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Thursday, November 3, 2016

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख भोपाल एनकाउंटर का विरोध-राजीव यादव की सरकारी हत्या का प्रयास

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Wednesday, November 2, 2016

২৬শে নভেম্বর “সংবিধান জাগৃতি অভিযান” Saradindu Uddipan


২৬শে নভেম্বর "সংবিধান জাগৃতি অভিযান" 

Saradindu Uddipan

November 3 at 6:41am
ভারতের সংবিধান গণতন্ত্রের ইতিহাসে সর্ববৃহৎ এবং সর্বশ্রেষ্ঠ সংবিধান। এই সংবিধানের জন্য ভারতের ২৯টি রাজ্য, ৭টি কেন্দ্র শাসিত অঞ্চল, ২২টি মূখ্য ভাষা, ১৭০০র বেশি মাতৃভাষা, ৭টি মূখ্য ধর্ম এবং ৬৭৪৮টির বেশি জাতি গোষ্ঠীর বিভিন্নতা থাকা সত্ত্বেও এ দেশের মানুষ সংঘবদ্ধ নাগরিক হিসেবে নিজেদের জীবন উপভোগ করছেন। ভারতের সংবিধানের ভিত এমন ভাবে গড়ে তোলা হয়েছে যে যাতে প্রত্যেক নাগরিক নিজ নিজ ক্ষেত্রে অর্থনৈতিক, সামাজিক, ধর্মীয়, বৌদ্ধিক ও সাংস্কৃতিক স্বাধীনতা উপভোগ করতে পারে। এই সংবিধান দেশের প্রত্যেক নাগরিককে ধর্ম, জাতি, লিঙ্গ, ভাষা এবং আঞ্চলিকতার উর্দ্ধে এসে সদ্ভাবনার সাথে জীবন অতিবাহিত করার মৌলিক অধিকার প্রদান করেছে।

কিন্তু অত্যন্ত বেদনার সাথে জানাচ্ছি যে, দেশে একটি ফ্যাসিবাদী শক্তি কায়েম হওয়ার পরে প্রতিনিয়ত এই সংবিধানের অবমাননা চলছে।

সংসদীয় গণতন্ত্রে যে জনকল্যাণকারী নির্ণয় সংসদের অভ্যন্তরে নেওয়ার কথা তার সমস্তটাই ভ্রষ্টাচারী নেতা ও পুঁজিবাদী সংগঠনের দ্বারা সংসদের বাইরে নেওয়া হচ্ছে। শাসকবর্গ অসমানতা এবং বর্বরতাপূর্ণ ব্যবস্থা কায়েম করার জন্য সংসদীয় গণতন্ত্র, ভারতীয় সংবিধান এবং জনগণের বিরুদ্ধে ভয়ঙ্কর ষড়যন্ত্রে লিপ্ত হয়েছে। এরা বিশ্বের সর্বশ্রেষ্ঠ গণতন্ত্রকে মনুবাদী বিচারধারা এবং ব্রাহ্মন্যবাদী একনায়কতন্ত্র এবং ফ্যাসিবাদের যূপকাষ্ঠে বলি চড়াতে চাইছে। এদের কাজকর্মে প্রমানিত হচ্ছে যে এই অমানবিক পুঁজিবাদ–ব্রাহ্মন্যবাদ দেশদ্রোহী গাটবন্ধন ভারতীয় সংবিধানকে নিজেদের কব্জায় নিয়ে ফেলেছে। 
এমন বিকট পরিস্থিতিতে ভারতের একজন গণতন্ত্র প্রেমী সচেতন নাগরিক হিসেবে সংবিধান তথা সংসদীয় গণতন্ত্র বাঁচানোর জন্য সর্বশক্তি নিয়ে এগিয়ে আসা প্রয়োজন।

এই ভয়ঙ্কর পরিস্থিতি উপলব্ধি করে আমরা ন্যাশনাল সোশাল মুভমেন্ট অব ইন্ডিয়ার পক্ষ থেকে আগামী ২৬শে নভেম্বর এক ঐতিহাসিক "সংবিধান জাগৃতি অভিযান" এর ডাক দিয়েছি। 
সমতা, স্বতন্ত্রতা, ন্যায় এবং বন্ধুত্বপূর্ণ জীবনযাপনের জন্য সকলকে একত্রিত হয়ে এই ঐতিহাসিক "সংবিধান জাগৃতি অভিযান" মহামিছিলে বিপুল সমাবেশ ঘটিয়ে ভারতীয় সংবিধানের শত্রু ও বিশ্বাসঘাতকদের সমুচিত জবাব দেবার জন্য আহ্বান জানাচ্ছি। আমাদের বিশাল উপস্থিতি এবং সোচ্চার প্রতিবাদে রাষ্ট্রের বিরুদ্ধে এই ষড়যন্ত্র ধ্বংস হবে বলে বিশ্বাস রাখি। 
জয় ভীম, জয় ভারত

পুনশ্চ ঃ সকাল ১১টায় ওয়াই চ্যানেল থেকে এই পদযাত্রা শুরু হবে। র‍্যালি শেষ হবে রেডরোড অবস্থিত বাবা সাহেব ডঃ বি আর আম্বেদকরের মূর্তির পাদদেশে। আপনারা জাতীয় পতাকা এবং সংবিধানের প্রতিলিপি নিয়ে এই মহার‍্যালিতে যোগ দিন।

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हिंदू हो या मुसलमान, शरणार्थियों की खैर नहीं। मजहबी दंगाई सियासत के लिए नागरिकता ब्रह्मास्त्र! विभाजनपीड़ित हिंदुओं को बलि का बकरा बनाकर 2003 का नागरिकता संशोधन विधेयक दरअसल भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीनने की सर्वदलीय हिंदुत्व राजनीति है।पहले नागरिकता छीनो,फिर गैरमुसलमानों को नागरिकता दे दो,लेकिन मुसलमानों को नागरिकता कतई मत दो। सेना को समर्थन का मतलब,अबाध पूंजी के लिए यु�


हिंदू हो या मुसलमान, शरणार्थियों की खैर नहीं।

मजहबी दंगाई सियासत के लिए नागरिकता ब्रह्मास्त्र!

विभाजनपीड़ित हिंदुओं को बलि का बकरा बनाकर 2003 का नागरिकता संशोधन विधेयक दरअसल भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीनने की सर्वदलीय हिंदुत्व राजनीति है।पहले नागरिकता छीनो,फिर गैरमुसलमानों  को नागरिकता दे दो,लेकिन मुसलमानों को नागरिकता कतई मत दो।

सेना को समर्थन का मतलब,अबाध पूंजी के लिए युद्ध गृहयुद्ध के कारोबार और नागरिकों के कत्लेआम को समर्थन!

पलाश विश्वास

विभाजनपीड़ित हिंदुओं को बलि का बकरा बनाकर 2003 का नागरिकता संशोधन विधेयक दरअसल भारत के मुसलमानों की नागरिकता छीनने की सर्वदलीय हिंदुत्व राजनीति है।पहले नागरिकता छीनो,फिर गैरमुसलमानों को नागरिकता दे दो,लेकिन मुसलमानों को नागरिकता कतई मत दो।यह सीधे तौरपर पूर्वी बंगाल के  हिंदू विभाजनपीड़ितों को नागरिकता से वंचित रखने का स्थाई जमींदारी बंदोबस्त है।

हम खुद पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ित शरणार्थी परिवार से हैं,जिनकी नागरिकता,आरकक्षण और मातृभाषा के अधिकार के लिए मेरे पिता आजीवन आखिरी सांस तक लड़ते रहे हैं।हम हर हाल में देश भर में जारी नागरिकता के लिए शरणार्थी आंदोलन के साथ हैं।लेकिन सारी राजनीति शरणार्थियों के खिलाफ है जो शरणार्थियों को शतरंज का मोहरा बनाने के बाद हिंदुत्व की पैदल सेना बनाने पर आमादा है।यह मारे लिए निजी तौर पर बहुत बड़ा संकट है।

हम शरणार्थियों की बिना शर्त नागरिकता देने की मांग करते रहे हैं।जैसे पश्चिम पाकिस्तान के शरणार्थियों को नागरिकता मिली है,वैसे ही।

हम 2003 के नागरिकता संशोधन कानून को सिरे से रद्द करने की मांग इसीलिए करते हैं क्योंकि इसका मकसद मुसलमानों को नागरिकता से वंचित करने और हिंदू बंगाली शरणार्थियों की नागरिकता का मसला हिंदू मुसलमान विवाद से नत्थी करने का उपक्रम है जिसके तहत न मुसलमानों को नागरिकता मिलनी है और न हिंदू विभाजनपीड़ितों को।

