Sustain Humanity
Saturday, October 29, 2016
नई विश्व व्यवस्था बनाने की तैयारी में है इजराइल,साझेदार संघ परिवार पलाश विश्वास
Thursday, October 27, 2016
Mrinal Sikder নাগরিকত্ব বিলের বিরোধিতা করল তৃনমুল কংগ্রেস। এর আগে একই রাস্তাতে হেটেছে সিপিএমের সেলিম, কংগ্রেসের তরুন গগৈ। যুক্তি টা কি? এটা সাম্প্রদায়িক বিল। কিন্তু এখন প্রশ্ন হল ভারত ভাগ ভাষা বা ভুগোলের ভিত্তি হয়েছিল কি? না, এটা সম্পুর্ন দ্বিজাতিত্তত্বের ভিত্তিতে হয়েছিল।বাংলাদেশ পাকিস্তানের সংখ্যালঘুরা মুসলিম মৌলবাদের জন্য উদ্বাস্তু হয়েছিল এবং এখনও হচ্ছে। তাই ধর্মীয় নির্যাতনের বলি এই হিন্দু, বৌদ্ধ, খ্রিষ্টান দের নাগরিকত্ব কিভাবে সাম্প্রদায়িক হতে পারে? এখন যেসব মুসলিমরা বাংলাদেশ বা পাকিস্তান থেকে আসছে তারা আসছে ভারত থেকে উপার্জন করে বাংলাদেশে পাঠানোর জন্য নতুবা ভারতের জনবিন্যাসের পরিবর্তনন করে মুসলিম সংখ্যাগরিষ্ঠ পাকিস্তানে পরিনত করতে। বিশ্বের কোন দেশ এইভাবে অবৈধ অনুপ্রবেশকারী দের নাগরিকত্ব দেয় কি? আর মুসলিমদের যদি নাগরিকত্ব দিতে হয় তবে বাংলাদেশ বা পাকস্তানকেও ভারতে সংগে জুড়ে দেওয়া হোক। তাই সকল উদবাস্ত দরদী মানুষের কাছে আবেদন আপনারা ঐক্যবদ্ধ আন্দোলন গড়ে তুলুন, নিজের অধিকারে আদায়ের জন্য সমস্ত ষড়যন্ত্রের বিরুদ্ধে সোচ্চার হন
নাগরিকত্ব বিলের বিরোধিতা করল তৃনমুল কংগ্রেস। এর আগে একই রাস্তাতে হেটেছে সিপিএমের সেলিম, কংগ্রেসের তরুন গগৈ। যুক্তি টা কি? এটা সাম্প্রদায়িক বিল। কিন্তু এখন প্রশ্ন হল ভারত ভাগ ভাষা বা ভুগোলের ভিত্তি হয়েছিল কি? না, এটা সম্পুর্ন দ্বিজাতিত্তত্বের ভিত্তিতে হয়েছিল।বাংলাদেশ পাকিস্তানের সংখ্যালঘুরা মুসলিম মৌলবাদের জন্য উদ্বাস্তু হয়েছিল এবং এখনও হচ্ছে। তাই ধর্মীয় নির্যাতনের বলি এই হিন্দু, বৌদ্ধ, খ্রিষ্টান দের নাগরিকত্ব কিভাবে সাম্প্রদায়িক হতে পারে? এখন যেসব মুসলিমরা বাংলাদেশ বা পাকিস্তান থেকে আসছে তারা আসছে ভারত থেকে উপার্জন করে বাংলাদেশে পাঠানোর জন্য নতুবা ভারতের জনবিন্যাসের পরিবর্তনন করে মুসলিম সংখ্যাগরিষ্ঠ পাকিস্তানে পরিনত করতে। বিশ্বের কোন দেশ এইভাবে অবৈধ অনুপ্রবেশকারী দের নাগরিকত্ব দেয় কি? আর মুসলিমদের যদি নাগরিকত্ব দিতে হয় তবে বাংলাদেশ বা পাকস্তানকেও ভারতে সংগে জুড়ে দেওয়া হোক। তাই সকল উদবাস্ত দরদী মানুষের কাছে আবেদন আপনারা ঐক্যবদ্ধ আন্দোলন গড়ে তুলুন, নিজের অধিকারে আদায়ের জন্য সমস্ত ষড়যন্ত্রের বিরুদ্ধে সোচ্চার হন
Subodh Biswas বজ্রাঘাত , এ কি শুনতে পেলাম। বাঙালি জাতির দিদি মাননীয়া মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জী নাগরিকত্ব বিলের বিরোধিতা করবেন। ।যেসব বাঙালি রাজনীতিক দল উদ্বাস্তুদের ভোটে বিজয়ী হন, তারা কেন মুখে গোদরেজের তালা মেরে আছেন। কোথায় গেল মমতা দিদির প্রতিশ্রুতি ? কোথায় গেলো সর্বহারাদের সি পি এম পার্টী ।কংগ্রেস পার্টী ও কী শ্রবন শক্তি হারালো। অবাঙালি সাংসদরা পার্লামেন্টে নাগরিকত্ব বিলের সমর্থন করছেন, অথচ বাঙালি অনেক সংসদরা বিলের বিরোধিতা করবেন। এরা উদ্স্তু বাঙালিদের বনদ্ধু না শত্রু। আমরা কাদের বিজয়ী করেছি। দুখের বিষয় উদ্বাস্তু সংসদরাও বাকশক্তি হারিয়ে ফেলেছেন। এমন কী ঠাকুর নগরের মাননীয়া মমতা বালা ঠাকুরেও কোন প্রতিকৃয়া পাচ্ছিনা। অভিভাবক হীন ছিন্নমূল জনগোষ্ঠীদের আসল বন্ধু কে বুঝেনেবার সময় এসেগেছে।
