THE HIMALAYAN TALK: PALASH BISWAS TALKS AGAINST CASTEIST HEGEMONY IN SOUTH ASIA

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Tuesday, April 15, 2014

वाह रे कारपोरेट मीडिया का ‘लोकतंत्र’ ! मेक्सिको के कुछ सबक

वाह रे कारपोरेट मीडिया का 'लोकतंत्र' ! मेक्सिको के कुछ सबक

Posted by Reyaz-ul-haque on 4/15/2014 05:28:00 PM

पी. कुमार मंगलम का यह लेख मेक्सिको में चुनावों और प्रायोजित आंदोलनों तथा दलों के जरिए फासीवादी, जनविरोधी उभारों और जन संघर्षों को दबाने के साम्राज्यवादी प्रयोगों की रोशनी में भारत में पिछले कुछ समय से चल रही लहरों की (पहले 'आप' की लहर और अब मोदी की) पड़ताल करता है. एक जरूरी लेख.

नरेंद्र मोदी या फिर अरविंद केजरीवाल/राहुल गांधी (यहाँ  कभी अगर क्रमों की अदला-बदली होती है, तो वह आखिरकार मीडिया कुबेरों के स्वार्थोँ से ही तय होती है)? आजकल अगर आप दोस्तों-रिश्तेदारों, लोकतंत्र के अपने अनुभवों का रोना रोते बुजुर्गों और अतिउत्साहित 'नये' वोटरों को सुनें, तो बात यहीं शुरु और खत्म हुआ करती है। जब 2014 के लोकसभा चुनावों का दौर शुरू हो चुका है, तब सभी संभावित राजनीतिक विकल्पों की गहरी पड़ताल के बजाए पूरी बात का सिर्फ़ इन चेहरों पर टंग जाना क्या स्वाभाविक है! आदि-समाजवाद से लेकर 'ग्लोबलाईज़्ड' समय के बीच की खिचड़ी सच्चाइयों से निकलते अनेकों जनसंघर्षों के इस दौर में सिर्फ़ 'परिवार', 'संघ-परिवार' और "अपनी ईमानदारी" की 'उपलब्धि' लिए घूमते इन चेहरों का यूं छाया रहना तो और भी अचरज भरा है! हालांकि, अगर इन दिनों चारों ओर से आ रही 'पल-पल की खबरों' पर गौर करें, तो चुनावों के मीडियाई नियंत्रण की कड़ियाँ अपने-आप खुलने लगती हैं। साथ ही, दुनिया के 'सबसे बड़े' भारतीय लोकतंत्र का खोखलापन भी नजर आता है। वैसे, बात सिर्फ भारत की ही नहीं है। 'विकासशील' या फिर 'तीसरी दुनिया' का ठप्पा झेलते देशों में 'जनता का शासन' अक्सर न दिखने वाले या फिर दिखने में लुभाऊ लगने वाले ऐसे ही फंदों से जकड़ा है। यहाँ हम लातीनी अमरीकी देश मेक्सिको में जनतंत्र के पिछले कुछ दशकों के अनुभवों की चर्चा करते हुए अपनी बात स्पष्ट करेंगे।

मेक्सिको: हड़प लिए गए लोकतंत्र की त्रासदी

हम शायद ही कभी यह सोचते हैँ कि सिर्फ एक देश संयुक्त राज्य अमरीका का आम प्रयोग (हिदी में और ज्यादा) में अमरीका कहा जाना एक शब्द के गलत प्रयोग से कहीं ज्यादा है। जैसाकि समकालीन लातीनी अमरीकी लेखक एदुआर्दो गालेआनो का कहना है, यह इस एक देश (अब से आगे यू.एस.) के द्वारा अपनी दक्षिणी सीमा के बाद शुरू होते लातीनी अमरीका का भूगोल, इतिहास, संस्कृति और राजनीति हथियाकर इस पुरे क्षेत्र को "एक दोयम अमरीका" में बदल देने की पूरी दास्तान है। यहाँ हम इस भयावह सच के पूरे ताने-बाने और अभी तक चल रहे सिलसिले की बात तो नहीँ कर सकते, लेकिन मेक्सिको की बात करते हुए इसके कई पहलू खुलेँगे।

भूगोल के हिसाब से उत्तरी अमरीका मेँ होने और यू.एस. से बिल्कुल सटे होने के बावजूद मेक्सिको स्पानी भाषा और स्पानी औपनिवेशिक इतिहास के साथ सीधे-सीधे दक्षिणी अमरीका का हिस्सा है। इस जुड़ाव की सबसे अहम बात यह है कि 1810-25 के बीच स्पानी हुकूमत से बाहर निकले मेक्सिको, मध्य और दक्षिणी अमरीका के देशों (इन तीनों को मिलाकर बना क्षेत्र ही लातीनी अमरीका कहलाता है) में बोई गई सामाजिक-आर्थिक गैरबराबरी, धनिकोँ के राजनीतिक वर्चस्व और यू.एस. की दादागिरी की नर्सरी भी यही देश रहा है। बात चाहे इस 'आज़ादी' के बाद भी स्पेनवंशी क्रियोल और मिली-जुली नस्ल के स्थानीय पूँजीपतियों के पूरे देश के संसाधन, संस्कृति और सत्ता पर कब्जे की हो या 1844-48 में यू.एस द्धारा मेक्सिको की आधी जमीन लील लिये जाने की हो, मेक्सिको कल और आज के लातीनी अमरीका की कई झाँकिया दिखलाता है।

'आज़ाद' मेक्सिको की लगातार भयावह होती गैरबराबरियों के खिलाफ वहां के भूमिहीन किसानों और खान मजदूरोँ का गुस्सा 1910 की मेक्सिको क्रांति बनकर फूटा। हालांकि, बहुत जल्द ही ब्रिटिश, फ्रांसीसी और आगे चलकर यू.एस. के बाज़ार और पैसे पर पलते क्रियोल वर्ग ने बदलाव के संघर्षों को बर्बरता से कुचल डाला था। 1930 के दशक मेँ उत्तर के पांचो विया और दक्षिण मेँ चियापास क्षेत्र के एमिलियानो सापाता जैसे क्रांतिकारी नेताओं की हत्या कर बड़ी पूँजी और सामाजिक भेदभाव की शक्तियों ने पूरे राज्य तंत्र पर कब्जा कर लिया था। 1929 में राष्ट्रपति रहे प्लूतार्को कायेस ने पीआरआई (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन इंस्तितुसियोनाल-व्यवस्थागत क्रांति का दल) बनाकर इन शक्तियों को संगठन और वैचारिक मुखौटा दिया। जैसाकि नाम से ही जाहिर है, यह पार्टी क्रांति के दौर में जोर-शोर से उठी समानता और न्याय की मांगों[1] को एक अत्यधिक केंद्रीकृत राष्ट्रपति प्रणाली वाली व्यवस्था में दफनाने की शुरुआत थी। 

प्लुतार्को कायेस के बाद आए सभी राष्ट्रपतियों ने जनआकांक्षाओं का गला घोंटने वाली इस व्यवस्था को मजबूत किया। मजेदार बात यह कि यह सब लगातार जनता के नाम पर, लोकप्रिय नायकों की मूर्तियां वगैरह बनवाकर तथा लोकगीतों-लोककथाओं के कानफोड़ू सरकारी प्रचार के साथ-साथ किया गया! यह भी बताते चलें कि मूलवासियों सहित अन्य वंचित तबकों की कीमत पर विदेशी पूंजी का रास्ता बुहारती पीआरआई सरकारें यू. एस. शासन-व्यवस्था की सबसे करीबी सहयोगी बन गईं थी। आश्चर्य नहीं कि जब 1950 के दशक में हालीवुड में "कम्युनिस्ट" कहकर चार्ली चैपलिन जैसे कलाकारों को निशाना बनाया जा रहा था, तब वहां के सरकारी फिल्मकारों ने मेक्सिको क्रांति के नायकों को खलनायक दिखा कई फिल्में ही बना डाली! 1953 में आई एलिया काज़ान की ऐसी ही एक फिल्म में चियापास के भुमिहीन किसानों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता को बातूनी और छुटभैया गुंडा बना दिया गया था! 

