Sustain Humanity
Friday, December 9, 2016
ডিজিটালে কোন কোন কম্পানীর লাভ? ডিজিটালে সাধারণ মানুষ বাঁচবেন ত? ছ মাসেও পরিস্থিতির উন্নতি না হলে,সারা দেশে বাংলার দুর্ভিক্ষ ফিরে আসবে। নোট বাতিল সিদ্ধান্ত কিন্ত বাংলার গৈরিকীকরণ অভিযানেরই অঙ্গ।বাংলার জননেত্রী মুখ্যমন্ত্রী মমতা ব্যানার্জির কোনো হিতৈষী সত্যি সত্যি আছে কিনা আমি জানি না। তিনিই আমাদের নেত্রী এবং রাজ্যের মুখ্যমন্ত্রী।অন্ধ বামবিরোধী ভোটব্যান্কের রাজনীতিতে �
Thursday, December 8, 2016
#सलामतरहेअपनाकालाधनकेसरिया #जनगणमनपेटीएमकैशलैसजिओबिगबाजारओलाबैंकिंगधोडाला #ThanksHDFCChiefParikhtostandforIndianBankingSystems पलाश विश्वास
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#ThanksHDFCChiefParikhtostandforIndianBankingSystems
पलाश विश्वास
एचडीएफसी बैंक के चेयरमैन दीपक पारेख ने नोटबंदी की तीखी आलोचना कर दी है तो भारतीय स्टेट बैंक की चेयरमैन ने बैंकिग के हक के खिलाफ मुद्रा प्रबंधन की रिजर्व बैंक की नीति के खिलाफ मुंह खोल दिया है।देश भर के बैंक कर्मचारी और अफसर नोटबंदी के महीनेभर बाद तक लगातार काम करते रहने,आम जनता की सेवा में लगे रहने के बाद,करीब पंद्रह लाख करोड़ पुराने नोट जमा करके बदले में सिर्फ तीन लाख करोड़ नये नोट के दम पर भारतीय बैंकिग को जिंदा रखने की हरसंभव कोशिश करके अब हारने और थकने लगे हैं और बहुत जल्द वे हड़ताल पर जाने वाले हैं।कैशलैस इंडिया में अब आम जनता को कुछ दिनों तक नकदी देने का काम करेंगी पीटीएम, जिओ,बिगबाजार और ओला जैसी नानबैंकिंग सेवाएं।अगर बैंक कर्मी सचमुच हड़ताल पर चले गये और वह हड़ताल हफ्तेभर तक चली,तो कैसलैस सावन के अंधों को दिन में तारे नजर आने लगेंगे।
नोट बंदी के बाद इसी बीच टाटा समूह ने ब्रिटेन में एक अरब पौंड का निवेश कर दिया है तो अडानी समूह को आस्ट्रेलिया में करीब आठ अरब डालर का खदान खजाना मिल गया है और खुदरा बाजार समेत संचार और ऊर्जा,इंफ्रास्ट्रक्चर और रियल्टी,रक्षा से लेकर बैंकिंग सेक्टर में रिलायंस समूह जिओ जिओ है।बाकी आम जनता दाने दाने को मोहताज है।नौकरीजीवी पेंशनभोगी दो करोड़ बैंकों की लाइन लगाकर पैसा घर चलाने के लिए लेने खातिर बैंकों और एटीएम पर दम तोड़ने लगे हैं।विशेषज्ञों के मुताबिक कृषि क्षेत्र में नुकसान सत्तर फीसद से ज्यादा है और अनाज का भारी संकट आगे बंगाल की भुखमरी है।मंदी की छाया अलग गहराने लगी है।उत्पादन दर अभी से दो फीसद गिर गया है और विकास दर हवा हवाई है।शेयर बाजार में बड़े खिलाड़ियों की दिवाली और दिवालिया तमाम निवेशक।कल कारखाने ,कामधंधे , हाट बाजार,खेती बंद।
सिर्फ काला धन अब केसरिया है।
जनार्दन रेड्डी के उड़ाये पांच सौ करोड़ में से ड्राइवर के सुइसाइड नोट में सौ करोड़ काला केसरियाधन सफेद है और बाकी कसिकिस के सुईसाइड नोट में सफेद हुआ है ,मालूम नहीं है।दो हजार के नये नोट ने केसरिया तंत्र कालाधन का खड़ा कर दिया है।नोटबंदी से ऐन पहले बंगाल भाजपा के खाते में तीन करोड़ और हर राज्य में जमीन खरीद,नोटबंदी से पहले नये नोट के साथ केसरिया सेल्फी सुनामी के बाद बंगाल में भाजपा के नेता के पास 33 करोड़ केसरिया नये नोट बरामद तो बंगलूर में 40 करोड़ के नये नोट हासिल।
