारत उद्वास्तु समन्वय समिति के 22 राज्यों के  प्रतिनिधियों के कैडर कैंप में बांग्ला के साहित्यकार कपिल कृष्ण ठाकुर ने कहा कि बंगाल और उड़ीशा में शरणार्थी आंदोलन के नेतृत्व की वजह से वे सत्ता की आंखों में किरकिरी बन गये थे और उन्हें और उनके साथियों को खदेड़कर नैनीताल की तराई में भेज दिया गया था।तराई जाने से पहले बंगाल छोड़ते हुए हावड़ा स्टेशन के प्लेटफार्म पर शरणार्थियों के हुजूम के सामने उन्होंने कमीज उतारकर उन्होंने यह शपथ ली थी।
इसी तरह ढिमरी ब्लाक में चालीस गांव बसाने और हर भूमिहीन किसान परिवार को दस दस एकड़ बांटने के आंदोलन और उसके सैन्य दमन के बारे में उस आंदोलन में उनके साथियों के कहे के अलावा हमें आज तक कोई दस्तावेज वगैरह बहुत खोजने के बाद भी नहीं मिले हैं।
पूर्वी बंगाल में वे तेभागा आंदोलन से जुड़े थे तो भारत विभाजन के बाद पूर्वी बंगाल में भाषा आंदोलन के दौरान ढाका में आंदोलन में शामिल होने के लिए वे जेल गये और फिर बांग्लादेश बनने के बाद दोनों बंगाल के एकीकरण की मांग लेकर भी वे ढाका में आंदोलन करने के कारण जेल गये।दोनों मौकों पर बंगाल के मशहूर पत्रकार और अमृत बाजार पत्रिका के संपादक तुषार कांति घोष उन्हें आजाद कराकर भारत ले आये।तुषार बाबू की मृत्यु से पहले भी पुलिनबाबू ने बारासात में उनके घर जाकर उनसे मुलाकात की थी और देवघर के सत्संग वार्षिकोत्सव में मैंने 1973 में तुषार बाबू और पुलिनबाबू को एक ही मंच को साझा करते देखा था लेकिन तुषारबाबू से हमारी कोई मुलाकात नहीं हुई।
इसी तरह बलिया के स्वतंत्रता सेनानी दिवंगत रामजी त्रिपाठी ने पुलिनबाबू की  चंद्रशेखर से मित्रता की वजह सुचेता कृपलानी के मुख्यमंत्रित्व काल में पूर्वी पाकिस्तान से दंगों की वजह से भारत आये शरणार्थियों के पुनर्वास की मांग लेकर पुलिनबाबू ने जो लखनऊ के चारबाग रेलवे स्टेशन पर तीन दिनों तक ट्रेनें रोक दी थी,उस आंदोलन को बताते रहे हैं।इसका कोई ब्यौरा नहीं मिल सका।चंद्रशेखर से उनका परिचय तभी हुआ।
1960 में असम में दंगों के मध्य जब शरणार्थी खदेड़े जाने लगे तो पुलिनबाबू ने दंगाग्रस्त कामरुप,ग्वालपाड़ा, नौगांव, करीमगंज से लेकर कछाड़ जिले में सभी शरणार्थी इलाकों में डेरा डालकर महीनों काम किया और असम सरकार और प्रशासन की मदद से शरणार्थियों का बचाव तो किया ही, शरणार्थियों से  पुलिनबाबू ने यह भी कहा कि भारत विभाजन के बाद शरणार्थी जहां भी बसे हैं,वही उनकी मातृभूमि हैं और उन्हें स्थानीय समुदायों के साथ मिलकर वहीं रहना है।किसी कीमत पर यह नई मातृभूमि नहीं छोड़नी है।
हमने सत्तर के दशक में मरीचझांपी आंदोलन के दौरान मध्य भारत के दंडकारण्य, महाराष्ट्र और आंध्र तक में शरणार्थियों को बंगाल लौटने के इस आत्मघाती आंदोलन के खिलाफ उनकी यही दलील सुनी है,जिसके तहत असम,उत्तर प्रदेश या उत्तराखंड के शरणार्थियों ने उस आंदोलन का समर्थन नहीं किया और वे मरीचझांपी नरसंहार से बच गये।लेकिन वे मध्यभारत के शरणार्थियों को मरीचझांपी जाने से रोक नहीं पाये।बल्कि उस आंदोलन के वक्त इस आंदोलन की वजह से रायपुर के माना कैंप में उनपर कातिलाना हमला भी हुआ,जिससे वे बेपरवाह थे।