'आज़ाद' मेक्सिको के आर्थिक-राजनीतिक हालातों की कुछ बारीकियाँ 1947 के बाद के भारत को समझने में मदद करती हैं। मसलन, जहां मेक्सिको में औपनिवेशिक अर्थव्यवस्था, सत्ता और समाज में हावी रहे क्रियोल वर्ग ने नए निज़ाम पर जबरन कब्जा किया, वहीं भारत में अंग्रेजी राज से उपजे सवर्ण जमींदार 1947 के बाद "देशभक्ति" और खादी ओढ़कर पूरी व्यवस्था पर पसर गए! फिर, जहां मेक्सिको में शासक वर्गों ने पीआरआई का लुभावना सरकारी मुखौटा तैयार किया, वहीं 'आज़ाद' भारत की कांग्रेस ब्राह्मणवादी सामंतों के हाथों कैद होकर रह गई थी। यह जरूर है कि मेक्सिको में चियापास के मूलवासियों सहित भूमिहीनों-छोटे किसानों पर खुलेआम चली राजकीय हिंसा (जिसकी जड़ें अत्यधिक हिंसक औपनिवेशिक इतिहास में हैं) के बरअक्स भारत में यह हिंसा 'लोकतंत्र', 'विकास' और 'राष्ट्रवाद' के दावे से दबा दी जाती रही है। स्वरूप जो भी रहा हो, पूरी व्यवस्था पर गिनती के शोषक वर्गों के कब्जे ने दोनों ही देशों की बड़ी आबादी को अपनी ही जमीन पर तिल-तिल कर खत्म होने को मजबूर किया। इस पूरी प्रक्रिया में अपनी जीविका, भाषाओं और संस्कृतियों पर रोज 'विकास' के हमले झेलते भारत और मेक्सिको के मूलवासी बहुल क्षेत्र "सत्ता-केंद्र से पूरी योजना के साथ थोपे गये पिछड़ेपन" की जीती-जागती मिसाल बने (विलियम्स 2002)। वैसे,1991 के बाद से 'जनहित' के नाम पर बड़ी राष्ट्रीय-अंतर्राष्ट्रीय कंपनियों के लिए खुलकर किसानों-मजदूरों की जमीन और रोजगार छिनते भारतीय लोकतंत्र का 'मानवीय' मुखौटा अपने-आप उतर गया है। इस पूरे दौर की एक खास बात यह रही है कि बड़े मीडिया समुह नव-उदारवादी नीतियों के सबसे बड़े पैरोकार बन पूरे देश में इन्हें लागू करने वाले दलों को एकमात्र राजनीतिक विकल्प बना कर पेश कर रहे हैं। 'ग्लोबल' कहकर खुद पर इठलाती कारपोरेट मीडिया के इस गोरखधंधे को समझने के लिये भी मेक्सिको एक अच्छा उदाहरण है, जो वैश्वीकरण की उलटबासियाँ  काफी पहले से झेल रहा है। 

मेक्सिको: वैश्वीकरण और मीडियाक्रेसी का मकड़जाल

यू. एस. से सटे होने के कारण मेक्सिको और फिर मध्य अमरीकी देश वैश्वीकरण के पहले शिकारों में रहे हैं। 'उदारीकरण' 'आर्थिक सुधार' आदि का लुभावना चेहरा देकर वैश्वीकरण की जो नीतियां आज पूरी दुनिया में लागू की जा रही हैं, मेक्सिको काफी पहले से उन सबकी प्रयोगशाला रहा है (शायद यहीं से यह कहावत भी निकलती है: मेक्सिको, भगवान से इतना दूर और यू.एस. के इतना करीब!)। एक और खास बात यह कि लातीनी अमरीका के ज्यादातर देशों के उलट, जहां नव-उदारवादी नीतियां भयानक तानाशाहियों के द्धारा थोपी गईं [2], मेक्सिको में देश बेचने का काम छ्ह साला चुनावों के साथ और संसाधनों की लूट का हिस्सा मध्यवर्ग में बांटकर किया गया। हालांकि, 1980 के बीतते-बीतते शोषित तबकों को हथियार और कभी-कभी 'भागीदारी' के सरकारी झुनझुने तथा मध्यवर्ग को 'राष्ट्रवाद' और 'विकास' के दावे से साधते रहने की पीआरआई की रणनीति चूक गई थी। तब, जहां महंगाई और मेक्सिकन मुद्रा पेसो की कीमत में भारी गिरावट से कंगाल हुए उच्च और मध्य वर्ग सरकार को नकारा घोषित कर रहे थे, वहीं सालों की लूट और अनदेखी से बरबाद आबादी का बड़ा हिस्सा अपने आंदोलन खड़ा कर रहा था। 

1988 के राष्ट्रपति चुनावों में वंचित तबकों के जमीन और जीवन की मांगों को साथ लेकर तेउआनतेपेक कार्देनास पीआरडी (पार्तिदो दे ला रेवोलुसियोन देमोक्रातिका-लोकतांत्रिक क्रांति का दल)  के झंडे के साथ पीआरआई उम्मीदवार कार्लोस सालिनास गोर्तारी के खिलाफ़ लड़े। व्यापक जनसमर्थन और जबरदस्त लोकप्रियता, कार्देनास के पिता पूर्व समाजवादी राष्ट्रपति लासारो कार्देनास थे, के बावजूद वे चुनाव हार गए। जीत और हार का बहुत कम फासला किसी राजनीतिक उलटफेर से नहीं, बल्कि सोची-समझी सरकारी साजिश से तय हुआ था। इलेक्ट्रॉनिक मतों की गिनती में कार्देनास शुरू से आग चल रहे थे कि ठीक आधी रात को मशीनें 'अचानक' खराब हो गईं। और जब उन्हें 'ठीकठाक' कर अगली सुबह नतीजों का एलान किया गया, तो कार्देनास राष्ट्रपति के बजाय राष्ट्रपति के भूतपूर्व उम्मीदवार बन चुके थे! लोकतंत्र के खुल्लम-खुल्ला अपहरण में इस बार सरकारी भोंपू बने बड़े मीडिया ने 1994 के चुनावों में अपनी भूमिका निर्णायक रूप से बढ़ा ली थी। तब, पहले से ज्यादा संगठित पीआरडी की चुनौती को एक-दूसरे का पर्याय बने पीआरआई और राज्यसत्ता (जैसे अपने यहां कांग्रेस/बीजेपी/संस्थागत 'वाम' और सरकार) तथा सबसे बड़े मीडिया समूह तेलेवीसा ने मिलकर खत्म कर डाला था। श्रम 'सुधार' और 'उदार' कर-व्यवस्था के नाम पर पूरी तरह से यू.एस. का हुक्म बजाते नाफ्टा [3] करार पर पीआरआई की बलैयाँ  लेने वाली तेलेवीसा ने अपने कारनामों से जनमत सरकार के पक्ष में या ठीक-ठीक कहें तो पीआरडी के खिलाफ़ मोड़ दिया था।

