Sunday, April 26, 2015

पहली मई से पहले क्या करें हम? पूरे देश को जोड़ने का यह मौका है।बेकार न जाने दें। फासिस्ट संघपरिवार को और उसकी कारपोरेट केसरिया सरकार को सुखीलाला के मुनाफे के अलावा न मनुष्यता की परवाह है और न प्रकृति या पर्यावरण की।

पहली मई से पहले क्या करें हम?
पूरे देश को जोड़ने का यह मौका है।बेकार न जाने दें।
फासिस्ट संघपरिवार को और उसकी कारपोरेट केसरिया सरकार को सुखीलाला के मुनाफे के अलावा न मनुष्यता की परवाह है और न प्रकृति या पर्यावरण की।

पलाश विश्वास
पूरे देश को जोड़ने का यह मौका है।बेकार न जाने दें।

आपको जनजागरण अभियान के वास्ते मुक्तबाजारी फासिस्ट जायनी नरमेध संस्कृति और जनसंहारी राजकाज के बारे में जनता के बीच जाने के लिए सामग्री चाहिए,तो हम हस्तक्षेप को जनसुनवाई का राष्ट्रीयमंच बनाने के एजंडे के तहत तमाम तथ्यों,सूचनाओं,खबरों और विशेषज्ञों का विश्लेषण रोज प्रकाशित कर रहे हैं।

आप प्रिंटनिकालकर इस सामग्री को भी प्रसारित कर सकते हैं और जो नेट पर हैं,उन्हें शेयर कर सकते हैं।व्हाट्सअप का भी इस्तेमाल कर सकते हैं।

कृपया निरंतर हस्तक्षेप, http://www.hastakshep.com/
जुड़े रहें।

फासिस्ट संघपरिवार को और उसकी कारपोरेट केसरिया सरकार को सुखीलाला के मुनाफे के अलावा न मनुष्यता की परवाह है और न प्रकृति या पर्यावरण की।

नेपाल को हिंदू राष्ट्र बनाने का हिंदू साम्राज्यवादियों का शाश्वत एजंडा है।नेपाल में आये भूकंप से मानवीयआधर पर अपने विस्तारवादी योजनाओं को अंजाम देने का मौका बनाने में लगा है संघपरिवार और मदद की आड़ में अनंत हस्तक्षेप की तैयारी है।

हम नेपाल ही नहीं,इस महादेश के सारे नागरिकों को अपना स्वजन मानते हैं और युद्ध और गृहयुद्ध के विरुद्ध हैं।

भारतीय जनता मजबूती के साथ संकट कीघड़ी में नेपाली जनता के साथ है।
संघ परिवार लेकिन इस आपदा की आड़ में तमाम आर्तिक मुद्दों पर बहस को रफा दफा करने लगा है।सोशल मीडिया पर नासा की चेतावनी के बहाने अंतरिक्ष से पराबैंगनी रश्मि के भारत में देर रात हमले का वाइरस संदेश यज्ञों का नया सिलसिला शुरु करने का खुल्ला आवाहन है।

कारपोरेट मीडिया की महिमा अपरंपार है और उससे भी भारी महिमा है सोशल मीडिया पर सक्रिय संघियों की।नेपाल के भूकंप के बाद व्हाट्सअप से रायपुर मौसम कार्यालय के हवाले से चेतावनी जारी कर दी गयी कि बिहार झारखंड में देर रात भूकंप आनेवाला है जो रेक्टरस्केल पर 13.2 होगा।

देर रात को फोन आते रहे कंफर्म करने के लिए।

हमने जवाब में कहा कि अगर इतना बड़ाभूकंप आने को है तो करने को कुछ नहीं है।कहीं से हमारे पास ऐसी कोई सूचना नहीं है।

दहशत का माहौल ऐसे जान बूझकर बनाया जा रहा है।किसी रायपुर मौसम कार्यालय से भूकंप की  ऐसी चेतावनी जारी हो सकती है या नहीं,हमें मालूम नहीं है।नेपाल में आये भूंकप के बारे में हालांकि कोई चेतावनी जारी हुई नहीं।

पहली मई से पहले क्या क्या घटित होने वाला है,वह संघ परिवार को ही मालूम होगा।हम कोशिश करें कि चाहे कुछ भी हो जाये,अस्मिताओं के आर पार मई दिवस पर मेहनतकश जनता और पूरे देश को लामबंद करने का अभियान हर कीमत पर चलाना है और अभी बचे हुए दिनों में उसकी तैयारी करनी है।

हमें यह आलेख कल लिखना था।लेकिन जब अपने घर में तबाही का मंजर होता है,तो आपका ध्यान उधर जाता है।नेपाल के इस भूकंप का असर चीन में भी हुआ है।तो एवरेस्ट पर भी हिमस्खलन की आशंका है।7.9 के इस भूकंप से भारत में जो असर हुआ है  तो नेपाल में और नेपाल के सीमावर्ती भारतीयइलाकों के दुर्गम इलाकों में लोग कितने सकुशल होगे,इसका शायद कोई सूचना हमें कभी न मिल सकें।

पहली मई को कोई अचरज नहीं कि महामहिम बिजनेस फ्रेंडली प्रदानमंत्री राष्ट्र के नाम कोई संदेश प्रसारित करें या पिर मंकी बातें जारी हों जिसमें श्रमिक कल्याण के बखान हों।

वे अंबेडकर का अपहरण कर सकते हैं तो मई दिवस का अपहरण भी कर सकते हैं।

याद रखना है कि हम केसरिया कारपोरेट रंग के खिलाफ सारेर रंगों के इंद्रधनुष बनाकर इस कायनात और इंसानियत को उसकी मुकम्मल रुह के साथ बचाने की मुहिम चला रहे हैं।

2010 में मूलनिवासी ट्रस्ट से मेरी पुस्तक प्रणव का बजट पोटाशियम सायोनाइड प्रकाशित हुआ था जो भारत मुक्ति मोर्चा की दिल्ली रैली में जारी हुई थी।बामसेफ में सक्रिय तमाम लोगों के पास यह पुस्तक होगी जिसमें हमने कर प्रणाली में किये जाने वाले सुधारों की व्यापक चर्चा की थी।जिसमें खासतौर पर डीटीसी और जीएसटी की चर्चा है।हमारे भाषण की भी सीडी डीवीडी देशभर के कार्यकर्ताओं समर्थकों के पास होंगे।

हमलोग बामसेफ के माध्यम करीब पंद्रह सालों से राष्ट्रीय सम्मेलन से लेकर जिला और महकमा के कार्यक्रमों में भी देशभर में एलपीजी यानी उदारीकरण निजीकरण और ग्लोबीकरण पर लगातार चर्चा करते रहे हैं।जिसकी वीडियो रिकार्डिंग भी खूब हुई है।

तमाम विशेषज्ञों से लेकर हमारे वक्तव्य यू ट्यूब पर उपलब्ध हैं।तमाम पुस्तकें छापी गयीं।लाखों की तादाद में सीडी डीवीडी वितरित है।अब उनके व्यापक इस्तेमाल जनजागरण में करने का सही मौका है।

राष्ट्रीय आंदोलन की टाइम लाइन लेकिन लगातार बदलती रही और आखिरी बार पिछले लोकसभा चुनावों से ऐन पहले राष्ट्रीया आंदोलन के एजंडे समेत बामसेफ को भी सत्ता की राजनीति में समाहित कर दिया गया।

इसके बावजूद बामसेफ आंदोलन अलग अलग धड़ों में जारी है।हमने इन धड़ों के साथ सभी अंबेडकरी गुटों और सारे अंबेडकरियों की एकता के लिए भरसक कोशिश की और बुरी तरह नाकाम रहे।हमारे अनेक साथी इन धड़ों में अब भी हैं।हम उनके बी संपर्क में हैं।उनसे भी निवेदन है कि यह मौका गवांए नहीं।

पंद्रह साल तक आर्थिक मुद्दों पर लगातार चर्चा और हर साल बजट का व्यापक पैमाने पर विश्लेषण की वजह से आज बामसेफ के ज्यादातर कार्यकर्ता अस्मिता की राजनीति को तिलांजलि देकर देश जोड़ो और मुक्तबाजार का प्रतिरोध करो के लिए सहमत है।

यह नवउदारवाद की संतानों की फासिस्ट सत्ता के खिलाफ हमारी कुल पूंजी है।

अब हम लोगों ने आर्थिक सुधारों के लिए जो जनजागरण चलाया,जो साहित्य घरों में हैं और जो सीडी डीवीडी घरों में पड़ी हैं,बामसेफ के बाहर निकले और बामसेफ में अब भी रह गये कार्यकर्ताओं समर्थकों से निवेदन है कि वे उन्हें झाड़ पोंछकर निकालें और उनके साथ जनता के बीच जाकर जनजागरण का काम करें।

वे खुद नेतृत्व करें इस अभियान का और हमसे संपर्क करें या नहीं,इसकी हम शिकायत नहीं करने जा रहे हैं।दूसरे जो लोग ऐसा जनजागरण चलाना चाहे,उनसे भी यही निवेदन है।

सवाल राजनीति का नहीं है।बुनियादी मसला अर्थव्वस्था का है और इससे इस प्रकृति पर्यावरण  मनुष्यता और सभ्यता के सारे अहम मसले ताने बाने की तरह जुड़े एक दूसरे से गूंथे हुए हैं।

हमें उम्मीद है कि संगठन के मुद्दे पर भले ही मतभेद हो,आर्थिक मुद्दों पर अब भी हम लोग सहमत हैं।अलग अलग भी लोग काम कर सकते हैं।अलग अलग जनजागरण भी चला सकते हैं।

अब भाषणबाजी,सेमीनार या सम्मेलनों से कोई मसला नहीं हल होने वाला है।देश व्यापी जन सुनवाई का वैकल्पिक मंच हमें तैयार करने होेंगे।

मीडिया के भरोसे नहीं,अपने पास पहले से उपलब्ध प्रिंट और विजुअल कांटेट के साथ सीधे जनता के बीच जाना है और उन्हें हकीकत नये सिरे से बताना है।

अगर हम सबको साथ लेकर चलने को तैयार हैं तो हमारे पास देशभर में हजारों कार्यकर्ता अब तैयार हैं जो चाहे तो पहली मई से ही राष्ट्रीय आंदोलन की शुरुआत कर सकते हैं।

हम जो काम पहले कर चुके हैं,वह चूंकि बामसेफ के मंच से ही किया हुआ है,इसलिए हम बामसेफ के कार्यकर्ताओं और समर्थकों जो लगभग निष्क्रिय हैं,उन्हें फिर सक्रिय करने के लिए उनको यह कार्यक्रम दे रहे हैं।इसका कतई मतलब यह नहीं है कि यह जनजागरण सिर्फ बामसेफ के अंदर बाहर के लोग करेंगे।

