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Tuesday, December 13, 2016

ये हमारे तमाम नाकाम बेरोजगार बच्चे तन्हाई में जीने मरने को अभिशप्त हैं। हम इस डिजिटल उपभोक्ता मुक्त बाजार का क्या करेंगे? पलाश विश्वास


ये हमारे तमाम नाकाम बेरोजगार बच्चे तन्हाई में  जीने मरने को अभिशप्त हैं।

हम इस डिजिटल उपभोक्ता मुक्त बाजार का क्या करेंगे?

पलाश विश्वास

पिछले जाड़ों में भी इन दिनों शाम ढलने से पहले हम रोजाना मुंबई रोड स्थित एक्सप्रेस भवन के लिए रवाना हो जाते थे।देर रात घर वापस लौटते थे।यह शाम को घर से निकल जाना और देर रात वापस हो जाना करीब 36 साल तक चलता रहा है।उससे भी पहले 1973 से 1979 तक नैनीताल के मालरोड पर हमारी शाम बीतती थी और बर्फवारी हो या घमासान बारिश माल रोड में तल्ली मल्ली नैनीताल समाचार होकर देर रात तक हम दोस्तों के साथ होते थे।उससे भी पहले बचपन में हमारे लिए अकेले घिर जाने का कोई मौका नहीं था।

हमें अपने दफ्तर से रिटायर हो जाने से पहले कभी तन्हाई का अहसास ही नहीं हुआ।हम हमेशा मित्रों से घिरे रहने वाले प्राणी रहे हैं।घर में सविताबाबू हैं और मेरा कंप्यूटर है।टीवी मैं बहुत कम देख पाता हूं।

ऐसी घमासान तन्हाई होती है जिंदगी में छह सात महीने में इसका अहसास खूब हो गया है।मैंने बूढ़ाते हुए भी बचपन का दामन कसकर पकड़ा हुआ था और डीएसबी के मेरे ठहाकों का सिलसिला एक्सप्रेस भवन तक जारी रहा है।पिछले छह सात महीने में मैं एकबार भी ठहाका लगा नहीं सका,खुलकर खिलखिला नहीं सका।

हम नहीं जानते कि इस देश में हमारे राष्ट्रीय नेता खुलकर कभी ठहाके लगाते भी हैं या नहीं या वे हंसते भी हैं या नहीं।

कामरेड ज्योति बसु हंसते नहीं थे,यह किस्सा मशहूर है।

हालांकि ममता दीदी मुख्यमंत्री बनने के बाद मुस्कुराने भी लगी हैं।

डा.मनमोहन सिंह को हमने कभी हंसते हुए नहीं देखा।

बाकी लोग तो चीखते या दहाड़ते नजर आते हैं।

जो लोग हंस नहीं सकते,उन्हें दूसरों की हंसी की क्या परवाह होगी।

राजनीति अब आम जनता की हंसी छीन रही है।

राजनीति को सिर्फ आम लोगों की चीखों में अपनी जीत नजर आती है।

इस मुक्त बाजार में जिंदगी की मुस्कान सिरे से गायब है।हम नहीं जानते कि कुल कितने लोगों की इसकी परवाह है।

नोटबंदी से लोग कालाधन निकलने की उम्मीद में थे।लोगों को लगा कालाधन वाले बुरी तरह फंसे हैं और आगे सावन ही सावन है।उन्हें लगा कि अब क्रांति हो ही गयी है।उन्हें लगा ऐसा साहसी और ईमानदार छप्पन इंच का सीना इतिहास में कही दर्ज नहीं हुआ।

पढ़े लिखे मर्दों को सबस मजा इस बात को लेकर आया कि घर की महिलाओं का खजाना सार्वजनिक हो गया।

किसी ने नहीं सोचा कि घर में कैद इन औरतों को उनके श्रम और निष्ठा के बदले में हम कितनी आजादी और कितनी खुशी देते हैं।

ये वे औरते हैं जो आस पड़ोस के हाट बाजार में शौक से जाती हैं और एक एक पैसे के लिए मोलभाव करती हैं।यही मोलभाव उनका सार्वजनिक संवाद है।आजादी है।

औरतों की शापिंग के किस्से अलग हैं।

जिनमें हम उनकी हंसी,उनकी आजादी और उनके संवाद देखते नहीं हैं।

नोटबंदी ने इस देश में अपने घर में कैद करोड़ों स्त्रियों की खुशी और आजादी छीन ली है।डिजिटल लेनदेन में संवाद की कोई गुंजाइश नहीं है।

मैंने छत्तीस साल तक पेशेवर नौकरी की है तो सिर्फ संवादहीन हो जाने से मेरा यह हाल है।

अचानक बूढ़ा हो गया हूं।बूढाने की उम्र भी हो चुकी है,जाहिर है।जबकि मैं सामाजिक गतिविधियों में बचपन से अपने पिता से नत्थी रहा हूं।पत्ररकारिता को भी मैंने सामाजिक सक्रियता बतौर जिया है।यह न नौकरी रही है न यह मेरा कैरियर है।मेरे साथ काम करने वाले जानते हैं कि काम को मैंने कभी बोझ नहीं समझा।अपनी मौज में काम करने की मेरी आदत पुरानी है।वह मौज खत्म है।

बेरोजगारी और शून्य आय की स्थितियों का सामना करते करते मैं सचमुच बूढ़ा हो गया हूं।मैं अपने आस पास तमाम लड़के लड़कियों को देखता हूं जो हमारी तरह झुंड में चलते हैं।हमारे साथ लड़कियां नहीं होती थीं।लड़कियों का झुंड अलग होता था। हालांकि स्कूल कालेज में हमारे साथ लड़कियां जरुर होती थीं,लेकिन उनसे संवाद की कोई स्थिति नहीं बन पाती थी।

देश ने अगर सचमुच तरक्की की है तो मेरे नजरिये से यह तरक्की आज की लड़कियों का अपने इर्द गिर्द चहारदीवारी तोड़ना है और हर क्षेत्र में उनकी सशक्त और सार्थक हिस्सेदारी है।

हम लोगों ने छात्र जीवन में कभी कैरियर नौकरी के बारे में सोचा नहीं था।हम पत्रकारिता,साहित्य और रंगकर्म के रंगों से रंगे हुए थे और हमें कुछ सोचने की फुरसत ही नहीं थी।हम कभी भी कहीं भी गिरदा की तरह झोला उठाकर चल देने की तैयारी में रहते थे।जिनका पत्रकारिता,साहित्य या रंगकर्म से नाता नहीं था,वे भी सूचना और जानकारी की कमी के बावजूद बुनियादी मुद्दों और ज्वलंत समस्याओं से जूझते थे।वे भी हमारी तरह बदलाव के ख्वाब देखते थे और देशभर में वे थे।जिनसे फेसबुक के बिना,मोबाइल के बिना हम तमाम लोगों का निरंतर संवाद जारी रहता था।

आज भी सामाजिक सरोकार और बुनियादी मुद्दों और ज्वलंत समस्याओं से आमना सामना करने वाले छात्र कम नहीं हैं बल्कि उनके साथ बेहद सक्रिय छात्राओं की बहुत बड़ी संख्या हैरतअंगेज हैं।

फिरभी ज्यादातर छात्र छात्राएं कैरियर और नौकरी को लेकर रात दिन बिजी हैं। तमाम परीक्षाओं प्रतियोगिताओं की तैयारी उनकी दिनचर्या है।उन्हें हंसने,सोचने या ख्वाब देखने की फुरसत नहीं है।उनका बचपन भी हमारे बचपन जैसा आजाद नहीं है।

फिरभी हमारे समय की तुलना में इस वक्त सैकड़ों गुणा छात्र छात्राएं कैरियर और नौकरी में कामयाबी के ख्वाब देखते हैं हालांकि बदलाव के ख्वाब भी वे देखते हैं।

पूरे छत्तीस साल पेशेवर पत्रकारिता में बिताने के बाद इन्हीं छह महीने की बेरोजगारी से इतनी तन्हाई है तो इन युवाजनों की बेरोजगारी की तन्हाई की सोचकर मैं भीतर से दहल जाता हूं।