सबसे पहले, तेलेवीसा ने अपने बड़े नेटवर्क और उसपर आम लोगों के भरोसे को भंजाते हुए पीआरआई उम्मीदवार एर्नेस्तो सेदियो को अन्य उम्मीदवारों के मुकाबले 10 गुना ज्यादा प्रचार दिया। फिर, पीआरआई विरोधी मतों को बांटने के लिए 1980 में खड़ी हुई कट्टर कैथोलिक रुझानों वाली पार्टी पीएएन (पार्तिदो दे ला आक्सियोन नासियोनाल- राष्ट्रीय कारवाई का दल) को पीआरडी से ज्यादा तवज्जो देकर 'विपक्ष' बनाया गया। इतना ही नहीं, पीआरडी की राजनीतिक चुनौती को कुंद करने के लिए बिल्कुल उसी के सुर में मजदूर-किसान हित और व्यवस्था परिवर्तन की बात करने वाली पीटी (पार्तिदो दे लोस त्राबाखादोरेस-मजदूर दल) को रातों-रात सनसनीखेज तरीके से देश का 'हीरो' बना दिया गया! यह और बात है कि इस पार्टी का न तो पहले कभी नाम सुना गया था और न ही देश में इसका कोई संगठन था! यह सब करते हुए बाकी खबरें (हां, कहने के लिए तो वे खबरें ही थी!) भी पीआरआई की जीत के हिसाब से तय हो रहीं थी। मसलन, चुनाव से ठीक पहले सर्बिया-बोस्निया गृहयुद्ध और दूसरे देशों के अंदरूनी झगड़ों को बार-बार बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया। इशारा साफ था, अगर मेक्सिको को टूटने या कमजोर होने से बचाना है, तो देशवासियों को 'अनुभवी' और 'सबको साथ लेकर चलने वाली' पीआरआई का साथ देना ही चाहिए! यहां पीआरडी, जिसके हजारों कार्यकर्ता सरकारी हिंसा का शिकार हुए, और चियापास में भूमिहीन मूलवासियों के हथियारबंद सापातिस्ता आंदोलन को बतौर 'खलनायक' पेश किया गया।   

तेलेवीसा की अगुआई में बड़ी मीडिया की इन सब कलाबाजियों का नतीजा पीआरडी की एक और हार तथा पीआरआई की 'जीत' के रूप में सामने आया। पहले से ही विदेशी पूंजी पर टिके और नाफ्टा में प्रस्तावित कर 'सुधार' आदि से अपनी कमाई कई गुना बढ़ाने को आतुर बड़ी मीडिया ने इस जीत को को तुरत-फुरत 'ऐतिहासिक' भी बता दिया था! वैसे इस जीत का असली खिलाड़ी तो सिर्फ रेफरी होने का ढोंग कर रहा यही मीडिया था, जिसने अपनी और अन्य धनकुबेरों की बेशुमार दौलत की खातिर मुनाफे की एक और सरकार बनवा दी थी। यहां बताते चलें कि पीआरआई के लिए चंदे की खातिर रखे गए सिर्फ़ एक रात्रि-भोज के दौरान 750 मिलियन डालर (करीब 45 सौ करोड़ रु.) जुटाए गए, जिसमें 70 मिलियन डालर (करीब 4 सौ 27 करोड़ रू.) तो तेलेवीसा के मालिक एमीलीयो इसकारागा ने ही दिए थे!

लैटिन अमेरिका इन क्राइसिस (संकटग्रस्त लातीनी अमरीका) के लेखक जान डब्ल्यू शेरमान ने मेक्सिको में बडी मीडिया के द्वारा रचे गए 'लोकतंत्र' के इस नाटक को 'मीडियाक्रेसी' कहा है। इस 'मीडियाक्रेसी' में आबादी के बड़े हिस्से की सोच पर हावी एक या एक से अधिक कॉरपोरेट मीडिया, जैसे मेक्सिको में तेलेवीसा, अपने फायदे की सरकार बनाते-गिराते रहते हैं। यहां इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि सत्ता में कौन सी पार्टी आ रही है, बस इस बात का पूरा ध्यान रखा जाता है कि जो भी आए इस मीडिया के काम आए! अपने मतलब के लिए सत्तासीन पार्टियों की अदला-बदली तो यहां की खास रवायत है! साल 2000 आते-आते मेक्सिको यह सब कुछ देख चुका था, जब राष्ट्रपति चुनावों में जीत का सेहरा पीआरआई के बजाय पीएएन के सिर बांधा गया। धार्मिक कट्टरता के अपने सभी दावों को बड़ी चालाकी से छुपा पीएएन अब बाजार की सबसे बड़ी हिमायती पार्टी बन गई थी और देश को नए राष्ट्रपति के रूप में कोका-कोला (मेक्सिको) के मुखिया रहे विसेंते फाक्स का ब्रांडेड तोहफा दिया था! 

निष्कर्ष: भारत और मीडियाक्रेसी की 'लहरें'

चुनावों से ठीक पहले ज्यादातर टी.वी. और अखबार मोदी तथा उनके मनपसंद प्रचार-हथकंडों, जैसे गुजरात में 'विकास' की विडंबनाओं पर घुन्ना चुप्पी और आतंकवाद (मतलब आई. एम. मतलब मुसलमान!) की तोतारटंत, से सज गए हैं। पूरी दुनिया का 'सच' "सबसे पहले" बताने-दिखाने का दावा करने वाली बड़ी मीडिया भला "हर-हर मोदी" के उन्माद में बौड़ाए संघी लगुओं-भगुओं-सा व्यवहार क्यों कर रही  है! वैसे, कल तक यही मीडिया अस्सी-नब्बे के दशक से नेहरुवादी समाजवाद का अपना ही बुना भ्रमजाल (जिसमें चलती स्थानीय जमींदारों-पूंजीपतियों की ही थी) तोड़कर बाजार के 'मनमोहनी' छ्लावे बेचती कांग्रेस पर फिदा था। हो भी क्यों न, 'खबर' बेचने के अपने कारोबार में ठेका-प्रथा और अधिकतम काम के लिए कम-से-कम पगार जैसे उदारीकरण के 'वरदानोँ' का सबसे ज्यादा फायदा भी तो इसी मीडिया ने उठाया है! और आज जब शोषण और लूट की इन्हीं सब नीतियों के लिए मनमोहन सिंह "अंडरएचीवर" बन चुके हैं, तब यह मीडिया पूरी पेशेवर सफाई और 'निष्पक्षता' से कारपोरेट पूंजी के नए, 'सख्त', 'कठोर' आदि, आदि...सेवक बने नरेंद्र मोदी के साथ हो लिया है! 

यहां मेक्सिको के जिन अनुभवों को रखा गया है, उनकी नजर से देखें तो कांग्रेस से बड़ी मीडिया का इस तरह किनारा कर लेना ज्यादा बेहतर तरीके से समझा जा सकता है। मसलन, मेक्सिको के पीआरआई की तरह कांग्रेस भी जहाँ सत्ता के सभी खुले-छुपे हिस्सों पर वर्षों की अपनी पकड़ के बावजूद (या शायद इसी वजह से) वंचित तबकों के बुनियादी मुद्दे हल नहीं कर सकी, वहीं लोकप्रिय दिखने की चुनावी मजबूरियों के चलते वह आज कॉरपोरेट मुनाफे को खुली छूट भी नहीं दे सकती। इस तरह, 'विकास' और 'सबका साथ' के दावों के अपने ही अंतर्विरोधों में टूटी-फूटी यह पार्टी सिर्फ मुनाफे के लिए 'प्रतिबद्ध' बड़ी पूंजी की पहली पसंद नहीं रह गई है। वहीं, एकमुश्तिया वोट बटोरने के अपने हिंदू सांप्रदायिक एजेंडे को कारपोरेटी विकास की चकमक चाशनी में पेश करते मोदी बड़ी मीडिया के लिए ज्यादा जिताऊ-बिकाऊ खिलाड़ी (जैसे मेक्सिको में पीएएन) बन चुके हैं! 