हम पहले ही साफ कर चुके हैं कि देशभर के हमारे साथी आर्थिक मुद्दों पर ही देश जोड़कर राज्यतंत्र बदलने का आंदोलन शुरु करना चाहते हैं और हमें देश के नब्वे फीसद जनता को अस्मिताओं के आर पार इस मुक्त बाजारी कयामत के प्रतिरोध में खड़ा करना है।चूंकि बामसेफ के जरिये भारी पैमाने पर आर्थिक मुद्दों पर कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण हो गया है,तो हमे राष्ठ्रीय आंदोलन के सिलसिले में हमारे साथियों की इस दक्षता और विशेषज्ञता का इस्तेमाल करना ही होगा।

मई दिवस से पहले अभी काफी वक्त है,केसरिया कारपोरेट राज के कयामती तिलिस्म के खिलाफ खड़े हैं जहां भी जो लोग हैं,मई दिवस के मौके पर उन सबमें संवाद और समन्वय का पड़ाव भी हम पार कर लेते हैं तो राष्ट्रव्यापी आंदोलन खड़ा करने का अगला पड़ाव भी हम तय कर लेगें।


यह हमारी आत्मघाती अर्थव्यवस्था के लिए भारी चेतावनी है कि कयामत हमारे सर पर नाच रही है और हम बेखबर है।बिजनेस फ्रेंडली राजकाज के कल्कि अवतार मदर इंडिया के सुखी लाला ही है,जिनका सरोकार बाजार से है, इंसानियत से नहीं।


इंसानियत बची रहेगी या नहीं फासिस्टों को इसकी चिंता सताती नहीं है बल्कि उनके एजंडा में तो गैर नस्ली,विधर्मी गैर जरुरी जनसंख्या का सफाया होता है और इसका पुख्ता इंतजाम हो गया है।

जो लोग फर्जी चेतावनी से या भूंकप के झटकों से बेहद घबड़ा रहे हैं,वे तनिक दिलोदिमाग पर तबाही के इस मंजर पर गौर करें।

सुंदरलाल बहुगुणा भूमि उपयोग को मनुष्यता और सभ्यता के लिए सबसे खतरनाक मानते हैं।पहाड़ों में कृषि का अंत हो गया है। हिमालय में भारत से लेकर चीन तक कारोबारियों का अखंड साम्राज्य है और उनकी सोच मुनाफावसूली के दायरे से बाहर किसी मानवीय संवेदना को महसूस ही नहीं कर सकता।महाजनी सभ्यता का स्थाईभाव यही है।

भुखमरी ,अकाल और प्राकृतिक आपदाएं मुनाफावसूली के सबसे बड़े मौके पैदा करती हैं और जब सत्ता मुनाफावसूली का पर्याय हो तो राजकाज का मतलब मुनाफावसूली के लिए ऐसे मौके बार बार बनाने का होता है।

इसीलिए हम बार बार इतिहासबोध पर जोर देते हैं।इसीलिे हम बार बार सामाजिक यथार्थ की पड़ताल अर्थव्यवस्था के आइने में करते हैं,जिनमें मानवीय त्रासदियां भी शामिल हैं।हमारे हिसाब से पर्यावरण चेतना के बिना अर्थव्यवस्था और सामाजिक यथार्थ के मायने समझना असंभव है।इसीलिए हम बार बार सामाजिक बदलाव और राज्यतंत्र में बदलाव के लिए आर्थिक मामलों की समझ और पर्यावरण चेतना को अनिवार्य मानते हैं।

पूरे देश को जोड़ने का यह मौका है।बेकार न जाने दें।
बहुत हुआ इंतजार,अब वर्गीय सत्ता के खिलाफ वचितों का राष्ट्रीय आंदोलन शुरु होना ही चाहिए।

রবীন্দ্রনাথ ও শিবাজী

রবীন্দ্রনাথ ও শিবাজী
​​  Kai Káús

"... ১৯০৫ সালের ১৬ অক্টোবর কার্যকরী হওয়ার দিন থেকে কলকাতায় হিন্দু উচ্চবিত্ত ও মধ্যবিত্ত শ্রেণী বঙ্গভঙ্গের বিরুদ্ধে নানামুখী কর্মসূচী গ্রহণ করে। এই সময়ে এই আন্দোলনের পুরোভাগে এসে দাঁড়ান কবি রবীন্দ্রনাথ ঠাকুর। রবীন্দ্রনাথ তখন কবি হিসেবে প্রতিষ্ঠিত। সামাজিক মর্যাদায় জোড়াসাঁকোর ঠাকুর পরিবার কলকাতা তথা বাংলার হিন্দু উচ্চ ও মধ্যবিত্তের সংস্কৃতির জগতের প্রধান পাদপীঠ। অর্থনৈতিকভাবে এই পরিবার জমিদারকুলের শিরোমণি। ফলে খুবই স্বাভাবিকভাবে রবীন্দ্রনাথ ঠাকুরের অবস্থান ছিল কলকাতা কেন্দ্রীক হিন্দু সংস্কৃতির নেতৃত্বের আসনে। সামাজিক শ্রেণীগত অবস্থানের কারণেই রবীন্দ্রনাথ ঝাঁপিয়ে পড়েন বঙ্গভঙ্গ বিরোধী তথা বাঙালি মুসলিম বিরোধী আন্দোলনে। এরই চরম বহি:প্রকাশ "শিবাজী উৎসব" কবিতা রচনা ও প্রকাশ।

... উনিশ শতকের আশির দশকে হিন্দুদের গো-রক্ষা আন্দোলন প্রবল আকার ধারণ করে। দয়ানন্দ স্বরস্বতীর 'গোকরুণানিধি' প্রকাশিত হয় ১৮৮১ সালে। ১৮৮২ সালে এই সংগঠনের জন্য কলকাতা থেকে সংগৃহীত হয় ছয়-সাত লক্ষ টাকা। এটা বলাই বাহুল্য যে কলকাতা থেকে এই বিপুল অর্থের যোগান দিয়েছিল হিন্দু জমিদার ও মধ্যবিত্ত শ্রেণী। দয়ানন্দ স্বরস্বতীর আর্য সমাজ ও গো-রক্ষা আন্দোলন বাংলা এবং সর্বভারতীয় পর্যায়ে হিন্দু-মুসলিম সম্পর্কের অবনতি ঘটায়। প্রত্যক্ষ রাজনৈতিক উদ্দেশ্য না থাকলেও সে সময়ে দেশে কয়েকটি গুপ্ত সমিতি গড়ে উঠে। এইরূপ একটি সংগঠন হলো জ্যোতিরিন্দ্রনাথ ঠাকুর এবং রাজনারায়ণ বসু প্রতিষ্ঠিত 'সঞ্জীবনী সভা'। ১৮৮৬ সালে রাজনারায়ণ বসুর প্রতিষ্ঠিত এই সংগঠন হিন্দু ধর্মের গৌরব পুনরুদ্ধারে নিবেদিত ছিল। এই সংগঠনের কর্মকান্ডে বাংলার মুসলিম সমাজ সম্পর্কে কোনো ইতিবাচক বক্তব্য স্থান পায়নি। বাংলা ও ভারতবর্ষের ইতিহাসে মুসলমানদের অবদান এবং সমাজে তাদের বাস্তব উপস্থিতি এই সংগঠন উপলব্ধি করতে পারেনি। এই সংগঠনের সাথে জড়িত ছিলেন রবীন্দ্রনাথ। বস্তুত উনিশ শতকের হিন্দু পুনরুজ্জীবনবাদী আন্দোলনে আন্দোলিত ছিল জোড়াসাঁকোর ঠাকুর পরিবার।

... হেমলতা দেবী প্রণীত গ্রন্থ 'ভারতবর্ষের ইতিহাস' রবীন্দ্রনাথ সমালোচনা করেন বাংলা ১৩০৫ সালের ভারতী পত্রিকার জৈষ্ঠ্য সংখ্যায়। এই গ্রন্থ সমালোচনার অনুষঙ্গে ভারতে মুসলিম ইতিহাস সম্পর্কে রবীন্দ্রনাথের দৃষ্টিভঙ্গির খানিকটা পরিচয় পাওয়া যায়। লেখিকা হেমলতা দেবী সম্ভবত তার ইতিহাস গ্রন্থে প্রামাণ্য তথ্যের ভিত্তিতে বস্তুনিষ্ঠ দৃষ্টিকোণ থেকে ইতিহাসকে বিচার করেছেন। এই গ্রন্থের বিষয়বস্তু সম্পর্কে আলোচনা করতে গিয়ে রবীন্দ্রনাথ বলেন যে,

"মোঘল রাজত্বের পূর্বে তিনশত বছরব্যাপী কালরাত্রে ভারত সিংহাসনে দাস বংশ থেকে লোদী বংশ পর্যন্ত পাঠান রাজণ্যবর্গের যে রক্তবর্ণ উল্কা বৃষ্টি হয়েছে গ্রন্থে তার একটা বিবরণ থাকলে ভাল হতো।"

এখানে লক্ষ্যণীয় বিষয়টি হলো ভারতবর্ষের ইতিহাসে সুলতানী শাসনামলকে রবীন্দ্রনাথ ভারত ইতিহাসের কাল অধ্যায় হিসেবে চিহ্নিত করতে প্রয়াসী হয়েছেন। ভারতীয় ইতিহাসের সুলতানী যুগের সুদীর্ঘ তিন শতাব্দী সময়কালকে কালো অধ্যায় হিসেবে চিহ্নিত করার রবীন্দ্রনাথের এই প্রয়াস অনৈতিহাসিক, সাম্প্রদায়িক এবং মুসলিম বিদ্বেষপ্রসূত। সুলতানী আমলে ভারতের সামাজিক ও সাংস্কৃতিক ক্ষেত্রে বহুল উন্নতি সাধিত হয়। এই সময়কালে ভারতে একটি প্রাতিষ্ঠানিক শাসন কাঠামো গড়ে উঠে। শিক্ষা ও শিল্পকলায় নতুন দিগন্তের সূচনা ঘটে। বহির্বিশ্বের সাথে ভারতের প্রত্যক্ষ বাণিজ্যিক ও সাংস্কৃতিক সম্পর্ক স্থাপিত হয়। ভারতের নিম্নবর্গের মানুষ ব্রাহ্মণদের সামাজিক অত্যাচার থেকে রেহাই পায়। বাংলার ইতিহাসে সুলতানী আমল একটি স্বর্ণোজ্জল অধ্যায়। মুসলিম সুলতানদের হাতেই বাংলা ভাষার পূর্ণ সমৃদ্ধি ঘটে। মুসলিম শাসকেরা বাংলা ভাষাকে নিজের ভাষা হিসেবে গ্রহণ করে এবং এই ভাষার ব্যাপক পৃষ্ঠপোষকতা প্রদান করে। এই সময়কালটি বাংলা ভাষা বিকাশের সোনালী যুগ। আরবী ও ফারসী ভাষার সংস্পর্শে এসে সমৃদ্ধ হয় বাংলা ভাষা। বাংলা সাহিত্যে নোবেলজয়ী রবীন্দ্রনাথ এই সুলতানী আমলকে বলেছেন ইতিহাসের কালো অধ্যায়। এখানে তিনি মুসলিম বিদ্বেষ থেকে ইতিহাস বিকৃতিতে অবতীর্ণ।