বজ্রাঘাত , এ কি শুনতে পেলাম। বাঙালি জাতির দিদি মাননীয়া মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জী নাগরিকত্ব বিলের বিরোধিতা করবেন। ।যেসব বাঙালি রাজনীতিক দল উদ্বাস্তুদের ভোটে বিজয়ী হন, তারা কেন মুখে গোদরেজের তালা মেরে আছেন। কোথায় গেল মমতা দিদির প্রতিশ্রুতি ? কোথায় গেলো সর্বহারাদের সি পি এম পার্টী ।কংগ্রেস পার্টী ও কী শ্রবন শক্তি হারালো। অবাঙালি সাংসদরা পার্লামেন্টে নাগরিকত্ব বিলের সমর্থন করছেন, অথচ বাঙালি অনেক সংসদরা বিলের বিরোধিতা করবেন। এরা উদ্স্তু বাঙালিদের বনদ্ধু না শত্রু। আমরা কাদের বিজয়ী করেছি। দুখের বিষয় উদ্বাস্তু সংসদরাও বাকশক্তি হারিয়ে ফেলেছেন। এমন কী ঠাকুর নগরের মাননীয়া মমতা বালা ঠাকুরেও কোন প্রতিকৃয়া পাচ্ছিনা। অভিভাবক হীন ছিন্নমূল জনগোষ্ঠীদের আসল বন্ধু কে বুঝেনেবার সময় এসেগেছে।
शरणार्थियों की नागरिकता के विरोध में ममता बनर्जी और इस विधेयक को लेकर बंगाल और असम में धार्मिक ध्रूवीकरण बेहद तेज शरणार्थियों को नागरिकता का मामला कुछ ऐसा ही बन गया है जैसे महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण का मामला है।तकनीकी विरोध के तहत संसद के हर सत्र में महिला सांसदों की एकजुटता के बावजूद उन्हें राजनीतिक आरक्षण सभी दलों की ओर से जैसे रोका जा रहा है,2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक के तक
शरणार्थियों की नागरिकता के विरोध में ममता बनर्जी और इस विधेयक को लेकर बंगाल और असम में धार्मिक ध्रूवीकरण बेहद तेज
शरणार्थियों को नागरिकता का मामला कुछ ऐसा ही बन गया है जैसे महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण का मामला है।तकनीकी विरोध के तहत संसद के हर सत्र में महिला सांसदों की एकजुटता के बावजूद उन्हें राजनीतिक आरक्षण सभी दलों की ओर से जैसे रोका जा रहा है,2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक के तकनीकी मुद्दों के तहत मुसलमान वोट बैंक को साध लेने की होड़ में विभाजनपीड़ितों की नागरिकता का मामला तो लटक ही गया है और इससे असम और बंगाल में कश्मीर से भी भयंकर हालात पैदा हो रहे हैं।पहले शरणार्थी वामदलों के साथ थे।मरीचझांपी नरसंहार के बाद परिवर्तन काल में शरणार्थी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हो गये और शरणार्थियों में देशबर में कहीं भी वामदलों का समर्थन नहीं है।धर्मनिरपेक्ष राजनीति के इस विधेयक के तकनीकी विरोध के साथ शरणार्थी अब पूरे देश में संघ परिवार के खेमे में चले जायेंगे।बंगाल में 2021 में संघ परिवार के राजकाज की तैयारी जोरों पर है।
पलाश विश्वास
सबसे पहले यह साफ साफ कह देना जरुरी है कि हम भारत ही नहीं,दुनियाभर के शरणार्थियों के हकहकू के लिए लामबंद हैं।