आजकल (या कम से कम मोदी को सीधे-सीधे चुनौती देने तक) बड़ी मीडिया की लाडली बनी आम आदमी पार्टी के हो-हल्ले के पीछे झांके, तो लोकतंत्र पर भारी पड़ते पूँजी का खेल यहाँ भी दिख जाता है। सबसे पहले, सिर्फ़ पैसों के हेरफेर को भ्रष्टाचार समझने के चलताऊ नजरिए से लैस 'आप' ने भ्रष्टाचार की टी.वी. पर नहीं दिखने वाली, लेकिन हमारी पूरी व्यवस्था की जड़ में बैठी सच्चाइयों (आबादी का बड़ा हिस्सा भूमिहीनों का है, जिसमें ज्यादातर दलित हैं) से लोगों का ध्यान हटा दिया है। फिर, इतिहास की कई नाइंसाफियों की उपज ऐसी सच्चाइयों को 'सामान्य' समझने-समझाने वाले हमारे समाज के बड़े हिस्से को बिना कोई जनांदोलन खड़ा किए 'ईमानदार' होने और व्यवस्था 'बदलने' का फास्टफुडिया इल्हाम भी दे दिया गया है! यह तब जब दलितों-मुसलमानों-स्त्रियों सहित व्यवस्था के सभी शिकारों पर 'आम आदमी' के इस पार्टी का रवैया बिल्कुल सतही और आखिरकार शोषक सत्ताओं और विचारों को ही आगे बढ़ाने वाला है। मसलन, औरतों के सवालों को उनकी पूरी सामाजिक-सांस्कृतिक  गहराई में उठाने की बजाय यहाँ इन सवालों का निशाना रही पुरुषसत्ता को ही "महिलाओं की कमांडो फोर्स" का नया हथियार दे दिया गया है! वहीं, धार्मिकता, पूरी राजनीतिक व्यवस्था और पुलिस आदि के जरिए वार करती सांप्रदायिकता पर सीधी बहस न खड़ी कर इसे सिर्फ़ मोदी विरोध और मुसलमानों को बेहतर शिक्षा और रोजगार के अभी तक चल रहे सरकारी छलावे के चुनावी तोतारटंत के भरोसे छोड दिया गया है। लोकतंत्र के तमाम दावों के बावजूद आप का अंदरूनी ढाँचा (जिसमें चलती सिर्फ़ पोस्टर ब्वाय अरविंद केजरीवाल और उन्हीं के चुने कुछ टेक्नोक्रेट लोगों की ही है) और स्वराज का इसका मंत्र (जहां सर्वशक्तिशाली लोकपाल न तो जनता द्वारा चुना जाएगा और न ही उसकी कोई जन-जवाबदेही होगी) भी भागीदारी और जनवाद के लिए कोई अच्छा संकेत नहीं देते। 

इस तरह, सत्ता के अत्यधिक केंद्रीकरण तथा पूँजीपतियों के ही हित साधने वाली मौजूदा आर्थिक नीतियों पर पूरी सहमति (याद करें केजरीवाल के "अच्छे" उद्योगपतियों के 'बिजनेस' में दखल न देने की वह चारों तरफ छापी गई टिप्पणी!) के साथ 'आप' 'मुख्यधारा' की राजनीति के लिए कोई खतरा नहीं है। बल्कि, आज कॉरपोरेट व्यवस्था के लिए भी चंद नामों पर चलती और और देश के अलग-अलग हिस्सों से रोजाना उठ रही प्रतिरोध की अनगिनत आवाजों से कोई भी गहरा जुड़ाव न रखने वाली यह पार्टी एक वफादार और 'ईमानदार' 'विरोधी' बन रही है।आश्चर्य नहीं कि इसी व्यवस्था की जय-जयकार करती बड़ी मीडिया, जो जनांदोलनों को "अराजक", "माओवादी" आदि बताकर खबरों से गायब कर दिया करती है, शुरू से ही 'आप' को चमका-दमका कर खड़ा करती आई है (बहुत-कुछ मेक्सिको के पीटी की तरह)! यह जरूर है कि जबर्दस्त संगठन और हिंदुत्व के वोटखींचू ताकत की वजह से लोकसभा चुनावों से पहले भाजपा इस मीडिया से 'आप' से ज्यादा तरजीह पा रही है, लेकिन आने वाले दिनों में जब मोदी का खूनी चेहरा रोज नए ग्राहक ढूँढ़ती बड़ी पूँजी के काम का नहीं रहेगा, तब 'साफ-सुथरी' 'आप' को दुबारा हीरो बनते देर नहीं लगेगी!

कुल मिलाकर, चौबीसो घंटे की प्राईम टाईम खबर बने मोदी (जिनकी रैलियों और वहां जुटाई गई भीड़ को कई-कई कैमरों से बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया जा रहा है), फिलहाल सिर्फ़ विज्ञापनों की तरह बीच-बीच में दिखाए जाते केजरीवाल और छोटू बना दिए गए कांग्रेस और अन्य दलों के साथ बड़ी मीडिया लोकतंत्र का एक और "महापर्व" रचने मॆ जुट गई है। हालांकि, इस महापर्व को रचने-बेचने के लिए महाभारत और दबंग के नायकों (सभी मर्द और सवर्ण!) की आदि हो चुकी जनता को मुट्ठी बाँधे, लड़ने को तैयार मोदी और केजरीवाल/राहुल दिखाकर इनके "सीधे मुकाबले" का भुलावा भी दिया जा रहा है! और, मेक्सिको की ही तरह यहाँ भी 'भविष्य' के इन चेहरोँ की नूराकूश्ती मेँ हमारे जल-जंगल-जमीन को डकारते बडी पूँजी के खतरे पर कहीँ कोई बात नहीँ होती!


टिप्पणियां:

1. इन मांगों को उनकी पूरी गहराई और तफ़सील में मेक्सिको की दीवारों पर दर्ज करने का काम दिएगो रिबेरा, दाविद सिकिएरोस और उनके साथियों ने किया। 

2. दुनिया में पहली बार लोकप्रिय समर्थन से चुनी गई साल्वादोर आयेंदे की साम्यवादी सरकार के 1973 में तख्तापलट के साथ चिली इन देशों का सबसे कुख्यात उदाहरण बना। यू.एस. के तब के विदेश मंत्री किसिंगर ने कहा था: "हम चुपचाप हाथ पर हाथ धरे नहीं बैठेंगे, जब चिली की जनता की गैर-जिम्मेदारी से वहां कोई कम्युनिस्ट सरकार आ जाए"! 1973 में चिली के तानाशाह बने आगोस्तो पिनोचे यू.एस. के हथियारों और सैनिकों के बल पर ही सत्ता हथिया पाए थे।

3.  North Atlantic Free Trade Agreement: उत्तर अटलांटिक मुक्त व्यापार संगठन 1 जनवरी, 1994 को यू.एस., मेक्सिको और कनाडा को शामिल करते हुए अस्तित्व में आया। ठीक इसी दिन भूमिहीन मूलवासियों के योद्धा रहे एमिलियानो सापाता के नारों को उठाते हुए चियापास के जंगलों और गलियों पर एकदम से छा जाने वाले सापातिस्ता फ्रंट के लड़ाकों ने इस तारीख को सचमुच ऐतिहासिक बना दिया था। सापाता के ये नए साथी गुलामी की नई शर्तें थोपने वाले इस करार को रद्द करने के साथ-साथ मेक्सिको की पूरी शासन व्यवस्था को बदलने के लिए भी लड़ रहें हैं।


संदर्भ सूची:

Canclini, Garcia Nestor. Hybrid Culture: Strategies for Entering and Leaving Modernity. Minneapolis, London: University of Minnesota Press. 1995.