... ঐতিহাসিক প্রামাণ্য তথ্যে এটা স্বীকৃত যে পলাশী পূর্ববর্তী সুবে বাংলার অর্থাৎ বাংলা, বিহার ও উড়িষ্যার জনজীবন সম্পূর্ণ বিপর্যস্ত হযে পড়েছিল মারাঠা দস্যু আর সন্ত্রাসীদের হামলা, লুন্ঠন, হত্যা ও আক্রমণে। নবাব আলীবর্দী খান মারাঠা সন্ত্রাসীদের বিরুদ্ধে প্রতিরোধ যুদ্ধে তার শাসনামলের প্রায় পুরো সময়কালটি ব্যাপৃত থাকেন। উনিশ শতকের হিন্দু উচ্চ ও মধ্যবিত্ত শ্রেণী এই ঐতিহাসিক সত্য ভুলে সন্ত্রাসী মারাঠাদের আক্রমণ, লুটপাট আর কর্মকান্ডকে মুসলিম বিরোধী অভিহিত করে হিন্দুদের গৌরব চিহ্নিত করতে থাকে। প্রধানত: এই হিন্দু পুনরুত্থানবাদী আন্দোলনের পটভূমিতে বাংলার হিন্দুসমাজ বিজাতীয় মারাঠাদের গুণকীর্তন আর বন্দনা শুরু করে। রবীন্দ্রনাথ ছিলেন এই ধারারই শক্তিশালী প্রবক্তা।

... 'শিবাজী উৎসব্' (১৯০৪) কবিতাটি যখন রবীন্দ্রনাথ রচনা করেন তখন তিনি কবি হিসেবে প্রতিষ্ঠিত। একই সঙ্গে কলকাতার বুদ্ধিজীবী মহলেও তিনি সম্মানের সাথে সমাদৃত। পারিবারিক এবং আর্থিক কারণে তিনি কলকাতার অভিজাত মহলের নেতৃস্থানীয় পর্যায়ে অবস্থান করছেন। বয়েসের পরিসীমায়ও তিনি পরিণত। বলা যেতে পারে উনিশ শতকের শেষ এবং বিশ শতকের শুরুর পর্বের রবীন্দ্রনাথের চিন্তা ও কর্মের ধারাবাহিকতার সাথে কবিতাটির মর্মার্থ ওতপ্রোতভাবে জড়িত। মহারাষ্ট্রের বালগঙ্গাধর তিলক ১৮৯৫ সালের ১৫ এপ্রিল সেখানে শিবাজী উৎসব প্রতিষ্ঠা করেন। তিলক শিবাজী উৎসব প্রতিষ্ঠা করেছিলেন উগ্র হিন্দু জাতীয়তা ও সাম্প্রদায়িকতা প্রচার ও প্রসারের জন্য। ক্রমে শিবাজী উৎসবের অনুকরণে চালু হয় গণপতি পূজা। ইতিপূর্বে ১৮৯৩ সালে প্রতিষ্ঠিত গো-রক্ষিণী সভা ঐ অঞ্চলে প্রভাব বিস্তারের চেষ্টা করে। মহারাষ্টের শিবাজী উৎসবের অনুকরণে সখারাম গণেশ দেউস্করের প্রচেষ্টায় কলকাতায় শিবাজী উৎসব প্রচলিত হয় ১৯০২ সালের ২১ জুন তারিখে। সরলা দেবী ১৯০২ সালের অক্টোবর মাসে দূর্গাপূজার মহাষ্টমীর দিনে বীরাষ্টমী উৎসব প্রচলন করেন। তিনি ১৯০৩ সালের ১০ মে শিবাজী উৎসবের অনুকরণে প্রতাপাদিত্য উৎসব প্রচলন করেন এবং একই বছরের ২০ সেপ্টেম্বর তারিখে প্রবর্তন করেন উদয়াদিত্য উৎসব। কলকাতার বাইরে থাকার কারণে রবীন্দ্রনাথ এই তিনটি উৎসবে উপস্থিত ছিলেন না। কিন্তু ২৯ সেপ্টেম্বর ১৯০৩ সালে দূর্গাপূজার মহাষ্টমীর দিনে ২৬ বালিগঞ্জ সার্কুলার রোডে জানকীনাথ ঘোষালের বাড়িতে যে বীরাষ্টমী উৎসব অনুষ্ঠিত হয় রবীন্দ্রনাথ তাতে সক্রিয়ভাবে যোগ দেন।

... শিবাজী উৎসবের মূল মন্ত্র ছিল চরম মুসলিম বিদ্বেষ, সন্ত্রাস এবং সাম্প্রদায়িকতা। বস্তুত এই শিবাজী উৎসবের সূত্র ধরেই বাংলায় সন্ত্রাসবাদী রাজনীতির এবং সাম্প্রদায়িক ভেদনীতির ভিত্তি স্থাপিত হয়। এর ফলশ্রুতিতে বাঙালি হিন্দু ও বাঙালি মুসলমান পরস্পর বিপরীত পথে ধাবিত হয়। ঐতিহাসিকভাবে এটা স্বীকার্য যে এই সন্ত্রাস আর সাম্প্রদায়িক রাজনীতির দায়ভাগ পুরোপুরি বর্তায় হিন্দু জমিদার আর মধ্যবিত্ত শ্রেণীর উপর্। 'শিবাজী উৎসব' পালনের মধ্য দিয়ে সমগ্র বাংলায় যখন মুসলিম বিদ্বেষ আর সাম্প্রদায়িক রাজনীতি এবং সমাজনীতির ভূমি নির্মিত হচ্ছে তখন বাঙালি মুসলিম সমাজ অর্থে, বিত্তে, শিক্ষায় একটি পিছিয়ে পড়া সম্প্রদায়। আর পূর্ববাংলায় বাঙালি মুসলিম জসংখ্যার সিংহভাগ জমিদারদের রায়ত বা প্রজা। বাংলার হিন্দুরা মুসলমানদের প্রতিপক্ষ হিসেবে বিবেচনা করলেও হিন্দু জমিদার আর মধ্যবিত্তের প্রতিপক্ষ হয়ে উঠার শক্তি বা অবস্থা বাঙালি মুসলমানের ছিল না। কিন্তু বাস্তব ইতিহাস হলো বিশ শতকের শুরুতে এই সাম্প্রদায়িক 'শিবাজী উৎসব' বাংলায় চালু হয়েছিল মুসলিম বিরোধীতা এবং মুসলিম বিদ্বেষকে পুঁজি করে।

কবিতার শুরুতে রবীন্দ্রনাথ শিবাজীর কর্মকান্ড ও জীবনের উদ্দেশ্য সম্পর্কে বলেন :

কোন দূর শতাব্দের এক অখ্যাত দিবসে
নাহি জানি আজ
মারাঠার কোন শৈল অরণ্যের অন্ধকারে ব'সে
হে রাজা শিবাজী
তব ভাল উদ্ভাসয়া এ ভাবনা তরিৎ প্রভাবৎ
এসেছিল নামি
'একরাজ্যধর্ম পাশে খন্ড ছিন্ন বিক্ষিপ্ত ভারত
বেধে দিব আমি'।

এখানে রবীন্দ্রনাথ শিবাজীকে ভারতের ঐক্যের প্রতীক হিসেবে তুলে ধরেছেন। তিনি বলতে চেয়েছেন যে খন্ড, ছিন্ন, বিক্ষিপ্ত ভারত ধর্মের ভিত্তিতে ঐক্যবদ্ধ করা ছিল শিবাজীর জীবনের উদ্দেশ্য। মহারাষ্ট্রে শিবাজী উৎসবের প্রচলন, পরবর্তী সময়ে কলকাতাসহ ভারতের বিভিন্ন অঞ্চলে শিবাজী উৎসব প্রচলনের এবং এই উৎসবকে জনপ্রিয় করে তোলার জন্য নিবেদিত প্রাণ বালগঙ্গাধর তিলক এবং সখারাম দেউস্করের মূল উদ্দেশ্য ছিল শিবাজীর আদর্শে ভারতকে ঐক্যবদ্ধ করা। এখানে এটা স্পষ্টত:ই লক্ষ্যণীয় যে তিলক, দেউস্কর আর রবীন্দ্রনাথের ভাবনা সম্পূর্ণ অভিন্ন।

... মুসলিম শাসকেরা কখনোই ইসলাম ধর্মকে স্থানীয় জনগোষ্ঠীর উপর চাপিয়ে দেয়নি কিংবা ইসলাম গ্রহণের জন্য কোন প্রকার জোর জবরদস্তি করেনি। জাত-পাত আর বহুবর্ণে বিভক্ত এবং কুসংস্কারে আচ্ছন্ন ভারতীয় জনগোষ্ঠীর একটি অংশ স্বেচ্ছায় ইসলামের আদর্শে অনুপ্রাণিত হয়ে ইসলাম গ্রহণ করেছে। ইতিহাসে এটাও স্বীকার্য যে সমগ্র ভারতবর্ষকে মুসলিম শক্তিই প্রথম এককেন্দ্রীক শাসনের আওতায় নিয়ে এসেছে। আর ভারতের ঐক্য স্থাপন কখনোই ধর্মের ভিত্তিতে হয়নি। মুসলিম রাজনৈতিক পতাকাতলে ভারতবর্ষ ঐক্যবদ্ধ হয়েছিল। সতেরো শতকের ভারত ইতিহাসে শিবাজী একজন মুসলিল বিরোধী, সন্ত্রাসী, লুন্ঠনকারী ও বিশ্বাসভঙ্গকারী আঞ্চলিক দলনেতা। শিবাজীর আদর্শ হলো একমাত্র মুসলিম শাসনের বিরোধিতা। এখানে রবীন্দ্রনাথ শিবাজীর হিন্দুধর্ম আর সন্ত্রাসের আদর্শে ভারতকে এক করতে অনুপ্রাণিত হয়েছেন। শিবাজীর আদর্শে রবীন্দ্রনাথের অনুপ্রাণিত হওয়ার বিষয়টি পুরোপুরি সাম্প্রদায়িক, মুসলিম বিদ্বেষী এবং আবহমানকাল ধরে চলে আসা বাংলা ও ভারতের সমাজ ও সংস্কৃতি ধারার বিরোধী।

