Sustain Humanity


Monday, November 30, 2015

वीरेन डंगवाल के संग एकालाप


वीरेन डंगवाल के संग एकालाप


मृत्‍युंजय 


मेरे भीतर एक डोमाजी उस्ताद बैठे हैं

             साभारःअभिषेक श्रीवास्तव का जनपथ


(क)



"क्या करूँ
कि रात न हो
टी.वी. का बटन दबाता जाऊँ
देखूँ खून-खराबे या नाच-गाने के रंगीन दृश्य
कि रोऊँ धीमे-धीमे खामोश
जैसे दिन में रोता हूँ
कि सोता रहूँ
जैसे दिन-दिन भर सोता हूँ
कि झगड़ूँ अपने आप से
अपना कान किसी तरह काट लूँ
अपने दाँत से
कि टेलीफोन बजाऊँ
मगर आयँ-बायँ-शायँ कोई बात न हो"

तब मेरा क्या होगा वीरेन दा -

दिन कहीं बचा है क्या वीरेन दा?
कि पूरा दिन एक विशाल चमकीली काली पट्टियों वाला विज्ञापन है
जिसमें रंगों की अँधेरी सुबहें परवाज करती हैं
कि पूरी रात एक रिमोट है
जिसके बटन दिन के हाथों में हैं।
कि पूरी कायनात एक स्क्रीन में बदल गई है
सब कुछ आभासी हो गया है।
कि प्रेम करने को आतुर कमीने नंगे बदन खुले रास्ते में खड़े हैं
रास्ता छेंक कर
कि रक्त की शरण्य भी आखेटकों की सैरगाह है
कि पटक देने का जी चाहता है सर
कहीं भी

कहीं कुछ भी नष्ट नहीं होता
अविनाशी हो गया है सब कुछ
कोई ऐसी जगह बची ही नहीं जहाँ कोई न हो
दुनिया के सारे दर और दीवारजिन्हें घर कहते है
खाक हो गए हैं
आइए एक पहाड़ उलटकर अपनी रीढ़ पर रख लें
और दब जाएँ इस अविनाशी नश्वरता के नीचे
दम घुटने से

मैं तो... मन करता है अपनी टाँगे धीरे धीरे रेत दूँकाट लूँ
गर्दन खींच दूँ रबर की तरह
मुट्ठियों में भींच लूँ सारी हड्डियाँ
बाकी लोथ पटक दूँ
सारे कमरे में फैल जाए आदिम रक्त गंध

कहीं तो कुछ हो
मत बदलेबचा रहे
मत बचेयाद रहे
याद न रहेसपने रहें

सपने जो हरदम हकीकत के अदृश्य हाथों की अवश कठपुतलियाँ हैं
और हकीकत तो वही है न वीरेन दा!

ये हम कहाँ आ गए वीरेन दा -

कि आपके गर्म हाथों में छुपाकर अपना मुँह
रोने का मन कर रहा है
पर आँसू नश्तर की तरह चुभ रहे हैं
रोती हुई आँखे दर्द से सूख गई हैं
दिमाग की नस तक फैल गया है चिपचिपा मांस
मेरी अपनी ही पलकें चुभ रही हैं खुले घाव में
आपकी हथेली को भेद हजार कीड़े भिनक रहे हैं
रक्त गंध के हर जर्रे में उनकी नुकीली सूँड़ गड़ गई है
उसी भयानक स्क्रीन पर लाइव चल रहा है यह दृश्य
पीछे से एक आकार में अँगुलियाँ उठाये एक हिंस्र पशु नगाड़ों के शोर में अपनी बारीक दाढ़ी में नफीस तराना पढ़ रहा है!