Galeano, Eduardo. Memoria del fuego (II): las caras y las mascaras. Madrid: Siglo Veintiuno de España Editores. 1984.

Galeano, Eduardo. Upside Down: A Primer for the Looking Glass World(translation by Mark Fried). New York: Metropolitan Books. 2000

Sherman, W. John. Latin America in Crisis. Colorado: Westview Press. 2000.

Williams, Gareth. The Other Side of the Popular. Durham & London: Duke University Press. 2002

आखिर क्यों है बंगाल अपराधियों के लिए जन्नत?क्यों मुठभेड़ को आखिरी विकल्प मानने लगे हैं अफसरान?

आखिर क्यों है बंगाल अपराधियों के लिए जन्नत?क्यों मुठभेड़ को आखिरी विकल्प मानने लगे हैं अफसरान?

एक्सकैलिबर स्टीवेंस विश्वास



आखिर क्यों है बंगाल अपराधियों के लिए जन्नत?


क्यों मुठभेड़ को आखिरी विकल्प मानने लगे हैं अफसरान?


क्योंकि बंगाल में  अपराधकर्म  पर कोई अंकुश  नहीं है!अपराधी गिरोह बाकायदा प्रतिष्ठानिक और संस्थागत हैं बंगाल में। हर गैरकानूनी काम का ठेका उन्हें ज्यादातर राजनैतिक दलों से मिलता है!ऊपर से पुलिस के भी हाथ बंधे हुए है।


राजनीतिक संरक्षण की वजह से अपराधी खुलेआम आजाद घूमते हैं।राजनीतिक मंचों पर शिखरस्थ राजनेताओं के साथ अमूमन मौजूद अपराधियों को छूने की भी जुर्रत नहीं कर पाता पुलिस प्रशासन।


आपराधिक गिरोहबंदी बाकायदा राजनीतिक संस्कृति बन गयी है और कानून के रखवालों का हौसला पस्त है।


अपराध को रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण होता है डर। अब पुलिस महकमे में इस बात की खास चर्चा है कि बंगाल में एंकाउंटर होता ही नहीं है। कानूनी प्रक्रिया में जहां अपराध पर अंकुश लगाना बेहद पेचीदा है और राजनीतिक हस्तक्षेप से अपाऱाधी आसानी से छूट भी जाते है,वहां मुठभेड़ के अलावा कोई दूसरा विकल्प है ही नहीं।


बंगाल में राजनीतिक वर्चस्व से आम जनता और उद्योग कारोबार की हालत जो है ,वह है,लेकिन इससे सीधे तौर पर पुलस प्रशासन का हौसला पस्त हो रहा है।कानून व्यवस्था के जिम्मेदार लोगों को जब आत्मसम्मान और प्रतिष्ठा तिलांजलि देकर आपराधिक तत्वों के साथ घुटने टेकने पड़े,तो कम से कम आईपीएस और आईएएस कैडर के लोगों को फिर मुंबई में गैंगस्टार सफाये की एंकाउंटर पद्धति इस मकड़जाल से निकलने की एकमात्र राह दिखायी देती है।


वैसे बंगाल में एंकाउंटर पद्धति का प्रयोग नहीं हुआ है,ऐसा कहना भी इतिहास से मुंह चुराना होगा।मुंबई में माफिया गिरोह के खिलाफ एंकांउटर शुरु होने से काफी पहले, गुजरात और यूपी के एंकांउटर बूम धूम से भी पहले खालिस्तानी आतंकवाद के खिलाफ बंगाल के ही सिर्द्धार्थ शंकर राय के निर्देशन में केपीएस गिल ने मुठभेड़ को सर्जिकल पद्धति से अंजाम दिया है।


गौरतलब है कि मौलिक मुठभेड़ संस्कृति भी सिद्धार्थ शंकर राय और उनके तत्कालीन पुलिस मंत्री और इस वक्त मां माटी मानुष सरकार के पंचायतमंत्री सुब्रत मुखर्जी का आविस्कार है,जिसके जरिये बंगाल भर में लोकप्रिय जनविद्रोह नक्सलबाड़ी आंदोलन में घुसपैठ के जरिये पहले गैंग वार के परिदृश्य रचे दिये गये और एक के बाद एक सारे के सारे नक्सली मार गिराये गये।


हाल में इसी मां माटी मानुष की सरकार ने भी परिवर्तन के बाद माओवादी नेता किशनजी को मुठभेड़ में मार गिराने में सफलता अर्जित की।


विडंबना यह है कि राजनीतिक हस्तक्षेप से मुठभेड़ को अपराध से निपटने की सर्वश्रेष्ठ पद्धति मानने वाले पुलिसवाले यह तथ्य सिरे से भूल रहे हैं कि मुठभेड़ संस्कृति भी राजनीतिक वर्चस्व की ही सुनहरी फसल है।


राजनीतिक फायदे के लिए ही हस्तक्षेप के बदले मुठभेड़ के तौर तरीके अपनाती हैं सरकारें और इस महायज्ञ में भवबाधा की स्थिति में इसी यज्ञ में पुर्णाहुति भी अंततः पुलिस और प्रशासनिक अफसरों की दे दी जाती है।


ऐसा मुंबई में अक्सर होता है।गुजरात और यूपी में होते रहे हैं।बंगाल में तो खूब हुआ है,पंजाब में भी बखूब।कश्मीर में तो रोज हो रहा है और उत्तरपूर्व में रोजमर्रे की जिंदगी है मुठभेड़ संस्कृति।


फिर भी न कहीं अपराधकर्म पर अंकुश लगा है और न दो चार अपराधियों को मुठभेड़ में मार गिरा देने से कानून और व्यवस्था की स्थिति सुधरती है और न राजनीतिक हस्तक्षेप से रोज मर मर कर जीने की अफसरान की तकदीर बदलती है।


Monday, April 14, 2014

पूंजीवादी शोषण प्रणाली को चलाने में मददगार होता है जातीय उत्पीड़न

पूंजीवादी शोषण प्रणाली को चलाने में मददगार होता है जातीय उत्पीड़न

पूंजीवादी शोषण प्रणाली को चलाने में मददगार होता है जातीय उत्पीड़न

HASTAKSHEP

अम्बेडकर के 'जाति का खात्मा' पर परिचर्चा के संदर्भ में- भाग-2

पार्थ सरकार

'जात पात तोड़क मंडल' के सम्मेलन में अपने प्रस्तावित अध्यक्षीय भाषण में अम्बेडकर इस बात को रेखांकित करते हैं कि क्या सामाजिक सुधार के पहले हम राजनीतिक सुधार कर ले सकते हैं। उनका कहना था कि ऐसा नहीं हो सकता। जातीय विषमता के साथ स्वतंत्रता प्राप्ति की बात पर उन्होंने प्रश्नचिन्ह उठाया था। इस पर हमारे वक्ता ने कहा कि सामाजिक सुधारों की बात करना जरूरी तो था लेकिन एक कम्युनिस्ट होने के नाते सामाजिक सुधार व राजनीतिक सुधार के बीच कोई वरीयता वाली बात से वे सहमत नहीं हैं। कम्युनिस्ट लोग क्रांतिकारी मुकाम को हासिल करने के क्रम में सामाजिक सुधारों को भी अंजाम देते हैं और उसके लिए संघर्ष चलाते हैं, मसलन- बिहार में इज्जत की लड़ाई लड़ी गई या अन्य जगहों पर जाति विरोधी आंदोलन चलाए गए। राजनीतिक सत्ता लेने के बाद हम उन सारी चीजों को करते हैं जो सत्ता लिए बिना नहीं कर सकते। दलितों को समानता का हक दिलाने में उस समय 'जमीन जोतने वालोंका नारा बहुत ही कारगर होता। यह बिना क्रांतिकारी बदलाव का नहीं हो सकता था और क्रांति राजनीतिक सत्ता लेने के साथ सम्बंधित है