त्रिपुरा के दिवंगत शिक्षा मंत्री और कवि अनिल सरकार के साथ गुवाहाटी से मालेगांव अभयारण्य के रास्ते शरणार्थी इलाकों में रुककर हर गांव में 2003 में पुलिनबाबू की मृत्यु के दो साल बाद उन गांवों की नई पीढ़ियों की स्मृति में उनका वही बयान हमने सुना है।तब लगा कि जनता की स्मृति इतिहास और दस्तावेजों से कही ज्यादा स्थाई चीज है। तराई में भले ही लोग उन्हें भूल गये हों,असम में लोग उन्हें अब भी याद करते हैं।उनकी वजह से देश भर के शरणार्थी मुझे जानते हैं।
विडंबना यह है कि हमारे पुराने घर में उनका लिखा सबकुछ,उनकी डायरियां तक ऩष्ट हो गया है रखरखाव के अभाव में।इसके लिए काफी हद तक मेरी भी जिम्मेदारी है।उनके पुराने साथी कामरेड पीसी जोशी,कामरेड हरीश ढौंढियाल,कामरेड चौधरी नेपाल सिंह वगैरह का भी ढिमरी ब्लाक पर लिखा कुछ उपलब्ध नहीं है।जेल में सड़कर मर गये बाबा गणेशा सिंह के परिवार के पास भी कुछ नहीं है।
तराई और पहाड़ में पहले भूमि आंदोलन ढिमरी ब्लाक नाकाम जरुर रहा लेकिन इसके बाद बिंदु खत्ता में उसी ढांचे पर भूमिहीनों को जमीन मिल सकी है।ढिमरी ब्लाक की निरंतरता में बिंदु खत्ता और उसके आगे जारी है।जबकि पहाड़ और तराई में अब भी किसानों को सर्वत्र भूमिधारी हक मिला नहीं है और जल जंगल जमीन से बेदखली अभियान जारी है।जो पहले तराई में हो रहा था,वह अब व्यापक पैमाने में पहाड़ में संक्रामक है।आजीविका,पर्यावरण और जलवायु से भी पहाड़ बेदखल है।
पुलिन बाबू को जिंदगी में कुछ हासिल हुआ नहीं है और न हम कुछ खास कर सके हैं।पुलिनबाबू के दिवंगत होने के बाद पंद्रह साल बीत गये हैं और तराई और पाहड़ के लोगों को अब इसका कोई अहसास ही नहीं होगा कि पहाड़ और मैदान के बीच सेतुबंधन का कितना महत्वपूर्ण काम वे कर रहे थे।यह इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पृथक उत्तराखंड होने के बाद पहाड़ से तराई का अलगाव हो गया है और यह उत्तराखंड के वर्तमान और भविष्य लिए बेहद खतरनाक है।
पुलिनबाबू के संघर्ष के मूल में तराई के विभिन्न समुदायों के साथ पहाड़ के साझा आंदोलन मेहनतकशों के हकहकूक के लिए सबसे खास है और फिलहाल हम उस विरासत से बेदखल हैं।
पुलिनबाबू की स्मृतियों की साझेदारी,अपनी यादों और देशभर में उनके आंदोलन के साथियों और मित्रों के कहे मुताबिक पुलिनबाबू के जीवन के बारे में जो जानकारियां हमें अबतक मिली हैं,हम उसे साझा कर रहे हैं।इसे लेकर हमारा कोई दावा नहीं है।इस जानकारी को संशोधित करने की गुंजाइश बनी रहेगी।जो उनके बारे में बेहतर जानते हैं,बहुत संभव है कि हमारा संपर्क उनसे अभी हुआ नहीं है।बहरहाल हमारे पास जो भी जानकारी उपलब्ध है,हम बिंदुवार वही साझा कर रहे हैं।