दोनों पक्ष इस साजिश को समझ लें तो बेहतर है।हमारे पुरखे इस साजिस को समझ नही पराये तो हम भारत पाकिस्तान विवाद से निकल नहीं पा रहे हैॆं और इस साजिश के तहत देश के चप्पे चप्पे पर पाकिस्तान बना रहा है दंगाई राजनीति।यह अनवरत युद्ध है।अनंत गृहयुद्ध है।बेलगाम आत्मध्वंस है।खून की नदियां हैं।इस हिसा की कोई सीमा नहीं है।सीमाओं के आर पार लहू का सैलाब है।आइलान की लाशें हैं।आगजनी,हिसां,कत्लेआम और बलात्कार कार्निवाल नतीजे हैं।

2003 के इस काला शैतानी कानून की पेचदगी किसी संशोधन से खत्म नहीं होती है,इसलिए 1955 के नागरिकता कानून को बहाल करके सबसे पहले विभाजन पीड़ितों को नागरिकता देना जरुरी है।1971 के बाद जो लोग आये हैं,उनकी नागरिकता का मसला भी 1955 के कानून के तहत संभव है,उस कानून में संशोधन के जरिये हिंदू मुसलमान विवाद से हिंदू विभाजनपीड़ितों की समस्या सुलझेगी नहीं।

इसके उलट भारत विभाजन का इतिहास हूबहू दोहराया जा रहा है।

बंगाल में दो राष्ट्र के सिद्धांत के तहत हिंजदुस्तान पाकिस्तान बनाने की राजनीति फिर उसी मजहबू सियासत के जरिये नागरिकता के सवाल पर हिंदुओं और मुसलमानों में बंगाल,त्रिपुरा और असम में सीधे टकराव के हालात बना रही है।

इसके विपरीत पश्चिम पाकिस्तान से आये विभाजनपीड़ितों की नागरिकता के बारे में कोई विवाद नहीं रहा है।उन्हें बिना शर्त नागरिकता दी गयी तो पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों की नागरिकता 2003 के कानून के जरिये छिनी क्यों गयी और जब फिर हिंदू शरणार्थियों को नागरिकता देने का दावा है तब क्यों मुसलमानों को नागरिकता का सवाल बीच में क्यों खड़ा कर दिया जा रहा है।यह चुनावी समीकरण समझना जरुरी है।

जाहिर है कि बंगाल और असम में धार्मिक ध्रूवीकरण से पूरे देश का केसरियाकरण और हिंदू राष्ट्र का आरएसएस के एजंडा को पूरा करने की यह सर्वदलीय राजनीति है और महिलाओं को संसद और विधानसभा में आरक्षण हर कीमत पर रोकने की तर्ज पर यह पूर्वी बंगाल के शरणार्थियों की नागरिकता छीन लेने की सर्वदलीय राजनीति है।असम और बंगाल में दंगे हुए तो दूसरे राज्यों से आये इन राज्यों में बसे लोगों को भी इस दंगे की आग से बचाना मुश्किल होगा।जिसका असर देश विदेश में भारी पैमाने पर होना है।राजनीति सिर्फ यूपी जीतने की सोच रही है।बाकी देश दुनिया की उसे कोई परवाह नहीं है और न इंसानियत और न मजहब से उसका कोई नाता है।

आज इंडियन एक्सप्रेस की सबसे बड़ी खबर नागरिकाता संशोधन विधेयक के सिलसिले में हिंदू और मुसलमान शरणार्थियों में कौन असल दुश्मन है,इसपर असम सरकार के एक खास मंत्री हिमंत विश्व शर्मा का यह जिहादी बेमिसाल बयान है।जो भोपाल में फर्जी मुठभेड़ से ज्यादा खतरनाक है।यहां लाशों की गिनती भी असंभव है।

असम में प्रस्‍तावित नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 का विरोध जारी है। इस विधेयक में बांग्‍लादेश, पाकिस्‍तान और अफगानिस्‍तान से आने वाले अल्‍पसंख्‍यक समुदाय के लोगों को भारतीय नागरिकता देने का प्रावधान है। विदेशी नागरिकों को नागरिकता देने के मुद्दे पर पूर्वोत्तर राज्य असम की राजनीति में उबाल आ गया है। केंद्र की भाजपा सरकार ने जुलाई में नागरिकता अधिनियम, 1955 के कुछ प्रावधानों में संशोधन के लिए विधेयक पेश किया था।असम में भी भाजपा की सरकार है।

कृपया गृहयुद्ध के आवाहन की इस युद्ध घोषणा पर गौर करें।भाजपा के नॉर्थ ईस्ट डेमोक्रैटिक एलाएंस के संयोजक हेमंत विश्व शर्मा ने राज्य के लोगों से कहा है कि अपना दुश्मन चुन लीजिए, या तो 1.5 लाख या 55 लाख लोग।

हेमंत प्रदेश में सरकार में बेहद प्रभावशाली  मंत्री भी हैं। अंग्रेजी अखबार इंडियन एक्सप्रेस ने अपनी रिपोर्ट में शर्मा के इन बयानों को लिखा है। आंकड़ों पर सफाई नहीं दी हालांकि हेमंत ने इन आंकड़ों को धर्म विशेष से नहीं जोड़ा है, लेकिन उन्होंने यहा जवाब उस समय दिया जब वह विपक्ष के असम की नागरिकता विधेयक पर जवाब दे रहे थे।उन्‍होंने बिल का विरोध करने वालों से पूछा कि किस समुदाय ने असमिया लोगों को अल्‍पसंख्‍यक बनाने की धमकी दी है।

नागरिकता (संसोधन) बिल के जरिए पाकिस्‍तान और बांग्‍लादेश में जुल्‍म सह रहे हिंदुओं, बौद्धों, जैन, सिख और पारसियों को नागरिकता देने का प्रस्‍ताव है। हिंदू और मुसलमान माइग्रेंट में भेद करने की नीति क्‍या भाजपा की है, इस सवाल शर्मा ने कहा, "हां, हम करते हैं। साफतौर पर हम करते हैं। देश का बंटवारा धर्म के नाम पर हुआ था। इसलिए यह नई चीज नहीं है। जब हम डिब्रूगढ़ या तिनसुखिया जाते हैं तो हमें अच्‍छा लगता है क्‍योंकि वहां पर बहुसंख्‍या में हैं। लेकिन जब आप धुबड़ी या बारपेटा जाते हैं,तब आपको ऐसा नहीं लगता।

Choose your enemy, Hindu or Muslim migrants: Assam BJP minister Himanta Biswa Sarma

Sarma seemed to be referring to Hindu and Muslim migrants as he was replying to queries on the opposition to the Citizenship (Amendment) Bill in Assam.

TATING THAT it is his party's policy to differentiate between Hindu and Muslim migrants, Assam Minister and convenor of the BJP's North East Democratic Alliance (NEDA) Himanta Biswa Sarma on Tuesday asked the people of the state to choose their enemy — "the 1-1.5 lakh people or the 55 lakh people?"

Although there are no official figures of Hindu or Muslim migrants from Bangladesh in Assam, political groups often claim that the state has about 55 lakh Bangladeshi migrants. The reference to "1-1.5 lakh" people, however, does not match any known figure.

"The whole thing is that we have to decide who our enemy is. Who is our enemy, the 1-1.5 lakh people or the 55 lakh people? The Assamese community is at the crossroads. We could not (save) 11 districts. If we continue to remain this way, six more districts will go out (of our hands) in the 2021 Census. In 2031, more (districts) will go out," said Sarma, pressing for the Bill.

While Sarma referred to "11 districts", the 2011 Census identified nine districts as areas with Muslim majority, up from six in 2001.