¹यहां हम इस बात का जिक्र कर देना चाहेंगे कि हर कम्युनिस्ट पार्टी के पास एक न्यूनतम कार्यक्रम होता है और एक अधिकतम कार्यक्रम होता है। इसके अलावा वह अपने लिए फौरी कार्यभारों का भी फेहरिस्त रखता है। कई चीजों को क्रांति द्वारा ही हल किया जा सकता है, जैसे 'जमीन जोतने वालों' की बात हमने कही (इस नारे के मुकम्मल अर्थ में न कि गैर-मजरूआ व सीलिंग से फाजिल जमीन के बंटवारे में। हम यहां जमीन के मुकम्मल फनर्वितरण की बात कर रहे हैं)। यह राजनीतिक सत्ता के साथ जुड़ा हुआ है और नए सामाजिक-आर्थिक परिस्थितियों के निर्माण के साथ जुड़ा हुआ है। तो जो जातीय शोषण-उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष हो सकते थे उन्हें किसी भी कम्युनिस्ट पार्टी को अपने फौरी कार्यभारों में लेना चाहिए था और हम कह सकते हैं कि कई कार्यभारों को लिया गया जिससे जातीय उत्पीड़न पर चोट किया गया। इसीलिए हमारे लिए सामाजिक सुधार और राजनीतिक सुधार के बीच वैसी कोई तीखी क्रमबद्धता नहीं है जैसा कि अम्बेडकर रखते हैं। यहां कह देना चाहिए कि सामाजिक सुधारों के बारे में उस समय के कांग्रेस के नेताओं के विचारों के बारे में हम कोई अच्छा मत नहीं रखते और उनकी इसके प्रति उदासीनता को समझ सकते हैं। यहां फिर हम अम्बेडकर की चिन्ता को समझ सकते हैं और वहां तक वे बिल्कुल जायज बात कह रहे थे।

जाति जिन मौजूदा रूपों में अपने को अभिव्यक्त करती है उसका भारत के विकास के रास्ते से सम्बंध है। भारत ने कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं देखा। यहां पूंजीवाद का विकास धीमी, क्रमिक गति से हुआ जिसने यहां के मेहनतकशों के लिए अपार दुःख लाया। इसे हम मार्क्सवादी-लेनिनवादी लहजे में पूंजीपति-जमींदार रास्ता कहते हैं या जर्मनी के का जो प्रांत ऐसे विकास का प्रतीकी उदाहरण रहा है उसके नाम पर प्रशियाई रास्ता (Prussian Path)  कहते हैं। यह रास्ता पुराने (अर्ध-सामंती) बंधनों को धीरे-धीरे चटकाता है और उन्हें पूंजीवादी तर्ज पर ढाल भी देता है। जाति के साथ ऐसा ही हुआ। जातीय दर्जेबंदी के आधार पर जो जमीन की मिल्कियत थी वह कमोबेश बनी रही। भूमिहीन दलित जातियां बंधनों से मुक्त तो हुई लेकिन उनका अधिकांश हिस्सा मजदूर बना। इसी तरह से जातीय गोलबंदी का फायदा चुनावों में और व्यवसाय में लिया गया जिसकी चर्चा कर दी गई है। आरक्षण के द्वारा भी जातियों में वर्ग विभेद पैदा हुए। इन बदलावों में क्रमिक रूप से यह भी हुआ कि भारत में जमीन की मिल्कियत धीरे-धीरे पिछड़ी जातियों के हाथों में आती जा रही है और वे गांवों में नया मालिक वर्ग बन रहे हैं। जाति श्रम-विभाजन का अनमनीय रूप रहा है। इसीलिए जातीय श्रम-विभाजन को तोड़ दूसरे श्रम विभाजन में शरीक होना एक प्रगति का कदम है और इसमें जरूर इजाफा हुआ है। यह सामाजिक गतिशीलता (social mobility) जाति व्यवस्था को कमजोर करने का एक बड़ा साधन है। पूंजीवादी विकास के साथ दस्तकारी (artisanship) के कई रूपों का विलोप होता जा रहा है क्योंकि मशीनें इसका स्थान ले लेती हैं और यह भी जातीय श्रम विभाजन को तोड़ता है। विडम्बना यह है कि यह उन जातियों को मुफलिसी व कंगाली की स्थिति में भी धकेल देते हैं। और यह उन्हें कमजोर बनाता है और जातीय दंश उन्हें तब ज्यादा झेलना पड़ता है।

¹ यहां हम अपने लेख — 'जाति का सवाल' में से कुछ उद्धरण देना चाहेंगे-

अपने एक लेख में मार्क्स कहते हैं कि मध्य युग में सम्पत्ति, व्यापार, व्यक्ति सभी राजनीतिक होते थे- यानी राजनीति निजी क्षेत्रों की लाक्षणिकता होती थी। (हेगेल के न्याय के दर्शन की आलोचना में योगदान से) हम जानते हैं कि भूदास वास्तव में एक तरह से जमींदार की सम्पत्ति होते थे तथा वे कई तरह के बंधनों से बंधे होते थे। इसी तरह जमींदार अपने आप में न्यायाधीश व सेनापति भी होता था। इस तरह उससे भूदासों का रिश्ता सीधे-सीधे राजनीतिक होता था। हम पाते हैं कि वर्ग ''एस्टेट'' के रूप में अपने को पेश करते थे और राजनीतिक गुणों से विभूषित होते थे। इस तरह जब हम प्राक्-पूंजीवादी या सामंती दुनिया के समाज में विद्यमान ऐसे रूपों पर विचार करते हैं तो हमें अधिरचनात्मक तत्वों को भी अपने आकलन में लेना होगा। जाति के साथ भी ऐसा ही है। जजमानी संबंध जैसे सम्बंध जाति व्यवस्था के अवयव रहे हैं। जजमानी संबंधों के तहत लोगों को कई तरह के जातीय कार्यभारों का निर्वहन करना पड़ता था, जो ग्राम समुदाय के अंदर श्रम विभाजन की व्यवस्था थी और यह व्यवस्था अपरिवर्तनीय और सख्त थी। इस तरह से इस श्रम विभाजन के तहत लोग एक दूसरे से उत्पादन की प्रक्रिया में जुड़े होते थे — जातीय कार्यभार उत्पादन संबंध ही थे। इन जातीय कार्यभारों का निर्वहन कुछ नियमों के तहत होता था (ऊँच-नीच या दर्जेबंदीवाली व्यवस्था, अनुलंघ्घनीय वंशानुगत काम, छुआछूत, सजातीय विवाहद्ध और यह परम्परागत व्यवहार व रीति-रिवाज से परिचालित होता था ;धार्मिक अनुशंसा, अनुमोदन)। इस तरह जाति व्यवस्था अपने में आधार व अधिरचना दोनों के अवयवों को समाहित करती थी। इस व्यवस्था की अपनी विचित्रताओं में एक यह भी है कि शोषकों व शोषितों के क्रम-अनुक्रम को सटीक ढंग से बताना मुश्किल होता है यद्यपि यह एक दर्जेबंदी वाली शोषक व्यवस्था (hierarchical system) है और इसके तहत निचले पायदान पर आने वाली जातियों का ऊँची जातियों द्वारा शोषण होता था। हम पाते हैं कि इस श्रम विभाजन ने मानसिक और शारीरिक श्रम के बीच के विभाजन को गहरा और चिरकालिकप्रायः बना दिया। इसने जाति व्यवस्था के भेदों को,इस श्रम विभाजन से उत्पन्न विभेदों को बढ़ा दिया और सख्त बना दिया। जाति व्यवस्था वाले समाज के नियमों की संहिता मनुस्मृति ने इसीलिए इस विभेद पर जोर डाला। जाति व्यवस्था के अंतर्गत लोगों के समूहों को खास कामों में बांधे रखने की प्रथा अनमनीयवंशानुगत व परम्परा तथा धर्म द्वारा अनुमोदन प्राप्त (sanctified) रही है। यह एक घृणास्पद व्यवस्था है जो मानव क्षमताओं के विकास को रोकती है और सम्पूर्णता में समाज विकास में बड़ी बाधा पेश करती है। (अम्बेडकर ने अपने उपरोक्त भाषण में बहुत अच्छी तरह से जाति के दुर्गुणों और उसके प्रगति विरोधी चरित्र पर टिप्पणी की है)