सबसे पहले यह साफ साफ कह देना जरुरी है कि हम विभाजनपीड़ित शरणार्थियों की नागरिकता के लिए जारी देशव्यापी आंदोलन के साथ है।
सबसे पहले यह साफ साफ कह देना जरुरी है कि विभाजनपीड़ितों की नागरकता के मसले को लेकर धार्मिक ध्रूवीकरण की दंगाई राजनीति का हम पुरजोर विरोध करते हैं।विभाजनपीड़ितों की पहचान अस्मिताओं या धर्म का मसला नहीं है।यह विशुद्ध तौर पर कानूनी और प्रशासनिक मामला है,जिसे जबर्दस्ती धार्मिक मसला बना दिया गया है और पूरी राजनीति इस धतकरम में शामिल है,जो विभाजनपीड़ितों के खिलाफ है।
कुछ दिनों पहले मैंने लिखा था कि इतने भयंकर हालात हैं कि अमन चैन के लिहाज से उनका खुलासा करना भी संभव नही है।पूरे बंगाल में जिस तरह सांप्रदायिक ध्रूवीकरण होने लगा है,वह गुजरात से कम खतरनाक नहीं है तो असम में भी गैरअसमिया तमाम समुदाओं के लिए जान माल का भारी खतरा पैदा हो गया है। गुजरात अब शांत है।लेकिन बंगाल और असम में भारी उथल पुथल होने लगा है।मैंने लिखा था कि असम और बंगाल में हालात कश्मीर से ज्यादा संगीन है।
पहले मैं इस संवेदनशील मुद्दे पर चुप रहना बेहतर समझ रहा था लेकिन हालात असम में विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के खिलाफ अल्फाई आंदोलन और बंगाल में भी धार्मिक ध्रूवीकरण की वजह से बेहद तेजी से बेलगाम होते जा रहे हैं,इसलिए अंततः इस तरफ आपका ध्यान खींचना अनिवार्य हो गया है।
नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 को लेकर यह ध्रूवीकरण बेहद ते ज हो गया है।हम शुरु से शरणार्थियों के साथ हैं।यह समस्या 2003 के नागरिकता संशोधन विधयक से पैदा हुई है,जो सर्वदलीय सहमति से संसद में पास हुआ।
जन्मजात नागरिकता का प्रावधान खत्म होने से जो पेजदगिया पैंदा हो गयी हैं,उन्हें उस कानून में किसी भी तरह का संशोधन से खत्म करना नामुमकिन है।
1955 के नागरिकता कानून के तहत शरणार्थियों को जो नागरिकता का अधिकार दिया गया था,उसे छीन लेने की वजह से यह समस्या है।
यह कानून भाजपा ने पास कराया था,जिसका समर्थन बाकी दलों ने किया था।बाद में 2005 में डा. मनमोहनसिह की कांग्रेस सरकार ने इस कानून को संसोधित कर लागू कर दिया।गौरतलब है कि मनमोहन सिह और जनरल शंकर राय चौधरी ने ही 2003 के नागरिकता संशोधन विधेयक में शरणार्थियों को नागरिकता का प्रावधान रखने का सुझाव दिया था,लेकिन जब उनकी सरकार ने उस कानून को संशोधित करके लागू किया तो वे शरणार्थियों की नागरिकता का मुद्दा सिरे से भूल गये।
अब वही भाजपा सत्ता में है और वह अपने बनाये उसी कानून में संसोधन करके मुसलमानों को चोड़कर तमाम शरणार्थियों को नागरिकता देने के लिए नागरिकता संशोधन 2016 विधेयक पास कराने की कोशिश में है और उसे शरणार्थी संगठनों का समर्थन हासिल है।लेकिन भाजपा को छोड़कर किोई राजनीतिक दल इस विधेयक के पक्ष में नहीं है।दूसरी ओर,शरणार्थियों की नागरिकता के बजाय संघ परिवार मुसलमानों को नागरिकता के अधिकार से वंचित करने की तैयारी में है।जबकि तृणमूल कांग्रेस और वामपंथी दलों के साथ असम की सरकार के इस विधेयक को समर्थन के बावजूद असम के तमाम राजनीतिक दल और अल्फा,आसु जैसे संगठन इसके प्रबल विरोध में हैं।आसु ने असम में इसके खिलाफ आंदोलन तेज कर दिया है।असम में गैर असमिया समुदायोेें के खिलाफ कभी भी फिर दंगे भड़क सकते हैं।भयंकर दंगे।
