नेपाल भले ही एक गरीब देश हो, पर स्वतंत्र रहने और स्वाभिमान कायम रखने के सवाल पर कोई समझौता नहीं।
राष्ट्रवादी चेतना एक मायावी, बेहद मानवीय और प्यारी चीज़ है। जिस राष्ट्र और राष्ट्रीय समूहों में यह चेतना प्रगतिशील रूप में विकसित नहीं होती, वहां पर सत्ताधारी कुलीन वर्ग अपनी सत्ता को टिकाये रखने के लिए अपने रंग-बिरंगे पैंतरों से जनमानस को लगातार बेवकूफ बनाये रखता है, और बहुसंख्यक जनता के लोकतान्त्रिक अधिकारों को रौंदने के लिए एक छद्म शत्रु का आकार गढ़ता है, जिससे कि जनमानस कभी भी अपने असली शत्रु (जो कि वह स्वयं है) को पहचान न सके।

ट्विटर पर जबरदस्त चर्चित गो बैक इंडियन मीडिया सन्देश का एक पोस्टर
दक्षिण एशिया में राष्ट्रवादी चेतना पर बात करते वक़्त एक बड़ा खतरा यह है कि हिन्दू बहुल दो देशों खासकर भारत व नेपाल में इसे कौन खाद पानी दे कर सींच रहा है? कौन सी शक्तियां इसको जनपक्षीय आधार पर अथवा अंध राष्ट्रवादी आधार पर विकसित करने के लिए प्रयासरत हैं? क्यूंकि राष्ट्रवादी चेतना उस वक़्त मानवीय चीज़ में तब्दील होने की प्रक्रिया में चली जाती है, जबकि एक ख़ास देशकाल में बहुसंख्यक जनता को मानवीय गरिमा से युक्त जिंदगी जीने की छटपटाहट में पता चले कि उसका एक लम्बे समय से अपने ही लोगों द्वारा निरंतर शोषण किया जा रहा है। कभी ऐतिहासिक काल से दो शासक वर्गों के बीच अपनी सत्ता टिकाये रखने के लिए ‘रोटी-बेटी’ के नाम पर बने सांस्कृतिक संबंधों का हवाला देकर और कभी समान हिन्दू धार्मिक आस्था व देवनागरी लिपि से उपजी भाषाई निकटता के आधार पर। और जब जनता अपने अनुभवों से जन्मे हीनताबोध से लड़ने के लिए छिटपुट विद्रोह में उतरने लगती है, तब उसे अपने शत्रुओं के असली व नकली चेहरे समझ में आने लगते हैं। भले ही उसकी मुक्ति पाने की छटपटाहट लगातार पराजय में बदलती आने लगे, पर फिर भी जब वह संघर्ष का दामन नहीं छोड़ती, तब उसी क्षण उसकी यह चेतना एक मायावी चीज़ में तब्दील हो जाती है। लेकिन यह मायावी चेतना उस वक़्त एक पैने नेजे में तब्दील हो जाती है, जब जनता अपने इतिहास बोध से निर्मित बर्तमान के एक ऐसा जीवन बकौल अल्जीरियन क्रन्तिकारी चिन्तक फ्रान्ज़ फैनन के शब्दों में अपने ‘अभागे जीवन’ से फिर से नई लड़ाई के साधन खोजने में आमादा हो जाय। लेकिन सत्ताधारी वर्ग उसके इस कदम को अपना विरोधी मानकर प्रचार करने लगे और अभी कल तक जनता के दामन से मुंह न मोड़ने की कसम खाने वाले उसके कम्युनिस्ट/ माओवादी मित्र अब सत्ताधारी वर्ग के साथ मिलकर जनता के दमन में सहयोग दें।
नेपाल की प्राकृतिक त्रासदी हमारी संवेदन शीलता को जांचने के लिए ऐसा ही एक क्षण उपस्थित करती है। नेपाली समाज मूल रूप में एक ग्रामीण समाज है। भूकंप की परिघटना ने उसके मिटटी से बने घास-फूस, पहाड़ी चट्टानों व लकड़ी के मिले जुले चीज़ों से बने घरों को धूल में तब्दील कर हजारों लोग को वहीँ दफ़न कर दिया है। एक राष्ट्र को राष्ट्र बनाने वाले उसके लाखों परिवारों की आजीविका तहस नहस की है। इन क्षणों में एक टीवी पत्रकार, किसी एक पीड़ित परिवार से यह पूंछे कि ‘भूकंप की घटना में अपना परिवार खोने के बाद आपको अब कैसा लग रहा है’; यह सुनकर तब आपको कैसा महसूस होगा? (पढ़ें भारतीय टीवी चैनल)