ये हमारे ही बच्चे हैं।

ये ही हमारे भविष्य के निर्माता और उत्तराधिकारी हैं।

सबसे खतरनाक बात यह है कि सत्ता ने उनकी हंसी छीन ली है।

कैंपस में और कैंपस के बाहर हम उन्हें इस देश में उनकी मेधा और योग्यता के मुताबिक रोजगार और आजीविका न दे सकें,तो तरक्की का क्या मायने है,यह हमारी समझ से बाहर है।

ये बच्चे हमसे कहीं ज्यादा समझदार भी हैं और लगता नहीं है कि इनमें रोमानियत का वह जज्बा है,जो हम लोगों में था।हमारे वक्त जो प्रेम करते थे वे नापतौल कर गणित लगाकर प्रेम नहीं करते थे।अब प्रेम हो या विवाह,उसके लिए कैरियर नौकरी या व्यवसाय में कामयाबी बेहद जरुरी है।

कामयाब न हुए तो इन युवाजनों की जिंदगी में न दोस्ती संभव है,न प्रेम की कोई संभावना है और न विवाह या पारिवारिक जीवन की।

पहली नजर में मुहब्बत या आंखों आंखों में प्यार अब मुश्किल ही है।

प्यार और विवाह हो जाये तो दांपत्य मुश्किल है।

मुक्तबाजार में जरुरतें बेहिसाब हैं और उसके मुताबिक न आजीविका है और न रोजगार।क्रयशक्ति के लिए अपराध बढ़ रहे हैं।घरेलू हिंसा बढ़ रही है।घृणा,ईर्षा का महोत्सव है।गला काट प्रतियोगिता है।

हंसी गायब है।खुशी सिरे से गायब है।

कहीं कोई ठहाका नहीं लगा रहा है।

कही कोई खिलखिला नहीं रहा है।

कहीं कोई हंस नहीं रहा है।

कही कोई मुस्कुरा नहीं रहा है।

घर भी अब बाजार है।

संबंधों के लिए भी क्रयशक्ति अनिवार्यहै।

ये हमारे तमाम नाकाम बेरोजगार बच्चे तन्हाई में  जीने मरने को अभिशप्त हैं।

हम इस डिजिटल उपभोक्ता मुक्त बाजार का क्या करेंगे?

गौरतलब है कि हमारे ये काबिल पढ़े लिखे बच्चे असंगठित क्षेत्र के मजदूर य दिनभर की दिहाड़ी कमाने वाले मेहनतकश लोग नहीं हैं।

मुश्किल यह है कि जिन बच्चों को लाड़ प्यार से सबकुछ दांव पर लगाकर हम नौकरी और कैरियर की दौड़ में रेस का घोड़ा बना रहे हैं,वे बड़ी बड़ी डिग्रियां,डिप्लोमा हासिल करके अपनी मेधा,योग्यता और दक्षता के बावजूद बहुत तेजी से असंगठित मजदूरों के हुजूम में शामिल होते जा रहे हैं।

मेधा,योग्यता और दक्षता के बावजूद उनके लिए कहीं कोई अवसर नही हैं।

मेधा,योग्यता और दक्षता के बावजूद उनके लिए कही न रोजगार है और न आजीविका है।

मेधा,योग्यता और दक्षता के बावजूद वे नौकरी या कैरियर शुरु करने से पहले ही हमारी तरह रिटायर हैं।

निजीकरण,उदारीकरण और ग्लोबीकरण का नतीजा यह बेरोजगारी है।

विनिवेश और अबाध पूंजी प्रवाह,संसाधनों की खुली नीलामी का यह नतीजा है।

कारपोरेट अर्थव्यवस्था का यह नतीजा है।

मुक्तबाजार अर्थव्यवस्था का हमने पिछले पच्चीस सालों के दौरान किसीभी स्तर पर विरोध नहीं किया है,उसका यही नतीजा है।

हमें उत्पादन प्रणाली के ध्वस्त हो जाने की कोई परवाह नहीं थी,जिसका यह नतीजा है।

हमने जंगलों और खेतों में हो रहे लगातार बेदखली और नरसंहारों का कभी विरोध नहीं किया है,जिसका यह नतीजा है।

हमने निजता और गोपनीयता,स्वतंत्रता,संप्रभुता और अपने नागिरक अधिकारों और मौलिक अधिकारों को बचाने के लिए कोई हरकत नहीं की है,जिसका यह नतीजा है।

अब जंगलों और खेतों,चायबागानों और कल कारखानों के बाद बैंकों और एटीएम से लाशें निकलने लगी हैं।फिरभी हम खामोश हैं।

अब डिजिटल लेनदेन के लिए हम अपनी आंखों की पुतलियों की तस्वीर और अपनी उंगलियों की छाप न जाने किसको किसको कितनी संख्या में बांटने को तैयार हैं।

डिजिटल लेनदेन का आधार आधार निराधार है।

हम खुशी खुशी कैशलैस फेसलैस इकानामी चुन रहे हैं।

हमारी इकोनामी में हमारी जान पहचान का कोई नहीं होगा।

हमारी इकोनामी में किसी मनुष्य का चेहरा नहीं होगा।

हम ब्रांड खरीदेंगे और बाजार में कंपनी राज होगा।

हमारे जो बच्चे रोजगार और आजीविका के लिए खुदरा बाजार पर निर्भर हैं,हमने उन्हें रातोंरात कबंध बना दिया है।

हाट बाजार के तमाम लोग अब कबंध हैं।

खेतों से लेकर बैंकों तक जो अंतहीन मृत्यु जुलूस है,वही अब भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था का रोजनामचा है।

2009 के लोकसभा के चुनाव से पहले हम गुजरात गये थे।गांधीग्राम से वापसी के रास्ते अमदाबाद से लेकर कोलकाता तक ट्रेनों में हमने उन मजदूरों को भारी तादाद में घर लौटते देखा जो वोट डालने घर लौट रहे थे।

2014 के चुनाव में भी मजदूर दूसरे राज्यों से वोट डालने,मोदी को चुनने ट्रेनों में भर भर कर घर लौटे।राज्यों के विधानसभा चुनावों में भी ऐसा होता रहा है।

इसबार फिलहाल बंगाल बिहार में वोट नहीं है।यूपी पंजाब उत्तराखंड में चुनाव होने वाले हैं,मौजूदा हालात में कब चुनाव होंगे,पता नहीं है।लेकिन ट्रेनों में लदकर  देश के तमाम महानगरों और औद्योगिक कारोबारी क्षेत्रों से असंगठित क्षेत्र के मजदूर घर लौट रहे हैं क्योंकि करोडो़ं की तादाद में वे नोटबंदी की वजह से, कैसलैस पेसलैस इकोनामी की वजह से बेरोजगार हो गये हैं।

हमने पिछले दशक के दौरान देश में जहां भी गये,आते जाते ट्रेनों में हजारों की तादाद में बंगाल बिहार यूपी के तमाम बच्चों को नौकरी और आजीविका के लिए भागते देखा है।वह तादाद सरकारी नौकरियां लगभग खत्म हो जाने की वजह से अबतक दस बीस गुणा ज्यादा है।इनमें बंगाल के  मालदह मुर्शिदाबाद,नदिया,,24 परगना जैसे गरीब इलाकों के बच्चे जितने हैं,हुगली हावड़ा मेदिनीपुर वर्दवान जैसे खुशहाल जिलों के बच्चे उनसे कही कम नहीं हैं।

नोटबंदी का महीना बीतते न बीतते वे तमाम हाथ कटे पांव कटे कंबंध बच्चे सर से पांव तक लहूलुहान बच्चे घर लौट चुके हैं या लौट रहे हैं।

ये बच्चे भी आपके और हमारे बच्चे हैं।

नागरिकों की जान माल इस कैशलैस फेसलैस आधार निराधार इकोनामी में कितनी सुरक्षित है,किसी को कोई परवाह नहीं है।