साभारः इंडियन एक्सप्रेस

इस सरकारी अल्फाई बयान से असम के अलावा बाकी भारत पर भी अल्फाई राजकाज का असर समझा जा सकता है।सीधे तौर पर मुसलमानों को निशाना बांधकर चांदमारी का मामला कश्मीर घाटी में जो चल रहा है,जैसे यूपी और बाकी भारत में फर्जी मुठभेडो़ं का खेल है,आदिवासियों के खिलाफ सैन्य अभियान है और उसे बहुसंख्य जनता का अंध समर्थन है,ऐसे मुश्किल हालात में करीब दस करोड़ विभाजनपीड़ितों की नागरिकता छीनने की बेशर्म जिहाद का असल मकसद मुसलमानों की चांदमारी है और उन विभाजनपीड़ितों के नागरिक और मानवाधिकार का निषेध है,यह समझना पीड़ितों और शरणार्थियों दोनों के लिए समझना मुश्किल है।

फिलहाल यूपी का कुरुक्षेत्र लड़ने के लिए संघ परिवार का यह जिहाद अनिवार्य है,यह बात तो समझ में आती है।लेकिन वामदलों,तृणमूल कांग्रेस और कांग्राेस की धर्मनिरपेक्षता का अस मकसद क्या है,यह समझ से परे है।

बहरहाल विभाजन के बाद अब भी दुनिया की सबसे बड़ी मुसलमान आबादी भारत में है।कश्मीर में मुसलमानों का बहुमत है और असम,यूपी,बिहार,महाराष्ट्र,बंगाल जैसे अनेक राज्यों में मुसलमानों के समर्थन के बिना कोई सरकार नहीं बन सकती।

ऐसे हालात में मजहबी सियासत की इस खतरनाक चाल से देश के भीतर असंख्य पाकिस्तान बनाने का यह उपक्रम है।जिसका नजारा असम और बंगाल में साफ साफ दीख रहा है।

भारत में हजरत बल संकट,गुजरात नरसंहार और बाबरी विध्वंस का खामियाजा बांग्लादेश और दुनियाभर के हिंदुओं को भुगतना पड़ा है।

बांग्लादेश में अब भी दो करोड़ हिंदू हैं,जिनपर लगातार हमले होते जा रहे हैं।हाल में ये हमले बहुत तेज हो गये है।अबी एक फेसबुक पोस्ट को लेकर बांग्लादेश में हिंदुओं पर जगह जगह हमले हो रहे हैं।

असम और बंगाल में धार्मिक ध्रूवीकरण की राजनीति का क्या असर होना है,यह समझने वाली बात है जबकि असम में राजकाज अल्फाई है।

दूसरी ओर,बंगाल में ममता बनर्जी की सरकार विभाजनपीडितों को नागरिकता देने के खिलाफ हैं।मुसलमान वोट बैंक वामदलों से छीनकर वे मुख्यमंत्री बनी हैं।बागाल में दुर्गोत्सव से पहले लगभग हर जिले में हालात दंगाई थे।

अब भी बंगाल के हर जिले में हिंदू मुसलमान टकराव की राजनीति चल रही है और वामदलों को हाशिये पर रखकर भाजपा और तृणमूल कांग्रेस खुलकर वोटबैंक की यह राजनीति कर रही हैं।वामदलों की राजनीति मुसलमान वोट बैंक छीने की राजनीति है और विभाजन पीड़ित हिंदू शरणार्थियों के लिए मरीचझांपी नरसंहार है।

2003 के नागरिकता संशोधन कानून का बंगाल के किसी राजनेता ने विरोध नहीं किया था।उस वक्त वामदलों का शासन था।संसदीय समिति के अध्यक्ष कांग्रेस के प्रणव मुखर्जी थे।पूर्वी बंगाल के विभाजनपीड़ितों की तब किसी ने परवाह नहीं की।अब मुसलमानों को नागरिकता देने की मांग करते हुए तृणमूल कांग्रेस,कांग्रेस और वामदल नागरिकता संशोधन विधेयक का विरोध कर रही हैं।जाहिर है कि केंद्र और असम सरकार के ताजा बयान का लक्ष्य सिर्फ असम नहीं है।वे बंगाल में और बाकी देश में भी हिंदू विभाजनपीड़ितों के एकमात्र तरणहार खुद को साबित करने लगे हैं।

मुसलमान वोटबैंक हर कीमत पर दखल में रखने की होड़ में शामिल कांग्रेस,तृणमूल कांग्रेस और वामदलों की राजनीति के मुकाबले संघ परिवार का यह तुरुप का पत्ता है ,जिसके तहत सीधे मुसलमानों को दुश्मन करार दिया जा रहा है।जबकि बंगाल का कोई रोजनीतिक दल विभाजनपीड़ित हिंदू शरणार्थियों के पक्ष में नहीं है।हिंदुओं का पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में ध्रूवीकरण का यह संघ परिवार का अभूतपूर्व मौका है।जिसे बाकी दल जानबूझकर अंजाम तक पहुंचा रहे हैं।

बांग्लादेश में बंगाल और असम और बाकी भारत में मुसलमानविरोधी इस मजहबी सियासत का वहां के दो करोड़ हिंदुओं पर क्या असर होगा या लगातार हमलों की वजह से वे बांग्लादेस में रह सकेंगे या नहीं,इसे लेकर किसी राजनीतिक पक्ष को कोई सरदर्द नहीं है और उनकी मजहबी सियासत का अंतिम लक्ष्य सत्ता है।

बहरहाल,बंगाल में नौ करोड की आबादी में अगर सात करोड़ बंगाली हैं तो चार करोड़ लोग पूर्वी बंगाल से आये शरणार्थी हैं।बंगाल सरकार में उनका कोई मंत्री नहीं है।वाम जमाने में जो भूमि सुधार मंत्रालय रहा है,ममता बनर्जी भूमि आंदोलन की नेता बतौर सत्ता में दोबारा आने के बाद उसे खत्म कर रही हैं।अब भूमि सुधार निषेध है।

1971 में इंदिरा मुजीब समझौते के तहत बांग्लादेश से आने वाले शरणार्थियों का पंजीकरण बंद होने के साथ साथ इंदिरा गांधी ने केंद्र सरकार का पुनर्वास मंत्रालय बंद कर दिया है लेकिन तब से लेकर अब तक सीमापार से आनेवाले शरणार्थियों की तुलना में भारत में जल जंगल जमीन से बेदखल विस्थापितों की संख्या कई गुणा ज्यादा है,जिनके पुनर्वास का कोई बंदोबस्त नहीं है।

बंगाल में लेकिन पुनर्वास मंत्रालय अभीतक है,जिसे अब ममता बनर्जी खत्म कर रही हैं।चुस्त प्रशासनके नाम पर ममता बनर्जी अनुसूचितों के मंत्रालय पर ताला लगाने की तैयारी कर रही हैं।ये सारे कदम शरणार्थियों और अनुसूचितों के खिलाफ हैं।

ऐसे में शरणार्थियों के केसरियाकरण का असर कितना व्यापक होगा,इसका अदाजा लगा लीजिये।मजहबी सियासत के लिए नागरिकता कानून ब्रह्मास्त्र बन गया है जिसके बलि 2003 से अबतक हिंदू शरणार्थी होते रहे हैं और अब सुरासुर संग्राम है और असुरों का सफाया तय है तो समझ लीजिये कि हिंदू हो या मुसलमान,शरणार्थियों की खैर नहीं।क्योकि सत्तापक्ष दोनों के खिलाफ दोनों में दंगे कराने की तैयारी में है।

इसके तहत संघ परिवार विभाजनपीड़ितों का एकमुश्त हिंदुत्वकरण कर रही है तो असम और बंगाल समेत पूरे पूर्वोत्तर और पूर्वी भारत में गुजरात और खस्मीर जैसे हालात पैदा करके सत्ता पर अपना वर्चस्व कायम करने की कोशिश कर रही है।  नागरिकता संशोधन विधेयक 2016 के जरिये विभाजनपीड़ितों की 2003 के कानून के तहत छिनी नागरिकता वापस करने का जो उपक्रम है,उसमें भारत में बाहर से आने वाले गैरमुसलिम शरणार्थियों को नागरिकता देने के प्रावधान है जो संवैधानिक ढांचे के मुताबिक समानता के मौलिक अधिकार के खिलाफ है तो अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ भी है।

संघ परिवार ने इस रणनीति के तहत इस विधेयक के खिलाफ वामदलों,तृणमूल कांग्रेस और कांग्रेस समेत धर्मनिरपेक्ष दलों को लामबंद कर दिया है तो संघ परिवार के दावे के मुताबिक राज्यसभा में बहुमत न होने की वजह से इस विधेयक के पारित होने की संभावना बहुत कम है।दूसरी तरफ लोकसभा में बहुमत और राज्यसभा में जोड़ तोड़ के तहत यहकानून पास हो गया तो इसकी तकनीकी खामियों की वजह से इसे लागू करना बहुत मुश्किल है।

राष्ट्र का सैन्यीकरण देश को विदेशी पूंजी के हवाले करने के लिए अनिवार्य है।ताकि अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली,जल जगंल जमीन आजीविका रोजगार नागरिक मानवाधिकार और पर्यावरण से बेदखली के खिलाफ कोई प्रतिरोध न हो।

इसीलिए माहौल यह बनाया गया है कि सिर्फ सैनिकों को हम शहीद मानने लगे हैं और नागरिकों की शहादत हमारे लिए बेमतलब है।सेना को हम तीज त्योहारों के सात जोड़कर धर्मोन्मादी युद्धोन्माद का कार्निवाल मना रहे हैं।