हमारे पुरखे बुद्धमय बंगाल के उत्तराधिकारी थे जो बाद में नील विद्रोह के मार्फत मतुआ आंदोलन के सिपाही बने,जिसकी निरंतरता तेभागा आंदोलन तक जारी थी।भारत विभाजन के दौरान मेरे ताउ दिवंगत अनिल विश्वास और चाचा डा.सुधीर विश्वास बंगाल पुलिस में थे और कोलकाता में डाइरेक्ट एक्शन के वक्त दोनों ड्यूटी पर थे।लेकिन पुलिनबाबू विभाजन से पहले पूर्वी बंगाल में तेभागा में शामिल थे और उसी सिलसिले में वे विभाजन से पहले भारत आ गये और बारासात के नजदीक दत्तोपुकुर में एक सिनामा हाल में वे गेटकीपर बतौर काम कर रहे थे।
हमारा पुश्तैनी घर पूर्वी बंगाल के जैशोर जिले के नड़ाइल सबडिवीजन के लोहागढ़ थाना के कुमोरडांगा गांव रहा है जो मधुमती नदी के किनारे पर बसा है और जिसके उसपार फरीदपुर जिले का गोपालगंज इलाका और मतुआकेंद्र ओड़ाकांदि है।पुलिनबाबू के पिता का नाम उमेश विश्वास है।दादा पड़दादा का नाम उदय और आदित्य है।जो आदित्य और उदय भी हो सकते हैं।उमेश विश्वास के तीन और भाई थे।उनके बड़े भाई कैलास विश्वास जो मशहूर लड़ाके थे।भूमि आंदोलन के लड़ाके।
उमेश विश्वास के मंझले भाई का नाम याद नहीं है जबकि उन्हींका पुलिनबाबू पर सबसे ज्यादा असर रहा है।पुलिनबाबू मेरे बचपन में उन्हींके किस्सा सुनाते रहे हैं,जो पूरे इलाके में हिंदू मुसलमान किसानों के नेता थे।कालीपूजा की रात वे काफिला के साथ नाव से किसी पड़ोस के गांव जा रहे थे कि घर से निकलते ही उन्हें जहरीले सांप ने काट लिया।उन्हें बचाया नहीं जा सका और उनके शोक में तीन महीने के भीतर हमारे दादा उमेश विश्वास का भी देहांत हो गया।
उस वक्त पुलिनबाबू कक्षा दो में पढ़ रहे थे तो ताउजी कक्षा छह में।जल्दी ही कैलाश विश्वास का भी निधन हो गया और बाकी परिवार वालों ने उन्हें संपत्ति से बेदखल कर दिया,जिससे आगे उनकी पढ़ाई हो नही सकी।पुलिनबाबू के चाचा इंद्र विश्वास विभाजन के वक्त जीवित थे ।उन्होंने और बाकी परिवार वालों ने संपत्ति के बदले मालदह,नदिया और उत्तर 24 परगना में जमीन लेकर नई जिंदगी शुरु की।
हमारी दादी अकेली इस पार चली आयी हमारे फुफेरे भाई निताई सरकार के साथ जो बाद में नैहाटी के बस गये।पुलिनबाबू मां के साथ रानाघाट कूपर्स कैंप में चले गये,जहां उनके साथ ताउ ताई और चाचा जी भी रहे।
रानाघाट में ही वे शरणार्थी आंदोलन में शामिल हो गये।1950 के आसपास शरणार्थियों को कूली कार्ड देकर  दार्जिलिंग के चायबागानों में खपाने के लिए जब ले जाया गया ,तब सिलिगुड़ी में पुलिनबाबू ने इसके खिलाफ आंदोलन किया तो उन सबको फिर लौटाकर रानाघाट लाया गया।तब कम्युनिस्ट शरणार्थियों को बंगाल से बाहर भेजने के खिलाफ आंदोलन कर रहे थे।पुलिनबाबू भी कम्युनिस्ट थे और उस वक्त कामरेड ज्योति बसु से लेकर तमाम छोटे बड़े कम्युनिस्ट नेता शरणार्थी आंदोलन में थे।शरणार्थी आंदोलनतब क्मुनिस्ट आंदोलन ही था।
पुलिन बाबू ने नई मांग उठा दी कि बेशक शरणार्थियों को बंगाल के बाहर पुनर्वास दिया जाये लेकिन उन सभीको एक ही जगह मसलन अंडमान या दंडकारण्य में बसाया जाये ताकि वे नये सिरे से अपना होमलैंड बसा सकें।