... ১৭৫৭ সালে পলাশীর যুদ্ধে নবাব সিরাজদৌল্লার পরাজয়ের পটভূমিতে একদিকে বাংলার স্বাধীনতা সূর্য অস্তমিত হয় এবং অন্যদিকে বাংলায় সুদীর্ঘ মুসলিম শাসনের অবসান ঘটে। যেহেতু রাজশক্তি মুসলমানদের কাছ থেকে ইংরেজরা ক্ষমতা দখল করে ঔপনিবেশিক শাসন প্রতিষ্ঠা করেছিল তাই তাদের প্রধান শত্রু হয়ে দাঁড়ায় বাংলার মুসলমান সমাজ। ইংরেজ শক্তি বাংলার মুসলমান সমাজের উপর শুরু করে শোষণ, নিপীড়ন আর নির্যাতন। অন্যদিকে বাংলার হিন্দু সমাজ শুরু করে বৃটিশ শক্তির পদলেহন ও দালালী। তারা ইংরেজ কোম্পানির দালালী, মুৎসুদ্দী আর বেনিয়াগিরী করে প্রভুত অর্থের মালিক হওয়ার পাশাপাশি ইংরেজি শিক্ষাকে গ্রহণ করে। অন্যদিকে মুসলমান সমাজ তাদের ঐতিহ্য, ধর্ম ও সংস্কৃতি নষ্ট হওয়ার ভয়ে ইংরেজি শিক্ষা থেকে দূরে থাকে। ক্রমে রাজক্ষমতা, প্রশাসনিক কর্তৃৃত্ব মুসলমানদের হাতছাড়া হয়ে যায়। উপরন্তু রাজভাষা ফারসীর পরিবর্তে ইংরেজি চালু হলে মুসলমান সমাজ যুগপৎ ভূমি ও সরকারী চাকুরীর সুযোগ থেকে বঞ্চিত হয়ে একটি দরিদ্র শ্রেণীতে পরিণত হয়। ইংরেজি শিক্ষা গ্রহণের আর্থিক সামর্থ্য মুসলমানদের ছিল না। এই পটভূমিতে ইংরেজদের পদলেহী হিন্দু সমাজের একাংশ দালালী আর বেনিয়াগিরী করে প্রচুর অর্থ উপার্জন করে। ১৭৯৩ সালের চিরস্থায়ী বন্দোবস্ত প্রবর্তনের পটভূমিতে এই সকল দালাল-বেনিয়ারা অর্থ দিয়ে সরকারের কাছ থেকে জমি বন্দোবস্ত নিয়ে জমিদার শ্রেণীতে পরিণত হয়।

এই ইংরেজদের দালালদেরই একজন রবীন্দ্রনাথের প্রপিতামহ দ্বারকানাথ ঠাকুর। এই দালাল শ্রেণীর কাছে ইংরেজ শাসন ছিল আশীর্বাদ স্বরূপ। অন্যদিকে বাংলার মুসলমান সমাজ ইংরেজ শাসনের বিরুদ্ধে পরিচালনা করে একটানা আন্দোলন সংগ্রাম। আঠারো ও উনিশ শতকের বাংলার কৃষক বিদ্রোহ ও গণতান্ত্রিক সংগ্রামের পুরোভাগে ছিল বাংলার মুসলমান সমাজ। বৃটিশ সাম্রাজ্যবাদী শাসনকে বাংলার মুসলমান সমাজ কখনোই মেনে নিতে পারেনি। অন্যদিকে বাংলার হিন্দু সমাজের বেলায় পরিস্থিত ছিল সম্পূর্ণ ভিন্ন। হিন্দু জমিদার, মহাজন, বেনিয়া আর মধ্যবিত্ত শ্রেণী ছিল বৃৃটিশ সাম্রাজ্যবাদের সহযোগী শক্তি। ঐতিহাসিকভাবে এটা বলা যায় বাংলার তথা ভারতীয় মুসলমান সমাজকে যুগপৎ বৃটিশ সাম্রাজ্যবাদ এবং তাদের সহযোগী হিন্দু শক্তির বিরুদ্ধে লড়াই করতে হয়েছে। আর এই ঐতিহাসিক প্রক্রিয়ার ভেতর দিয়ে নির্মিত হয়েছে হিন্দু-মুসলিম স্থায়ী বিভাজন রেখা।

... মুঘল তথা মুসলিম শক্তির বিরুদ্ধে গুপ্ত হামলা পরিচালনা, হত্যা, খুন এবং গোপন আস্তানায় থেকে মুসলমানদের বিরুদ্ধে লুন্ঠন পরিচালনার জন্য রবীন্দ্রনাথের ভাষায় শিবাজী ইতিহাসে অমর হয়ে আছেন। তিনি আরও বলেন যে শিবাজীর ইতিহাস চাপা দেয়ার চেষ্টা করা হয়েছে। কিন্তু শিবাজীর তপস্যা সত্য ছিল বলে তাকে ইতিহাসে চাপা দেয়া যায়নি। মুসলিম ও ইংরেজ ঐতিহাসিকদের বস্তুনিষ্ঠ গবেষণায় এটা প্রমাণিত হয়েছে যে শিবাজী একজন লুন্ঠনকারী, হত্যাকারী, আত্মগোপনকারী, সন্ত্রাসী মারাঠা দলনেতা। তার কার্যক্রম সীমিত ছিল বিশাল মুঘল সাম্রাজ্যের এক ক্ষুদ্র অঞ্চলে। সতেরো শতকের ভারতীয় ইতিহাসে একটি প্রমাণিত ও সত্যনিষ্ঠ ঐতিহাসিক সিদ্ধান্তের বিপরীতে রবীন্দ্রনাথের এই অবস্থান প্রমাণ করে তিনি মুসলিম বিরোধী হিন্দু পুনরুত্থানবাদী ও আর্য সংস্কৃৃতির ডামাডোলে কতটা নিমজ্জিত ছিলেন। সামাজিক ও শ্রেণীগত অবস্থানে রবীন্দ্রনাথ ইংরেজ শাসনের মহিমায় মুখর। তিনিই পরবর্তীকালে সম্রাট পঞ্চম জর্জের দিল্লি আগমন উপলক্ষ্যে রচনা করেন 'জনগণমন অধিনায়ক জয় হে ভারত ভাগ্যবিধাতা' সঙ্গীত। এটা এখন ভারতের জাতীয় সঙ্গীত। রবীন্দ্রনাথের এই ভাগ্যবিধাতা আল্লাহ বা ঈশ্বর নয়, খোদ বৃৃটিশ সাম্রাজ্যবাদ।

... রবীন্দ্রনাথ বলতে চেয়েছেন যে, মুঘলবিরোধী, লুন্ঠনকারী আর সন্ত্রাসী শিবাজী কর্মকান্ড ভারতের ঐতিহ্যে পরিণত হয়েছে। আর এই ঐতিহ্য হলো মুসলিম বিরোধীতা, মুসলমানদের বিরুদ্ধে সন্ত্রাস পরিচালনা এবং মুসলমানদেরকে ভারতবর্ষ থেকে বিতাড়িত করার সঙ্কল্প। বাঙালি হিন্দুদের মাঝে বিশেষত: ১৭৫৭ সালের পলাশী যুদ্ধোত্তরকালে নব উত্থিত হিন্দু বেনিয়া, দালাল, মহাজন, জমিদার শ্রেণী বাংলা ও ভারতের মুসলিম শাসনের বিরুদ্ধে বিষোদগার করতে থাকে। উনিশ শতকের বিকশিত হিন্দু মধ্যবিত্ত শ্রেণীর বড় অংশই ছিল মুসলিম বিদ্বেষী এবং বাংলার মুসলমান সমাজ সম্পর্কে উন্নাসিক মনোভাবাপন্ন। বিশ শতকের হিন্দু জমিদার আর মধ্যবিত্তের প্রধান অংশই হলো এই ধারার বাহক। হিন্দু-মুসলিম বিরোধ সৃষ্টি, সাম্প্রদায়িক সম্প্রীতি বিনষ্ট, দুই সম্প্রদায়ের মাঝে দাঙ্গা হানাহানি এবং পরিশেষে ধর্মের ভিত্তিতে ভারত বিভাগের দায়িত্ব ঐতিহাসিকভাবে বর্তায় এই হিন্দু উচ্চবিত্ত আর মধ্যবিত্তের উপর।

... বঙ্গভঙ্গের পটভূমিতে বাঙালি শিবাজীকে নেতা হিসেবে বরণ করে নেয়। শিবাজীর মহৎ নাম বাঙালি আর মারাঠা জাতিকে এক সূত্রে গেঁথে দেয়। রবীন্দ্রনাথের এই এক সূত্রে গাঁথার মূল সূত্রটি হলো মুসলিম বিরোধীতা। শিবাজী মুসলিম বিদ্বেষী তাই আসন্ন বঙ্গভঙ্গের পটভূমিতে মুসলমানদের উপর সামাজিক প্রভাব বহাল রাখা এবং সামাজিক শোষণ করার পথ বন্ধ হওয়ার প্রেক্ষাপটে বাঙালি হিন্দু জমিদার আর মধ্যবিত্ত সমাজ মুসলিম বিরোধীতায় অবতীর্ণ। এখানেই মুসলিম বিরোধীতার হাতিয়ার হিসেবে মুসলিম বিদ্বেষী মারাঠী সন্ত্রাসী শিবাজীকে বাঙালি হিন্দু সমাজ বরণ করে নিয়েছে, আপন করে নিয়েছে। মুসলিম বিরোধী বঙ্গভঙ্গ আন্দোলনে শিবাজী বাঙালি হিন্দুদের কাছে আদর্শ হিসেবে প্রতিষ্ঠিত। শিবাজীর পথ ধরেই এগিয়ে যাওয়ার পথের সন্ধান পেয়েছিল বাঙালি হিন্দু সমাজ। শিবাজী মুঘল শক্তির বিরুদ্ধে আর বাঙালি হিন্দু সমাজ প্রতিবেশী মুসলিম সম্প্রদায়ের বিরুদ্ধে। এখানেই শিবাজীর সাথে বাঙালি হিন্দুদের আদর্শিক ও স্বার্থগত সম্পর্কের মিল॥"

- ড. নুরুল ইসলাম মনজুর / শতবর্ষ পরে ফিরে দেখা ইতিহাস : বঙ্গভঙ্গ ও মুসলিম লীগ ॥ [ গতিধারা - জুলাই, ২০১০ । পৃ: ৫২-৮৬ ]


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পুঁজিবাদের বিরুদ্ধে ইসলাম

পুঁজিবাদের বিরুদ্ধে ইসলাম

 
 
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পুঁজিবাদের বিরুদ্ধে ইসলাম
মাহমুদ জাবির: ধর্ম, পুঁজিবাদ আর মার্ক্সবাদের মধ্যে যে বিতর্ক তা আজ সর্বমহলে স্পষ্ট। আধুনিক প্রচারণায় ধর্মকে পুঁজিবাদের সহসঙ্গী হিসেবে তুলে ধরা হয়। অন্ …
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পুঁজিবাদের বিরুদ্ধে ইসলাম
মাহমুদ জাবির: ধর্ম, পুঁজিবাদ আর মার্ক্সবাদের মধ্যে যে বিতর্ক তা আজ সর্বমহলে স্পষ্ট। আধুনিক প্রচারণায় ধর্মকে পুঁজিবাদের সহসঙ্গী হিসেবে তুলে ধরা হয়। অন্যদিকে ধর্মকে মার্ক্সবাদ বিরোধী আদর্শ হিসেবে চিত্রিত করা হয়। আবার মার্ক্সবাদকে নাস্তিক্যবাদের সমার্থক হিসেবে ব্যক্ত করা হয়। বিপরীত প্রচারণাও রয়েছে। যেমন: ধর্ম পুঁজিবাদ ও মার্ক্সবাদ বিরোধী আদর্শ, মার্ক্সবাদ নাস্তিক্যবাদের বিরোধী- ইত্যাদি।
 