हमने हाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांच्यजन्य के ताजा में डिजिटल सुरक्षा को लेकर प्रकाशित मुख्य आलेख फेसबुक पर शेयर किया है।

इस आलेख के मुताबिक आप इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, आपके पास मेल एकाउंट है, सोशल साइट्स पर एकाउंट है, मोबाइल में एप्स हैं- तो समझिए कि आप घर की चाहारदीवारी में रहते हुए भी सड़क पर ही खुले में ही गुजर-बसर कर रहे हैं।आलेख में खुलकर डिजिटल सुरक्षा की खामियों की चर्चा की गयी है।

नोटबंदी से पहले लगातार चार महीने तक एटीएम,डेबिट और क्रेडिट कार्ड के पिन चुराये जा रहे थे और यह सब क्यों हुआ ,कैसे हुआ,न सरकार के पास और न रिजर्व बैंक के पास इसका कोई जवाब अभीतक है।बत्तीस लाख से ज्यादा कार्ड तत्काल रद्द भी कर दिये गये।

आज की ताजा खबर वाशिंगटन पोस्ट के हवाले से है।हैकर योद्धाओं के अंतरराष्ट्रीय संगठन लीजन ने राहुल गांधी ,विजय माल्या,बरखा दत्त और रवीश कुमार के ट्विटर एकाउंट का पासवर्ड तोड़कर उनपर कब्जी कर लिया।इस हैकर योद्धा संगठन का दावा है कि उसने भारत में चालीस हजार से ज्यादा संस्थाओं,प्रतिष्ठानों और निजी कंप्यूटर सर्वरों में मौजूद तमाम तथ्य और जानकारियां हैक कर ली है और इनमें अपोलो अस्पताल समूह से लेकर भारत की संसद तक शामिल है।

मीडिया के मुताबिक हाल के दिनों में पांच हाई प्रोफाइल ट्विटर अकाउंट हैक करने वाले ग्रुप का कहना है कि उसका अगला निशाना sansad.nic.in है जो भारत के सरकारी कर्मचारियों को ईमेल सर्विस मुहैया कराती है. लीजन (Legion) नाम के इस ग्रुप के एक सदस्य ने यह भी दावा किया है कि उसकी पहुंच ऐसे सभी सर्वर्स तक हो गई है. इनमें अपोलो जैसे मशहूर अस्पताल भी शामिल हैं जहां तमिलनाडु की सीएम जयललिता का निधन हुआ था. लीजन इस वजह ने इन सर्वर्स का डाटा रिलीज नहीं कर रहा है क्योंकि ऐसा करने से देश में अफरातफरी मचने की आशंका है. इन हैकरों का यह भी दावा है कि भारत का डिजिटल बैंकिंग सिस्टम आसानी से साइबर हमले का शिकार हो सकता है.

लीजन के इस दावे के बाद देश की साइबर सिक्योरिटी को लेकर गंभीर होना लाजिमी है. इस ग्रुप ने पिछले दिनों इंडियन नेशनल कांग्रेस, कांग्रेस के उपाध्यक्ष राहुल गांधी, बिजनेसमैन विजय माल्या, वरिष्ठ पत्रकार बरखा दत्त और रवीश कुमार के ट्विटर अकाउंट हैक कर लिए थे. इससे पहले देश के एटीएम नेटवर्क के जरिये करीब 32 लाख डेबिट कार्ड हैक हुए थे. केवल भारत में ही नहीं, दुनिया के तमाम देशों में हैकिंग की बड़ी घटनाएं इस साल सामने आई हैं. फेसबुक के सीईओ मार्क जुकरबर्ग, गूगल के सुंदर पिचाई और ट्विटर के सीईओ जैक दोरजी के सोशल मीडिया अकाउंट हैक हुए थे.

संघ परिवार के मुखपत्र के ताजा विशेष लेख में जो सवाल उठाये गये हैं,उसका लब्वोलुआब यही है कि  क्या हमारे पास डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इतना दुरूस्त है कि हम आसानी और सुरक्षित तरिके से डिजिटल हो सकते हैं।

इस बारे में हम सिलसिलेवार लिख चुके हैं।

अब एचएल दुसाध ने भी लिखा हैः

खुद संघ उठा रहा है :कैशलेस व्यवस्था की सुरक्षा पर सवाल

पीएम मोदी के कैशलेस अर्थव्यवस्था की सुरक्षा को लेकर खुद संघ अब सवाल खड़ा करने लगा है.उसके मुखपत्र पांचजन्य ने अपने ताजे अंक के आवरण कथा में कैशलेस अर्थव्यवस्था की राह में सबसे बड़ी समस्या पेमेंट मैकेनिज्म की सुरक्षा बताया है.उसके हिसाब से भारत में इनका कोई अपना कोई सर्वर नहीं है ,सारा डाटा विदेशी सर्वर में जाता है इसलिए डाटा चोरी होने और निजता हनन की सम्भावना ज्यादा है.सीमा पार आतंकी अड्डों और सीमा के भीतर कालेधन पर सर्जिकल स्ट्राइक सरीखे कदमों के बाद भारत पर साइबर हमले का खतरा गहराते जा रहा है.अब युद्ध सीमा पर नहीं,बल्कि घरों के अन्दर लड़े जा रहे हैं,जो कई बार हथियारबंद युद्धों से ज्यादा खतरनाक और नुकसान पहुचाने वाले साबित होते हैं.'

संघ की भांति ही उसके आनुषांगिक संगठन भारतीय मजदुर संघ और स्वदेशी जागरण मंच ने भी कैशलेस अर्थव्यस्था की खामियों की ओर इशारा किया है.हद तो दैनिक जागरण के उप संपादक राजीव सचान ने किये है.सचान साहब शुरू में नोटबंदी के फैसले की खूब तरफदारी किये,पर शायद अब उनका धैर्य जवाब दे गया है.इसिलए आज के दैनिक जागरण में 'शेर की सवारी का सबक'शीर्षक से लेख लिखकर मोदी के नोटबंदी के फैसले को प्रायः विफल करार दे दिया है.बहरहाल खुद संघ से जुड़े लोग जिस तरह नोटबंदी के फैसले की खामियां गिनाने लगे हैं,आपलोगों में से कई मित्र शायद यह मान कर चल रहे होंगे कि नोटबंदी से यूपी का चुनाव मोदी के लिए वाटर लू साबित हो सकता है ,पर मैं इससे सहमत नहीं हूँ.इसीलिए कहता हूँ मोदी की नाभि में मारो सामाजिक न्याय का तीर.

The Indian Express की Computer hacking Legion के लिए कहानी चित्र

Legion cyber-attack: Next dump is sansad.nic.in, say hackers

The Indian Express-11 घंटे पहले

Barkha Dutt hacked, Barkha Dutt Twitter, Legion, Legion Hacking, Legion Hacked, Rahul Gandhi, Barkha Dutt hacking: Legion say they have ...

Legion hackers: Who are they and how they are hacking Indian ...

India Today-12/12/2016

Hacker group Legion calls Indian banking system deeply flawed

Economic Times-11 घंटे पहले

Legion says it will now hack government website sansad.nic.in

International Business Times, India Edition-7 घंटे पहले

The man hacking India's rich and powerful talks motives, music ...

अत्यधिक उल्लिखित-Washington Post-11/12/2016

Indian banks flawed, have been hacked several times: Legion

गहरा-Business Standard-7 घंटे पहले

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Sunday, December 11, 2016

हिंदुओं के डिजिटल नस्ली नरसंहार के खिलाफ संघ परिवार खामोश क्यों है? सवाल यह है करोडो़ं लोगों के साइबर अपराध के शिकार होते रहने का सच जानते हुए संघ परिवार की सरकार किसके हित में डिजिटल इंडिया के लिए देश में नकद लेनदेन सिरे से खत्म करने के लिए नोटबंदी के जरिये आम जनता की क्रयशक्ति छीनकर उन्हें भूखों मारने का इंतजाम कर रही है। क्या संघ परिवार की सरकार और फासिज्म का राजकाज संघ मुख्याल�

हिंदुओं के डिजिटल नस्ली नरसंहार के खिलाफ संघ परिवार खामोश क्यों है?