औद्योगीकरण और शहरीकरण के मार्फत अंधाधुंध अबाध विदेशी पूंजी की घुसपैठ से किसानों की थोक आत्महत्या के बाद खुदरा बाजार बेदखल है और विदेशी पूंजी के मुकाबले उद्योग और कारोबार जगत में देशी कंपनियां हिंदुस्तानी बाजार से बेदखल हो रही है।टाटा संस के विवाद में डोकोमो का किस्सा भी नैनो से नत्थी है।जिससे टाटा समूह का बेड़ा गर्क हुआ है।इनी गिनी दो चार कंपनियों को छोड़ दें,तो बाकी भारतीय कंपरनियों की टाटा जैसी दुर्गति तय है।

जाहिर है कि शहादत का सिलसिला सीमाओं पर ही नहीं,खेतों खलिहानों पर ही नहीं,उद्योग और कारोबार के हर सेक्टर में शुरु हो गया है।

इसके बावजूद राजनीतिक नेतृत्व जो अंध राष्ट्रवाद का आवाहन करके निरंकुश पितृसत्ता के फासिज्म के तहत मजहबी सियासत के तहत सेना का राजनीतिकरण पर आमादा है और सेना के साथ खड़े होने की भावुक अपीलें जारी कर रहा है,उसका सीधा मतलब है कि सेना को नहीं,बल्कि हम उनके युद्ध और गृहयुद्ध के कारोबार का समर्थन करें।यह कुल मिलाकर अमेरिका का राष्ट्रपति बनने के प्रबल दावेदार डोनाल्ड ट्रंप की ही राजनीति का ग्लोबीकरण है,जो इजराइल का मुसलमानों के खिलाफ जिहाद है।हम अमेरिका और इजराइल के पार्टनर हैं तो हमारी राजनीति भी अमेरिका और इजराइल की राजनीति है।राजनय का अंजाम भी वही है।जो युद्ध सीरिया के बहाने तीसरा विश्वयुद्ध में तब्दील होने जा रहा है,हम भारत को उसी युद्ध में जानबूझकर शामिल कर रहे हैं तो तीसरे विश्वयुद्ध के महाविनाश के हिस्सेदार बी होंगे हम।मुसलमानों के खिलाफ खुला जिहाद भारत में अरब वसंत का अबाध प्रवाह बन चुका है।

याद करें कि हम पहले ही लिख चुके हैं कि हम यह भी नहीं देख रहे हैं कि अमेरिका परमाणु युद्ध की तैयारी में है और भारत उनके लिए सिर्फ बाजार है।इस बाजार पर कब्जे के लिए वह कुछ भी करेगा।

जाहिर है कि हम यह देख नहीं रहे हैं कि दो दलीय संसदीय तंत्र में जनता के लिए अपना प्रतिनिधि चुनने का कोई विकल्प है ही नहीं।राष्ट्रीय नेतृत्व जो हम चुनते हैं वह देश की एकता ,अखंडता और संप्रभुता की निर्विकल्प समाधि है।अमेरिकी चुनाव में यह बहुत कायदे से साबित हो रहा है।तथाकथित राष्ट्रीय नेतृत्व न राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करता है और न जनता का, वह कुलमुिलाकर गुजरात नरसंहार या सिखों के नरसंहार या बाबरी विध्वंस के तहत धार्मिक ध्रूवीकरण का अनचाहा चुनाव नतीजा है।भारत में ऐसा बार बरा होता रहा है और अमेरिका में अबकी दफा यह खुल्ला खेल फर्ऱूखाबादी है।

अरबपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस का समर्थन है और इजराइल का भी समर्थन है।मुसलमानों के खिलाफ जिहाद का ऐलान करने वाले इस धनकुबेर को अमेरिकी मतदाता सिरे से नफरत करते हैं।लेकिन अमेरिका के पहले अश्वेत राष्ट्रपति बाराक ओबामा की विदेश मंत्री बतौर आइसिस को जन्म देनेवाली हिलेरी के ईमेल से पर्दाफाश हो गया है कि वे अमेरिका के खिलाफ युद्ध कर रही आतंकवादी संस्थाओं को लगातार पैसा और हथियार देती रही हैं।

पिछले 23 अक्तूबर तक बारह प्वाइंट से आगे चल रही हिलेरी अब ट्रंप से एक प्वाइंट पीछे हैं।यानी अमेरिकी जनता हिलेरी को भी राष्ट्रपति पद पर देखना नहीं चाहती।इस बीच कुछ राज्यों में चुनाव पहले से शुरु हो जाने से करीब दो करोड़ वोट पड़ चुके हैं और वहां दोबारा मतदान नहीं हो सकता।

समझा जा सकता है कि इन वोटों से हिलेरी को बढ़त मिली हुई है।अब नतीजा चाहे जो हो,अमेरिकी जनता हिलेरी या ट्रंप में से किसी एक को चुनने के लिए मजबूर है जबकि दोनों अमेरिकी हितों के खिलाफ हैं।

जाहिर है कि दो दलीय संसदीय प्रणाली लोकतंत्र के लिए ब्लैकहोल की तरह है।हमारे यहां उस तरह दो दलीय लोकतंत्र नहीं है।चुनाव में असंख्य पार्टियां केंद्र और राज्यों में सत्ता संघर्ष में शामिल हैं।लेकिन सही मायने में सत्ता के ध्रूवीकरण को देखें तो हमारे यहां भी दो दलीय संसदीय प्रणाली है।

भारतीय लोकतंत्र में कांग्रेस और भाजपा एक दूसरे के विकल्प हैं।बाकी दल उनके पक्ष विपक्ष में उनके साथ या विरोध में हैं।तीसरा कोई पक्ष भारत में भी नहीं है।वामपक्ष या बहुजन पक्ष या समाजवादी खेमा भाजपा और कांग्रेस के साथ सत्ता में केंद्र या राज्य में साझेदारी तो कर सकता है,लेकिन राजकाज और राष्ट्रीय नेतृत्व फिर कांग्रेस या भाजपा का है,जिनका कोई विकल्प नहीं है।

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनाव में हम अपना आइना देख सकते हैं कि कैसे राष्ट्रविरोधी ताकतों के हाथों लोकतंत्र का दिवाला निकलता है।

हमने पहले ही लिखा है कि मुश्किल यह है कि हमारी राजनीति जितनी अंध है, उससे कुछ कम हमारी राजनय नहीं है।हम दुनिया को अमेरिकी नजर से देख रहे हैं और हमारी कोई दृष्टि है ही नहीं।हमें अमेरिकी कारपोरेट हितों की ज्यादा चिंता है,भारत या भारतीय जनता के हितों की हमें कोई परवाह नहीं है।

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Monday, October 31, 2016

স্তন ছিড়ে ফেলা হয়েছে, যোনিপথে লোহার রড বা বন্দুকের নল ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। . ১৯৭১ সনের ২৯শে মার্চ সকাল থেকে আমরা মিটফোর্ড হাসপাতালের লাশঘর ও প্রবেশপথের দুপার্শ্ব থেকে বিশ্ববিদ্যালয় শিববাড়ী, রমনা কালিবাড়ী, রোকেয়া হল, মুসলিম হল, ঢাকা হল থেকে লাশ উঠিয়েছি। ২৯শে মার্চ আমাদের ট্রাক প্রথম ঢাকা মিটফোর্ড হাসপাতালের প্রবেশ পথে যায়। আমরা উক্ত পাঁচজন ডোম হাসপাতালের প্রবেশপথে নেমে একটি বাঙ্গালী যুবকের পচা, ফুলা, বিকৃত লাশ দেখতে পেলাম। লাশ গলে যাওয়ায় লোহার কাঁটার সাথে গেঁথে লাশ ট্রাকে তুলেছি। আমাদের ইন্সপেক্টর আমাদের সাথে ছিলেন। এরপর আমরা লাশ ঘরে প্রবেশ করে বহু যুবক-যুবতী, বৃদ্ধ- কিশোর ও শিশুর স্তুপীকৃত লাশ দেখলাম। আমি এবং বদলু ডোম লাশ ঘর থেকে লাশের পা ধরে টেনে ট্রাকের সামনে জমা করেছি, আর গণেশ, রঞ্জিত(লাল বাহাদুর) এবং কানাই লোহার কাঁটা দিয়ে বিঁধিয়ে বিঁধিয়ে পচা, গলিত লাশ ট্রাকে তুলেছে। প্রতিটি লাশ গুলিতে ঝাঁঝরা দেখিছি, মেয়েদের লাশের কারো স্তন পাই নাই, যোনীপথ ক্ষতবিক্ষত এবং পিছনের মাংস কাটা দেখিছি। মেয়েদের লাশ দেখে মনে হয়েছে, তাদের হত্যা করার পূর্বে তাদের স্তন জোর করে ছিঁড়ে ফেলা হয়েছে, যোনিপথে লোহার রড কিংবা বন্দুকের নল ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। যুবতী মেয়েদের যোনিপথের এবং পিছনের মাংস যেন ধারালো চাকু দিয়ে কেটে এসিড দিয়ে জ্বালিয়ে দেয়া হয়েছে। প্রতিটি যুবতী মেয়ের মাথায় খোঁপা খোঁপা চুল দেখলাম। মিটফোর্ড থেকে আমরা প্রতিবারে একশত লাশ নিয়ে ধলপুর ময়লার ডিপোতে ফেলেছি। . চুন্নু ডোমের সাক্ষাৎকার। বাংলাদেশের স্বাধীনতা যুদ্ধঃ দলিলপত্রের অষ্টম খন্ডের (১২-৬৬) সংকলন।