কোনো কোনো বামপন্থী ইসলাম ধর্মকে পুঁজিবাদের সমর্থক আদর্শ হিসেবে প্রচার করে। আবার কোনো কোনো কমিউনিস্ট মত প্রকাশ করে যে ইসলাম কোনোভাবেই মার্ক্সবাদ বিরোধী নয়, উল্টোভাবেও বলে- মার্ক্সবাদ কখনোই ইসলাম ধর্মের বিরোধী কোনো আদর্শ নয়। এ ধরণের বিভ্রান্তিমূলক বক্তব্য প্রচারের মূল কারণ- তাদের ইসলাম সম্পর্কে অজ্ঞতা অথবা ভাসা ভাসা ভাবে ইসলাম অধ্যয়ন। খুব কম মানুষই আছে যারা গভীরভাবে ইসলামকে বুঝার চেষ্টা করেছে। আর সে কারণেই ইসলামকে পুঁজিবাদের সমর্থক এমনকি মার্ক্সবাদের বিরোধী নয় বলে মতামত ব্যক্ত করা হচ্ছে। যারা বলছে ইসলাম পুঁজিবাদের সমর্থক তারা ইসলাম বুঝতে পারেনি অথবা ইসলাম বিদ্বেষী মনোভাব থেকে বলছে। যারা বলছে ইসলাম মার্ক্সবাদ বিরোধী নয় অথবা মার্ক্সবাদ নাস্তিক্যবাদের সমার্থক নয়- তারা ইসলাম ও মার্ক্সবাদ সম্পর্কে না বুঝেই বলছে, অথবা রাজনীতি করার স্বার্থেই মুসলিম সেন্টিমেন্টকে ব্যবহার করছে।
 
প্রথমেই মার্ক্সবাদীদের জানতে হবে যে, ইসলাম পুঁজিবাদ বিরোধী আদর্শ। এ বিষয়টি প্রমাণ করতে হলে বুঝতে হবে ইসলাম কী এবং পুঁজিবাদ বলতে কী বোঝায়?
ইসলাম আর দশটি ধর্মের মত কোনো ধর্ম নয়, ইসলাম হল 'দ্বীন' বা জীবন ব্যবস্থা। আংশিক বা খণ্ডিত জীবন ব্যবস্থা নয়, পূর্ণাঙ্গ জীবন ব্যবস্থা। ইসলাম শুধুমাত্র কতগুলো নীতি নৈতিকতার সমষ্টি নয়, আনুষ্ঠানিক এবাদতের মধ্যেও ইসলাম সীমাবদ্ধ নয়। ইসলাম এমন এক পূর্ণাঙ্গ দ্বীন যা শুধুমাত্র কতগুলো আহকাম বা বিধিনিষেধ পালনের মধ্যে দায়িত্ব শেষ করে না। বরং ইসলাম বিশ্বাসীদের মধ্যে জাগিয়ে তোলে সামাজিক দায়িত্ববোধ। ইসলাম সন্ন্যাসবাদকে প্রশ্রয় দেয় না। যাবতীয় অনর্থক কর্মকে ইসলাম নিষিদ্ধ করে সামাজিক, রাজনৈতিক, অর্থনৈতিক ক্ষেত্রে মুমিনকে করে দায়িত্ব সচেতন । সূরা ইমরানে কুরআন বলছে- " তোমরাই শ্রেষ্ঠ উম্মত, তোমাদের পাঠানো হয়েছে মানবজাতির কল্যাণের জন্য। তোমরা যাবতীয় সৎকর্ম সমাজে প্রতিষ্ঠিত করবে এবং সকল প্রকার অন্যায়-অবিচার এর মূলোচ্ছেদ করবে। '' (৩ : ১১০)
 
মানবজাতির কল্যাণে নিয়োজিত হওয়ার জন্য এত স্পষ্ট বক্তব্য কোনো ধর্মে এমনকি কোনো মতাদর্শে পাওয়া যাবে না। এর মানে ইসলাম মুমিনকে তখনই শ্রেষ্ঠত্বের মর্যাদা দেয় – যখন সে সামাজিক, রাজনৈতিক, অর্থনৈতিক ও সাংস্কৃতিক অব্যবস্থাপনার সংস্কার সাধনে আত্মনিয়োগ করার মধ্য দিয়ে মানবজাতির কল্যাণকে সুনিশ্চিত করতে পারে। পৃথিবীর যাবতীয় ধর্ম ছাড়াও পুঁজিবাদ এবং সমাজতন্ত্রের মধ্যে এর মত বা এর চেয়ে উন্নতমানের কোনো বাক্য কেউ দেখাতে পারবে?
 
এ আয়াতে স্পষ্ট হয়েছে ইসলাম চূড়ান্তভাবে অন্যায়, অবিচার, লুণ্ঠন , শোষণ, দুর্নীতির শুধু বিরোধিতাই করে না, ইসলাম পুঁজিবাদ ও সাম্রাজ্যবাদ সৃষ্ট সকল প্রকার অব্যবস্থাপনার মূলোচ্ছেদ ও ধ্বংস কামনা করে। শুধু কামনা বা আশা পোষণে সীমাবদ্ধ না থেকে ইসলাম মুমিনদের সক্রিয় পদক্ষেপ নেয়ার নির্দেশ দেয়। কুরআন সে নির্দেশকে তুলে ধরেছে এভাবে- "তোমরা তাদের বিরুদ্ধে যুদ্ধ কর যাবত ফিতনা দূরীভূত না হয় এবং আল্লাহর দ্বীন প্রতিষ্ঠিত না হয়।" (২ : ১৯৩ )
 
যে ইসলাম মানুষকে সন্ন্যাসবৃত্তি পরিত্যাগ করে নির্যাতিত, নিপীড়িত, শোষিত গণমানুষদের অধিকার প্রতিষ্ঠার জন্য মুমিনদের দায়িত্বশীল করে তোলে যেখানে গণমানুষের কল্যাণ প্রতিষ্ঠাই একমাত্র ব্রত, সেখানেই ইসলাম ধর্ম কিছুতেই উল্টানো জগৎ চেতনা তৈরি করতে পারে না। ইসলাম ধর্ম কিছুতেই আফিম হতে পারে না। সামগ্রীক ধর্ম সম্পর্কে কার্ল মার্ক্সের বক্তব্য – "ধর্ম হচ্ছে নির্যাতিত জীবের দীর্ঘশ্বাস, হৃদয়হীন জগতের হৃদয়, প্রাণহীন পরিবেশের প্রাণ, এটা হচ্ছে জনগণের আফিম ।" (মার্ক্স, ১৯৭৫)
 
কার্ল মার্ক্স ইসলাম ধর্মকে আর দশটা ধর্মের সাথে একাকার করে ফেলেছেন। কার্ল মার্ক্স খ্রিষ্টান ধর্মের ব্যবহারিক দিকটার মধ্যে যে কদর্যরূপ লক্ষ্য করেছেন তা বাকিসব ধর্মের বৈশিষ্ট্য মনে করেন। ধর্মের অপব্যবহার আর ধর্মের প্রকৃত রূপ এক অর্থ বহন করে না। ধর্মের অপব্যবহারে ধর্মকে পুঁজিবাদের সমর্থক মনে হতে পারে, কিন্তু তা তো ঐশী ধর্মের প্রকৃত রূপ নয়। বরং তা হল ধর্মের ইহজাগিতকরণ।
 
ঐশী ধর্ম ইসলাম যে পদ্ধতিতে মুমিনদের আহ্বান করছে নির্যাতিত, নিপীড়িত, মজলুমদের পক্ষে দাঁড়াতে, এরকম উদাত্ত আহ্বান কোনো মতাদর্শে স্পষ্টভাবে বিবৃত হয়নি। কুরআন বলছে – "তোমাদের কি হল যে তোমরা যুদ্ধ করবে না আল্লাহ্‌র পথে এবং অসহায় নর নারী এবং শিশুদের জন্য, যারা বলে হে আমাদের প্রতিপালক! এই জনপদ যার অধিবাসী জালিম উহা হতে আমাদিগকে অন্যত্র নিয়ে যাও, তোমার নিকট হতে কাউকে আমাদের অভিভাবক কর এবং তোমার নিকট হতে কাউকে ও আমাদের সহায় করো ।'' (৪ : ৭৫)
 
যে ইসলাম এই নির্দেশ প্রদান করে যে, মুমিন হবে ঐ সকল মানুষের অভিভাবক ও সহায় যারা অসহায় ও মজলুম হয়ে আছে, যারা জালিমের অত্যাচারে, শোষণ আর জুলুমের শিকার – সেই ইসলাম কি করে পুঁজিবাদের সমর্থক হতে পারে? সে ইসলাম কি করে সাম্রাজ্যবাদের সমর্থক হয়ে কাজ করতে পারে? ইসলামের কোনো পক্ষশক্তি জালেমের জুলুম, অত্যাচার, নিপীড়নের পক্ষে অবস্থান নিতে পারে না। উপরন্তু  ইসলাম মুমিনদের যুদ্ধে অবতীর্ণ হওয়ার আহ্বান জানায়- যাতে করে জালেমের বিরুদ্ধে ইস্পাত কঠিন প্রতিরোধ গড়ে তোলা যায়।
 
ইসলাম কী করে পুঁজিবাদের সমর্থক হয় যখন পুঁজিবাদের সকল বৈশিষ্ট্য ইসলাম নাকচ করে দেয় ? পুঁজিবাদের প্রধান বৈশিষ্ট্য হল –
             ১। ব্যক্তিগত মালিকানা
             ২। শ্রমের পণ্যকরণ (Commodification of Labour)
             ৩। উদ্ধৃত মুনাফা লাভ
             ৪। উদ্ধৃত মুনাফা বিনিয়োগ
             ৫। মুনাফা লাভের প্রতিযোগিতা
             ৬। সঞ্চয়কৃত পুঁজি বিনিয়োগ  
ইসলাম পুঁজিবাদের ব্যবস্থার ব্যক্তিগত মালিকানার বিরোধী এমনকি মার্ক্সবাদী ব্যবস্থার ব্যক্তিগত মালিকনার উচ্ছেদেরও বিরোধী । আল্লাহ্‌ পাক সূরা বাকারায় মুত্তাকীর বৈশিষ্ট্য হিসেবে উল্লেখ করেন- " তাদেরকে যে উপনোপকরণ দিয়েছি তা হতে ব্যয় করে ।'' (২ : ৩)
"তোমরা যা উপার্জন কর এবং আমি যা ভূমি হতে তোমাদের জন্য উৎপাদন করে দেই তন্মধ্যে যা উৎকৃষ্ট তা ব্যয় কর । " (২ : ২৬৭)
 
এর মানে ব্যক্তি যা উপার্জন করে তার চূড়ান্ত মালিক আল্লাহ্‌, ব্যক্তি হল সাময়িক শর্তযুক্ত মালিক । ব্যক্তি এক্ষেত্রে সমস্ত সম্পদ বা উপার্জন আত্মভোগেও ব্যয় করতে পারে, আবার আল্লাহ্‌র নির্দেশে ব্যয়ও করতে পারে। উপার্জন কোনো কাজে ব্যয় করবে তা নির্ভর করে তার বিশ্বাসগত দিকের উপর। ব্যক্তি যদি চূড়ান্ত মালিক হিসেবে আল্লাহ্‌কে মেনে নেয় তখন আত্মভোগে প্রয়োজনীয় ভোগ করবে এবং এক অংশ জনকল্যাণে ব্যয় করবে। যারা জনকল্যাণে আত্মনিয়োগ করে না কুরআন তাদেরকে দ্বীনে অস্বীকারকারী হিসেবে ঘোষণা দিয়েছে। সূরা মাউনে বলা হয়েছে– "তুমি কি তাকে দেখেছো , যে দ্বীনকে অস্বীকার করে ? সে তো সেই যে এতিমকে তাড়িয়ে দেয়, অভাবগ্রস্থকে খাদ্যদানে উৎসাহ দেয় না।"
 