सवाल यह है करोडो़ं लोगों के साइबर अपराध के शिकार होते रहने का सच जानते हुए संघ परिवार की सरकार किसके हित में डिजिटल इंडिया के लिए देश में नकद लेनदेन सिरे से खत्म करने के लिए नोटबंदी के जरिये आम जनता की क्रयशक्ति छीनकर उन्हें भूखों मारने का इंतजाम कर रही है।

क्या संघ परिवार की सरकार और फासिज्म का राजकाज संघ मुख्यालय से संचालित नहीं हैं?

क्या संस्थागत फासीवादी किसी संगठन का राजनीतिक नेतृत्व संस्था के नियंत्रण से बाहर हो सकता है?

मौजूदा नोटबंदी डिजिटल इंडिया आंदोलन भी संघ परिवार का मंडलविरोधी रामंदिर मार्का कमंडल आंदोलन है और इसका सीधा मतलब है बहुजनों का सफाया।

भस्मासुर ही बना रहे हैं तो भगवान विष्णु कहां हैं?

यह सारा तमाशा संघ परिवार का है।

हिंदुत्व का एजंडा चूंकि नरसंहारी कारपोरेट एजंडा है।

पलाश विश्वास

संघ परिवार की पूंजी परंपरागत तौर पर धर्मप्राण आस्थावान हिंदुओं की आस्था है।हिंदुओं की सहिष्णुता,उदारता को घृणा और हिंसा में तब्दील करने की उसकी सत्ता राजनीति है और घृणा के इस जहरीले कारोबार को वह हिंदुत्व का एजंडा कहता है,जिसका हिंदुत्व से कोई लेना देना नही है और उसके हिंदुत्व के इस कारोबार का मकसद हिंदुओं का सर्वनाश है और कारपोरेट एकाधिकार नस्ली राजकाज है।

नोटबंदी से पहले कालाधन की घोषणा करने पर पैतालीस फीसद का टैक्स और नोटबंदी के बाद पचास फीसद का टैक्स।सिर्फ पांच फीसद टैक्स की अतिरिक्त आय के लिए नोटबंदी कर्फ्यू का मकसद जाहिर है कि कालाधन निकालना कतई नहीं है।

आर्थिक गतिविधियों के खिलाफ यह कर्फ्यू है।

बहुजनों के वजूद के खिलाफ यह कर्फ्यू है।

संघ समर्थक बनियों, सत्ता में भागीदार ओबीसी के खिलाफ यह कर्फ्यू है।

यह संविधान के खिलाफ मनुस्मृति अभ्युत्थान है।

मकसद डिजिटल नस्ली नरसंहार बजरिये कारपोरेट नस्ली एकाधिकार की अर्थव्यवस्था है।

आज सुबह हमने राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखपत्र पांच्यजन्य के ताजा में डिजिटल सुरक्षा को लेकर प्रकाशित मुख्य आलेख फेसबुक पर शेयर किया है।

इस आलेख के मुताबिक आप इंटरनेट का इस्तेमाल करते हैं, आपके पास मेल एकाउंट है, सोशल साइट्स पर एकाउंट है, मोबाइल में एप्स हैं- तो समझिए कि आप घर की चाहारदीवारी में रहते हुए भी सड़क पर ही खुले में ही गुजर-बसर कर रहे हैं।आलेख में खुलकर डिजिटल सुरक्षा की खामियों की चर्चा की गयी है।

इस बीच डिजिटल हो जाने की राजकीय हिंदुत्व की कारपोरेट मुहिम जोर शोर से चल रही है। नजारा ये है के जिन्होंने कभी भी डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, ऑनलाइन पेमेंट के बारें में सुना तक नहीं था, वो आज डिजिटल होना सीख रहे हैं।जबकि नोटबंदी से पहले लगातार चार महीने तक एटीएम,डेबिट और क्रेडिट कार्ड के पिन चुराये जा रहे थे और यह सब क्यों हुआ ,कैसे हुआ,न सरकार के पास और न रिजर्व बैंक के पास इसका कोई जवाब अभीतक है।बत्तीस लाख से ज्यादा कार्ड तत्काल रद्द भी कर दिये गये।

संघ परिवार के मुखपत्र के ताजा विशेष लेख में जो सवाल उठाये गये हैं,उसका लब्वोलुआब यही है कि  क्या हमारे पास डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर इतना दुरूस्त है कि हम आसानी और सुरक्षित तरिके से डिजिटल हो सकते हैं।

भारतीय बैंकों की तरफ से रोज खाताधारकों को संदेश मिल रहे हैंः

अब अपनी जेब और पर्स में भर-भर के नोट डालने का जमाना चला गया। नोटों को छोड़िए और आ जाइए कार्ड्स पर, आ जाइए इंटरनेट पर, आ जाइए ई-वॉलेट पर। अब कैश नहीं बिना कैश के जिंदगी जीना सीखिए।

लेनदेन से बेदखल बैंक अब संघी डिजिटल मुहिम में शामिल हैं।

यह दिवालिया बना दिये गये के वजूद का सवाल भी है क्योंकि उनके पास नकदी नहीं है और कोी बैंक ग्राहकों का अपना पैसा बैंक किसी सूरत में लौटा नहीं सकता।

गौरतलब है कि  पिछले तीन सालों में साइबर क्राइम 350 फीसदी बढे हैं।

मनीं कंट्रोल के मुताबिक डिजिटल लेनदेन कम लागत के साथ इस्तेमाल में आसान है। इसके इस्तेमाल से रोजमर्रा के खर्च और निवेश में आसानी होगी। साथ ही पैसों के लेनदेन में तेजी आएगी और खर्च का रिकॉर्ड रखने में भी आसानी होगी। लेकिन साथ ही डिजिटल लेनदेन में गोपनीयता और सुरक्षा भी जरुरी होगी। डिजिटल लेनदेन रेलवे, एयरलाइन और बस की टिकट बुकिंग में मुमकिन है। वहीं टोल बूथ, रोजमर्रा के सामान की खरीदारी, टैक्सी और ऑटो का किराया, निवेश और बैंकिंग, टैक्स भुगतान, फीस भुगतान और बिल भुगतान में भी संभव है।


डिजिटल लेनदेन के फायदे तो कई हैं, लेकिन साथ ही खतरे भी ज्यादा हैं। हम देख रहे है कि साल दर साल साइबर क्राइम को लेकर केसेस बढ़ते ही जा रहे है। डिजिटल लेनदेन में आदमी जालसाजी में आसानी से फंस जाता है और फर्जी ई-मेल के जरिए गोपनीय जानकारी, पासवर्ड, क्रेडिट कार्ड नंबर जैसी जानकारी चुराई जाती है। ऑनलाइन शॉपिंग में ब्राउडर आपको फर्जी वेबसाइट पर ले जाता है और वो वेबसाइट आपकी गोपनीय जानकारी चुराती है। कभी ग्राहक और मर्चेंट्स के बीच हो रहे लेनदेन को हैक किया जाता है। हैकर लॉग इन और पासवर्ड की जानकारी चुराते हैं।


तो पांचजन्य में पाठकों से सीधा सवाल किया गया हैःआप गूगल पर 'सर्च' करते हैं, पर क्या आप जानते हैं कि गूगल भी आपको सर्च करता है? एकाउंट बनाते समय मांगी गई जानकारियां आपने दी होंगी, पर यदि फेसबुक के पास वे जानकारियां भी हों जो आपने नहीं दी थीं, तो? आपके मेल आपकी प्रेषण सूची तक ही पहुंचते हैं या उसके और भी ठिकाने हैं? आपके व्हाट्सअप संदेश कौन-कौन पढ़ सकता है आपके मित्रों के अलावा? स्मार्टफोन में डाउनलोड एप्स क्या आपकी निजता के लिहाज से सुरक्षित हैं? क्या बड़ी-बड़ी इंटरनेट कंपनियां आपको मंजे हुए खुराफाती हैकरों से बचा सकती हैं... आखिर करोड़ों लोग साइबर अपराधों के शिकार हुए हैं। खतरे की संभावनाएं बहुत लंबी-चौड़ी हैं। पर डरिए मत, सजग रहिए। सजगता ही बचाव है।