राजनीतिक दल इस कानून के तहत मुसलमानों को भी नागरिकता देने की मांग कर रहे हैं जिसके लिए संघ परिवार या एसम के राजनीतिक दल या संगठन तैयार नहीं हैं।असम में तो किसी भी गैरअसमिया के नागरिक और मानवाधिकार को मानने के लिए अल्फा और आसु तैयार नहीं है,भाजपा की सरकार में राजकाज उन्हीं का है।
वामपंथी दलों के साथ तृणमूल कांग्रेस इस विधेयक का शुरु से विरोध करती रही है।अब बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी और पश्चिम बंगालसरकार इस विधेयक का आधिकारिक विरोध करते हुए उसे वापस लेने की मांग कर रही है।
शरणार्थियों को नागरिकता का मामला कुछ ऐसा ही बन गया है जैसे महिलाओं को राजनीतिक आरक्षण का मामला है।तकनीकी विरोध के तहत संसद के हर सत्र में महिला सांसदों की एकजुटता के बावजूद उन्हें राजनीतिक आरक्षण सभी दलों की ओर से जैसे रोका जा रहा है,2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक के तकनीकी मुद्दों के तहत मुसलमान वोट बैंक को साध लेने की होड़ में विभाजनपीड़ितों की नागरिकता का मामला तो लटक ही गया है और इससे असम और बंगाल में कश्मीर से भी भयंकर हालात पैदा हो रहे हैं।पहले शरणार्थी वामदलों के साथ थे।मरीचझांपी नरसंहार के बाद परिवर्तन काल में शरणार्थी तृणमूल कांग्रेस के पक्ष में हो गये और शरणार्थियों में देशबर में कहीं भी वामदलों का समर्थन नहीं है।धर्मनिरपेक्ष राजनीति के इस विधेयक के तकनीकी विरोध के साथ शरणार्थी अब पूरे देश में संघ परिवार के खेमे में चले जायेंगे।बंगाल में 2021 में संघ परिवार के राजकाज की तैयारी जोरों पर है।
गौरतलब है कि दंडकारण्य और बाकी भारत से विभाजनपीड़ितों को बंगाल बुलाकर उनके वोटबैंक के सहारे कांग्रेस को बंगाल में सत्ता से बेदखल करने का आंदोलन कामरेड ज्योति बसु और राम चटर्जी के नेतृत्व में वामदलों ने शुरु किया था।मध्यबारत के पांच बड़े शरणार्थी शिविरों को उन्होंने इस आंदोलन का आधार बनाया था।शरणार्थियों के मामले में बंगल की वामपंथी भूमिका से पहले ही मोहभंग हो जाने की वजह से शरणार्थियों के नेता पुलिनबाबू ने तब इस आंदोलन का पुरजोर विरोध किया था,जिस वजह से वाम असर में सिर्फ दंडकारण्य के शरणार्थी ही वाम आवाहन पर सुंदरवन के मरीचझांपी पहुंचे तब तक कांग्रेस को वोटबैंक तोड़कर मुसलमानों के समर्थन से ज्योति बसु बंगाल के मुख्यमंत्री बन चुके थे और वामदलों के लिए शरणार्थी वोट बैंक की जरुरत खत्म हो चुकी थी।जनवरी 1979 में इसीलिए मरीचझांपी नरसंहार हो गया और बंगाल और बाकी देश में वामपंथियों के खिलाफ हो गये तमाम शरणार्थी।