ইসলাম দরিদ্র ও অসহায় মানুষদের সাহায্যে এগিয়ে আসার জন্য কোনো কোমল সুরের ব্যবহার করে নি। ইসলাম দরিদ্র ও অসহায় মানুষদের সাহায্যে এগিয়ে না আসাকে ভৎসনা করেছে এমনকি দ্বীনে অস্বীকারকারী হিসেবে ঘোষণা করেছে। ইসলাম মুমিনদের এই নির্দেশ প্রদান করে যে, 'উপার্জিত সম্পদের মধ্যে যা উৎকৃষ্ট তা ব্যয় কর। এর মানে অভাবী মানুষের সাহায্য কোনো করুণার বিষয় নয়। এ হলো দায়িত্ব, স্পষ্ট সামাজিক দায়িত্ব। এ হল খোদাপ্রেমিকদের প্রতি স্পষ্ট নির্দেশ, যে নির্দেশ বাস্তবায়নে ব্যক্তি নিজেই ব্যক্তিগত ভাবে এমনকি সামিষ্টকভাবে তৎপর হতে পারে।
 
মার্ক্সবাদ ব্যক্তিকে এরূপ কোনো দায়িত্ব প্রদান করেনি। মার্ক্সবাদ মনে করে ব্যক্তি এরূপ দায়িত্ব পালনের ক্ষমতা বা যোগ্যতা রাখে না। সে কারণে মার্ক্সবাদে ব্যক্তি মালিকানার চূড়ান্ত উচ্ছেদ এর মাধ্যমে সমস্ত মালিকানা রাষ্ট্রের হাতে সোপর্দ করা হয়। মার্ক্সবাদ মনে করে, যতদিন ব্যক্তিমালিকানা থাকবে ততদিন পুঁজিবাদ থাকবে। ব্যক্তিমালিকানা উচ্ছেদ হলেই রাষ্ট্রীয় সমাজতন্ত্র প্রতিষ্ঠিত হবে , তখনই মানুষের অধিকার প্রতিষ্ঠিত হবে। এর মানে ব্যক্তিমালিকানার উচ্ছেদ না হলে মানুষের অধিকার ফিরে পাওয়ার কোনো সম্ভবনা নাই- এমন ধারণায় মার্ক্সবাদ মানুষের অধিকার শুধুমাত্র একটি কর্তৃপক্ষের হাতে অর্পণ করে। মার্ক্সবাদ মনে করে ব্যক্তিগত মালিকানার উচ্ছেদ না হওয়া পর্যন্ত পুঁজিবাদ থাকবে, ইসলাম মনে করে 'ব্যক্তিগত মালিকানা থাকা অবস্থায় পরিশুদ্ধ বিশ্বাসে একজন মুমিন মানুষের অধিকার প্রতিষ্ঠার সামাজিক দায়িত্বে নিয়োজিত হতে পারে। মার্ক্সের মতে- " The supersession of private property is therfore the complete emancipation of all human senses and qualities ." (Marx, EPM)
 
এর মানে ব্যক্তিগত সম্পত্তির উচ্ছেদ না হলে মানুষের মুক্তি আসবে না। মার্ক্সের এমন ধারণাকে বাতিল করে ইসলাম ঘোষণা করে যে- ঈমান বা পবিত্র বিশ্বাসের ভিত্তিতে মুমিন তার ব্যক্তিগত সম্পত্তিকে আমানত মনে করে সেই সম্পত্তিতে অভাবীদের হক পূরণ করতে দায়িত্বশীল থাকে। ইসলাম সাথে সাথে এ দায়িত্ব কর্তৃপক্ষের উপরও সোপর্দ করে। সূরা নেসায় উল্লেখিত আয়াত অনুসারে সে দায়িত্ব অভিভাবকের উপর বর্তায়, যারা অসহায় নরনারীদের সহায়।
পুঁজিবাদের অপর বৈশিষ্ট্য হল শ্রমের পণ্যকরণ । শিল্প পুঁজিবাদে শ্রমিকের শ্রমকে পণ্যকরণ করার মধ্য দিয়ে বুর্জোয়া উদ্ধৃত মূল্য লাভ করে । কার্ল মার্ক্স শ্রমের এ ধরণের ব্যবহারকে প্রশ্ন করেন এবং শ্রমিকদের ন্যায্য মজুরীর পক্ষে জোরালো বক্তব্য তুলে ধরেন। ইসলাম এক্ষেত্রে অনেকদূর অগ্রসর হয়ে শ্রমিকসহ সকল অসহায় নিপীড়িত মানুষের পক্ষে জোরালো ভূমিকা নেয়ার জন্য মুমিনদের দায়িত্ব প্রদান করে। ইসলাম অভাবগ্রস্থদের অভাব পূরণের দায়িত্ব যেমন দিয়ে থাকে, তেমনি তাদের সাথে উন্নত আচরণের নির্দেশ দেয়। সূরা আরাফে আল্লাহ্‌ বলেন- "আল্লাহ্‌ অন্যায় আচরণের নির্দেশ দেন না। ... বল, আমার প্রতিপালক নির্দেশ দিয়েছেন ন্যায়বিচারের। " (৭ : ২৮,২৯)
অন্যত্র আল্লাহ্‌ বলেন- " আল্লাহ্‌ ন্যায়পন্থীদের ভালবাসেন। " (৬০ : ৮)
 
যারা স্বতঃস্ফূর্তভাবে আল্লাহে ঈমান রাখবে, তারা আল্লাহ্‌কে ভালবাসবে, সে কারণে তারা হবে দায়িত্বশীল ও ন্যায়পন্থী। ন্যায়পন্থী না হলে ব্যক্তিগত সম্পত্তি রাষ্ট্রীয় মালিকানায় অর্পিত হলেও শ্রমিক তার অধিকার পেতে পারে না । ন্যায়পন্থী হলে রাষ্ট্রীয় মালিকানা ছাড়াও শ্রমিক পেতে পারে উন্নত আচরণ ও তার অধিকার। যারা মানুষের অধিকার দেয় না , তাদের ভর্ৎসনা করে কুরআন বলছে- "আল্লাহ্‌ জীবনোপকরণে তোমাদের কাউকে কারো উপরে শ্রেষ্ঠত্ব দিয়েছেন। যাদেরকে শ্রেষ্ঠত্ব দেয়া হয়েছে তারা তাদের অধীনস্ত দাস দাসীদের নিজেদের জীবনোপকরণ হতে এমন কিছু দেয় না যাতে তারা এ বিষয়ে সমান হয়ে যায়। তবে কি উহারা আল্লাহ্‌র অনুগ্রহ অস্বীকার করে?" (১৬ : ৭১)
 
এ আয়াতে স্পষ্ট হয় যে, ইসলাম অধীনস্তদের বঞ্চিত করাকে কিছুতেই সমর্থন করে না। এর মানে শ্রমিকদের স্বল্প মজুরী দিয়ে উদ্ধৃত মুনাফা অর্জন করা ইসলাম সম্মত নয়। ইসলাম আরো অগ্রসর হয়ে বলছে – "তাদের ধন সম্পদে রয়েছে অভাবগ্রস্থ ও বঞ্চিতদের হক। " (৫১ : ১৯)
 
ইসলাম এভাবে ধনী সম্প্রদায়কে অভাবীদের প্রতি দায়িত্বশীল হতে শুধু নির্দেশ দেয় না, বাধ্যতামূলক করে। সুতরাং শ্রমিক বা অভাবীদের অধিকার প্রতিষ্ঠার জন্য নতুন করে নতুন মতাদর্শের প্রয়োজন পড়ে না। ইসলাম এমন এক পূর্ণাঙ্গ দ্বীন- যে দ্বীন শোষিত, বঞ্চিতদের অধিকার আদায়ের সমস্ত দিক নির্দেশনা ও বিধান জারি করেছে। সুতরাং ইসলাম শুধু পুঁজিবাদের বিরোধিতাই করছে না, পুঁজিবাদী ব্যবস্থা উচ্ছেদের জন্য ইসলাম মুমিনদের লড়াই করতে আহ্বান জানায়, যাতে করে ধনীদের কাছে অভাবীদের যে হক বা অধিকার রয়েছে তা আদায় করে কল্যাণকামী সমাজ প্রতিষ্ঠা করা যায়। সে জন্যে মার্ক্সবাদ বা সমাজতন্ত্রের প্রতিষ্ঠা ছাড়াই ইসলাম মানুষের অধিকার প্রতিষ্ঠার জন্য যথেষ্ট।
 
পুঁজিবাদে শ্রম শোষণ যেমন সমর্থিত তেমনি শোষিত উদ্ধৃত মূল্য বিনিয়োগ করে পুঁজির আকার বড় করতে প্রচেষ্টা চালায়। ইসলামে শ্রম শোষণ শুধু নিষিদ্ধই নয়, ন্যায় বিচারের মধ্য দিয়ে অভাবী বঞ্চিতদের জন্য সম্পদ বণ্টনের দায়িত্ব প্রদান করে। এ কারণে ইসলাম যাকাত ব্যবস্থাকে বাস্তবায়নের জন্য নির্দেশ জারি করেছে, যাতে করে ধনী ও দরিদ্রের ব্যবধান কমে যায়। নোবেল বিজয়ী অমর্ত্য সেন অসমতা হ্রাসের উপায় হিসেবে উল্লেখ করেন যে,ধনীর সম্পদের এক অংশ যদি দরিদ্র মানুষের মধ্যে বণ্টন করা যায়,তবে অসমতা হ্রাস পাবে। ইসলাম বহু আগেই অসমতা হ্রাসের এ বিধানকে যাকাত নামে কার্যকর করার নির্দেশ দিয়েছে। পুঁজিবাদের আর একটি বৈশিষ্ট্য হলো প্রাচুর্যের প্রতিযোগিতা। পুঁজিবাদীরা অধিক মুনাফা লাভের আশায় পুঁজি গঠনের প্রতিযোগিতায় অবতীর্ণ হয়। পুঁজি গঠনের প্রতিযোগিতায় অবতীর্ণ হয়ে তারা সঞ্চয় প্রকল্প গ্রহণ করে। অতি বেশি সঞ্চয়মুখী হয় অধিক মাত্রায় বিনিয়োগের জন্য। এ অবস্থায় কৃপণতা তাদের স্বভাবে পরিণত হয়। কৃপণতার কারণে স্বাভাবিক ব্যয়, আত্মীয়স্বজনের প্রতি দায়িত্ব, প্রতিবেশীর প্রতি দায়িত্ব, অভাবীদের প্রতি ও বঞ্চিতদের প্রতি যে স্বাভাবিক দায়িত্ববোধ- তা হারিয়ে পুঁজিপতিরা নিরন্তর চালিয়ে যায় মুনাফা লাভের অবিশ্রান্ত প্রতিযোগিতা। কুরআন সে প্রতিযোগিতাকে এভাবে তুলে ধরে
"প্রাচুর্যের প্রতিযোগিতা তোমাদের মোহাচ্ছন্ন করে রাখে, যতক্ষণ না তোমরা কবরে উপনীত হও,... তোমরা তো জাহান্নাম দেখবেই। " (সূরা, তাকাছুর)
এভাবেই প্রতিযোগিতায় শামিল হয়ে পুঁজিপতিরা যে সঞ্চয়ের সংস্কৃতি চালু রাখে তার ব্যাপারে কুরআনের বক্তব্য হল – " দুর্ভোগ প্রত্যেকের ... যে অর্থ জমায় ও উহা বারবার গণনা করে । সে ধারণা করে অর্থ তাকে অমর করে রাখবে । ... সে অবশ্যই নিক্ষিপ্ত হবে হুতামায় । " (সূরা হুতামা)
 