आप सुन रहे हैं न !
देखा आपने,
आपने देखा !
देख रहे हैं न।

चलिए उठिए वीरेन दा,
आप इतने घायल तो कभी नहीं हुए
हलक तक तक पसरे लहू में छप छप करते हम स्क्रीन पर दिख रहे हैं
देखिए नाटक नहीं है ये
टी वी चल रहा है
भागिए वीरेन दा
जल्दी करिए
कुचल नहीं सकते तो रेंग कर छुपने की कोशिश करिए प्लीज
हजार मेगा पिक्सल की रेंज में हैं हम !
लोग हँस रहे हैं
पापकार्न के ठोंगे और नया सिमअभी अभी खरीदे गए हैं।
एक नौकरी चहिए वीरेन दामैं तंग आ गया हूँ इस हरामपंथी से
चुपचाप पडा रहूँ कोई आए न जाए कुछ सुनूँ नहीं कुछ भी देख न सकूँ महसूस करना बंद कर दूँ बउरा जाऊँ
सुख में नहीं दुख में नहीं चेतना से भाग जाऊँ

एक नौकरी चहिए वीरेन दा
अपने कमीनेपन की बाड़ लगाकर रोक लेना चाहता हूँ सब
क्यों वीरेन दा
इस हरमजदगी के बाद भी वह मुझे प्रेम करती है
आप भी तो करते हैं
बर्दाश्त नहीं होता अब कुछ भी असली
मुझे छोड़ दीजिए
मत छुइए मुझे
हट जाइए
हटिए

मुझे एक नौकरी चाहिए वीरेन दा
वहीं उस स्क्रीन के भीतर
मेरे गले तक उल्टिओं का स्वाद भर आया है
उसे पी लूँगा
मैं कमजोर नहीं हूँ वीरेन दा
आपने क्या समझ रक्खा है
मैं जानता हूँ ये सब नकली है
मैं अभी फोड़ डालूँगा पूरा प्रोजेक्टर
एक नौकरी दिलाइए न वीरेन दा
नहीं दिलवा सकते फिर भी दिलवाइए तो...

शाम को मर जाता है वक्त
वक्त की लाश पर दिन और रात के गिद्ध खरोंचते है जटिल आकृतियाँ
सुबह गीला लाल रंग पसर जाएगा सब ओर
24 -7 का धंधा है यह
इतनी कठपुतलियाँ इतने वेग से इतनी तरफ घूम रही हैं
इतने धागों से बँधी हुई बड़े से देग में
यह रणनीति बनाने का वक्त है
वहीं चलिए वीरेन दा
उठिएलहू सने होठों में खैनी दबाइए
अपनी कैरिअर वाली साइकिल निकालिए
चलिए चलते हैं कानपुर के रास्ते
जहाँ आपके दोस्त और मेरे गुरु हैं
लाल इमली की भुतही मिल की सीढ़ियाँ उतरिए
जहाँ लोग हैं
इस स्क्रीन से बाहर निकालिए भाई
कोई प्यारा व्यारा नहीं है यहाँ
चलिए!

अपने सलवटों भरे चेहरे को सँभालिए
जी कड़ा करिए
हैंडिल थाम लीजिए कस कर
बाप रे! सँभालिए
इतनी तेजी इस उम्र में
मैं छूट जाऊँगा
गिर जाऊँगा मैं
सहस्रों फुट नीचे यहीं खो जाऊँगा मैं
इन प्रिज्मों की आभासी दुनिया में
जरा धीरे चलिए
हजारहाँ रपट चले घुटनों पर तो तरस खाइए
ये कोई फैसले का वक्त नहीं है
अभी तो रात बाकी है बात बाकी है
बाकीमीर अब नहीं हैं
कोई पीर भी नहीं है
हिंस्र पशुओं से भरा ये अँधेरा काफी डरावना है
अपने डर से डरिए वीरेन दा धीरे चलिए

मेरे भीतर एक डोमाजी उस्ताद बैठे हैं
मुझसे डर बुड्ढे
धीरे चल
चाल बदल कर नहीं बच सकता तू !