आम जनता के लिए नकदी वाले एटीएम तक फर्राटा दौड़ है और नकद पुरस्कार दो हजार का इकलौता नोट।
केसरिया एकाधिकार कंपनियों का विदेशों में निवेश अरबों पौंड और डालर में।
देश में निवेश दर शून्य से नीचे।
उत्पादन दर में गिरावट।
विकास दर में गिरावट।
कृषि विकास दर शून्य से नीचे।
सुनहले दिन केसरिया केसरिया।
#सलामतरहेअपनाकालाधनकेसरिया
#जनगणमनपेटीएमकैशलैसजिओबिगबाजारओलाबैंकिंगधोडाला
तमिलनाडु में अम्मा के अवसान के बाद शोकसंतप्त कमसकम सत्तर लोगों के मरने की खबर है।
हमारे हिंदू धर्म के मुताबिक तैतीस करोड़ देवदेवियों का संसार प्राचीन काल से है।
उनके परिवार नियोजन का रहस्य हम जानते नहीं हैं।
2016 में भी वे उतने ही हैं।
लेकिन अवतारों की संख्या उनसे कहीं ज्यादा है,इसमें कोई शक शुबह की गुंजाइश नहीं है।बाबाबाबियों की संख्या उनसे हजार गुणा ज्यादा है।
फिल्मस्टार और राजनेता भी ईश्वर न हो तो किसी देव देवी से कम नहीं है।
अम्मा ने तो फिरभी बहुत कुछ किया है।
आम जनता को दो रुपये किलो चावल,एक रुपये में भरपेट भोजन,राशनकार्ड पर टीवी,छात्र छात्राओं को मुफ्त लैपटाप, महिलाओं को साड़ी और विवाह पर कन्या को मंगल सूत्र।
इन तमाम योजनाओं से लाभान्वित लोगों का शोक जायज है।अम्मा में उनकी अटल आस्था का भी वाजिब कारण है।
इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वे अपने पीछे चल अचल संपत्ति दो सौ करोड़ के करीब छोड़ गयी हैं या उनका राजनीतिक उत्तराधिकार और उनकी संपत्ति की मिल्कियत किसे मिलने वाली है।
इसके विपरीत तैंतीस करोड़ देव देवी,इतने ही करोड़ अवतार,उनसे हजार गुणा बाबा बाबियों का यह हुजूम सिरे से मुफ्त खोर हैं और इनका सारा काला कारोबार आस्था का मामला है।
धर्मस्थलों में देश की कुल संपत्ति से दस बीस गुणा संपत्ति है,जो सारा का सारा कालाधन केसरिया है।जिसका कोई हिसाब किताब नहीं है।वह सारा केसरिया कालाधन विशुद्ध आयुर्वेदिक है।जहां कानून का हाथ पहुंच जाये तो काट दिया जाये।जहां आयकर छापा नहीं पड़ सकता।उन्हीं धर्मस्थलों के महंत अब हमारे जनप्रतिनिधि हैं।जो अस्पृश्यता के धुरंधर प्रवक्ता हैं।यही उनका आध्यात्म है।
आम जनता को कंगाल बनाये रखने की रघुकुल परंपरा मनुस्मृति है।यही रामराज्य और स्वराज दोनों हैं।अखंड जमींदारी और अखंड रियासत सही सलामत।केसरिया कालाधन सही सलामत।बाकी जनता का कत्लेआम अश्वमेध जारी रहे और बार बार देश का बंटवारा होता रहे।यही वैदिकी संस्कृति है।राम की सौगंध है।
नोटबंदी से वही मनुस्मृति फिर बहाल हुई है और भारतीय संविधान और लोकतंत्र का रफा दफा हो गया है।
रिजर्व बैंक के पास नोटों का कोई लेखा जोखा नहीं है और सारे नये नोटों का केसरिया कायाकल्प है।राजकाज बिजनेस में तब्दील है।राजनीति बेनामी संपत्ति है।रिजर्व बैंक को मालूम नहींं है किसे कितने नोट मिल रहे हैं और तमाम नये नोट केसरिया कैसे बनते जा रहे हैं और केसरिया हाथों में ही वे घूम क्यों रहे हैं।सत्ता नाभिनाल से जुड़ी तमाम गैर बैंकिंग संस्थाओं को आम जनता को गला काटने का हक और बैंकिंग दिवालिया।डिजिटल बहार।