স্তন ছিড়ে ফেলা হয়েছে, যোনিপথে লোহার রড বা বন্দুকের নল ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। . ১৯৭১ সনের ২৯শে মার্চ সকাল থেকে আমরা মিটফোর্ড হাসপাতালের লাশঘর ও প্রবেশপথের দুপার্শ্ব থেকে বিশ্ববিদ্যালয় শিববাড়ী, রমনা কালিবাড়ী, রোকেয়া হল, মুসলিম হল, ঢাকা হল থেকে লাশ উঠিয়েছি। ২৯শে মার্চ আমাদের ট্রাক প্রথম ঢাকা মিটফোর্ড হাসপাতালের প্রবেশ পথে যায়। আমরা উক্ত পাঁচজন ডোম হাসপাতালের প্রবেশপথে নেমে একটি বাঙ্গালী যুবকের পচা, ফুলা, বিকৃত লাশ দেখতে পেলাম। লাশ গলে যাওয়ায় লোহার কাঁটার সাথে গেঁথে লাশ ট্রাকে তুলেছি। আমাদের ইন্সপেক্টর আমাদের সাথে ছিলেন। এরপর আমরা লাশ ঘরে প্রবেশ করে বহু যুবক-যুবতী, বৃদ্ধ- কিশোর ও শিশুর স্তুপীকৃত লাশ দেখলাম। আমি এবং বদলু ডোম লাশ ঘর থেকে লাশের পা ধরে টেনে ট্রাকের সামনে জমা করেছি, আর গণেশ, রঞ্জিত(লাল বাহাদুর) এবং কানাই লোহার কাঁটা দিয়ে বিঁধিয়ে বিঁধিয়ে পচা, গলিত লাশ ট্রাকে তুলেছে। প্রতিটি লাশ গুলিতে ঝাঁঝরা দেখিছি, মেয়েদের লাশের কারো স্তন পাই নাই, যোনীপথ ক্ষতবিক্ষত এবং পিছনের মাংস কাটা দেখিছি। মেয়েদের লাশ দেখে মনে হয়েছে, তাদের হত্যা করার পূর্বে তাদের স্তন জোর করে ছিঁড়ে ফেলা হয়েছে, যোনিপথে লোহার রড কিংবা বন্দুকের নল ঢুকিয়ে দেওয়া হয়েছে। যুবতী মেয়েদের যোনিপথের এবং পিছনের মাংস যেন ধারালো চাকু দিয়ে কেটে এসিড দিয়ে জ্বালিয়ে দেয়া হয়েছে। প্রতিটি যুবতী মেয়ের মাথায় খোঁপা খোঁপা চুল দেখলাম। মিটফোর্ড থেকে আমরা প্রতিবারে একশত লাশ নিয়ে ধলপুর ময়লার ডিপোতে ফেলেছি। . চুন্নু ডোমের সাক্ষাৎকার। বাংলাদেশের স্বাধীনতা যুদ্ধঃ দলিলপত্রের অষ্টম খন্ডের (১২-৬৬) সংকলন।

Sunday, October 30, 2016

महत्वपूर्ण खबरें और आलेख नई विश्व व्यवस्था बनाने की तैयारी में इजराइल, साझेदार संघ परिवार

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हर मुश्किल आसान विनिवेश,यानी देश बेच डालो! देशभक्ति का नायाब नमूना,सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का लग रहा है सेल ताकि अच्छे दिन आये दिशी विदेशी निजी कारपोरेट कंपनियों के! पलाश विश्वास


हर मुश्किल आसान विनिवेश,यानी देश बेच डालो!

देशभक्ति का नायाब नमूना,सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का लग रहा है सेल ताकि अच्छे दिन आये दिशी विदेशी निजी कारपोरेट कंपनियों के!

पलाश विश्वास

हर मुश्किल आसान विनिवेश,यानी देश बेच डालो!

देशभक्ति का नायाब नमूना,सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों का लग रहा है सेल ताकि अच्छे दिन आये दिशी विदेशी निजी कारपोरेट कंपनियों के!

औद्योगीकरण के बहाने स्मार्ट भारत के लिए सबसे सीधा रास्ता विनिवेश का है।खेती में मरघट है और किसानों की खुदकशी आम है तो औद्योगिक ढांचा चरमरा रहा है और उत्पादन लगातार गिर रहा है।भारत का बाजार विदेशी कंपनियों के हवाले हैं।जिस चीन के बहिस्कार का नाटक है,सबसे ज्यादा मुनाफे में वे ही चीनी कंपनियां है।जाहिर है कि अच्छे दिन सचमुच आ गये हैं।बहरहाल किनके अच्छे दिन हैं और किनके बुरे दिन,यह समझ पाना टेढ़ी खीर है।अब केंद्र सरकार भी अपने पीएसयू ( पब्लिक सेक्टर यूनिट) के लिए बड़ा सेल लाने पर विचार कर रही है।जाहिर है कि भारत सरकार सार्वजनिक क्षेत्र की उत्पादन इकाइयों,उनके अधीन राष्ट्र की बेशकीमती संपत्ति और इन कंरपनियों के नियंत्रित प्रबंधित सारे संसाधनों को एकमुश्त निजी कारपोरेट देशी विदेशी कंपनियों के हवाले करने जा रही है।देशभक्ति यही है।

रोजगार सृजन का यह अभूतपूर्व उपक्रम बताया जा रहा है।सरकारी कंपनियों यानी सरकारी क्षेत्रों के बैंकों,जीवन बीमा निगम,भारतीय रेलवे जैसी कंपनियों की जमा पूंजी विनिवेश में लगाकर,यानी इन कंपनियों में लगगी आम जनता और करदाताओं के खून पसीने की कमाई विदेशी और देशी, निजी और कारपोरेट कंपनियों केहित में शेयर बाजार में हिस्सेदारी खरीदने के दांव पर लगाकर सरकारी कंपनियों को ठिकाने लगाने के  इस महोत्सव से व्यापक पैमाने पर रोजगार सृजन का दावा किया जा रहा है।सरकारी कंपनियों को,देशी उत्पादन इकाइयों को छिकाने लगाकर मेहनतकशों और कर्मचारियों के हकहकूक छीनकर कैसे रोजगार का सृजन होगा,खुलासा नहीं है।

विभिन्न मंत्रालयों के सचिवों के साथ नई विश्वव्यवस्था के परिकल्पित कल्कि अवतार ने सिसिलेवार बैटक करके मैजिक शो  के बीच देश की सरकारी कंपनियों के खजाने को खोलकर लोककल्याण और भारत निर्माण का यह विनिवेश किया है।कल्कि महाराज की दलील है कि सरकारी कंपनियां पूंजी पर बैठी हैं,इस पूंजी का निवेश कर दिया जाये तो अच्छे दिन आ जायेंगे और हर युवा हाथ को रोजगार मिलेगा।देश में दूध घी की नदियां बहने लगेंगी।सरकारी कंपनियों की इस पूंजी से सरकारी कंपनियों को निजी हाथों में सौंपर उनमें काम कर रहे मेहनतकशों और कर्मचारियों की रोजी रोटी छीन ली जाये तो देशी विदेशी कंपनियों की दिवाली घनघोर मनेगी,जो उन्हेंने इस देश की सेना को विदेशी कंपनियों के हाथों देश हारने की दीवाली काबतौर समर्पित किया है।