एक पड़ोसी देश की मित्र सरकार (पढ़ें भारत), जनता को इस तबाही से निजात दिलाने लेकिन अपने मन की बात को छुपाकर इन क्षणों में बचाव व राहत के नाम पर उसके ही एक दूसरे पड़ोसी मित्र देश (पढ़ें चीन) की जासूसी करने लगे। अगल बगल के पड़ोसियों और संसार भर से आये हुए राहत कार्य में बाधा डालते हुए यह प्रचार करने लगें कि नेपाल में राष्ट्रीय आपातकाल लागू हो जाने की वजह से उसे अन्य पड़ोसी देशों की मदद नहीं चाहिए। काठमांडू एयरपोर्ट में इस देश के सैन्य जनरल अपनी ड्रिल करते हुए नियंत्रण में ले राहत कार्यों के लिए आये विदेशी जहाजों को एअरपोर्ट में जगह न होने का हवाला देते हुए उसे वहां से लगातार भगाते रहें (चीन के अलावा अब इस बात को अमेरिका भी दोहराने लगा है)। नेपाल को हिन्दू राष्ट्र अभियान का एक हिस्सा समझते हुए ऐसे विचरण करें जैसे कि वह उत्तर प्रदेश या बिहार जैसा उनका एक राज्य हो न कि एक सार्वभौम एंड संप्रभुतासंपन्न राष्ट्र। पाकिस्तान के साथ अपनी हिन्दुत्ववादी दुश्मनी दिखाते हुए, उसके द्वारा भेजी राहत सामग्री पर संघी ब्रिगेड की अगुवाई में रामदेव का सफ़ेद झूठ (जिसे नेपाली मीडिया में किसी ने भी गंभीरता से नहीं लिया, पर मोदीवादी भोंपू से ग्रसित हिन्दू भारतीय मीडिया को जैसे पाकिस्तान को नीचा दिखाने का प्रमाण पत्र हाथ में लग गया है)।
दिल्ली दरबार की केवल एक यही मंशा नजर आती है कि नेपाल को भूकंप की तबाही से निजात दिलाने के श्रेय केवल उन्ही को मिले, परंपरागत दुश्मन चीन को नहीं (इस्लामिक पाकिस्तान के बारे में तो इस बारे में बहस की कोई भी गुंजाइश नहीं)। इस तरह का हिन्दुत्ववादी प्रचार-प्रपंच मानवीय तो बिलकुल ही नहीं, हाँ घिनौना जरूर लगता है।
नेपाल के प्रधानमंत्री सुशील कोइराला की भूकंप की खबर की जानकारी पाने की स्वीकारोक्ति प्रधानमंत्री मोदी की मार्फ़त हो, यह तो नेपाली राज्यसता में बैठे कुलीन वर्ग के संप्रभुतासंपन्न चेहरे पर एक बड़ा सवालिया निशान ही तो है। तब इन घटनाओं की श्रंखलाओं को क्या कहेंगे। नेपाल में तत्काल आपात्काल लगा, भारतीय सेना के जवान राहत कार्य के लिए पहुंचे, और नेपाल के राष्ट्रपति को इस निर्णय की जानकारी तक नहीं। ये वही नेपाल के कल तक शक्तिशाली महामहिम राष्ट्रपति महोदय हैं, जिन्होंने 2009 में संसदीय रास्ते से चुनकर आये दुनिया के पहले माओवादी प्रधानमंत्री प्रचंड के नेपाली सेना के प्रमुख को बर्खास्त करने के निर्णय को उलटा था, और फलतः प्रचंड को प्रधानमंत्री के पद से इस्तीफा देने पर मजबूर होना पड़ा था। जबकि 2006 के नेपाली अंतरिम संविधान के अनुसार राष्ट्रपति का पद (भारत के राष्ट्रपति की तरह) मात्र एक रबर स्टाम्प की भांति ही