कालाधन का अता पता नहीं।कालाधन कहां है,कोई जवाब नहीं।स्विस बैंक खाताधारकों का क्या हुआ,कोई पता नहीं।माल्या के अलावा हजारों हजार करोड़ कर्ज माफी किन्हें मिली,नामालूम। कानून बनाकर किनके कालधन लाखों करोड़ विदेश भेज दिये गये,मालूम नहीं।लाखों करोड़ का टैक्स माफ किनके लिए।लाखों करोड़ का कमिशन किन्हें मिला मालूम नहीं।आम जनता को रातोंरात कंगाल बना दिया गया और उनके लोग अरबों पौंड,अरबों डालर का सौदा कारोबार कर रहे हैं।बाकी सारा कारोबार बंद है।
अरबों पौंड,अरबों डालर का विदेश में निवेश पर नोटबंदी का कोई असर नहीं है।देश में निवेश शून्य से भी नीचे हैं।यह गजब की डिजिटल अर्थव्यवस्था है जिसकी सारी मलाई विदेशियों के लिए हैं या विदेशी कंपनियों के साझेदारों के लिए है।यह अजब गजब स्वराज का रामराज्य है।ग्लोबल हिंदुत्व सही मायने में यही है। उनका केसरिया कालाधन सात समुंदर पार।उनका सारा कर्ज माफ।किसानों की खेती चौपट कर दी।किसान लाखों की तादाद में खुदकशी कर रहे थे,मेहनतकश लाखों मारे जा रहे थे,दलित ,विधर्मी और आदिवासी लाखों मारे जा रहे थे और अब करोड़ों की तादाद में मारे जाएंगे।यही हिंदू राष्ट्र है।यही हिंदू ग्लोब है।
किसी सभ्य देश में बैंक के पैसा देने से इंकार की वजह से सौ लोगों के मारे जाने का इतिहास नहीं है।न जाने कितने और मरेंगे तो हम शोक मनायेंगे।दो मिनट का मौन उन शहीदों के नाम रखेंगे।या फिर खुद शहादत में शामिल हो जायेंगे। न जाने कितने बच सकेंगे,जो आखिरकार चीख सकेंगे और न जाने किस किसकी खाल और रीढ़ बची रहेगी,किसका सर सही सलामत रहेगा कि फिर सर उठाकर रीढ़ सीधी करके इस अन्याय के अंध आस्था कारोबार के अंधा युग का इस महाभारत में विरोध करने की हालत में होंगे।
यह महाजनी सभ्यता दऱअसल आस्था का कारोबार है।
इसीलिए कारपोरेट नरसंहारी एजंडा भी हिंदुत्व का एजंडा है।
आम जनता अब इसी आस्था की बलि हंस हंसकर हो रहे हैं।
यही नहीं,एक दूसरे का गला काट रहे हैं।
बनिया पार्टी ने बनिया समुदाय को कंगाल बना दिया है।
सत्ता समीकरण ओबीसी है।
सत्ता का चेहरा ओबीसी है।
सत्ता के क्षत्रप और सिपाहसालार ओबीसी है।
आधी आबादी ओबीसी है।
जिनमें ज्यादातर किसान हैं।
बाकी छोटे मोटे कामधंधे में लगे लोग।
ओबीसी तमाम लोग कंगाल हैं।
ओबीसी की गिनती अबतक नहीं हुई।
ओबीसी के हकहकूक बहाल भी नहीं हुए।
ओबीसी को आरक्षण देने के मंडल प्रावधान के खिलाफ मंडल के बदले कमंडल आया और हिंदुत्व के इस उन्माद की जमीन आरक्षण विरोध है।
उसी हिंदुत्व एजंडा के सारे कारिंदे ओबीसी।
जिस मनुस्मृति की वजह से दलितों पर हजारों साल से अत्याचार जारी है, उसी मनुस्मृति बहाल करने वाले दलितों के ईश्वर अवतार बाबा बाबी हैं।
अर्थव्यवस्था सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले हैं।
फिजां कयामत है।
लोग अपनी अपनी आस्था के लिए खुदकशी करेंगे।