जाहिर है कि दिवाली सेना को समर्पित करके युद्धोन्माद का ईंधन फूल टंकी भर लेने के बाद मां काली की पूजा के तहत अब उसी फर्जी औद्योगीकरण के शहरीकरण अभियान के तहत सरकारी कंपनियां,सरकारी संपत्ति और आम जनता के संसाधन विदेशी हितों की बलि चढ़ाने का कार्यक्रम जारी है।देश को देशभक्त सरकार का यह तोहफा है कि केंद्र सरकार अपनी 22 लिस्टेड और अनलिस्टेड कंपनियों की नियंत्रण हिस्सेदारी बेचने पर विचार कर रही है।

आम जनता के अच्छे दिनों के आयात निर्यात की इस बुलेट परियोजना के तहत दावा यह है कि  इससे सरकार को 56,500 करोड़ रुपये का विनिवेश लक्ष्य (डिसइनवेस्टमेंट टारगेट) हासिल करने में मदद मिलेगी।

फिलहाल विनिवेश की इस ताजा लिस्ट में बड़ी सरकारी कंपनियां जैसे कंटेनर कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया, भारत अर्थमूवर्स शामिल हैं। बाकी कंपनियों के कर्मचारी अफसर धीरज रखें,अबकी दफा नहीं तो बहुत जल्द उनका भी काम तमाम है।

इस घोषित लिस्ट के अलावा सरकार स्टील अथॉरिटी ऑफ इंडिया (SAIL)के तीन प्लांट्स और अनलिस्टेड कंपनी सीमेंट कॉरपोरेशन ऑफ इंडिया में भी अपनी हिस्सेदारी बेचने की योजना बनाई है।

गौरतलब है कि नीति आयोग के उपाध्यक्ष अरविंद पनगढ़िया की अध्यक्षता वाली समिति ने अपनी रिपोर्ट में घाटे में चल रहे 74 में से 26 सरकारी पीएसयू को बंद करने की सलाह दी है। वहीं, पांच पीएसयू को लॉन्ग टर्म लीज या मैनेजमेंट कॉन्ट्रैक्ट बेसिस पर देने का सुझाव दिया गया है। तीन सब्सिडियरी फर्म को पैरेंट पीएसयू में मिलाने और दो को जस-का-तस बनाए रखने की सिफारिश की है।

सातवें वेतन आयोग और वन रैंक, वन पेंशन लागू करने से भले ही सरकार के खजाने पर दबाव बढ़ा हो लेकिन कालेधन के खुलासे और स्पेक्ट्रम की नीलामी से मिलने वाली राशि से चालू वित्त वर्ष में राजकोषीय घाटे की भरपाई में बड़ी मदद मिलेगी।इन दोनों स्रोतों के बाद अब सरकार की नजरें विनिवेश पर हैं। पहली छमाही में कर राजस्व संग्रह मिला-जुला रहते देख वित्त मंत्रालय की कोशिश है कि दूसरी छमाही में विनिवेश के माध्यम से राशि जुटाई जाए।

गनीमत है कि विदेशी कंपनियों को इस तरह भारतीय कंपनियों, भारत की संपत्ति और संसाधनों को हासिल करने के लिए ईस्ट इंडिया कंपनी की तरह को ई पलाशी का युद्ध नहीं लड़ना पड़ रहा है।देश की स्वतंत्रता और संप्रभुता उन्हें धनतेरस के उपहार की तरह सप्रेम भेंट दिया जा रहा है।आम जनता देश के भीतर विदेशी कंपनी के हाथों देश को बेचे जाते देखकर खामोश रहे,इसके लिए उनका ध्यान भटकाने के लिए युद्ध और गृहयुद्ध का माहौल बनाये रखना जरुरी है ताकि लाखों ईस्टइंडिया कंपनी के हाथों देश का चप्पा चप्पा बेच सकें देशभक्तों की सरकार।

इस कारपोरेट धनतेरस कार्निवाल के लिए डिपार्टमेंट ऑफ इनवेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (दीपम) ने कैबिनेट नोट जारी किया है। दावा यह है कि सार्वजनिक कंपनियों का कूटनीतिक विनिवेश (स्ट्रैटेजिक डिसइनवेस्टमेंट) होने जा रहा है। इसकी प्रक्रिया शुरू हो गई है।गौरतलब है कि इस लिस्ट में ऐसी कंपनियां भी शामिल हैं, जो मुनाफे में चल रही हैं। वहीं कुछ ऐसी भी हैं, जो मुनाफे में नहीं हैं लेकिन उनके पास काफी संपत्ति है।

संसद के बजट सत्र से पहले ही विनिवेश का यह नील नक्शा तैयार है और हमेशा की तरह संसद को बाईपास करके कैबिनेट ने सरकारी कंपनियों में हिस्सा बेचने से संबंधित विनिवेश प्रस्ताव को सैद्धांतिक मंजूरी दे दी है और आगे होने वाले विनिवेश की रुपरेखा तय कर दी है,जिसका इस देश के निर्वाचित जनप्रतिनिधि विरोध करेंगे,इसकी कोई आशंका भी नहीं है।  इस फैसले के तहत 50 पीएसयू में स्ट्रैटेजिक विनिवेश होगा। इस मामले में अब कंपनी दर कंपनी फैसला लिया जाएगा।

गौरतलब है कि इससे पहले नीति आयोग ने मुनाफे में चल रही सरकारी कंपनियों (पीएसयू) में स्ट्रैटेजिक डिसइनवेस्टमेंट के सुझाव वाली रिपोर्ट दी थी। उसी के आधार पर यह योजना बनाई गई है। आयोग ने उन कंपनियों की पहचान की थी, जिन्हें बेचा जा सकता है। वह इस मामले में दीपम के साथ मिलकर काम करेगा। प्लानिंग के तहत सरकार अनलिस्टेड कंपनियों से पूरी तरह बाहर निकल जाएगी। वह पूरी कंपनी निवेशकों को बेच देगी। वहीं, लिस्टेड कंपनियों में केंद्र सरकार अपनी हिस्सेदारी 49 पर्सेंट से कम करेगी। इससे कंपनी पर उसका नियंत्रण खत्म हो जाएगा।

कैबिनेट बैठक में महंगाई भत्ते में 2 फीसदी की बढ़ोतरी को मंजूरी मिल गई है। इसके अलावा कैबिनेट ने कीमतों को काबू में रखने के लिए चीनी पर स्टॉक होल्डिंग लिमिट की मियाद 6 महीने के लिए बढ़ा दी है।रोजगार भले छीनजाये।सर पर चाहे चंटनी की तलवार लटकी रहे।बचे खुचे अफसरों और कर्मचारियों को सातवां वेतन आयोग की सिफारिशों को लागू करने के अलावा इस तरह के तमाम क्रयक्षमता बढ़ाने वाले वियाग्रा की आपूर्ति होती रहेगी,ताकि संगठित सरकारी क्षेत्र में विनिवेश के खिलाप कोई चूं बी न कर सकें।

बहरहाल 1991 के बाद 1916 तक ट्रेड युनियनों के लिए विनिवेश के सौजन्य से सपरिवार विदेश दौरे और दूसरी किस्म की मौज मस्ती की गुंजाइस बहुत कम हो गयी है और कामगार कर्मचारी हितों की लड़ाई और आंदोलन की विचारधारा अब विशुध चूं चूं का मुरब्बा है,जो आयुर्वेद का वैदिकी चमत्कार है।

बहरहाल वित्त मंत्री मशहूरकारपोरेट वकील अरुण जेटली ने गुरुवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अध्यक्षता में हुई कैबिनेट की बैठक के बाद जानकारी देते हुए मीडिया मार्फत कहा है कि  कि किस पीएसयू का रणनीतिक विनिवेश होगा यह तय करने का काम डिपार्टमेंट ऑफ इन्वेस्टमेंट एंड पब्लिक एसेट मैनेजमेंट (डीअाईपीएएम) को सौंपा गया है। वही विनिवेश के लिए न्यूनतम मूल्य तय करेगा। उन्होंने बताया कि सरकारी कंपनियों में रणनीतिक हिस्सेदारी की बिक्री के जरिए 20,500 रुपए जुटाने की योजना है। लेकिन इस लक्ष्य को पाने के लिए सरकार विनिवेश में जल्दबाजी में नहीं करेगी।

विनिवेश के इस खेल में आपका बीमा प्रीमियम और उसका भविष्य भी दांव पर है क्योंकि सार्वजनिक क्षेत्र की जीवन बीमा निगम कंपनी भारतीय जीवन बीमा निगम (एलआईसी) ने सरकार द्वारा एनबीसीसी के 2,218 करोड़ रुपये के विनिवेश के तहत 50 प्रतिशत से अधिक शेयरों की खरीद की है। एनबीसीसी की पिछले सप्ताह आयोजित बिक्री पेशकश में भागीदारी के बाद सार्वजनिक क्षेत्र की निर्माण कंपनी में एलआईसी की हिस्सेदारी बढ़कर 8.11 प्रतिशत हो गई है। एनबीसीसी द्वारा शेयर बाजारों को दी गई जानकारी के अनुसार ओएफएस के दिन उसके नौ करोड़ शेयरों की पेशकश में से 54.08 प्रतिशत या 4.86 करोड़ शेयर खरीदे।