कामरेड ज्योति बसु और बाकी नेता शरणार्थियों को बंगाल के  बाहर भेजने के खिलाफ आंदोलन चला रहे थे।जब पुलिनबाबू ने कोलकाता के केवड़ातला महाश्मसान में शरणार्थियों के बंगाल के बाहर होमलैंड बनाने की मांग पर आमरण अनशन पर बैठ गये तो कामरेडों के साथ उनका सीधा टकराव हो गया और वे और उनके तमाम साथी ओड़ीशा में कटक के पास खन्नासी रिफ्युजी कैंप में भेज दिये गये।
1951 में खन्नासी रिफ्युजी कैंप में ताउजी और चाचाजी उनके साथ थे। खन्नासी कैंप में रहते हुए पुलिनबाबू का विवाह ओड़ीशा के ही बालेश्वर जिले के बारीपदा में व्यवसायिक पुनर्वास के तहत बसे बरिशाल जिले से आये वसंत कुमार कीर्तनिया की बेटी बसंतीदेवी के साथ हो गया।
इसी बीच ताउजी का पुनर्वास संबलपुर में हो गया।तभी पुलिनबाबू और उनके साथियों को 1953 के आसपास नैनीताल जिले की तराई में दिनेशपुर इलाके में भेज दिया गया।बाद में पुलिनबाबू ने संबलपुर से ताउजी को भी दिनेशुपर बुला लिया।
जो लोग रानाघाट से होकर खन्नासी तक पुलिनबाबू के साथ थे,वे तमाम लोग उनके साथ दिनेशपुर चले आये ,जहां पहले ही तैतीस कालोनियों में शरणार्थी बस चुके थे।पुलिनबाबू और उनके साथी विजयनगर कालोनी में तंबुओं में ठहरा दिये गये।
इसी बीच 1952 के आम चुनाव में लखनऊ से वकालत पास करके श्याम लाल वर्मा को हराकर नारायणदत्त तिवारी एमएलए बन गये।वे 1954 में ही दिनेशपुर पहुंच गये और लक्ष्मीपुर बंगाली कालोनी पहुंचकर वे सीधे शरणार्थी आंदोलन में शामिल हो गये।तभी से पुलिनबाबू का उनसे आजीवन मित्रता का रिश्ता रहा है।
1954 में ही तराई उद्वास्तु समिति बनी।जिसके अध्यक्ष थे राधाकांत राय और महासचिव पुलिनबाबू।उद्वास्तु समिति की ओर से दिनेशपुर से लंबा जुलूस निकालकर शरणार्थी स्त्री पुरुष बच्चे बूढ़े रुद्रपुर पहुंचे।
पुलिस की घेराबंदी में उनका आंदोलन जारी रहा।इसी आंदोलन के दौराम स्वतंत्र भारत,पायोनियर और पीटीआी के बरेली संवाददाता एन एम मुखर्जी के मार्फत प्रेस से पुलिनबाबू के ठोस संबंध बन गये और प्रेस से अपने इसी संबंध के आधार पर आजीवन सर्वोच्च सत्ता प्रतिष्ठान से संवाद जारी रखा।रुद्रपुर से शरणार्थियों को जबरन उठाकर ट्रकों में भर कर किलाखेड़ा के घने जंगल में फेंक दिया गया,जहां से वे पैदल दिनेशपुर लौटे।लेकिन इस आंदोलन की सारी मांगे मान ली गयीं। स्कूल, आईटीआई,अस्पताल ,सड़क. इत्यादि के साथ शरणार्थियों के तीन गांव और बसे।
रानाघाट से ओड़ीशा होकर जो लोग पुलिनबाबू के साथ दिनेशपुर चले आये,उन लोगों ने हमारी मां बसंतीदेवी के नाम पर बसंतीपुर गांव बसाया।बसंतीपुर के साथ साथ पंचाननपुर और उदयनगर गांव भी बसे।