आज के दिन में यदि हम उत्पादन संबंधों की बात करें तो हम पाएंगे कि जजमानी संबंधों के तहत श्रम विभाजन द्वारा काम की परम्परा समाप्त हो गई है। लेकिन इसकी समाप्ति कोई क्रांतिकारी रूपांतरण द्वारा नहीं हुई है। आज जजमानी संबंधों के खत्म होने की बात के लिए किसी 'अध्ययन' पर आधारित होने की बात नहीं रह गई है। यह तो सबको साफ है। फिर भी हम एक अध्ययन पर आधारित होकर इसकी समाप्ति पर थोड़ा गौर करेंगे। वह है ''स्लेटर अध्ययनों'' के 2008 का चक्र। अंग्रेज प्रोफेसर स्लेटर द्वारा 1881 में तमिलनाडु के कुछ गांवों में इस अध्ययन की शुरुआत की गई थी और इसके कई चक्र चले हैं। ये अध्ययन बताते हैं कि कैसे क्रमिक रूप में इन संबंधों में बदलाव आया है और श्रम विभाजन का पूंजीवादी ढांचे पर रूपांतरण हुआ है। तमिलनाडु के इरूवेलपट्टु गांव का हाल में किया गया अध्ययन बताता है कि यह गांव अब एक तरह से दो जातियों का गांव हो गया है। तरह-तरह की सेवा देने वाली जातियां इस गांव को छोड़ चुकी हैं। दलित जातियां हैं जो आज अपनी दावेदारी कर रही हैं और उन पर जमींदार का साया नहीं है। यहां दासता (debt bondage) खत्म है। खेतिहर मजदूरी तो ये करते ही हैं पर साथ ही गैर-कृषि मजदूरी का महत्त्व बढ़ रहा है। आज भी पुराने जमींदारी खानदान के पास सबसे ज्यादा खेत है और वह प्रभावशाली भी है लेकिन पुराने आश्रित और आश्रयदाता (patron and client) के संबंध अब नहीं हैं। अध्ययन बताता है कि ''लोहार अब ताला बनाता है, बढ़ई के पास फर्निचर पॉलिश करने का व्यवसाय है। दोनों बाहर हैं। धोबी अभी भी पैसे के बदले आइरनिंग का काम कर देगा, लेकिन धोने का नहीं। गांव के ये भूतपूर्व सेवा देने वाले लोग अभी भी पैसे के बदले अपने विशेष रीति-रिवाज का काम कर देंगे लेकिन अब आपसी निर्भरता पर आधारित सेवा की आम प्रथा समाप्त हो गई है।'' इसी तरह का एक दूसरा महत्त्वपूर्ण अध्ययन यान ब्रीमन का है। उन्होंने विभिन्न समयों में गुजरात आकर शोध करके अनाविल ब्राह्मणों व हलपतियों (एक दलित जाति) के बीच के रिश्ते को दिखाया है। आज हलपतियों की इन पर व्यक्तिगत निर्भरता नहीं है लेकिन आज भी वे मुख्यतः खेतिहर मजदूरी करते हैं और अनाविलों के यहां ही करते हैं। इस तरह के बदलावों को समझने के लिए जरूरी है कि हम भारत के विकास के रास्ते को समझें। आज रुपए-पैसे या माल-मुद्रा के संबंधों ने पुराने संबंधों की जगह ले ली हैं।

इस तरह के बदलाव का एक मतलब यह भी होता है कि ऊपर से यह लग सकता है कि दलित व निचली जातियां जातियों के रूप में ही आज निचले पायदान पर खड़ी हैं। नहीं, वे आधुनिक मजदूर-मेहनतकश के रूप में वहां खड़ी हैं। आज उनके और उनके मालिकों के बीच का संबंध स्वतंत्र मजदूर व मालिक का है। निस्संदेह पूंजीवाद प्राक्-पूंजीवादी अधिरचनात्मक अवयवों का प्रयोग अपने हित में करता है। आर्थिक रूप से पूंजीवादी रूपांतरण तो हो जाता है लेकिन अधिरचनात्मक अवयवों का प्रयोग बंद नहीं होता। जातीय उत्पीड़न पूंजीवादी शोषण प्रणाली को चलाने में मददगार होता है लेकिन मजदूरों को जातीय उत्पीड़न के तमाम अवयव कहीं से भी अपने नए संबंधों में देय नहीं लगता। इसीलिए हम पाते हैं कि पिछली सदी के 70 व 80 के दशकों में तथा 90 के दशक के पूर्वार्ध में इज्जत का सवाल बड़े पैमाने पर जुझारू संघर्षों के केन्द्र में रहा और नक्सली आंदोलन ने इन संघर्षों की अगुवाई की। सामंती निर्भरता के संबंधों को खत्म करने में इसकी महत्त्वपूर्ण भूमिका रही। आज भी जातीय भेदभाव व उत्पीड़न के खिलाफ संघर्ष एक फौरी कार्यभार बना हुआ है।ह्

भारत में हुए पूंजीवादी बदलाव ने जातियों में वर्ग विभाजन कर दिया है और आज यह एक प्रभावी हकीकत है। ऐसे में जब भी हम जातीय सवाल को लेते हैं तब दृष्टिकोण की बात सामने आती है कि हम इसे पूंजीवादी सुधारवादी नजरिए से लेते हैं या फिर सर्वहारा क्रांतिकारी दृष्टिकोण से। सर्वहारा दृष्टिकोण इस बात को कहता है कि हर प्रकार के शोषण-उत्पीड़न का विरोध कर ही सर्वहारा अपने को मुक्त कर सकता है। इसीलिए वह जातीय उत्पीड़न के खिलाफ भी उतनी ही तल्खी से जूझता है और उसे अपने संघर्ष का अंग बनाता है। बुर्जुआ सुधारवादी तरीका दलित व पिछड़ी जातियों को सम्पत्तिवान व समृद्ध बनाने का झांसा देते हुए जाति के खात्मे का बात करता है। प्रश्न यह है कि क्या पूंजीवाद के अंतर्गत ऐसा हो सकता है? क्या बहुसंख्या गरीबी में नहीं रहती है और लोग लगातार उजड़ते नहीं हैं और सर्वहाराकरण नहीं होता है? लेकिन आज के दिन में 'भोपाल घोषणापत्र' जैसी मुहिम चलाकर दलित पूंजीवाद की पैरोकारी की जाती है। दलित पूंजीपति के बन जाने से उन जातियों से आए सर्वहारा का जातीय उत्पीड़न खत्म नहीं हो जाता। यह आम अनुभव की बात है। दूसरी बात जो बसपा जैसी तथाकथित दलित पार्टियों द्वारा फैलाई जाती है वह यह है कि दलितों की शक्ति उनके वोट में है और वोट में चमत्कारी गुण है जो उनके लिए मुक्तिदायी हो सकता है। यह चुनावी भ्रम दलित जातियों को संघर्ष से मुंह फेरने को कहता है और वस्तुतः राज्य संरक्षण की ओर उन्हें मुखातिब करता है।