बहुत संभव है कि लोकसभा में भारी बहुमत और राज्यसभा में जोड़ तोड़ के दम पर संघ परिवार यह कानून पास करा लें लेकिन 1955 के नागरिकता कानून को बहाल किये बिना संशोधनों के साथ 2003 के कानून को लागू करने में कानूनी अड़चनें भी कम नहीं होंगी और इस नये कानून से नागरिकता का मामला सुलझने वाला नहीं है।शरणार्थी समस्या सुलझने के आसार नहीं है लेकिन इस प्रस्तावित नागरिकता संशोधन के विरोध और विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के साथ मुसलमान वोट बैंक की राजनीति जुड़ जाने से जो धार्मिक ध्रूवीकरण बेहद तेज हो गया है,उससे बंगाल और असम में पंजाब,गुजरात और कश्मीर से भयानत नतीजे होने का अंदेशा है।
जहां तक हमारा निजी मत है,हम 2003 के नागरिकता संशोदन कानून को सिरे से रद्द करके 1955 के नागरिकता कानून को बहाल करने की मांग करते रहे हैं।1955 के कानून को लेकर कोई विरोध नही रहा है।इसीके मद्देनजर हमने अभी तक इस मुद्दे परकुछ लिखा नहीं है और न ही संसदीय समिति को अपना पक्ष बताया है क्योंकि संसदीय समिति में शामिल सदस्यअपनी अपनी राजनीति कर रहे हैं और सुनवाई सिर्फ इस विधेयक को लेकर राजनीतिक समीकरण साधने का बहाना है।
वे हमारे अपने लोग हैं जिनके लिए मेरे दिवंगत पिता पुलिनबाबू ने तजिंदगी सीमाओं के आर पार सर्वहारा बहुजनों को अंबेडकरी मिशन के तहत एकताबद्ध करने की कोशिश में दौड़ते रहे हैं। जब बंगाल में कम्युनिस्ट नेता बंगाल से बाहर शरणार्थियों के पुनर्वास का पुरजोर विरोध कर रहे थे,तब पुलिनबाबू कम्युनिस्टों के शरणार्थी आंदोलन में बने रहकर शरणार्थियों को बंगाल से बाहर दंडकारण्य या अंडमान में एकसाथ बसाकर उन्हें पूर्वी बंगाल जैसा होमलैंड देने की मांग कर रहे थे।
केवड़ातला महाश्मशान पर इस मांग को लेकर पुलिनबाबू ने आमरण अनशन शुरु किया तो उनका कामरेड ज्योतिबसु समेत तमाम कम्युनिस्ट नेताओं से टकराव हो गया।उन्हें ओड़ीशा उनके साथियों के सात भेज दिया गया लेकिन जब उनका आंदोलन वहां भी जारी रहा तो उन्हें नैनीताल की तराई के जंगल में भेज दिया गया।वहां भी कम्युनिस्ट नेता की हैसियत से उन्होंने ढिमरी ब्लाक किसान आंदोलन का नेतृत्व किया।आंदोलन के सैन्य दमन के बाद तेलंगना के तुरंत बाद कम्युनिस्ट पार्टी ने उस आंदोलन से नाता तोड़ दिया।फिर उन्होंने कम्युनिस्टों पर कभी भरोसा नहीं किया।
वैचारिक वाद विवाद में बिना उलझे पुलिनबाबू हर हाल में शरणार्थियों की नागरिकता,उनके आरक्षण और उनके मातृभाषी के अधिकार के लिए लड़ते रहे।1971 में बांग्लादेश बनने के बाद भी वे ढाका में शरणार्थी समस्या के स्थाई हल के लिए पूर्वी और पश्चिमी बंगाल के एकीकरण की मांग करते हुए जेल गये।
1971 के बाद वीरेंद्र विश्वास ने भी पद्मा नदी के इस पार बांग्लादेश के अल्पसंख्यकों के लिए होम लैंड आंदोलन शुरु किया था।मरीचझापी आंदोलन में भी वे नरसंहार के शिकार शरणार्थियों के साथ खड़े थे।