1958 में लालकुंआ और गूलरभोज रेलवे स्टेशनों के बीच ढिमरी ब्ल्का के जंगल में किसानसभा की अगुवाई में चालीस गांव बसाये गये।हर परिवार को दस दस एकड़ जमीन दी गयी।इस आंदोलने के नेता पुलिनबाबू के साथ साथ चौधरी नेपाल सिंह, कामरेड हरीश ढौंढियाल और बाबा गणेशा सिंह थे।तब चौधरी चरण सिंह यूपी के गृहमंत्री थे।पुलिस और सेना ने भारी पैमाने पर आगजनी,लाठीचार्ज करके भूमिहीनों को ढिमरी ब्लाक से हटा दिया।हजारों लोग गिरफ्तार किये गये।पुलिनबाबू का पुलिस हिरासत में पीट पीटकर हाथ तोड़ दिया गया।उनपर और उनके साथियों के खिलाफ करीब दस साल तक मुकदमा चलता रहा।मुकदमा के दौरान ही जेल में बाबा गणेशा सिंह की मृत्यु हो गयी।
1960 के आसपास नैनीताल की तराई में ही शक्तिफार्म में फिर शरणार्थियों को बसाया गया तो तबतक रामपुर,बरेली,बिजनौर,लखीमपुर खीरी,बहराइच और पीलीभीत जिलों में भी शरणार्थियों का पुनर्वास हुआ।इसी दौरान रुद्रपुर में ट्रेंजिट कैंप बना।इन तमाम शरणार्थियों की रोजमर्रे की जिंदगी से पुलिनबाबू जुड़े हुए थे और इस वजह से उन्हें गर परिवार की कोई खास परवाह नहीं थी।बाद में मेरठ,बदांयू और कानपुर जिलों में भी शरणार्थी बसाये गये।
1967 में यूपी में संविद सरकार बनने के बाद दिनेशपुर में बसे शरणार्थियों को भूमिधारी हक मिला तो ढिमरी ब्लाक केस भी वापस हो गया।अब वह ढिमरी ब्लाक आबाद है,जिससे बहुत दूर भी नहीं है बिंदुखत्ता।
1958 के ढिमरी ब्लाक आंदोलन के सिलसिले में जमानत पर रिहा पुलिनबाबू बंगाल चले आये और उन्होंने नदिया के हरीशचंद्रपुर में जोगेन मंडल के साथ एक सभा में शिरकत की।जोगेन मंडल पाकिस्तान के कानून मंत्री बनने के बाद पूर्वी बंगाल में हो रहे दंगों और दलितों की बेदखली रोक नहीं सके तो वे गुपचुप भारत चले आये।मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन की राजनीति की बहुत कड़ी आलोचना के मध्य जोगेन मंडल लगभग खलनायक बन गये थे,जिनके साथ पुलिनबाबू का गहरा नाता था।लेकिन हरीशचंद्रपुर की उस सभा में जोगेन मंडल और उनमें तीखी झड़प हो गयी।
नाराज पुलिनबाबू सीधे ढाका निकल गये और वहां भाषा आंदोलन के साथियों के साथ सड़क पर उतर गये।शुरु से ही वे भाषा आंदोलन के सिलसिले में ढाका आते जाते रहे हैं।लेकिन इसबार वे ढाका में गिरफ्तार लिये गये।
तुषारबाबू की मदद से वे पूर्वी बंगाल की जेल से छूटे तो 1960 में दिनेशपुर में अखिल भारतीय शरणार्थी सम्मेलन का आयोजन किया।इसी बीच असम में दंगे शुरु हो गये तो वे असम चले गये।वहां से लौटे तो चाचा डा.सुधीर विश्वास को वहां भेज दिया ताकि शरणार्थियों के इलाज का इंतजाम हो सके।चाचाजी भी लंबे समय तक असम के शरणार्थी इलाकों में रहे।
इस बीच कम्युनिस्टों से उनका पूरा मोहभंग हो गया क्योंकि ढिमरी ब्लाक के आंदोलन से पार्टी ने अपना पल्ला झाड़ लिया और तेलंगाना आंदोलन इससे पहले वापस हो चुका था।बंगाल के कामरेडों से लगातार उनका टकराव होता रहा है।
1964 में पूर्वी बंगाल के दंगों की वजह से जो शरणार्थी सैलाब आया,उसे लेकर पुलिनबाबू ने फिर नये सिरे सेा आंदोलन की शुरुआत कर दी जिसके तहत लखनऊ के चारबाग स्टेशन पर लगातार तीन दिनों तक ट्रेनें रोकी गयीं।