উপর্যুক্ত আয়াতে বোঝা যায় ইসলাম বহু আগেই পুঁজিবাদ এর বিরোধিতা করে এসেছে। যখন কুরআন নাজিল হয়েছে তখন সমাজে বিকশিত পুঁজিবাদ না থাকলেও পুঁজিবাদের যে বৈশিষ্ট্যগুলোর কারণে পুঁজিবাদের বিকাশ হয়েছে সেই বৈশিষ্ট্যগুলোর বিরোধিতা করা হয়েছে কুরআনে। কেননা ইসলাম নীতিগত ও আদর্শিকভাবে সেকুলারিজমের বিরোধী। 'পুঁজিবাদ' সেকুলারিজম থেকে বিচ্ছিন্ন কিছু নয়। বরং সেকুলারিজমের বিকাশের সাথে সাথে পুঁজিবাদের বিকাশ হয়েছে। সেকুলারিজম হল ইহজাগতিকতা। 'পুঁজিবাদ' ইহজাগতিকতার আদর্শে প্রতিষ্ঠিত। পুঁজিবাদের বৈশিষ্ট্যই হল এই জগতেই ব্যক্তিগত পুঁজির পাহাড় বানাতে হবে, এ জগৎ হল সুখ সমৃদ্ধির সমস্ত আধার। সে কারণে পুঁজিবাদের সাথে ইসলামের কোনো সম্পর্ক নেই। কেননা ইসলাম মনে করে মানুষের জন্য সবচেয়ে উত্তম স্থান হল পরকাল। পরকাল হল সুখ সমৃদ্ধির কেন্দ্র । ইসলাম পার্থিব জীবনকে ভোগ বিলাস বা সুখ-সমৃদ্ধির  কেন্দ্র মনে করে না- যা পুঁজিবাদী ব্যবস্থায় মনে করা হয়। ইসলামে পার্থিব জীবন হল দায়িত্ব ও কর্তব্য পালনের জীবন, এ জীবন নিজের প্রতিষ্ঠার জন্য নয়। এ জীবন হল মানুষের কল্যাণে আত্মনিয়োজিত থাকার জন্য। এ কারণে কুরআন বিভিন্নভাবে পার্থিব জীবনের ভোগ বিলাস ও প্রাচুর্যের প্রতিযোগিতা থেকে বিরত থেকে সৎকর্মের প্রতিযোগিতায় আত্মনিয়োগের কথা ব্যক্ত করেছে। ইসলাম পুঁজিবাদের বিরুদ্ধে যত বেশি মাত্রায় অবস্থান নিতে সক্ষম, সমাজতন্ত্র পুঁজিবাদের বিরুদ্ধে ততখানি সক্ষম নয়। কেননা সমাজতন্ত্রে রাষ্ট্রীয় মালিকানার কারণে রাষ্ট্রীয় পুঁজিবাদ এর বিকাশ হওয়ার সুযোগ রয়েছে। ইসলামে সে রকম কোনো সুযোগ নেই , কেননা ইসলাম ন্যায়বিচারকে সর্বাধিক গুরুত্ব প্রদান করে এবং তার চূড়ান্ত পুরস্কার অর্জনের ক্ষেত্র হিসেবে পরকালকে ঘোষণা করেছে। সমাজতন্ত্রে এ ধরণের কোনো সুযোগ নেই।         
 
লেখক: বিশ্ববিদ্যালয় শিক্ষক

(মতামত প্রকাশিত বক্তব্য লেখকের একান্ত নিজস্ব,  রেডিও তেহরানের সম্পাদকীয় বিভাগের আওতাভূক্ত নয়।)


রেডিও তেহরান/এআর/২১

मृत्यु हुनेको संख्या १९५२ पुग्योः गृह ६.७ रेक्टरस्केलको भुकम्प फेरि गयो भुगर्वविद्को आँखामा महाभुकम्प


मृत्यु हुनेको संख्या १९५२ पुग्योः गृह


६.७ रेक्टरस्केलको भुकम्प फेरि गयो


भुगर्वविद्को आँखामा महाभुकम्प

-श्रीकमल द्विवेदी

धेरै ठूलो राष्ट्रिय क्षतिको समयमा सबै  सतर्क रहनुपर्छ, तर डराएर भाग्ने र आत्तिने गर्नु हुँदैन। आकस्मिक कार्यमा जुटेका ठाउँमा अनाबश्यक रुपमा रमिते भएर जानु पनि हुँदैन, यस्तो बेलामा भीडले कार्यगर्ने मानिसहरुलाइ बाधा पुर्‍याउँछ। पुरिएका मानिसहरु झि​क्न र घरवारबिहिनहरुलाई सहयोग गर्नुपर्छ। मुख्य धक्का गईसकेको हुँदा चनाखो भई सुरक्षित बस्नु आबस्यक हुन्छ। यो राष्ट्रिय संकटको बेला हामीले गर्नुपर्ने सबै भन्दा ठूलो आपसी सहयोगको हो। विस्तृतमा

 -श्रीकमल द्विवेदी

थ्रष्ट, मेन बाउन्ड्री थ्रस्ट र हिमालयन फ्रन्टल थ्रष्ट हिमालयको समानान्तर रूपमा छन्। ति थ्रष्टहरूबाट चट्टान चिप्लेर छिर्ने क्रममा कुनै क्षेत्रमा अड्केर बस्छ। 
नियमित रूपमा छिर्दा शक्ति सञ्चय हुँदैन भने धेरै घर्षणको कारण लामो समय अड्किएको ठाउँमा धेरै शक्ती सञ्चय हुन जान्छ। यसरी वरपर चिप्लिएर छिर्ने तर कतै अड्कन जाँदा शक्ति सञ्चय भएको ठाउँ अकस्मात फुटेर चलायमान हुँदा उत्पति हुने कम्पन नै भुकम्प हो।
साधारण उदाहरणबाट यो अनुभव गर्न सकिन्छ। एउटा दाह्री काट्ने ब्लेडलाई दुई हातले समाएर बङयाउँदै जाउँ। ब्लेड बाङ्गिदै जाँदा त्यसमा शक्ति सञ्चय हुँदै जान्छ। एउटा बिन्दुमा पुगेपछि ब्लेड भाँचिन्छ, र भाँचिने क्रममा थर्कदै हातमा कम्पन महसुस हुन्छ। यस्तै प्रकृया चट्टानमा हुँदा भुकम्प जान्छ।
नेपालको काठमाडौं पश्चिमको भागमा २०० वर्षभन्दा बढी समयदेखि ठूलो भुकम्प गएको थिएन। यसलाई साइस्मीक ग्याप भनिन्छ। पूर्वी नेपालमा केन्द्र बिन्दु(उदयपुर) भएको बि.सं. १९९० (सन १९३४) मा ठूलो भुकम्प आएको थियो।
यसै गरी सुदूर पश्चिममा वा सँगै जोडिएको गड्बालमा केन्द्रबिन्दु भएको सन् १८०३ मा पनि ७.५ रेक्टर स्केलको भुकम्प गएको थियो। यसै गरी सन १९०५मा कांगडामा पनि ठूलो भुकम्प गएको थियो। यस अवस्थामा पनि काठमाडौं पश्चिमको भागमा धेरै लामो समयसम्म ठूलो भुकम्प नजाँदा भुगर्भविदहरूले ठूलो विनासकारी भुकम्प जाने पूर्वानुमान गरेका थिए। अहिले गएको भुकम्प त्यही “साईस्मिक ग्याप” मा गएको भुकम्प भएको अनुमान छ।
भुकम्प जाँदा मुख्य धक्का, त्यस अगाडि जाने पूर्व धक्का र पछि जाने धक्का वा आफ्टर शक्स हुन्छन्। कहिले काही मुख्य धक्का आउनु अगाडि साना साना धक्काहरू जाने गर्छन्। तर, बिना पूर्व-धक्का एकै पटक मुख्य धक्का पनि जान्छ। तर मुख्य धक्का पछि साना साना छोटो समयका धक्काहरु केही अन्तरालमा गईरहनु स्बभाविक हो।
यो प्रकृया केहि घण्टादेखि केहि दिनसम्म गइरहन सक्छ। प्रायः मानिसहरू यसैलाई भुईँचालो फर्केको भन्ने गर्छन्। धेरै समय अड्केर फुटेपछि चलेको धाँजामा केही समयसम्म चलाएमान हुनु स्बभाबिक भौगर्भिक प्रकृया हो। योपछि जाने धक्का वा आफ्टर शक्सहरूको पनि कुनै पूर्वानुमान गर्न सकिँदैन। यति बजे फेरि भुकम्प जान्छ भन्ने हल्ला मात्र हो।
ठूलो भुकम्पले भत्काएको घर वा चर्केको छ भने त्यस्तोमा बस्नु हुँदैन। ठूलो धक्काले चर्काएका संरचनाहरू पछि आउने साना धक्काले पनि भत्काउन सक्छ। तर मुख्य धक्कामा केही पनि क्षति नभएको घर छ भने खस्ने ढल्ने सामान नभएका कोठाहरूमा बस्दा केही हुँदैन। आत्तिएर भाग्दा बरू दुर्घटना हुन सक्छ।
भुकम्पको मापन गर्ने रेक्टर स्केल ‘लग स्केल’ प्रणालीबाट नापिने हुँदा ७.८ र ५.५ को शक्तिमा सयौं गुणा फरक हुन्छ। त्यसैले कमजोर कम्पनले ठूलो कम्पनले क्षति नगरेको संरचना भत्काउने सम्भावना धेरै कम हुन्छ।
काठामाडौं उपत्यका हजारौं वर्ष अगाडि ताल पुरिएर बनेको थेग्रिनीबाट बनेको छ। माटो बालुवाको तहमुनि चट्टान कतै कतै ५०० मिटरभन्दा तल छ। जति मोटो माटो बालुवाको तह छ त्यती नै बढि म्याग्निफिकेशन हुन्छ। उदाहरणको लागि कल्पना गरौं हामी बसमा बसेको छौं, यदि स्प्रिङको सिटमा बस्नु भएको छ भने बस चल्दा बढी लचक-लचक गर्दै  हल्लिन्छ, तर काठको सिटमा बस्दाको थर्काई कम हुन्छ। यसै गरी उपत्यकामा पनि जुन क्षेत्रमा धेरै थिग्रेनी ( सेडिमेन्ट) को तह छ त्यहाँ क्षति धेरै हुन जान्छ।
यसैगरी संरचना बनाउँदाको गलत डिजाईन, निर्माण सामाग्रीहरुको न्युन  गुणस्तर र कर्मीहरूको न्युन सिपले पनि क्षति बढाउँछ। सानो जग्गामा धेरै अग्लो घरहरू जगैदेखि उखेलिएको पनि देखिएका छन्। धेरै पर्खालहरु लडेका छन्। संरचना बलियो भए पनि सामानहरू खसेर पनि क्षति हुन जान्छ।
भुकम्पले पहिरो ल्याउन पनि सक्छ। यस्ता पहिरोहरुले खोला नदि थुनिन पनि सक्छ। यदि नदि थुनिएर बाँध बनेको छ भने त्यो फुटेर तल्लो तटमा ठूलो बाढी आउन पनि सक्छ। यदि नदिको बहाब घटेको छ भने नदि थुनिएको अनुमान गर्न सकिन्छ। हिमाली क्षेत्रमा हिमपहिरो पनि आउन सक्छ। यस्ता हिम पहिरोबाट पनि ठूलो बाढी आउन सक्छ।
धेरै ठूलो राष्ट्रिय क्षतिको समयमा सबै  सतर्क रहनुपर्छ, तर डराएर भाग्ने र आत्तिने गर्नु हुँदैन। आकस्मिक कार्यमा जुटेका ठाउँमा अनाबश्यक रुपमा रमिते भएर जानु पनि हुँदैन, यस्तो बेलामा भीडले कार्यगर्ने मानिसहरुलाइ बाधा पुर्‍याउँछ। पुरिएका मानिसहरु झिक्न र घरवारबिहिनहरुलाई सहयोग गर्नुपर्छ। मुख्य धक्का गईसकेको हुँदा चनाखो भई सुरक्षित बस्नु आबस्यक हुन्छ। यो राष्ट्रिय संकटको बेला हामीले गर्नुपर्ने सबै भन्दा ठूलो आपसी सहयोगको हो।
लेखक भुगर्वविद् हुन्।
प्रमुख तस्विरः गिरीश गिरी/सेतोपाटी