सवाल यह है करोडो़ं लोगों के साइबर अपराध के शिकार होते रहने का सच जानते हुए संघ परिवार की सरकार किसके हित में डिजिटल इंडिया के लिए देश में नकद लेनदेन सिरे से खत्म करने के लिए नोटबंदी के जरिये आम जनता की क्रयशक्ति छीनकर उन्हें भूखों मारने का इंतजाम कर रही है।

गौरतलब है कि नोटबंदी के बाद देश में आमदनी व खर्च में कमी आई है। एक सर्वेक्षण में कहा गया है कि सबसे अधिक प्रभावित बिहार, झारखंड और ओडि़शा जैसे राज्य रहे हैं। लोकल सर्किल्स के सर्वेक्षण में देश के 220 जिलों के 15,000 लोगों की राय ली गई। 20 प्रतिशत ने कहा कि इस कदम के बाद उनकी आय प्रभावित हुई है, वहीं 48 प्रतिशत ने कहा कि नोटबंदी के बाद उनका खर्च घटा है। सर्वेक्षण में कहा गया है कि लोगों को इस कदम से काफी परेशानी झेलनी पड़ रही है।

रिपोर्ट में कहा गया है, बैंकों और एटीएम में कतार में काफी समय गंवाने के बाद भी लोगों को आसानी से नकदी उपलब्ध नहीं हो रही है।

बैंक दिवालिया हैं।बैंकों और एटीएम से लाशें निकलने लगी हैं।कालाधन का कहीं अता पता नहीं है।अब डिजिटल इंडिया की मंकी बातें ही सारेगामापा है।नजारा यह है कि  देश में डिजिटल भुगतान को बढावा देने के लिए एक टीवी चैनल व वेबसाइट शुरू करने के बाद देशव्यापी टोलफ्री हेल्पलाइन नंबर 14444 शुरू किया जाएगा। इस हेल्पलाइन का उद्देश्य लोगों को नकदीविहीन लेनदेन के प्रति शिक्षित करना तथा जरूरी मदद उपलब्ध कराना है।

यह सेवा सप्ताह भर में शुरू होने की संभावना है। साफ्टवेयर सेवा कंपनियों के संगठन नासकाम के अध्यक्ष आर चंंद्रशेखर ने पीटीआई को यह जानकारी दी। उन्होंने कहा, सरकार ने देशभर में जनता की मदद के लिए नासकाम की मदद मांगी थी।

दूसरी ओर सूचना तकनीक के माध्यम से आईटी धमाके का बैंड बाजा डिजिटल इंडिया कारपोरेट मानोपाली नस्ली नरसंहार अश्वमेधी अभियान के मध्य ही बजने वाला है।अमेरिका ने भारत को उसके दुनियाभर के युद्ध में पार्टनर बना लिया है और इसके बदले में भारत की आईटी क्रांति की हवा निकालने की जुगत में है अमेरिका।

ताजा खबरों के मुताबिक अमेरिका में नौकरी करने के इच्‍छुक भारतीयों की राह अब आसान नहीं रहने वाली है। अमेरिका के नवनिर्वाचित राष्‍ट्रपति डोनाल्‍ड ट्रंप ने इस संबंध में एक बार फिर अपना कड़ा रुख दिखाया है। उन्‍होंने कहा है कि वे राष्‍ट्रपति का पद संभालते ही अपना पहला ऑर्डर वीजा के दुरुपयोग को रोकने के लिए देंगे। इसके चलते ही विदेशी लोग विभिन्‍न जॉब्‍स में अमेरिकियों का स्‍थान ले रहे हैं।

ट्रंप ने चेतावनी दी कि अमेरिका में नौकरी करने आने वाले भारतीयों समेत सभी विदेशियों को उनके प्रशासन में कड़ी जांच से गुजरना होगा।

संघ परिवार की सरकार कारपोरेट एकाधिकार कायम करके बहुसंख्य बहुजनों का नरसंहार अभियान चला रही है जो संघ परिवार के मनुस्मृति एजंडा से अलग नहीं है। साइबर सुरक्षा का सवाल उठाने वाले संघ परिवार ने नागरिकों की सुरक्षा और गोपनीयता के लिए सबसे खतरनाक आधार परियोजना का अभीतक किसी भी स्तर पर विरोध नहीं किया है।जबकि डिजिटल लेनदेन और बिना इंटरनेट डिजिटल लेनदेन में आधार नंबर अनिवार्य है जबकि आधार नंबर हैक या लीक होने की स्थिति में नागरिकों की जान माल को गंभीर खतरा है।इस आलेख में भी आधार योजना की कोई चर्चा नहीं है।

अगर संघ परिवार को जमीनी हकीकत के बारे में मालूम है तो उसे यह भी मालूम होना चाहिए कि डिजिटल लेनदेन से जो किसान और मेहनतकश और व्यापारी तबाह होंगे ,उनमें बहुसंख्य हिंदू हैं और बहुजन भी हैं।

हिंदुओं के नस्ली नरसंहार के खिलाफ संघ परिवार खामोश क्यों है?

क्या संघ परिवार का अपनी सरकार पर कोई नियंत्रण नहीं है?

या फिर असलियत यह है कि बहुजनों को अब भी संघ परिवार हिंदू नहीं मानता है?

इसका साफ मतलब यह निकलता है कि यह कारपोरेट  नरसंहार कार्यक्रम संघ परिवार का है।

विजेता आर्यों ने इस देश की सांस्कृतिक एकीकरण के लिए वैदिकी नरसंहार के इतिहास के बावजूद सभी नस्ली समुदाओं को हिदुत्व में शामिल किया,जो हिंदुत्व की विरासत है।जिसमें अनार्य और द्रविड़,शक कुषाण अहम और तमान दूसरी नस्लें हिंदुत्व में समाहित हुई है।इसके विपरीत गौतम बुद्ध से पहले ब्राह्मण धर्म और गौतम बुद्ध के बाद मनुस्मृति के जरिये नस्ली एकाधिकार कायम करने की सत्ता संस्कृति रही है और वही रंगभेदी सत्ता संस्कृति संघ परिवार की है।

हिंदुत्व का एजंडा वोट बैंक समीकरण के अलावा कुछ नहीं है।

संघ परिवार का राममंदिर आंदोलन भी वोट बैंक समीकरण के अलावा कुछ नहीं है।ओबीसी आरक्षण के विरोध में आरक्षण विरोधी आंदोलन की पृष्ठभूमि में मंडल के खिलाफ कमंडल युग का प्रारंभ हुआ।दलितों और ओबीसी को हिंदुत्व की पैदल फौजें बनाने के लिए राम की सौगंध ली जाती रही है।

मौजूदा नोटबंदी डिजिटल इंडिया आंदोलन भी संघ परिवार का मंडलविरोधी रामंदिर मार्का कमंडल आंदोलन है और इसका सीधा मतलब है बहुजनों का सफाया।

साइबर सुरक्षा को लेकर वह सत्ता वर्ग को आगाह कर रहा है लेकिन आम नागरिकों और संघ परिवार के हिसाब से बहुसंख्य हिंदुओं और बहुजनों को इस अश्वमेधी नरसंहार से बचाने की उसकी कोई गरज नहीं है और न संघ परिवार इस पर कोई सार्वजनिक बहस चला रहा है और न सार्वजनिक तौर पर वह डिजिटल इंडिया सत्यानाशी कार्यक्रम का किसी भी स्तर पर विरोध कर रहा है।

संघ परिवार के स्वदेशी आंदोलन का कहीं अता पता नहीं है जबकि खुदरा कारोबार खत्म है और छोटे और मंझौले व्यवसाय पर कारपोरेट एकाधिकार का डिजिटल स्थाई बंदोबस्त लागू हो गया है।