साठ के दशक में ही पुलिनबाबू तराई के सभी समुदायों के नेता के तौर पर स्थापित हो गये थे।वे तराई विकास सहकारिता समिति के उपाध्यक्ष बने सरदार भगत सिंह को हराकर।तो अगली दफा वे निर्विरोध उपाध्यक्ष बने।इस समिति के अध्यक्ष पदेन एसडीएम होते थे।इसी के साथ पूरी तराई के सभी समुदायों को साथ लेकर चलने की इनकी रणनीति मजबूत होती रही।
1971 में मुजीब इंदिरा समझौते के तहत पूर्वीबंगाल से आनेवाले शरणार्थियों का पंजीकरण रुक गया।शरणार्थी पुनर्वास का काम अधूरा था और पुनर्वास मंत्रालय खत्म हो गया।तजिंदगी वे इसके खिलाफ लड़ते रहे।
1971 के बांग्लादेश स्वतंत्रता युद्ध के बाद वे फिर ढाका में थे और शरणार्थी समस्या के समाधान के लिए दोनों बंगाल के एकीकरणकी मांग कर रहे थे।वे फिर गिरफ्तार कर लिये गये और वहां से रिहा होकर लौटे तो 1971 के मध्यावधि चुनाव में इंदिरा गांधी के समर्थन में बंगालियों को एकजुट करने के लिए सभी दलों के झंडे छोड़ दिये।इसी चुनाव में नैनीताल से केसी पंत भारी मतों से जीते और तबसे लेकर केसी पंत से उनके बहुत गहरे संबंध रहे।
1974 में इंदिरा जी की पहल पर उन्होंने भारत भर में शरणार्थी इलाकों का दौरा किया और उनके बारे में विस्तृत रपट इंदिरा जी को सौंपी।वे शरणार्थियों को सर्वत्र मातृभाषा और संवैधानिक आरक्षण देने की मांग कर रहे थे और भारत भर में बसे शरणार्थियों का पंजीकरण भारतीय नागरिक की हैसियत से करने की मांग कर रहे थे।आपातकाल में भी शरणार्थी समस्याओं को सुलझाने की गरज से वे इंदिरा गांधी के साथ थे।जबकि हम इंदिरा की तानाशाही के खिलाफ जारी लड़ाई से सीधे जुड़े हुए थे।इसी के तहत 1977 के चुनाव में जब वे कांग्रेस के साथ थे ,तब हम कांग्रेस के खिलाफ छात्रों और युवाओं का नेतृत्व कर रहे थे।तभी उनके और हमारे रास्ते अलग हो गये थे।
उस चुनाव में बुरी तरह हारने के बाद इंदिरा जी के साथ पुलिनबाबू के सीधे संवाद का सिलसिला बना और इंदिरा गांधी 1980 में सत्ता में वापसी से पहले दिनेशपुर भी आयीं।लेकिन पुलिनबाबू की मांगें मानने के सिलिसिले में उन्होंने क्या किया, हमें मालूम नहीं है।जबकि 1974 से लगातार शरणार्थियों की नागरिकता,उनकी मातृभाषा के अधिकार और संवैधानिक आरक्षण की मांग लेकर वे बार बार भारतभर के शरणार्थी इलाकों में भटकते रहे थे।इंदिराजी के संपर्क में होने के बावजूद कांग्रेस ने तबसे लेकर आज तक शरणार्थियों की बुनियादी समस्याओं को सुलझाने में कोई पहल नहीं की।फिर भी वे तिवारी और पंत के भरोसे थे,यह हमारे लिए अबूझ पहेली रही है।
31 अक्तूबर 1984 को इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्हें देखने पुलिनबाबू अस्पताल भी पहुंचे थे।वे दिल्ली में ही ते उस वक्त।तब तक दिल्ली में दंगा शुरु हो चुका था।नारायण दत्त तिवारी उन्हें अस्पताल से सुरक्षित अपने निवास तक ले गये थे।