तबसे आजतक विभाजनपीड़ित बंगाली शरणाऱ्थियों की नागरिकता,आरक्षण और मातृभाषा के अधिकार को लेकर आंदोलन जारी है लेकिन किसी भी स्तर पर इसकी सुनवाई नहीं हो रही है।सीमापार से लगातार जारी शरणार्थी सैलाब की वजह से दिनोंदिन यह समस्या जटिल होती रही है।भारत सरकार ने बांग्लादेश में अल्पसंक्यक उत्पीड़न रोकने के लिए कोई पहल 1947 से अब तक नही की है।2003 के कानून के बाद सन1947 के विभाजन के तुरंत बाद भारत आ चुके विभाजनपीड़ितों की नागरिकता छीन जाने से यह समस्या बेहद जटिल हो गयी है।1971 से हिंदुओं के साथ बड़े पैमाने पर असम,त्रिपुरा,बिहार और बंगाल में जो बांग्लादेशी मुसलमान आ गये,उसके खिलाफ असम औरत्रिपुरा में हुए खून खराबे के बावजूद इस समस्या को सुलझाने के बजाय राजीतिक दल अपना अपना वोटबैंक मजबूत करने के मकसद से राजनीति करते रहे,शरणार्थी समस्या सुलझाने की कोशिश ही नहीं हुई।
1960 के दशक में बंगाली शरणार्थियों के खिलाफ असम में हुए दंगो के बाद से लगातार पुलिन बाबू शरणार्थियों की नागरिकता की मांग करते रहे लेकिन वे शरणार्थियों का कोई राष्ट्रव्यापी संगठन बना नहीं सके।वे 1960 में असम के दंगाग्रस्त इलाकों में शरणार्तियों के साथ थे।अस्सी के दशक में भी बिना बंगाल के समर्थन के विदेशी हटाओ के बहाने असम से गैर असमिया समुदायों को खदेडने के खिलाफ वे शरणार्थियों की नागरिकता के सवाल को मुख्य मुद्दा मानते रहे हैं।
शरणार्थी समस्या सुलझाने के मकसद से अटल बिहारी वाजपेयी की पहल पर वे 1969 में भारतीय जनसंघ में शामिल भी हुए तो सालभर में उन्हें मालूम हो गया कि संघियों की कोई दिलचस्पी शरणार्थियों को नागरिकता देने में नहीं है।
हमें अनुभवों से अच्छीतरह मालूम है कि शरणार्थियों को बलि का बकरा बनाने की राजनीति की क्या दशा और दिशा है।लेकिन राजनीति यही रही तो हम शरणार्थी आंदोलन के केसरियाकरण को रोकने की स्थिति में कतई नही हैं।जो अंततः बंगाल में केसरियाकरण का एजंडा भी कामयाब बना सकता है।वामपंथी इसे रोक नही सकते।
बाकी राजनीतिक दलों के विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के किलाफऱ लामबंद हो जाने के बाद असम और बंगाल में ही नहीं बाकी देश में भी इस मुद्दे पर धार्मिक ध्रूवीकरण का सिलसिला तेज होने का अंदेशा है।
कानूनी और तकनीकी मुद्दों को सुलझाकर तुरंत विभाजनपीड़ितों की नागरिकता देने की सर्वदलीय पहल हो तो यह धार्मिक ध्रूवीकरण रोका जा सकता है।
The Citizenship (Amendment) Bill, 2016
Security / Law / Strategic affairs |
The Citizenship (Amendment) Bill, 2016 |
Highlights of the Bill
Key Issues and Analysis
Read the complete analysis here http://www.prsindia.org/billtrack/the-citizenship-amendment-bill-2016-4348/ |
Wednesday, October 26, 2016
Ambika Ray There was intense meeting on 25 th October in New Delhi with Dr.Satyapal Singh , Chairman of the Joint Parliamentary Committee on the issue of how to get the Citizenship Bill passed in both the house of the PARLIAMENT. Nikhil Bharat delegates have given all the noting to the Chairman in the long discussion. Again Nikhil Bharat delegates have been called before the Parliamentary Committee to have further discussion on 2 nd Nov.2016.