लोग अपनी अपनी आस्था के लिए दंगा मारपीट कत्लेआम करेंगे,जान दे देंगे।लेकिन लोगों को संविधान या कानून की परवाह नहीं है।
मनुस्मृति शासन बहाल ऱखने के लिए दलित ओबीसी बहुजन हिंदुत्व एजंडे के कारपोरेट सैन्यतंत्र की पैदल फौजें हैं।
इसीलिए निर्विरोध सलवाजुड़ुम।
इसीलिए निर्विरोध बलात्कार सुनामी।
इसीलिए निर्विरोध बच्चों की तस्करी।
इसीलिए निर्विरोध दलितों पर अत्याचार।
इसीलिए निर्विरोध स्त्री उत्पीड़न।
इसीलिए निर्विरोध निजीकरण।
इसीलिए निर्विरोध विनिवेश।
इसीलिए निर्विरोध बेदखली।
इसीलिए निर्विरोध बेरोजगार।
इसीलिए निर्विरोध सैन्य तंत्र।सैन्य शासन।
इसीलिए निर्विरोध फासिज्म कारोबार।राजकाज फासिज्म।
इसीलिए सामूहिक नसबंदी डिजिटल बहार निर्विरोध।
इसीलिए मैनफोर्स के हवाले देश का वर्तमान भविष्य और अतीत।
इसीलिए बिना उत्पादन के सिर्फ कमीशन खोरी का काला केसरिया मुक्तबाजार है।
इसीलिए इस देश का ट नहीं हो सकता।
Wednesday, December 7, 2016
बाबाओं और बाबियों का देश सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था राजनीति में नागनाथ और आम जनता भेड़ धंसान लोकतंत्र दिवास्वप्न नागरिकता अभिमन्यु का चक्रव्यूह विवेक धृतराष्ट्र पितृसत्ता गांधारी पलाश विश्वास
बाबाओं और बाबियों का देश
सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था
राजनीति में नागनाथ
और आम जनता भेड़ धंसान
लोकतंत्र दिवास्वप्न
नागरिकता अभिमन्यु का चक्रव्यूह
विवेक धृतराष्ट्र
पितृसत्ता गांधारी
पलाश विश्वास
सबसे पहले हम अपने पाठकों और इस देश की आम जनता से माफी चाहते हैं।मौजूदा आपातकालीन हालात में हालात अघोषित सेंसरशिप है और बाकायदा सोशल मडिया की नाकेबंदी है।जो लिंक हम शेयर कर रहे हैं,अव्वल तो वह आप तक पहुंच ही नहीं रहा है और पहुंच भी रहा है तो खुल नहीं रहा है।जिन प्लेटफार्म के जरिये हम आप तक पहुंचते हैं,वहां भी हमारे लिए सारे दरवाजे और खिड़कियां बंद हैं।
नोटबंदी लागू होने के साथ साथ आम जनता ही नहीं,प्रतिबद्ध पढ़े लिखे एक बड़े तबके को भी यकबयक उम्मीद हो गयी कि देश में पहलीबार कालाधन निकालने का चाकचौबंद इंतजाम हो गया है।उनके पुराने स्टेटस इसके गवाह है।बहुत जल्दी उन्हें अपने अनुभवों से मालूम पड़ गया कि ऐसा कुछ होने नहीं जा रहा है।ऐसे तमाम पढ़े लिखे लोग तीर तरकश संभालकर मैदान में डट गये हैं और चांदमारी पर उतर आये हैं।उन्हें यह समझ में नहीं आ रहा है कि बाकी आम जनता उनकी तरह न पढ़े लिखे हैं और न काबिल और समझदार हैं।जो अब भी भक्तिमार्ग पर अडिग हैं।तो उनके ईश्वर के खिलाफ गोलाबारी का मोर्चा खुल गया है।ईश्वर के खिलाफ अनास्था आम आस्थावान जनता को सिरे से नापसंद हैं और वे किसी दलील पर गौर करने की मानसिकता में नहीं होते।ऐसे हालात में हकीकत की पूरी पड़ताल के बिना,लोगों से संवाद किये बिना हालात का मुकाबला असंभव है।
प्रिंट और इलेक्ट्रानिक मडिया में पक्ष विपक्ष के सत्तापक्ष के हितों के मुताबिक बहुत कुछ छप रहा है।कुल किस्सा आधा सच और आधा झूठ का फसाना है।आम जनता के लिए क्या सच है,कितना सच और कितना झूठ है,झूठ क्या है,यह सुर्खियों की चीखों से पता करना एकदम असंभव है।सोशल मीडिया पर संवाद का रास्ता खुल सकता था और वहां भी अघोषित सेंसरशिप है।