प्रकाशित मिति: आइतबार, बैशाख १३, २०७२ ०९:४९:५०

धेरै ठूलो राष्ट्रिय क्षतिको समयमा सबै  सतर्क रहनुपर्छ, तर डराएर भाग्ने र आत्तिने गर्नु हुँदैन। आकस्मिक कार्यमा जुटेका ठाउँमा अनाबश्यक रुपमा रमिते भएर जानु पनि हुँदैन, यस्तो बेलामा भीडले कार्यगर्ने मानिसहरुलाइ बाधा पुर्‍याउँछ। पुरिएका मानिसहरु झि​क्न र घरवारबिहिनहरुलाई सहयोग गर्नुपर्छ। मुख्य धक्का गईसकेको हुँदा चनाखो भई सुरक्षित बस्नु आबस्यक हुन्छ। यो राष्ट्रिय संकटको बेला हामीले गर्नुपर्ने सबै भन्दा ठूलो आपसी सहयोगको हो। विस्तृतमा

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भुगर्वविद्को आँखामा महाभुकम्प

श्रीकमल द्विवेदी 

थ्रष्ट, मेन बाउन्ड्री थ्रस्ट र हिमालयन फ्रन्टल थ्रष्ट हिमालयको समानान्तर रूपमा छन्। ति थ्रष्टहरूबाट चट्टान चिप्लेर छिर्ने क्रममा कुनै क्षेत्रमा अड्केर बस्छ। 
नियमित रूपमा छिर्दा शक्ति सञ्चय हुँदैन भने धेरै घर्षणको कारण लामो समय अड्किएको ठाउँमा धेरै शक्ती सञ्चय हुन जान्छ। यसरी वरपर चिप्लिएर छिर्ने तर कतै अड्कन जाँदा शक्ति सञ्चय भएको ठाउँ अकस्मात फुटेर चलायमान हुँदा उत्पति हुने कम्पन नै भुकम्प हो।
साधारण उदाहरणबाट यो अनुभव गर्न सकिन्छ। एउटा दाह्री काट्ने ब्लेडलाई दुई हातले समाएर बङयाउँदै जाउँ। ब्लेड बाङ्गिदै जाँदा त्यसमा शक्ति सञ्चय हुँदै जान्छ। एउटा बिन्दुमा पुगेपछि ब्लेड भाँचिन्छ, र भाँचिने क्रममा थर्कदै हातमा कम्पन महसुस हुन्छ। यस्तै प्रकृया चट्टानमा हुँदा भुकम्प जान्छ।
नेपालको काठमाडौं पश्चिमको भागमा २०० वर्षभन्दा बढी समयदेखि ठूलो भुकम्प गएको थिएन। यसलाई साइस्मीक ग्याप भनिन्छ। पूर्वी नेपालमा केन्द्र बिन्दु(उदयपुर) भएको बि.सं. १९९० (सन १९३४) मा ठूलो भुकम्प आएको थियो।
यसै गरी सुदूर पश्चिममा वा सँगै जोडिएको गड्बालमा केन्द्रबिन्दु भएको सन् १८०३ मा पनि ७.५ रेक्टर स्केलको भुकम्प गएको थियो। यसै गरी सन १९०५मा कांगडामा पनि ठूलो भुकम्प गएको थियो। यस अवस्थामा पनि काठमाडौं पश्चिमको भागमा धेरै लामो समयसम्म ठूलो भुकम्प नजाँदा भुगर्भविदहरूले ठूलो विनासकारी भुकम्प जाने पूर्वानुमान गरेका थिए। अहिले गएको भुकम्प त्यही “साईस्मिक ग्याप” मा गएको भुकम्प भएको अनुमान छ।
भुकम्प जाँदा मुख्य धक्का, त्यस अगाडि जाने पूर्व धक्का र पछि जाने धक्का वा आफ्टर शक्स हुन्छन्। कहिले काही मुख्य धक्का आउनु अगाडि साना साना धक्काहरू जाने गर्छन्। तर, बिना पूर्व-धक्का एकै पटक मुख्य धक्का पनि जान्छ। तर मुख्य धक्का पछि साना साना छोटो समयका धक्काहरु केही अन्तरालमा गईरहनु स्बभाविक हो।
यो प्रकृया केहि घण्टादेखि केहि दिनसम्म गइरहन सक्छ। प्रायः मानिसहरू यसैलाई भुईँचालो फर्केको भन्ने गर्छन्। धेरै समय अड्केर फुटेपछि चलेको धाँजामा केही समयसम्म चलाएमान हुनु स्बभाबिक भौगर्भिक प्रकृया हो। योपछि जाने धक्का वा आफ्टर शक्सहरूको पनि कुनै पूर्वानुमान गर्न सकिँदैन। यति बजे फेरि भुकम्प जान्छ भन्ने हल्ला मात्र हो।
ठूलो भुकम्पले भत्काएको घर वा चर्केको छ भने त्यस्तोमा बस्नु हुँदैन। ठूलो धक्काले चर्काएका संरचनाहरू पछि आउने साना धक्काले पनि भत्काउन सक्छ। तर मुख्य धक्कामा केही पनि क्षति नभएको घर छ भने खस्ने ढल्ने सामान नभएका कोठाहरूमा बस्दा केही हुँदैन। आत्तिएर भाग्दा बरू दुर्घटना हुन सक्छ।
भुकम्पको मापन गर्ने रेक्टर स्केल ‘लग स्केल’ प्रणालीबाट नापिने हुँदा ७.८ र ५.५ को शक्तिमा सयौं गुणा फरक हुन्छ। त्यसैले कमजोर कम्पनले ठूलो कम्पनले क्षति नगरेको संरचना भत्काउने सम्भावना धेरै कम हुन्छ।
काठामाडौं उपत्यका हजारौं वर्ष अगाडि ताल पुरिएर बनेको थेग्रिनीबाट बनेको छ। माटो बालुवाको तहमुनि चट्टान कतै कतै ५०० मिटरभन्दा तल छ। जति मोटो माटो बालुवाको तह छ त्यती नै बढि म्याग्निफिकेशन हुन्छ। उदाहरणको लागि कल्पना गरौं हामी बसमा बसेको छौं, यदि स्प्रिङको सिटमा बस्नु भएको छ भने बस चल्दा बढी लचक-लचक गर्दै  हल्लिन्छ, तर काठको सिटमा बस्दाको थर्काई कम हुन्छ। यसै गरी उपत्यकामा पनि जुन क्षेत्रमा धेरै थिग्रेनी ( सेडिमेन्ट) को तह छ त्यहाँ क्षति धेरै हुन जान्छ।
यसैगरी संरचना बनाउँदाको गलत डिजाईन, निर्माण सामाग्रीहरुको न्युन  गुणस्तर र कर्मीहरूको न्युन सिपले पनि क्षति बढाउँछ। सानो जग्गामा धेरै अग्लो घरहरू जगैदेखि उखेलिएको पनि देखिएका छन्। धेरै पर्खालहरु लडेका छन्। संरचना बलियो भए पनि सामानहरू खसेर पनि क्षति हुन जान्छ।
भुकम्पले पहिरो ल्याउन पनि सक्छ। यस्ता पहिरोहरुले खोला नदि थुनिन पनि सक्छ। यदि नदि थुनिएर बाँध बनेको छ भने त्यो फुटेर तल्लो तटमा ठूलो बाढी आउन पनि सक्छ। यदि नदिको बहाब घटेको छ भने नदि थुनिएको अनुमान गर्न सकिन्छ। हिमाली क्षेत्रमा हिमपहिरो पनि आउन सक्छ। यस्ता हिम पहिरोबाट पनि ठूलो बाढी आउन सक्छ।
धेरै ठूलो राष्ट्रिय क्षतिको समयमा सबै  सतर्क रहनुपर्छ, तर डराएर भाग्ने र आत्तिने गर्नु हुँदैन। आकस्मिक कार्यमा जुटेका ठाउँमा अनाबश्यक रुपमा रमिते भएर जानु पनि हुँदैन, यस्तो बेलामा भीडले कार्यगर्ने मानिसहरुलाइ बाधा पुर्‍याउँछ। पुरिएका मानिसहरु झिक्न र घरवारबिहिनहरुलाई सहयोग गर्नुपर्छ। मुख्य धक्का गईसकेको हुँदा चनाखो भई सुरक्षित बस्नु आबस्यक हुन्छ। यो राष्ट्रिय संकटको बेला हामीले गर्नुपर्ने सबै भन्दा ठूलो आपसी सहयोगको हो।
लेखक भुगर्वविद् हुन्।
प्रमुख तस्विरः गिरीश गिरी/सेतोपाटी

प्रकाशित मिति: आइतबार, बैशाख १३, २०७२ ०९:४९:५०