इससे पहले खेती बेदखल है और उत्पादन प्रणाली तबाह है।

देश के सारे साधन संसाधन विदेशी पूंजी के हवाले है।

शेयर बाजार ग्लोबल इशारों के मुताबिक है।

सेवाक्षेत्र से लेकर रक्षा और आंतरिक सुरक्षा भी बेदखल हैं।

बैंक बीमा संचार उर्जा परिवहन रेलवे उड्डयन जहाजरानी परमाणु उर्जा निर्माण विनिर्माण बिजली पानी भोजन सौंदर्य प्रसाधन सिनेमा संस्कृति बाजार शिक्षा चिकित्सा सबकुछ विदेशी कंपनियों के हवाले हैं।

सबकुछ विशुद्ध आयुर्वेदिक पतंजलि ब्रांड हैं।

निजीकरण विनिवेश छंटनी बेदखली अत्याचार उत्पीड़न बलात्कार सुनामी की वैदिकी संस्कृति कारपोरेट है।

यही संघ परिवार का रामराज्य है।

रामराज्य है तो शंबूक की हत्या भी होनी है।

नस्ली दुश्मनों का वध और अश्वमेध भी तय हैं।

दरअसल वही हो रहा है और आस्था की वजह से हम इस अधर्म को धर्म मान रहे हैं।अपने ही नरसंहार के लिए उनकी पैदल सेना में हम शामिल हो रहे हैं।

क्या संघ परिवार की सरकार और फासिज्म का राजकाज संघ मुख्यालय से संचालित नहीं है?

क्या संस्थागत संगठन का राजनीतिक नेतृत्व संस्था के नियंत्रण से बाहर हो सकता है?

क्या संघ परिवार का कोई प्रधानमंत्री कारपोरेट सुपरमाडल बन सकता है?

क्या संघ परिवार भस्मासुर बनाने का कारखाना है?

भस्मासुर ही बना रहे हैं तो भगवान विष्णु कहां हैं?

यह सारा तमाशा संघ परिवार का है।

हिंदुत्व का एजंडा चूंकि नरसंहारी कारपोरेट एजंडा है।

भारतीयता का मतलब सिर्फ मुसलमान विरोध है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ पाकिस्तान और चीन के खिलाफ युद्धोन्माद है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ ग्लोबल हिंदुत्व है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ अमेरिका और इजराइल का रणनीतिक पार्टनर है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ रंगभेद,जाति व्यवस्था की असहिष्णुता और घृणा है?

भारतीयता का मतलब समानता और न्याय का विरोध है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ निरंकुश बलात्कारी पितृसत्ता है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ सलवा जुड़ुम है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ दलितों का उत्पीड़न है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ सैन्य दमन है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ लोकतंत्र का निषेध है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ कानून का राज निषेध है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ नागरिकों के मौलिक अधिकारों का अपहरण है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ मानवाधिकार हनन है?

भारतीयता का मतलब सिर्फ संविधान का दिन प्रतिदिन हत्या है?

संघ परिवार की भारतीयता के ये तमाम रंगबरंगे आयाम हैं।

फासिज्म का राजकाज नस्ली नरसंहार है।

डिजिटल नरसंहार अब संघ परिवार का कारपोरेट एजंडा है।

डिजिटल नरसंहार के लिए फासिज्म का यह कारोबार है।


हम शुरु से संघ परिवार को हिंदुत्व के हितों के खिलाफ मानते रहे हैं और उनके हिंदुत्व के एजंडे को नस्ली कारपोरेट नरसंहारी एजंडा मानते रहे हैं।

इस देश में बहुसंख्य आबादी हिंदुओं की है।

संघ परिवार ब्राह्मण धर्म के मुताबिक मनुस्मृति शासन भारत के संविधान के बदले लागू करना चाहता है और विशुद्ध रक्त सिद्धांत के तहत जिनके बूते हिंदू इस देश में बहुसंख्य हैं,उन दलितों,पिछडो़ं और आदिवासियों को वह हिंदू मानने से इंकार करता रहा है।बहुजनों को हिंदू न माने तो दस फीसद से कम सवर्ण और मात्र तीन प्रतिशत ब्राह्मण अल्पसंख्यक होते हैं बहुजनों के मुकाबले और मुसलमानों के मुकाबले भी।

पूर्वी बंगाल में दलितों की गिनती हिंदुओं में नहीं होती थी।इसलिए बंगाल में आजादी से पहले मुसलमान बहुमत रहा है और तीनों अंतरिम सरकारें मुसलमानों के नेतृत्व में बनी,जिनमें दलित भी शामिल थे।

मनुस्मृति शासन के लक्ष्य से संघ परिवार ने बहुजनों को भी हिंदुत्व के भूगोल में शामिल कर लिया।यह उसका राजनीतिक समीकरण है।

बहुजन अगर हिंदू न माने जाते तो भारत हिंदू राष्ट्र न हुआ रहता।

यह जितना सच है ,उससे बड़ा सच यह है कि संघ परिवार का सारा कामकाज हिंदुओं के हितों से विश्वासघात का है।

ठीक उसीतरह जैसे सर्वहारा हितों के खिलाफ वामपक्ष की राजनीति है।

डिजिटल बैंकिंग के फायदे पर जानकारों का कहना है कि डिजिटल इंडिया के लिए करेंसी का डिजिटाइज्ड होना जरूरी है। नोट की जगह डिजिटल करेंसी में ट्रांजैक्शन आसान होता है। बदलते वक्त के साथ  बैंकिंग बदल रही है। डिजिटल बैंकिंग बेहद सुरक्षित है। अब *999# के जरिए आम आदमी भी डिजिटल बैंकिंग कर सकता है। *999# के जरिए सस्ते मोबाइल से भी बैंकिंग संभव। डिजिटल बैंकिंग के जरिए अब 24/7 बैंकिंग ट्रांजैक्शन मुमकिन है। ट्रांजैक्शन के लिए घंटों लाइन में खड़ा रहना जरूरी नहीं है।

बैंक सेविंग अकाउंट होल्डर को डेबिट कार्ड देते हैं। डेबिट कार्ड से एटीएम से पैसा निकालना और दुकानों पर भुगतान संभव है। डेबिट कार्ड से ऑनलाइन पेमेंट भी संभव है। डेबिट कार्ड चेक-बुक की तर्ज पर काम करता है। डेबिट कार्ड से किसी दूसरे अकाउंट में पैसा ट्रांसफर करना मुमकिन है।

डेबिट कार्ड नबंरों की अहमियत होती है। डेबिट कार्ड इस्तेमाल में 3 नंबर जरूरी होते हैं। ये हैं डेबिट कार्ड नबंर, सीवीवी और पिन नंबर। इनके बिना कोई ट्रांजैक्शन संभव नहीं होता। कार्ड नंबर में खाताधारक की सारी जानकारी छिपी होती है। वहीं पिन नंबर सीक्रेट नंबर होता है। पिन नंबर कार्डधारक याद रखता है। पिन नंबर किसी को बताना नहीं चाहिए। पिन नंबर ताले की चाबी की तरह है। जबकि सीवीवी नंबर कार्ड के पिछले हिस्से पर छपा होता है।

कार्ड इस्तेमाल में कुछ एहतियात वरतने की जरूरत होती है। कार्ड से भुगतान अपने सामने ही करें। स्किमर डिवाइस से कार्ड की क्लोनिंग होने का खतरा रहता है। कार्ड अपने सामने ही स्वाइप करवाएं। कार्ड स्वाइप करते वक्त पिन नंबर डालना जरूरी होता है। भुगतान के वक्त अपना पिन नंबर खुद ही दर्ज करें।

कैशलेस इकोनॉमी की ओर बढ़ रहे संघी कदमों में यूपीआई एक बड़ा गेम चेजर  साबित हो सकता है। बस, जरूरत है इसे समझने की और इस्तेमाल में लाने की। मनीकंट्रोल ने लजे बिजनेस स्कूल की सीईओ पूनम रुंगटा केहवाले स इस समझाने की कोशिश की हैः