हम सिरे से असहाय हैं।हमारा कहा लिखा कुछ भी आप तक नहीं पहुंच पा रहा है।करीब 45 साल से जिन अखबारों में हम लगातार लिखते रहे हैं,वहां सारे लोग बदल गये हैं और जो लोग अब वहां मौजूद हैं,उनमें अब भी ढेरों लोग हमारे पुराने दोस्त हैं।लेकिन उनमें से कोई हमें छापने का जोखिम उठाने को तैयार नहीं है। क्योंकि पत्रकारिता अब मिशन नहीं है,बिजनेस है,जिसे सत्ता का संरक्षण और समर्थन की सबसे ज्यादा परवाह है।जनता का पक्ष उनकी कोई वरीयता है ही नहीं क्योंकि उन्हें सिर्फ अपने कारोबारी हितों की चिंता है और वे बेहद डरे हुए हैं।ऐसे हालात में पैनल चैनल पर हमें कहीं से बुलावा आना भी असंभव है।बाकी सोशल मीडिया पर हम रोजाना रोजनामचा वर्षों से लिख रहे हैं,जो आप तक पहुंच नहीं रहा है।हम शर्मिंदा हैं।
हमारे इलाके में जबसे मैं नौकरी के सिलसिले में बंगाल में आया हूं,1991 से लेकर वाममोर्चा के सत्ता से बेदखल होने से पहले तक बुजुर्ग और जवान कामरेड घर घर आते जाते थे।इनमें सबसे बुजुर्ग दो कामरेड माणिक जोड़ के नाम से मशहूर थे।वाममोर्चा के सत्ता से बेदखल होने के बाद थोड़े समय के अंतराल में दोनों दिवंगत हो गये।
कामरेड सुभाष चक्रवर्ती के जीवित रहने तक जिले भर में कैडरों का हुजूम जहां तहां दिखता रहता था।तमाम मुद्दों और समस्याओं पर आम जनता से निरंतर संवाद और इसके लिए तैयारी में उनकी दिनचर्या चलती थी।
कामरेड ज्योति बसु के अवसान के बाद बंगाल में कोई कामरेड बचा है या नहीं,मालूम नहीं पड़ता।
पूरे बंगाल में अब संघी सक्रिय हैं।अभी अभी बंगाल में नवजात बच्चों की अस्पतालों और नर्सिंग होम से व्यापक पैमाने पर तस्करी के मामले खुल रहे हैं,जिसमें प्रदेश भाजपा के संघी अध्यक्ष के खासमखास विधाननगर नगर निगम में भाजपाई उन्मीदवार एक चिकित्सक बतौर सरगना पकड़े गये हैं।
नोटबंदी से एक दिन पहले बंगाल भाजपा के खाते में करोड रुपये जमा होने का किस्सा सामने आया तो आसनसोल इलाके में पिछले विधानसभा चुनाव में भाजपा उम्मीदवार और आसनसोल के सांसद केंद्रीय मंत्री बाबुल सुप्रिय के खासमखास कोलकाता के पास विधाननगर में कोयला मापिया के साथ 33 करोड़ के ताजा नोट के साथ पकड़े गये हैं।
कालाधन नये नोट में तब्दील होकर फिर अर्थव्यवस्था में खुलकर आ रहा है और एक हजार के बदले दो हजार के नोट जारी करके कायदा कानून बदलकर इसका चाकचौबंद इंतजाम हो रहा है तो कैशलैस फंडा अलग है।
दीदी ने मोदी के खिलाफ जिहाद का ऐलान कर दिया है और बंगाल में दीदी के सारे समर्थक केसरिया हो गये हैं।वे धुर दक्षिणपंथी हैं और कट्टर वामविरोधी हैं जो बंगाल में हाल में हुए चुनावों में दीदी मोदी गठबंधन को जिताने के लिए जमीन आसमान एक कर रहे थे।ये तमाम लोग अब भी मोदी और दीदी का समर्थन कर रहे हैं और दीदी के जिहाद को राजनीतिक नौटंकी मान रहे हैं।