Ambika Ray
There was intense meeting on 25 th October in New Delhi with Dr.Satyapal Singh , Chairman of the Joint Parliamentary Committee on the issue of how to get the Citizenship Bill passed in both the house of the PARLIAMENT. Nikhil Bharat delegates have given all the noting to the Chairman in the long discussion. Again Nikhil Bharat delegates have been called before the Parliamentary Committee to have further discussion on 2 nd Nov.2016.
The question is not whether the Nobel Committee got anything right or wrong. Instead, let us, for at least once, apply our mind to the fundamental issue that all the so-called Nobel Prizes are awarded violating Alfred Nobel's last will and testament. By awarding these prizes the Nobel Foundation is literally portraying the recipients as illiterate, because they never question the legal standing of the prizes they are receiving. This must come to an end at once.
| Subodh Roy |
| October 26 at 9:02am |
Tuesday, October 25, 2016
সময় এসেছে। ভিক্ষা বৃত্তি ছাড়ুন। বাংলার নিপিড়িত শোষিত বঞ্চিত বহুজনের স্বার্থে একত্রিত হোন। রাজনৈতিক ক্ষ্মতায়নের মধ্য দিয়েই যোগ্য জবাব দিন এই যুগান্তের ষড়যন্ত্রকারীদের।
মোদিভাইয়ের আনা নাগরিকত্ব সংশোধনী বিল একেবারে বাতিল করার দাবী তুললেন দিদিভাই। দুর্দান্ত সাজানো নাটকের প্লট। শ্যামাপ্রসাদ থেকে শ্যামাঙ্গিনী মমতা নিখুঁত অভিনেতা অভিনেত্রী। দিদিভাই মোদিভাইরা জেনে গেছেন যে তাদের পূর্বপুরুষেরা ভারতকে টুকরো করে বাংলাকে টুকরো করে উদ্বাস্তুদের শিরদাঁড়া ভেঙ্গে দিয়েছেন। এখন তাদের মাথা নিচু করে থাকা ছাড়া উপায় নাই। ২০১৪ সাল পর্যন্ত আগত উদ্বাস্তুদের পক্ষে নাগরিকত্ব বিলকে সংশোধন করে আইনে পরিণত করলে এই ক্লীব শিরদাঁড়ায় আবার হাড় গজাতে শুরু করবে। ঘাড় শক্ত হবে। ঝুঁকে পড়া মাথা খাঁড়া হয়ে দাঁড়াবে। মূলনিবাসীর এই খাঁড়া মাথা ব্রাহ্মন্যবাদীদের কাছে বড় বেমানান। বড় বেশি আতঙ্কের।
বিজেপি যে বিল এনেছেন তাতে অসংখ্য ছিদ্র। এমন একটি ইস্যুতে এত ছিদ্র? খসড়া বিল আনার আগে সর্বদলীয় বৈঠকে এই ছিদ্র এড়ানো যেত। আসলে আন্তরিকতা নয় রাজনৈতিক ফয়দা তোলাই এদের লক্ষ্য। মানুষকে ছিন্নমূল করে রাখতে পারলেই এরা নিশ্চিন্ত থাকতে পারে।
সমাধান একটাই, বহুজনের রাজনৈতিক ক্ষ্মতায়ন। একটি বিদ্যালয়ের জন্য আন্দোলন, বিডিও অফিস ঘেরাও, ডেপুটেশন, একটি পরিষদ ইত্যাদি ইত্যাদি আসলে আবেদন-নিবেদন এবং ভিক্ষা বৃত্তির সামিল। সংখ্যা গরিষ্ঠ কেন এই ভিক্ষা বৃত্তিতে সামিল হবে? কেন তারা রাজনৈতিক ভাবে নিজেদের অধিকার প্রতিষ্ঠিত করবেন না !! আবেদন নিবেদনে ব্যক্তি মানুষের কিছু গতি হলেও সামগ্রিক স্বার্থ রক্ষা হয় না।
সময় এসেছে। ভিক্ষা বৃত্তি ছাড়ুন। বাংলার নিপিড়িত শোষিত বঞ্চিত বহুজনের স্বার্থে একত্রিত হোন। রাজনৈতিক ক্ষ্মতায়নের মধ্য দিয়েই যোগ্য জবাব দিন এই যুগান্তের ষড়যন্ত্রকারীদের।