इस मित्रता को जटका तब लगा ,जब 1984 में केसी पंत को टिकट नहीं मिला तो पुलिनबाबू तिवारी की ओर से पंत के खिलाफ खड़े  सत्येंद्र गुड़िया के खिलाफ लोकसभा चुनाव में खड़े हो गये तो उन्हें महज दो हजार वोट ही मिले। लेकिन पुलिनबाबू को आखिरी वक्त देखने वाले वे ही तिवारी थे।
अस्सी के दशक में शरणार्थियों के खिलाफ असम और त्रिपुरा में हुए खूनखराबा के विदेशी हटाओ आंदोलन से पुलिनबाबू शरणार्थियों की नागरिकता को लेकर बेहद परेशान हो गये और वे देस भर में शरणार्थियों को एकजुट करने में लगे रहे।उन्हे यूपी में दूसरे लोगों का समर्थन मिल गया लेकिन असम की समस्या से बाकी देस के शरणार्थी बेपरवाह रहे 2003 के नागरिकता संशोधन कानून के तहत उनकी नागरिकता छीन जाने तक।आखिरी दिनों में पुलिनबाबू एकदम अकेले हो गये थे।दूसरों की क्या कहें,हम भी उनके साथ नहीं थे।हमने भी 2003 से पहले शरणार्थियों की नागरिकता को कोई समस्या नहीं माना।हम सभी पुलिनबाबू की चिंता बेवजह मान रहे थे।
बहरहाल साठ के दशक में अखिल भारतीय उद्वास्तु समिति बनी,जिसके पुलिनबाबू अध्यक्ष थे।लेकिन वे राष्ट्रव्यापी संगठन बना नहीं सकें।
इसी के मध्य साठ के दशक में वे चौधरी चरण सिंह के किसान समाज की राष्ट्रीय कार्यकारिणी समिति में थे तो 1969 में अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर वे भारतीय जनसंघ में शामिल हो गये लेकिन जनसंघ के राष्ट्रीय मंच पर उन्हें अटल जी के वायदे के मुताबिक शरणार्थी समस्या पर कुछ कहने की इजाजत नहीं दी गयी तो सालभर में उन्होंने जनसंघ छोड़ दिया।
1971 में दस गावों के विजयनगर ग्रामशभा के सभापति वे निर्विरोध चुने गये।लेकिन फिर उसे भी तोबा कर लिया।
1973 में मेरे नैनीताल जीआईसी मार्फत डीेएसबी कालेज परिसर  में दाखिले के बाद मैं उनके किसी आंदोलन में शामिल नहीं हो पाया,पर चिपको आंदोलन और उत्तराखंड संघर्ष वाहिनी के हर आंदोलन में वे हमारे साथ थे।हमारे विरोध के बावजूद वे पृथक उत्तराखंड का समर्थन करने लगे थे।
नारायण दत्त तिवारी के मुख्यमंत्री बनने के बाद बंगाली शरणार्थियों की जमीन से बेदखली के मामलों की जांच के लिए एक तीन सदस्यीय आयोग बना,जिसके सदस्य थे,पुलिनबाबू,सरदार भगत सिंह और हरिपद विश्वास।
असम आंदोलन के मद्देनजर देशभर में बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता छिनने की आशंका से पुलिनबाबू ने 1983 में दिनेशपुर में अखिल भारतीय शरणार्थी सम्मेलन का आयोजन किया तो सत्तर के दशक से मृत्युपर्यंत भारत के कोने कोने में शरणार्था आंदोलनों में निरंतर सक्रिय रहे।
1993 में वे फिर किसी को कुछ बताये बिना बांग्लादेश गये।वे चाहते थे कि किसी तरह से बांग्लादेश से आनेवाला शरणार्थी सैलाब बंद हो।लेकिन शरणार्थियों का राष्ट्रीय संगठन बनाने के अपने प्रयासों में उन्हें कभी कामयाबी नहीं मिली।जिसकी वजह से शरणार्थी जहां के तहां रह गये।बांग्लादेश तक उनका संदेश कभी नहीं पहुंचा।

2001 में पता चला कि उन्हें कैंसर है और 12 जून 2001 को कैंसर की वजह से उनकी मृत्यु हो गयी।

नर्मदा डायरी

 नर्मदा डायरी