दीदी के समर्थक बहुत ज्यादा हैं,लेकिन उनमें से कोई कार्यकर्ता नहीं है और वे अपने अपने धंधे सिंडिकेट में मशगुल हैं।आम जनता के लिए उनके फरमान तो जारी होते हैं लेकिन आम जनता से किसी का कोई संवाद नहीं है।
सारी राजनीति अखबारों और टीवी के सहारे चल रही है।
वाम नेता भी वातानुकूलित हो गये हैं और उनके बयान सीधे अखबारों,टीवी और सोशल मीडिया से जारी होते रहते हैं।
राजनीति पत्रकारिता में सीमाबद्ध हो गयी है और सारे पत्रकार राजनेता या कार्यकर्ता बन गये हैं।पत्रकारिता से अलग राजनीति का अता पता नहीं है और न ही राजनीति और सत्ता से अलग पत्रकारिता का कोई वजूद है।
ऐसे माहौल में जिले के एक बड़े कामरेड से आज धोबी की दुकान पर मुलाकात हो गयी,जिनसे नब्वे के दशक में और 2011 तक हमारी घंटों बातचीत होती रहती थी।वे ट्रेड यूनियन आंदोलन में भी खासे सक्रिय हुआ करते थे।
कामरेड सुभाष चक्रवर्ती के खेमे में उनकी साख बहुत थी।उनसे राह चलते दुआ नमस्कार एक मोहल्ले में रहने के कारण अक्सर हो जाती थी।लेकिन बड़े दिनों के बाद उनसे आमना सामना हुआ तो हम उम्मीद कर रहे थे कि वे बातचीत भी करेंगे।वे प्राइवेट सेक्टर में नौकरी करते थे और राजनीतिक सक्रियता में उनकी नौकरी कभी आड़े नहीं आयी।उनने पहले ही मौके पर वीआरएस ले लिया था।
उनने कोई बात नहीं की तो मैंने पूछ लिया,क्या आप बैंक में थे।जाहिर है कि वे नाराज हुए और जवाब में कह दिया कि इतने दिनों से आपको यह भी नहीं मालूम।उनका सवाल था कि आप लिखते कैसे हैं।
इस पर मैंने पूछ ही लिया,नोटबंदी के बारे में कुछ बताइये।
वे बोले, मीडिया कुछ भी कह रहा है और आप लोगों को कुछ भी मालूम नहीं है।
मैंने कहा,आप कुछ बताइये।
जबाव में बुजुर्ग कामरेड ने कहा कि मुझे किसीसे कुछ लेना देना नहीं है।
गांव हो या शहर,आम जनता और परिचितों से कामरेड इस तरह कन्नी काट रहे हैं,जिन्हें अर्थव्यवस्था के बारे में भी जानकारी होती है।
यह सीधे तौर पर राजनीति का ही अवसान है,वामपंथ का तो नामोनिशां है नहीं।
बिना राजनीतिक कार्यक्रम और संगठन के इस आर्थिक अराजकता का मुकाबला असंभव है जबकि आम जनता को सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के करतब से सावन ही सावन दिखा रहा है।
बाबाओं और बाबियों का देश
सपेरों,मदारियों और बाजीगरों के हवाले अर्थव्यवस्था
राजनीति में नागनाथ
और आम जनता भेड़ धंसान
लोकतंत्र दिवास्वप्न
नागरिकता अभिमन्यु का चक्रव्यूह
विवेक धृतराष्ट्र
पितृसत्ता गांधारी
Tuesday, December 6, 2016
तो अब हम क्या करें? बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकरी की राजनीति और विरासत के हिंदुत्वकरण के बाद ओबीसी कार्ड और द्रविड़ आंदोलन के केसरियाकरण से हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है क्योंकि वामपंथ की अब कोई साख नहीं है। अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा अब भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी का है तो बैंकिंग ही खत्म हो जाने का अंदेशा है।बैंको को दिवालिया कर देने के बाद मुद्रा की साख खत्म हो जा
तो अब हम क्या करें?
बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकरी की राजनीति और विरासत के हिंदुत्वकरण के बाद ओबीसी कार्ड और द्रविड़ आंदोलन के केसरियाकरण से हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है क्योंकि वामपंथ की अब कोई साख नहीं है।
अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा अब भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी का है तो बैंकिंग ही खत्म हो जाने का अंदेशा है।बैंको को दिवालिया कर देने के बाद मुद्रा की साख खत्म हो जाने से जो आर्थिक अराजकता की स्थिति बन रही है,वह कालेधन की अर्थव्यवस्था से ज्यादा खतरनाक है।
पलाश विश्वास
हमने व्यापक पैमाने पर समाज के विभिन्न तबकों के लोगों से बात की है तो पता चला है कि गांवों और शहरों में नोटबंदी के खिलाफ अभी कोई माहौल बना नहीं है तो कालाधन वापसी की किसीको कोई उम्मीद भी नहीं है।लोग रातोंरात कैशलैस अर्थव्यवस्था के पक्ष में हो गये हैंं और उन्हें उम्मीद है कि सुनहले दिन अब आने ही वाले हैं।मोदी ने अमीरों के खिलाफ गरीबों को भड़काने का काम बखूब कर दिया है और अपने संपन्न पड़ोसियों के मुकाबले बहुसंख्य जनता को नोटबंदी में खूब मजा आ रहा है और उन्हें आने वाले खतरों के बारे में कोई अंदाजा नहीं है।आगे वे मोदी के नये करतबों और आम बजट में राहत का इंतजार कर रहे हैं।कालाधन के अलावा उन्हें बेनामी संपत्ति भी जब्त हो जाने की उम्मीद है।उन्हें समझाने और अर्थतंत्र के शिकंजे में फंसी उनकी रोजमर्रे के हकीकत का खुलासा करने का हमारा कोई माध्यम नहीं है और न कोई राजनीति ऐसी है जो आम जनता के हक हकूक के बारे में सच उन्हें बताने की किसी योजना पर चल रहा है।
हम यही बताने की कोशिश कर रहे है कि हिंदुओं के ध्रूवीकरण की राजनीति विपक्ष के अंध हिंदुत्व विरोध से जितना तेज हुआ है,उसी तरह अंध मोदी विरोध से भी कोई वैकल्पिक राजनीति तब तक नहीं बनती जब तक सच बताने और समजानेका हमारा कोई सुनियोजित कार्यक्रम और माध्यम न हो।हिंदुत्व के फर्जी एजंडा का पर्दाफाश करने की कोई जमीनी कवायद हम कर नहीं पाये हैं।तो संसदीय हंगामा से हम फासिज्म के राजकाज पर किसीभी तरह का अंकुश नहीं लगा सकते हैं। रोज नये नये सत्यानाशी फरमान जारी हो रहे हैं,जिनका असल मतलब और मकसद बताने और समझने का कोई नेटवर्क हमारे पास नहीं है।
मसलन बंगाल में मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने मोदी के खिलाफ नोटबंदी के बाद पुराने नोट फिर बहाल करने की मांग लेकर जिहाद छेड़ दिया है और वे दिल्ली,लखनऊ और पटना घूमकर नया राजनीतिक समीकरण बनाने के फिराक में हैंं।प्रबल जनसर्तन होने के बावजूद उनकी इस मुहिम को आम जनता का समर्थन कतई नहीं है और वे मोदी के करिश्मे से अपने दिन फिरने का इंतजार कर रहे हैं और जो गरीब लोग हैं,वे छप्पर फाड़ सुनहले दिनों का इंतजार कर रहे हैं।वामपंथियों काकोईजनाधार बचा नहीं है तो दीदी का कोई जनाधार भी दिख नहीं रहा है।इसके विपरीत भूमिगत सारे संघी सतह पर आ गये हैं और मोदी की छवि सामने रखकर वे बंगाल का तेजी से केसरियाकरण कर रहे हैं।
नोटबंदी क्रांति के बारे में हमें पहले दिन से ही खुशफहमी नहीं रही है।हमने शुरुआत में ही लिखा हैनई विश्वव्यवस्था में नागपुर तेलअबीब और वाशिंगटन गठभंधन के आधार पर अमेरिका के राष्ट्रपति पद पर ग्लोबल हिंदुत्व के उम्मीदवार घनघोर रंगभेदी डोनाल्ड ट्रंप के ताजपोशी से पहले भारत में आर्थिक आपातकाल लागू हो गया है।
अब जो हालात बन रहे हैं,वे बेहद खतरनाक हैं।बेहद खतरनाक इसलिए हैं कि हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है।आज बाबासाहेब डा.भीमराव बोधिसत्व का परिनिर्वाण दिवस है।देशभर में परिनिर्वाण दिवस की धूम लगी रही।तो दूसरी ओर,तमिलनाडु में तीन दशकों से द्रमुक राजनीति की धुरी बनी हुई अम्मा का अवसान हो गया।वामपंथ के भारतीय परिप्रेक्ष्य में हाशिये पर चले जाने के बाद अंबेडकरी और द्रमुक आंदोलन के दिशाहीन हो जाने से वैकल्पिक राजनीति अब विश्वविद्यालयी छात्रो के जयभीम कामरेड तक सीमाबद्ध हो गयी है।