मीडिया के मुताबिक ओएफएस के न्यूनतम मूल्य 246.50 रुपये प्रति शेयर के हिसाब से एलआईसी ने एनबीसीसी के 4.86 करोड़ शेयरों की खरीद के लिए करीब 1,200 करोड़ रुपये का निवेश किया। सरकार ने संस्थागत और खुदरा निवेशकों को एनबीसीसी की 15 प्रतिशत हिस्सेदारी बिक्री के जरिये 2,218 करोड़ रुपये जुटाए हैं। इस साल अप्रैल से सरकार बिक्री पेशकश के जरिये तीन कंपनियों में विनिवेश से 8,632 करोड़ रुपये जुटा चुकी है। सरकार ने चालू वित्त वर्ष में विनिवेश से 56,500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है।

विनिवेस हर मुश्किल आसान क्यों है,इसकी दलील यह है कि वित्त वर्ष 2016-17 के लिए सरकार ने राजकोषीय घाटे का लक्ष्य जीडीपी का 3.5 प्रतिशत रखा है। चालू वित्त वर्ष में रक्षा क्षेत्र में वन रैंक वन पेंशन तथा सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें लागू करने के चलते सरकार के खजाने पर बोझ बढ़ा है।इसके बावजूद केंद्र ने राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को सहजता से हासिल करने की ओर बढ़ रहा है। सिर्फ सातवें वेतन आयोग की सिफारिशें ही लागू होने से चालू वित्त वर्ष में सरकार के खजाने पर एक लाख करोड़ रुपये से अधिक का बोझ पड़ा है।हालांकि सरकार को काले धन की घोषणा होने और स्पेक्ट्रम की नीलामी से अतिरिक्त आय जुटाने में मदद मिली है। घरेलू काले धन के लिए आय घोषणा योजना से सरकार को लगभग 30,000 करोड़ रुपये मिलने का अनुमान है लेकिन चालू वित्त वर्ष में इसमें से मात्र आधी राशि ही आएगी।इसी तरह स्पेक्ट्रम की नीलामी से भी सरकार को 65 हजार करोड़ रुपये से अधिक राजस्व मिलने का अनुमान है लेकिन यह पूरी राशि भी सरकार को इसी साल में नहीं मिलेगी। ऐसे में अब सरकार की नजर विनिवेश पर है।

गौरतलब है कि आम बजट में सरकार ने विनिवेश से 56500 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा है लेकिन अप्रैल से अगस्त के दौरान पहले पांच महीने में इससे महज 3182 करोड़ रुपये ही जुटाए जा सके हैं जो बजटीय लक्ष्य का मात्र नौ प्रतिशत हैं।


चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों में की प्रगति देखें तो सरकार 533,904 करोड़ रुपये के राजस्व घाटे में से 76.4 प्रतिशत यानी 407,820 करोड़ रुपये का इस्तेमाल हो चुका है। वैसे पहली छमाही में राजस्व प्राप्तियों के संबंध में प्रदर्शन मिला-जुला रहा है।


परोक्ष कर संग्रह के मामले में सरकार का प्रदर्शन ठीक रहा है लेकिन प्रत्यक्ष कर संग्रह पर अर्थव्यवस्था की सुस्ती का असर दिख रहा है। चालू वित्त वर्ष में अप्रैल से सितंबर के दौरान परोक्ष कर संग्रह 4.08 लाख करोड़ रुपये रहा है जो बजट अनुमानों का 52.5 प्रतिशत है। इसी तरह प्रत्यक्ष करों के मोर्चे पर भी सरकार ने पहली छमाही में 3.27 लाख करोड़ रुपये का शुद्ध संग्रह किया है जो बजटीय अनुमान का मात्र 38.65 प्रतिशत है।

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Saturday, October 29, 2016

नई विश्व व्यवस्था बनाने की तैयारी में है इजराइल,साझेदार संघ परिवार पलाश विश्वास

नई विश्व व्यवस्था बनाने की तैयारी में है इजराइल,साझेदार संघ परिवार

https://www.youtube.com/watch?v=8S53ESH-JWE

पलाश विश्वास

इजराइल की तरह सर्जिकल स्ट्राइक के लिए चित्र परिणाम

भारत अमेरिका भले बन नहीं पाया हो,अमिरीकी उपनिवेश मुकम्मल बन गया है।विडंबना यह है कि वह अमेरिका अब गहरे संकट में है और डालर से नत्थी भारतीय अर्थव्यवस्था का अंजाम क्या होगा,अगर अमेरिका की पहल पर तृतीय विश्वयुद्ध शुरु हो गया,इस पर हमने सोचा नहीं है।अमेरिका इजराइल के शिकंजे में है।ट्रंप और हिलेरी दोनों इजराइल के उम्मीदवार हैं और जो भी जीते,जीत इजराइल की है और हार अमेरिकी गणतंत्र की है।जीत रंगभेद की है।नतीजा महान अमेरिका का पतन है।इजराइल की तैयारी नई विश्व व्यवस्था बनाने की है और संघ परिवार उसका सच्चा साझेदार है।इसके नतीजे क्या क्या हो सकते हैं,इस पर अभी से सोच लीजिये।

मसलन अभी टाटा संस का जो संकट है,वह अध्ययन और शोध का मामला है। टाटा मोटर्स का कारोबार इस मुक्त बाजार में जैसा बेड़ा गर्क हुआ कि नैनो झटके से टाटा का अंदर महल जिस तरह बेपर्दा हो गया है,उससे साफ जाहिर है कि चुनिंदा एकाध कंपनियों की दलाली का कारोबार भले मुक्तबाजार में आसमान की बुलंदियां छू लें, बाकी सभी भारतीय घरानों, कंपनियों, मंझौले और छोटे उद्योगों और व्यवसाइयों का बंटाधार है।खुदरा बाजार तो अब सिरे से बेदखल है और उत्पादन प्रणाली ठप है।

ग्लोबल कंपनियों को खुला बाजार के बहाने भारत में कारोबार का न्यौता देने से भारतीय बाजार से बेदखल होने लगी है देशी कंपनियां।सेक्टर दर सेक्टर यही हाल है।टाटा का किस्सा टाटा समूह का निजी संकट नहीं है।इस संकट के मायने बुहत गहरे हैं।घाव किसी एक को लगा है,यह समझकर बाकी लोग अपना ही जख्म चाटने लगे हैं।

सेवा क्षेत्र के दम पर अर्थव्यवस्था को फर्जी आंकड़ों और तथ्यों के सहारे पटरी पर रखना बेहद मुश्किल है।

टाटा के संकट से उद्योग और कारोबार जगत को खतरे की घंटी सुनायी नहीं पड़ी तो आगे चाहे ट्रंप जीते या फिर मैडम हिलेरी तृतीय विश्व युद्ध हो गया और डालर खतरे में हुआ तो कयामत ही आने वाली है।

इस बीच भारत के प्रधानमंत्री ने परंपरागत भारतीय विदेशनीति और राजनय को तिलांजलि देखकर एक तीर से दो निशाने साधन का करतब जो किया है,वह भी कम हैरत अंगेज नहीं है।इसे उनकी मंकी बात समझ लेना ऐतिहासिक भूल होगी।तेलअबीब और नागपुर के मुख्यालयों में नाभिनाल का संबंध है।अमेरिकी चुनाव में दोनों मुख्य उम्मीदवार ट्रंप और हिलेरी के पीछे तेल अबीब है।तेलअबीब के दोनों हाथों में लड्डू है।उस लड़्डू के हिस्से की दावेदारी का यह नजारा है,ऐसा समझना भी गलत होगा।

अब कोई गधा भी इतना नासमझ नहीं होगा कि इजराइल के सर्जिकल हमलों का असल मतलब क्या है।इजराइल कहां हमला करता है और किनकेखिलाफ हमला करता है।एक झटके से फलीस्तीन पर दशकों से होरहे हमलों को भारत के राजनीतिक नेतृत्व ने जायज बता दिया है,जिसे भारत हमेशा नाजायज बताता रहा है।भारत की गुटनिरपेक्ष राजनय का मुख्य फोकस फलस्तीन को बारत का समर्थन है और फलीस्तीनी जनता पर इजराइली हमलों का विरोध भी है।