है। कल के महामहिम राष्टपति आज शक्तिहीन होकर एक किनारे पड़े हैं। भूकंप परिघटना से उपजी इस स्थिति में यहाँ तक कि उनके सरेआम गृह मंत्री के दफ्तर जाकर तलब करने के बाद भी कम्युनिस्ट गृहमंत्री ठेंगा दिखाते हुए मिलने से इनकार कर देता है। इससे यह प्रतीत होता है, कि वर्तमान राष्ट्रपति अब दिल्ली की नजर में गिर चुके हैं, क्यूंकि वे मनमोहन मार्का 12 बिंदु समझौते से प्रचंड माओवाद को कैश माओवाद में तब्दील करने में एक छोटी सी भूमिका अदा करने वाले एक पात्र मात्र थे। इस किस्म के एक्स्ट्रा पात्र की अब मोदी राज को बिकुल भी जरूरत नहीं रह गयी है।

नेपाल में अभी चल रही
इंडिया मीडिया वापस जाओ अभियान दरअसल जनमानस की अपने शासकों के प्रति घृणा और फलतः प्रतिरोध में उठाया गया एक कदम है और यह 25 अप्रैल से अभी तक एक के बाद एक घटनाओं से उपजा है। भले ही ट्विटर में चल रही यह बहस भारतीय मीडिया के भूकंप से उपजी पीड़ा व दुख भरी घटनाओं पर असंवेदनशील रूप से रिपोर्टिंग करने पर केन्द्रित है। लेकिन यह नेपाली मन की राष्ट्रवादी चेतना से लैस आहत नेपाली स्वाभिमान की अभिव्यक्ति मात्र है। इस राष्ट्रवादी मन को समाजवादी नेपाली कांग्रेस ने प्रजातंत्र के नाम पर 1951 में ठगा। फिर 1990 में मिलकर नेपाली कांग्रेस व नेपाल कम्युनिस्ट पार्टी (एकीकृत मार्क्सवादी-लेनिनवादी) ने लोकतंत्र के नाम पर ठगा। और 2005-2006 में प्रचंड-बाबुराम एंड कंपनी के कैश माओवादियों गणतंत्र व संविधानसभा के नाम पर।
इन तीनों घटनाओं का केंद्रबिंदु और सूत्रधार दिल्ली दरबार है। ये समझौते नेपाली जनता के सार्वभौमिकता संपन्न बनने की लड़ाई में हार होने की ओर इशारा करते हैं। इसीलिए यदि अब मोदी सरकार विगत के 60 साल के सत्ता प्रतिष्ठान की तरह इस नेपाली मीडिया के विरोध को भारत विरोध की संज्ञा दें, तो तब भी उन्हें कोई परवाह नहीं।
बिगत की हारों से उपजे इतिहासबोध से सीखते हुए नेपाली राष्ट्रवादी मन ने इस बात को गांठ में बाँध लिया है कि 1816 की अपमानजनक सुगौली संधि के बाद नेपाल के ब्रिटिश राज्य का अर्ध-उपनिवेश और फलतः संरक्षित राज्य बन जाने के बाद लेकर 200 साल की अवधि का इतिहास केवल और केवल इस बात को और पुख्ता करता है कि नेपाल में भारतीय शासक वर्ग ब्रिटिश राज को ही अपनाए हुए है।
नेपाली मीडिया की यह बहस इस ‘मालिक-नौकर’ वाले इतिहासबोध से जनता को मुक्त कर स्वाभिमान से सर उठाने और सार्वभौमिकता कायम रखने की एक अभिव्यक्ति है। मायने नेपाल भले ही एक गरीब देश हो, पर स्वतंत्र रहने और स्वाभिमान कायम रखने के सवाल पर कोई समझौता नहीं।
पवन पटेल

About The Author
पवन पटेल, लेखक जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय के समाजशास्त्र विभाग में पीएचडी हैं और आजकल वे ‘थबांग में माओवादी आन्दोलन’ नाम से एक किताब पर काम कर रहे हैं; वे भारत-नेपाल जन एकता मंच के पूर्व महा सचिव भी रह चुके हैं।
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