हमने पिछले दिनों ओबीसी कार्ड के नये राजनीतिक समीकरण पर जो लिखा है,उससे देस में सबसे बड़ी आजादी के पढ़े लिखे लोग नाराज हो सकते हैंं।लेकिन सच यही है कि ओबीसी कार्ड के जरिये संघ परिवार ने पहले सत्ता दखल किया और हिंदुत्व के एजंडे के साथ राजकाज शुरु हुआ।अब वही हिंदुत्व कार्ड प्रधानमंत्री की अस्मिता राजनीति के तहत कारपोरेट एजंडा में तब्दील हुआ जा रहा है।इससे संघ परिवार का दूर दूर का कोई संबंध नहीं है।
भले ही राममंदिर आंदोलन और हिंदुत्व का एजंडा हाशिये पर है लेकिन संघ परिवार का यह ओबीसी समर्थित कारपोरेट एजंडा असहिष्णुता की रंगभेदी राजनीति से कही ज्यादा खतरनाक है।देश की सबसे बड़ी आबादी को यह बात समझ में नहीं आ रही है तो देश में अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली के एकाधिकार देशी विदेशी के कब्जे में चले जाने पर होने वाली नरसंहारी आपदाओं के बारे में हम किसे समझायें।
आज अम्मा को द्रमुक राजनीति के ब्राह्मणवाद विरोध और नास्तिकता के दर्शन के मुताबिक दफनाया गया है।हम भारतीय राजनीति में मातृसत्ता का समर्थन करते हैं।हम महिलाओं के राजनीतिक नेतृत्व का ही नहीं,जीवन में हर क्षेत्र में उनके नेतृत्व के पक्ष में हैं।जाति के आधार पर आधी आबादी ओबीसी के कार्ड के जरिये केसरिया है तो लिंग के आधार पर आधी आबादी ब्राह्मणवादी पितृसत्ता के कब्जे में हैं।विकास का तंत्र जनपदों के सीमांत व्यक्ति तक पहुंचाने,आम जनता की बुनियादी जरुरतों और सेवाओं की सबसे ज्यादा परवाह करने और सीधे जनता से संवाद और जनसुनवाई के लिए अम्मा जयललिता की स्त्री अस्मिता निर्णायक रही है और उनकी राजनीति सीधे रसोई से शुरु होती है,इसमें भी हमें कोई शक नहीं है।
ममता बनर्जी की राजनीति से सिरे से असहमत होने के बावजूद एक आजाद जनप्रतिबद्ध स्त्री के बतौर उनकी राजनीति का हम शुरु से समर्थन करते रहे हैं तो श्रीमती गांधी से लेकर सुषमा स्वराज और बहन मायावती की राजनीतिक भूमिका को हम सामाजिक बदलाव की दिशा में सकारात्मक मानते हैं और इसी सिलसिले में करीब पंद्रह साल से आमरण अनशन करने वाली मणिपुर की लौैहमानवी इरोम शर्मिला के संसदीय राजनीति में लड़ने के फैसले का हम विरोध नहीं करते।क्योंकि समता,न्याय औरसहिष्णुता के लिए पितृसत्ता का टूटना सबसे ज्यादा जरुरी है।
जयललिता ने अयंगर ब्राह्मण होते हुए,जन्मजात कनन्ड़ भाषी होते हुए अपने सिनेमाई करिश्मा से तमिल अनार्य द्रविड़ आम जनता के साथ जो तादात्म्य कायम किया और जिस तरह वे द्रविड़ राजनीति का तीन दशकों से चेहरा बनी रही,वह हैरतअंगेज और अभूतपूर्व है और हम उनके निधन को तमिलनाडु में मातृसत्ता का अवसान मानते हैं।इसके बावजूद सच यह है कि अम्मा का अंतिम संस्कार वैदिकी रीति रिवाज के मुताबिक हुआ तो फर्क सिर्फ इतना है कि उन्हें चिताग्नि में समर्पित करने के बजाय दफनाया गया है।यह रामास्वामी पेरियार के आत्मसम्मान और अनास्था आंदोलन के विपररीत द्रविड़ आंदोलन का केसरियाकरण है।
बाबासाहेब डा.भीमराव अंबेडकरी की राजनीति और विरासत के हिंदुत्वकरण के बाद ओबीसी कार्ड और द्रविड़ आंदोलन के केसरियाकरण से हमारे पास वैकल्पिक कोई राजनीति नहीं है क्योंकि वामपंथ की अब कोई साख नहीं है।
तो अब हम क्या करें?
अर्थव्यवस्था के लिए सबसे बड़ा खतरा अब भुखमरी,बेरोजगारी और मंदी का है तो बैंकिंग ही खत्म हो जाने का अंदेशा है।बैंको को दिवालिया कर देने के बाद मुद्रा की साख खत्म हो जाने से जो आर्थिक अराजकता की स्थिति बन रही है,वह कालेधन की अर्थव्यवस्था से ज्यादा खतरनाक है।