भारत की इसी गुट निरपेक्ष राजनय की वजह से  पाकिस्तान खुद को कितना ही इस्लामी साबित करें,अरब देशों में से किसी ने अब तक भारत के खिलाफ पाकिस्तान का साथ नहीं दिया है।पाकिस्तान तो पहले से घिरा हुआ है तो इजराइलके पक्ष में फलीस्तीन की खिलाफत करके अरब देशों को पाकिस्तान के पाले में धकेलने का इस राजनयिक  सर्जिकल स्ट्राइक का आशय बहुत खास है।

जाहिर सी बात है कि खिचड़ी कुछ और ही पक रही है।

तेलअबीब और नागपुर का यह टांका नई विश्व्यवस्था पर काबिज होने की तैयारी है।अमेरिका का अवसान देर सवेर हुआ तो विश्वव्यवस्था भी नई होगी और इस गलतफहमी में न रहे कि रुश को सोवियत संघ है और पुतिन कोई लेनिन।रूस पर भी दक्षिणपंथी नस्लवाद का शिकंजा है।रूस हो या न हो,नई विश्वव्यवस्था बनाने की तैयारी में है इजराइल और उसका साझेदार संघ परिवार है,जो ग्लोबल हिंदुत्व को नई विश्वव्यवस्था की एकमात्र आस्था बनाने पर आमादा है।

गुजरात नरसंहार के वक्त किसी ने नहीं सोचा था कि उस मामले में अभियुक्त इतना पाक साफ निकल जायेगा कि वही देश का प्रधानमंत्री होगा।लगभग यही परिदृश्य अमेरिका में है।ट्रंप के हक में गोलबंदी फिर तेलअबीब और नागपुर का हानीमून है।जैसे 2103 में भी मोदी के प्रधानमंत्रित्व का ख्वाब किसी को नही आया,वैसे ही मीडिया और विश्व जनमत को धता बताने वाले घनघोर रंगभेदी ट्रंप के अमेरिका के राष्ट्रपति बनने की आशंका अब भी लोकतांत्रिक ताकतों को नहीं है।

फासिज्म की चाल इसीतरह होती है कि कब मौत की तरह घात लगाकर वह देस काल परिस्थिति पर काबिज हो जाये,उसका अंदाजा कभी नहीं लगता।

जगजाहिर है कि सोवियत संघ के विघटन के बाद विश्वव्यवस्था पर अमेरिका काबिज है।खाड़ी युद्ध से ही मध्यएशिया का युद्धस्थल हिंद महासागर में स्थांनातरित करने की कवायद शुरु हो चुकी थी।क्योंकि तेल अमेरिका के पास कम नहीं है।फालतू तेल और जलभंडार मध्यएशिया से लूटने की उनकी रणनीति जो है सो है,उनका असल मकसद दक्षिण एशिया के अकूत प्राकृतिक संसाधन हैं और तेजी से पनप रहे दक्षिण एसिया के उपभोक्ता बाजार उनके खास निसाने पर है।युद्धक अर्थव्यवस्था के लिए यह हथियारों का सबसे बड़ा बाजार भी है।

जेपी के आंदोलन को समर्थन के जरिये राजा रजवाड़ों की स्वतंत्र पार्टी और भारतीय जनसंघ के विलय से बनी जनता पार्टी के आपातकाल के अवसान के बाद से अबतक दक्षिणपंथी हिंदुत्ववादी संग पिरवार समेत तमाम अमेरिका परस्त तत्वों ने भारत को अमेरिका बनाने की कोशिश में इस महादेश को सीमाओं के आर पार अमेरिकी उपनिवेश बनाने में कोई कसर नहीं छोड़ी है।

इंदिरा गांधी के अवसान के बाद कांग्रेस पर भी उन्हीं तत्वों का वर्चस्व हो गया है।शुरुआत 1977 की ऐतिहासिक हार के बाद 1980 में सत्ता में इंदिरा की वापसी के बाद इंदिराम्मा और संघ सरसंचालक देवरस की एकात्मता से हुई जिसे सिखों के नरसंहार के जरिये संघ समर्थन से भारी बहुमत के साथ सत्ता में पहुंचने के बाद 1984 में प्रधानमंत्री बने राजीव गांधी ने अयोध्या के विवादित मंदिर मस्जिद धर्मस्थल का ताला खोलकर अंजाम तक पहुंचाया।

फिर भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन के बहाने वाम और संघ दोनों के समर्थन से बनी वीपी सिंह के राजकाज के दौरान मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करने के बाद मंडल के खिलाफ कमंडल हाथों में लेकर जो आरक्षण विरोधी आंदोलन चालू हुआ, उसीके नतीजतन भगवान श्रीराम का रावणवध कार्यक्रम फिर शुरु हो गया।

इसी सिलसिले में भारत में सोवियत संघ के विघटन के बाद वाम राजनीति का हाशिये पर चला जाना भी बहुत प्रासंगिक है।

सोवियत समर्थक वाम राजनीति ने आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी का साथ दिया तो आपातकाल का अंत होते न होते आपातकाल के तुरंत बाद सत्ता की राजनीति में दक्षिणपंथ वापंथ एकाकार हो गया।सोवियत समर्थक धड़ा हालाकिं 1977 के बाद भी गाय और बछड़े की तरह उस इंदिराम्मा से जुड़ा रहा जो सत्ता में वापसी के लिए गुपचुप संघ परिवार के हिंदुत्व की लाइन पकड़ चुकी थी।बंगाल में सत्तामें भागेदारी की मलाई खाने के लिए सोवियत समर्थक फिर माकपाई मोर्चे में भी शामिल हो गये।

इंदिरा के अवसान के बाद राजीव गांधी के राजकाज के पीछे भाजपा की परवाह किये बिना संघ परिवार का हाथ रहा है।लेकिन वाम राजनीति की कोई दिशा बनी नहीं।तीन राज्यों की सत्ता की राजनीति में उलझकर खत्म होती गयी वामपंथी विचारधारा और पूरा देश दक्षिणपंथी अमेरिकापरस्ती के शिकंजे में फंसता गया।

1989 में मंडल आयोग के बहाने वीपी की सरकार गिराकर फिर बाबरी विध्वंस और गुजरात नरसंहार के जरिये संघ परिवार का प्रत्यक्ष राजकाज  की बुनियाद बन गयी।डा.मनमोहन सिंह के ऩवउदारवादी अवतार से भारत के मुक्त बाजार बनते जाने के नरसिम्हाकाल और मनमोहक समय के अंतराल में भारतीय राजनीति से वाम का सफाया हो गया तो मुख्ट राजनीति के कांग्रेस केंद्रित और भाजपाकेंद्रित दोनों धड़े अमेरिकापरस्त हो गये।सरकार चाहे जिस किसी की हो,राजकाज वाशिंगटन का जारी रहा है।राजनीति चाहे जो रही हो,आर्थिक नीतियां अमेरिकी हितों के मुताबिक बनती बिगड़ती रही है।संसद में बहुमत हो या नहीं,सारे कायदे कानून सुधार के समाजवादी नारों के साथ अर्थव्यवस्था को बंटाधार करने के लिए सर्वदलीय सहमति से बनते बिगड़ते रहे और राजनीति धार्मिक ध्रूवीकरण की हो गयी।

सत्तर के दशक से जारी धार्मिक ध्रूवीकरण का परिणाम यह अंध धर्मोन्मादी राष्ट्रवाद है जो अंततः मुक्तबाजार का कार्यक्रम है।जिसका भारतीय वामपंथ ने किसी बी स्तर पर कोई विरोध नहीं किया तो अंततः फासिज्म का यह कारोबार निर्विरोध सर्वदलीय सहमति से फलता फूलता रह गया है और नतीजतन राजनीति भी अब कारपोरेट है और ग्रामप्रधान भी अब करोडों में खेलता है।इस पेशेवर राजनीति से विचारधारा या जनप्रतिबतिबद्धता की उम्मीद करने से बेहतर है मर जाना।भारतीय किसान थोक दरों पर खुदकशी करके यही साबित कर रहे हैं।

अब लगता है कि घटना क्रम जिस तेजी से बदलने लगा है और अर्थव्यवस्था का जिस तेजी से बंटाधार होने लगा है,किसानों और आम मर्द औरतों के अलावा उद्योग और कारोबार जगत के वातानुकूलित लोगों के लिए भी आखिरी विकल्प वही है।


इसी सिलसिले में बहुत कास बात यह है कि अब संघ परिवार देश जीतने के बाद दुनिया जीतने के फिराक में है।इसी वजह से नागपुर और तेल अबीब का यह नायाब गठबंधन है तो ट्रंप के समर्थन में ग्लोबल हिंदुत्व की जय जयकार है।


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