पूनम रुंगटा का कहना है कि यूपीआई का इस्तेमाल करने के लिए सबसे पहले  यूपीआई पर रजिस्ट्रेशन करना होता है। रजिस्ट्रेशन की प्रक्रिया के लिए सबसे पहले अपने रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर से बैंक ऐप डाउनलोड करें और बैंक ऐप में यूपीआई का विकल्प चुनें। फिर अपना वर्चुअल एड्रेस बनाएं और वर्चुअल एड्रेस से बैंक अकाउंट लिंक करें।


यूपीआई के जरिए ई-कॉमर्स शॉपिंग आसानी से की जाती है। इसके जरिए आप पेमेंट ऑपशंस में यूपीआई का विकल्प चुनें और अपना वर्चुअल एड्रेस और भुगतान की राशि भरें। वर्चुअल एड्रेस भरने के बाद मोबाइल पर पिन आएगा और पिन भरने के बाद खरीदारी की प्रकिया पूरी होती है।


पूनम रुंगटा के मुताबिक यूपीआई के जरिए फंड ट्रांसफर आसानी से किया जा सकता है। फंड ट्रांसफर के लिए आप बैंक ऐप के यूपीआई सेक्शन में जाएं। जिसको पैसे ट्रांसफर करना है उसका वर्चुअल एड्रेस और राशि भरें। आप जैसे ही वर्चुअल एड्रेस भरेंगे उसके बाद मोबाइल पर पिन आएगा और मोबाइल पिन भरने के बाद आपके खाते से राशि ट्रांसफर हो जाएगी।


इतना ही नहीं यूपीआई के जरिए टैक्सी का भुगतान भी किया जा सकता है। टैक्सी भुगतान के लिए टैक्सी सर्विस के ऐप पर जाएं और राशि भरने के बाद एड मनी का विकल्प चुनें। अपना वर्चुअल एड्रेस भरें और वर्चुअल एड्रेस भरने के बाद मोबाइल पर पिन आएगा। मोबाइल पिन भरने के बाद भुगतान हो जाएगा।


सवालः आरबीआई के नए नियम के मुताबिक जल्दी कर्ज चुकाने पर कोई चार्ज नहीं लगेगा, क्या ये नियम डीएचएफएल पर भी लागू होगा? क्या होम लोन बंद कर देना चाहिए? कर्ज बंद करने पर किन बातों का ख्याल रखना चाहिए?


पूनम रुंगटाः 80सी के तहत टैक्स छूट पाने के लिए अभी कर्ज बंद ना करें। कर्ज लेने के 6 महीने बाद ही लोन बंद कर सकते हैं। कर्ज बंद करने से सिबिल स्कोर पर असर नहीं होता है। कर्ज लेने के 6 महीने बाद लोन बंद करने पर प्रीपेमेंट चार्ज लगेगा।



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Saturday, December 10, 2016

समझ लीजिये कि आपका ईश्वर कितना भारी चार सौ बीस है! अगले छह महीने तो क्या, भविष्य में कभी नकद लेन देन की संभावना कोई नहीं है ! यह नरसंहार अर्थव्यवस्था पर नस्ली कारपरोरेट एकाधिकार की साजिश है। सत्ता वर्ग डिजिटल है तो डिजिटल इंडिया में बढ़त भी उन्हीं की है और मुनाफा वसूली के साथ साथ मुक्तबाजार का सारा कारोबार उन्हीं के दखल में है। 160 बैंक पीएसपी बनेंगे डिजिटल तो सात लाख करोड़ से ज्यादा क

समझ लीजिये कि आपका ईश्वर कितना भारी चार सौ बीस है!



अगले छह महीने तो क्या, भविष्य में कभी नकद लेन देन की संभावना कोई नहीं है !

यह नरसंहार अर्थव्यवस्था पर नस्ली कारपरोरेट एकाधिकार की साजिश है।

सत्ता वर्ग डिजिटल है तो डिजिटल इंडिया में बढ़त भी उन्हीं की है और मुनाफा वसूली के साथ साथ मुक्तबाजार का सारा कारोबार उन्हीं के दखल में है।

160 बैंक पीएसपी बनेंगे डिजिटल तो सात लाख करोड़ से ज्यादा करेंसी चलन में कतई नहीं होंगी ,डिजिटल इंडिया के रणनीतिकारों का एक्शन प्लान यही है और इसी वजह से बाकायदा सुनियोजित तरीके से बैंकों को दिवालिया बना दिया गया है।

नोट वापस ले लिये गये हैं लेकिन नोट वापस करने की कोई योजना नहीं है।न नोट जरुरत के मुताबिक छापे जा रहे हैं।न कभी फिर छापे जाएंगे।

पलाश विश्वास

तीन दिन बैंक बंद होने पर बहुत शोर होने लगा है।बैंक लगातार खुले हों तो भी नकदी मिलने वाली नहीं है।जैसे एटीएम बंजर हैं वैसे बैंक भी बंजर बना दिये गये हैं।बैंकों के अफसर और कर्मचारी एक बहुत बड़ी साजिश के शिकार हो रहे हैं।उनका इस्तेमाल बैंकों को दिवालिया बनाकर डिजिटल बहाने सारे लेनदेन के निजीकरण कारपोरेट वर्चस्व के लिए हो रहा है।यह नस्ली नरसंहार है।

अगले मार्च तक 160 बैंकों के डीजीटल लेनदेन के आधारकेंद्र पीएसपी बनाये जाने की तैयारी है और सुप्रीम कोर्ट की यह खुली अवमानना है कि सरकार 10 से 15 दिनों में नकदी सुलभ करने कोई इंतजाम करने जा रही है।यह सरासर धोखाधड़ी है।

आम जनता के हाथ में नकदी कतई न रहे,पूरी कवायद इसीके लिए है ताकि गुलामी मुकम्मल स्थाई बंदोबस्त हो और राज मनुस्मृति का।मुकम्मल हिंदू राष्ट्र।

ताकि खेती और कारोबार,उत्पादन और सेवाओं,उपभोक्ता वस्तुओं के बाजार पर पूरीतरह कारपोरेट निंयत्रण हो।

सारे नागरिक चूहों में तब्दील हैं और हैमलिन का वह जादूगर ईश्वर है जो नागरिक चूहों को इस देश की तमाम पवित्र नदियों में उनकी आस्था के मुताबिक विसर्जित करने जा रहा है।

सात खून माफ है। सारे नरसंहार माफ हैं। वह ईश्वर है।

पेटीएम जिओ आदि नकदी लेनदेन का निजी बंदोबस्त बैंकों के जरिये बैंकिंग को खत्म करने के लिए हो रहा है,यह सीधी सी बात अफसरों और कर्मचारियों की समझ में नहीं आ रही है तो राजनीतिक समीकरण की भाषा में अभ्यस्त राजनीति को क्या समझ में आने वाली है,जिसके लिए मौका के मुताबिक मुद्दे रोज बदल रहे हैं और वे मौसम मुर्गा के माफिक झूठे मौसम की बांग लगा रहे हैं।

भारत को अमेरिका ने अपना रणनीतिक पार्टनर कानून बना लिया है और यह मामला नजरअंदाज हो गया है।निजीकरण विनिवेश और एकाधिकार के लिए वाया नोटबंदी जो डिजिटल चक्रव्यूह तैयार किया है नरसंहार विशेषज्ञों ने,उसे सिर्फ संसद में शोर मचाकर बदलने की किसी खुशफहमी में वे जाहिर है कि कतई नहीं है।

वे जानबूझकर नौटंकी कर रहे हैं और कालाधन है तो सबसे ज्यादा इन्ही रंगबिरंगी पार्टियों के सिपाहसालारों का है और पकड़े जाने वाले हर नये पुराने नोट के साथ साफ राजनीतिक पहचान वैसे ही जुड़ी है जैसे आजाद भारत में हुए हर सौदे,घोटाले,भ्रष्टाचार के साथ सत्ता और राजनीति नत्थी  हैं।