माफ करिएगा वीरेन दा
अनाप-शनाप बक गया गुस्से में
पर जा कहाँ रहे हैं
चला तो आप ऐसे रहे हैं जैसे जल्दी ही कहीं पहुँचना है हमें
पर इसी स्क्रीन के भीतर कहाँ तक जाएँगे आप
ऐसा न करिए कि मुझे गिरा दीजिए कहीं
यह रास्ता इतिहास की तरफ तो जाता नहीं है
भविष्य की तरफ तो जाता नहीं है
वर्तमान में तो आप भाग ही रहे हैं
फिर जा कहाँ रहे हैं हम

अद्भुत है यह तो अविश्वसनीय असंभव
हम कहीं पहुँच गए
ये क्या जगह है दोस्तों
ये क्या हो रहा है
मुझे मितली आ रही है
फिर से दिन उग आया है वीरेन दा
चिड़ियों की चोंचे नर्म शबनमी रक्त में लिथड़ी हैं
पेड़ अट्टहास कर रहे हैं
बाजरे की कलगी के रोएँ चुभ रहे हैं भालों की तरह हवा की अँतड़ियों में
हरियाली के थक्कों के बीच आप मुझे कहाँ ले आए हैं
सरपट की नुकीली पत्तियाँ खुखरियों की तरह काट रही हैं मुझे
इतनी रेत इतनी रेत
मेरा दम घुट रहा है
वक्त बीत रहा है वीर... ए...


(ख)


एक दर्द है जो अब होता ही नहीं
एक मन है जो चलता ही नहीं
एक जिस्म भी है जिस पर मेरा छोड़ हर किसी का नियंत्रण है
एक दुख है जो अब देश काल के शर से बिंधकर दुख ही नही रह गया है
आजकल तो इतने मुल्कों से इतनी लाशें उठती रहती हैं इतनी चीजों की कि
दुनिया एक कब्रगाह जैसी हो गई है
यहाँ आपसे धीमे धीमे बतियाते हुए भी मुझे डर है कि
हम एक बड़ी कब्र में तो नहीं बैठे हैं वीरेन दा?

नहीं...
अब पहले जैसी हालत नहीं है।
पक्का !
अब थोड़ा बेहतर महसूस कर रहा हूँ।
कितना परेशान किया आपको
मैं भी कैसा अभागा हूँ कि यह भी नहीं कर सका कि
कम से कम आपके जख्मों पर पट्टी ही बदल पाऊँ
ऐसे हालात में आप न होते तो
मेरा क्या होता वीरेन दा?
चुप रहने से क्या होगा ?
कहा न मेरी तबियत ठीक है !
बेहतर हूँ भाई,

अब सुनिए-
की-बोर्डों की ठक-ठक के नीचे
विराट कंप्यूटर के पीछे से
वहाँउस स्क्रीन के धागों में मैं जब झाँक रहा था
मैंने धब्बे देखे थे
लाल खून से भरे और चमकते हुए...
आप जानते हैं कुछ तो बताइए
उस विशाल स्क्रीन को
शार्ट सर्किट करने का कोई तो रास्ता होगा न

ओ होये बात,
अरे वीरेन दामुझे न बनाइए
मैं तब से जानता हूँ आपको जब आप
कंधे पर लटकाए घूमते थे मुझे
मेरी बेसिक रीडर को सँभालते बचाते
और तीनरंगे झंडे को उदास हसरत से देखते हुए


(ग)


यहाँ कुछ हरा-हरा सा दिख रहा है
क्या यही वह जगह है जहाँ से
पलटकर
कुछ छीन लातेमार खातेमार देते लोग
आत्महत्या की घिरी चौपाल में
हत्या के मंसूबे बनाकर।

'मरनाकहने से अपने घावों की
याद ताजा हो जाती है
और मारने से अपनी चोट भूल जाती है
हमारे अपने ही हैं ये दोस्त
सपने की व्यथा जैसे
कथा जैसी कई युग से कही जाती सुनी जाती आ रही है

गहरे पर्वतों के गर्भ में से
जंगलों की काष्ठव्यापी हरी कच्ची गंध से
पतली चपल और वेगवंती आ-वेग धारा से
बुलावा आ रहा है
चलेंगे वीरेन दा?


(30 नवंबर, 2010)
--
Pl see my blogs;


Feel free -- and I request you -- to forward this newsletter to your lists and friends!