सरदार सरोवर बांध परियोजना के प्रतिकूल प्रभाव वाले लोगों के संघर्ष पर एक नर्मदा डायरी 1995 की डॉक्यूमेंट्री है। इसे आनंद पटवर्धन और सिमंतिनी धूरू द्वारा निर्देशित किया गया था और वर्ष 1995 में रिलीज़ किया गया था।  
हमने यह फिल्म हाल में देखी।कोलकाता जनसत्ता से रिटायर होने के बाद अपने पैतृक गांव बसंतीपुर,उत्तराखंड में इन दिनों हूं ,जहां पूरी तरह डिसकनेक्टेड हूं।
इस वर्ष सरकारी और गैरसरकारी दोनों तरफ से दुनियाभर में महात्मा गांधी की 150 वीं जयंती मनायी जा रही है और सत्य,अहिंसा और प्रेम पर आधारित गांधी की विचारधारा,ग्राम स्वराज और रामराज्य पर व्यापक पैमाने पर चर्चा परिचर्चा हो रही है।
1985 से लगातार जारी नर्मदा बचाओ आंदोलन स्वतंत्र भारत में विशुद्ध गांधीवादी सत्याग्रह आंदोलन के सिद्धांतों के अनुसार चल रहा है। नर्मदा की जलधारा को बांधकर प्रकृति और पर्यावरण से छेड़छाड़ के अक्षम्य अपराध के अलावा इस बांध के डूब में शामिल गांवों के करीब दो लाख आदिवासियों के जबरन विस्थापन विकास के नाम पर हो रहा है,जिसका अहिसंक प्रतिरोध और विस्थापित मनुष्यता के जीने के संघर्ष का मानवीय डाक्युमेंटशन इस फिल्म में किया गया है। जिसमें गुजरात और अन्य राज्यों के विस्थापित आदिवासी गांवों की दिनचर्या,उनकी आजीविका,जीवन शैली अपने रंग रूप में इस फिल्म में उपस्थित है।
तीन दशक के नर्मदा बचाओ आंदोलन के देस के स्वतन्त्रता संग्राम में गांधी के नेतृत्व में चले मैराथन सत्याग्रह की समकालीन यथार्थ है। गांधी के सत्याग्रह के परिणामस्वरूप देश स्वतन्तर हुआ क्योंकि ब्रिटिश हुकूमत,ब्रिटिश सत्ता और ब्रिटिश संसद में कुछ तत्व इस सत्याग्रह से अव्शय ही प्राभावित हुए रहे होंगे। लेकिन विडंबना है कि स्वतन्त्र भारत में गांधीवादी सत्याग्रह की कोी सुनवाई न सरकार में है और न प्रशासन में । बांध की ऊंचाई लगातार बढ़ती ही जा रही है।
निर्देशक आनन्द पटवर्द्धन ने अपने इस वृत्तचित्र में तथ्यों,आंकड़ों को कालक्रमके अनुसार रखते हुए इस मानवीय संकट को यथार्थ के मुताबिक उपस्थित करते हुए वर्तमान समय में गांधी के सत्याग्रह के औचित्य पर बुनियादी सवाल खड़े किया है।
गौरतलब है कि नर्मदा घाटी के आदिवासी ही गांधीवादी सत्याग्रह के तहत जल जंगल जमीन की लड़ाई लड़ रहे हैं, जबकि बाकी देश में समूचे मध्य भारत और पूर्वोत्तर में आदिवासी प्रतिरोध सशस्त्र है। मधय भारत और आदिवासी भूगोल में िस प्रतिरोध को माओवादी कहा जाता है तो पूर्वोतत्र में मणिपुर,मिजोरम,नगालैंड,त्रिपुरा,असम जैसे राज्यों में उग्रवादी। मजे की बात यह है कि सिक्किम को छोड़कर पूर्वोत्तर में इस आदिवासी सशत्र प्रतिरोध के कारण गांव , हरियाली और प्रकृति की कीमत पर कहीं कोी विकास परियोजना नहीं चल पा रही है। इसके विपरीत नर्मदा घाटी में तीनदशक के आंदोलन के बावजूद आदिवासी अपने जल जंगल दमीन से बेदखल हो रहे हैं।
पलाश विश्वास
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