राजनेताओं की जान आफत में है और वे अपनी अपनी जान बचा रहे हैं।

पर्दे की आड़ में नरसंहार के सौदे तय हो रहे हैं।

नकदी का संकट कृत्तिम है ताकि अर्थव्यवस्था को कैशलैस बनाया जा सके।

यह डिजिटल इंडिया का फंडा है।इसी वजह से बाजार में दशकों से चलन में रहे तमाम हाईवैल्यु नोट को रद्द करके आम जनता से क्रयशक्ति छीन ली गयी है और इस नोटबंदी कवायद का कालाधन से कोई मतलब नहीं है।

हम आगाह करना चाहते हैं कि सारी कवायद संसदीय सर्वदलीय सहमति से हो रही है।

सात लाख करोड़ से ज्यादा करेंसी चलन में कतई नहीं होंगी ,डिजिटल इंडिया के रणनीतिकारों का एक्शन प्लान यही है और इसी वजह से बाकायदा सुनियोजित तरीके से बैंकों को दिवालिया बना दिया गया है।नोट वापस ले लिये गये हैं लेकिन नोट वापस करने की कोई योजना नहीं है।

न नोट जरुरत के मुताबिक छापे जा रहे हैं।न छापे जाएंगे।

सत्ता वर्ग डिजिटल है तो डिजिटल इंडिया में बढ़त भी उन्हीं की है और मुनाफा वसूली के साथ साथ मुक्तबाजार का सारा कारोबार उन्हीं के दखल में है।

यह बेलगाम नरसंहार अर्थव्यवस्था पर नस्ली एकाधिकार की साजिश है।

यह सारा खेल निराधार आधार के बूते किया जा रहा है और नोटबंदी का विरोध करने वाली राजनीति ने आधार योजना का किसी भी स्तर पर विरोध नहीं किया है।सारा केवाईसी आधार के जरिये है और नई तकनीक का इस्तेमाल भी इसी आधार मार्फत होना है।जिसके तहत बैंको को भी डिजिटल कवायद में जबरन शामिल किया जा रहा है और बैंकों के जरिये पेटीएम कारोबार का एकाधिकार वर्चस्व स्थापित हो रहा है।लेनदेन डिजिटल है लेकिन इस लेनदेन की सुरक्षा की कोई गारंटी नहीं है।

नोटबंदी से पहले जो एटीेएम डेबिट क्रेडिट कार्ड के पासवर्ड चुराये गये,उसका गेटवे आधार नंबर है और अब सारा कारोबार आधार नंबर के मार्फत करने का मतलब बेहद खतरनाक है।इस डिजिटल अर्थतंत्र में रंगभेदी वर्चस्व कायम करने का स्थाई बंदोबस्त है और इसे लागू करने के लिए ही कालाधन निकालने का लक्ष्य बताया गया है जो दरअसल कालाधन पर सत्ता वर्ग का एकाधिकार का चाकचौबंद इंतजाम है।

हर लेनदेन के साथ आधार नत्थी हो जाने का मतलब हर लेनदेन के साथ नागरिकों के बारे में सारी जानकारी लीक और हैक होना है और उस जानकारी को कौन कैसे इस्तेमाल करेगा,यह हम नहीं जानते।

मसलन जनधन योजना के तहत जो खाते करोडो़ं के तादाद में खोले गये,सिर्फ डाक मार्फत चेकबुक न पहुंचने के काऱण उन खातों का पासबुक और चेकबुक बैंक कर्मचारियों के दखल में हैं,जिनका नोटबंदी संकट में कालाधन सफेद बनाने के लिए इस्तेमाल हो रहा है।

तो समझ लीजिये कि आधार जानकारियां सार्वजनिक हो जाने पर नागरिकों की जानमाल गोपनीयता की क्या गारंटी होगी।

इसे खेल की तकनीक,योजना और आधार आथेंसिटी का मामला राजनेताओं को कितना समझ में आ रहा है ,कहना मुश्किल है।लेकिन नोटबंदी के खिलाफ शोरशराबे से कुछ हासिल नहीं होना है,यह तय है।

अगले छह महीने तो क्या भविष्य में कभी नकद लेन देन की संभावना कोई नहीं है तो डिजिटल दुनिया के बाहर के लोगों के लिए क्रयशक्ति शून्य है और इसका सीधा मतलब यह है कि रोजमर्रे की जिंदगी में उन्हें दाने दाने को मोहताज होना पड़ेगा।

यह खुल्लमखुल्ला नरसंहार है और अंजाम भुखमरी है।सत्तावर्ग को भूख नहीं लगती।

बहरहाल नोटबंदी के बाद सरकार जिस तरह डिजिटल पेमेंट को बढ़ावा दे रही है, उसका असर दिखने भी लगा है। पिछले 1 महीने में ही डिजिटल पेमेंट में कई गुना का उछाल आया है और इसका सबसे ज्यादा फायदा ई-वॉलेट कंपनियों को हो रहा है।

गौरतलब है कि पेटीेएम और जिओ ने खुलकर प्रधानमंत्री की छवि अपना कारोबार बढ़ाने के लिए किया है और उनके माडलिंग से इन कंपनियों के पौं बारह हैं।

जाहिर है कि नोटबंदी के बाद एटीएम और बैंकों के बाहर की कतारें आम हो चली हैं। बैंकों और एटीएम से लाशें निकल रही है।नकदी नहीं निकलरही हैं। इसका सीधा फायदा पेटीएम को हो रहा है क्योंकि लोग डिजिटिल पेमेंट पर जोर दे रहे हैं।

गौरतलब है कि नोटबंदी के बाद 1 महीने में डिजिटल पेमेंट 6 गुना तक बढ़ गया है।कालाधन पर खामोशी बरत कर देश के सबसे बड़े कारपोरेट वकील ने बाहैसियत संघी वित्तमंत्री कालाधन पर जो बहुप्रचारित बयान जारी किया है उसका कोई संबंध काला धन से नहीं है।न उन्होंने नोटबंदी  मुहिम में निकल कालाधन का कोई ब्यौरा दिया है।उनने ग्यारह सूत्री सरकारी निर्णय की जो जानकारी दी है ,उसका एजडा हिंदुत्व का नस्ली नरसंहार यानी डिजिटल डिवाइड है जिसके मुताबिक डिजिटल बनाने के लिए अपनी खासमखास कंपनियों के कारोबार के लिए बढा़वा देना है।

इसी के तहत सरकारी आंकड़ों के मुताबिक इस दौरान रुपे कार्ड से लेनदेन 500 फीसदी से ज्यादा बढ़ा है। वहीं ई-वॉलेट से पेमेंट भी करीब 3 गुना हो गया है। इस दौरान यूपीआई से 15 करोड़ रुपये की लेनदेन हुआ जो 1 महीने पहले 2 करोड़ रुपये से भी कम था। वहीं यूएसएसडी से लेनदेन भी तेजी से बढ़ रहा है। प्वाइंट ऑफ सेल यानी पीओएस से शॉपिंग के लिए पेमेंट में भी 40 फीसदी से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। जानकारों का मानना है कि आगे डिजिटल पेमेंट की रफ्तार और बढ़ेगी।

हालांकि सबी जानकार डिजिटल पेमेंट में सुरक्षा के खतरों को बहुत बड़ी बाधा मानते हैं। लेकिन सरकार और कंपनियों को आम जनता की जानमाल की कोई परवाह नहीं है और उनका का कहना है कि डिजिटल पेमेंट पूरी तरह सुरक्षित हैं। अगर थोड़े बहुत खतरे हैं तो उन्हें सुलझा लिया जाएगा।उन थोड़े बहुत खतरे से आगाह भी जनता को आगाह नहीं किया जा रहा है तो समझ लीजिये कि आपका ईश्वर कितना बारी चार सौ बीस है।

नोटबंदी के बाद सरकार भी डिजिटल पेमेंट को जमकर बढ़ावा दे रही है और अगर ज्यादा से ज्यादा लोग इसे अपनाते हैं तो इकोनॉमी को फायदा होगा।



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