इसी संदर्भ में हमारे वक्ता ने जातीय उत्पीड़न के खिलाफ दलित जातियों के प्रतिरोध की शानदार बात को सामने रखा। उन्होंने कहा कि दलित को केवल दबे-कुचले के रूप में देखना गलत है। ऐसा करना उनके प्रति एक सदाशयता वाली मानसिकता को दिखाता है। दलित जबरदस्त प्रतिरोध भी करते हैं और इसी में वे अपनी दावेदारी करते हैंकिसी के मुंहताज नहीं रहते।

वक्ता ने स्थानीय अम्बेडकर हॉस्टल के छात्रों और ऊँची जातियों की बहुलता वाले दूसरे हॉस्टल के लड़कों के बीच लड़ाई की बात की। सवर्ण लड़कों के उत्पीड़न का प्रतिरोध अम्बेडकर हॉस्टल के लड़के बहादुरी से करते हैं और वक्ता से बातचीत के दौरान उन्होंने कहा कि वे दबने वाले नहीं हैं। इसके विपरीत यदि हम उन्हें केवल संरक्षण की जरूरत वाले मानते हैं तो अन्याय करते हैं। एक ऐसे राज्य के आश्रित के रूप में उन्हें देखते हैं जो सर्वथा दलित विरोधी है, जो जातीय उत्पीड़न के मामलों में कानून के राज के नाम पर शोषितों-उत्पीडि़तों के खिलाफ काम करता है। दलित जातियों के लोगों के जनसंहार के मामले और पुलिस-प्रशासन से लेकर कोर्ट-कचहरी के फैसले हमारे विचारों का अनुमोदन करते हैं। जब दलित जातियों के लोग बगावत का रास्ता लेते हैं तो उनके साथ जिस नृशंस तरीके से निपटा जाता है वह हम खूब जानते हैं। दलित जातियों को संविधानपरस्त बनाया जाता है जिस संविधान ने जातीय संरचनाओं को नया जीवन दिया है, जिसने चुनावों की प्रक्रिया में जातीय गोलबंदी को प्रोत्साहित कर जाति को नया जीवन दिया है। राज्य ने आरक्षण का प्रावधान कर एक तरफ तो जनतंत्रीकरण जरूर किया है लेकिन दूसरी तरफ दलित जातियों की बहुसंख्या को शोषण-उत्पीड़न झेलने को मजबूर बना दिया है। इसी बहुसंख्या के राज की बात सर्वहारा क्रांतिकारी करते हैं और उन्हें संविधानपरस्ती के रास्ता से अलग करते हैं।

हमारे वक्ता ने इसी दृष्टि से अम्बेडकर को प्रतीक  (icon) बनाए जाने की बात की थी। उन्होंने राज्य के इस प्रयास के पीछे के मंसूबे की बात कही थी जो दलितों को क्रांतिकारी संघर्ष से अलग कर संविधानपरस्त बनाता है। उस संविधान के प्रति आस्था रखने वाला बनाता है जिसे एक अत्यंत सीमित निर्वाचन समूह (electorate) के आधार पर चुनी हुई संविधान सभा ने बनाया था। कहने की जरूरत नहीं कि इस संविधान सभा में जमींदारों व पूंजीपतियों के ही प्रतिनिधियों का बोलबाला हो सकता था। दलित जातियों को क्रांतिकारी संघर्ष का रास्ता छोड़ राज्य संरक्षण का रास्ता दिखाने की प्रेरणा देने के लिए अम्बेडकर का आज इस्तेमाल हो रहा है। इसीलिए हमारे वक्ता ने अम्बेडकर से आगे जाने की बात कही। उन्होंने धार्मिक शास्त्रों की सत्ता को चुनौती देने से आगे बढ़कर जाति के गैर-धार्मिक वस्तुगत अस्तित्व की ओर ध्यान दिलाया जो आज बदले रूप में अपने को पेश करता है। उन्होंने भारत के प्रशियाई रास्ते से हुए पूंजीवादी विकास की ओर ध्यान दिलाया जिसने जाति व्यवस्था को अपनी जरूरतों के हिसाब से ढाला है और इसका इस्तेमाल अपने हित में करता है। ऐसे में जाति के खिलाफ की लड़ाई इसकी विशिष्टताओं के खिलाफ का संघर्ष भी है। दलितों की बहुसंख्या आज मजदूरी करती है और मजदूर के रूप में उनका संघर्ष उन्हें पूंजीवाद विरोधी समाजवादी क्रांति तक ले जाता है। यह क्रांतिकारी सत्ता तक दलितों को ले जाने की बात है। फौरी जाति विरोधी हमारे कार्यभार इसी मंजिल की प्राप्ति हेतु हैं और इन दोनों कार्यभारों को एक दूसरे के विपरीत खड़ा करना गलत है। इसीलिए अम्बेडकर के जनतंत्रवादी लड़ाई से, विचारधारात्मक स्तर पर धर्मशास्त्रों के खिलाफ संघर्ष से हमें आज आगे बढ़कर इस काम के लिए अपनी तैयारी करनी होगी। यह वस्तुगत परिस्थितियों के खिलाफ बगावत का रास्ता है और इसके लिए उस मुक्तिदायी रास्ते को चुनना पड़ेगा जो भारतीय पूंजीवाद को जड़-मूल से उखाड़कर उसके बदले एक समाजवादी व्यवस्था का निर्माण करता हो जिसमें मनुष्य द्वारा मनुष्य का शोषण नहीं होगा।

जारी….

पिछला भाग-

वर्गीय हितों को साधने में किया जाता है जाति का इस्तेमाल

वर्गीय हितों को साधने में किया जाता है जाति का इस्तेमाल

वर्गीय हितों को साधने में किया जाता है जाति का इस्तेमाल

HASTAKSHEP

अम्बेडकर के 'जाति का खात्मा' पर परिचर्चा के संदर्भ में – भाग-1

पार्थ सरकार

हाल ही में पटना में अम्बेडकर के 'जाति का खात्मा' लेक्चर पर एक गोष्ठी का आयोजन किया गया। इसके आयोजकों में प्रमुख 'जनमुक्ति संघर्ष वाहिनी' थी जो जयप्रकाश नारायण के विचारों से प्रेरित संगठन है और इसने बोध गया महंत के सामंती वर्चस्व के खिलाफ संघर्ष को नेतृत्व दिया था जो उल्लेखनीय है। जाति विरोधी व महिला अधिकारों के आंदोलनों में भी इस संगठन की सक्रिय भागीदारी रही है। अम्बेडकर के इस भाषण पर परिचर्चा में कम्युनिस्ट सेन्टर ऑफ इण्डिया के साथी ने अपने विचार रखे जिस पर कुछ नकारात्मक प्रतिक्रियाएं हुईं।अम्बेडकर का मामला बहुत ही संवेदनशील बन गया है और उनके विचारों पर कोई नकारात्मक टिप्पणी करना मधुमक्खी के खोते में हाथ डालने जैसा है। हम यहां अपने साथी द्वारा दिए गए भाषण के मुख्य बिन्दुओं को रख रहे हैं और जगह-जगह विस्तार से कुछ और बातों को भी रखेंगे। (अतिरिक्त बातें या टिप्पणियां बड़े कोष्ठकों (square brackets) में रखी गई हैं। कहने की जरूरत नहीं कि समयाभाव में कुछ बातें नहीं कही जा सकी थीं)

            हम अम्बेडकर के उक्त भाषण की पृष्ठभूमि बता दें। अम्बेडकर को पंजाब में काम कर रहा 'जात-पात तोड़क मण्डल' की ओर से 1936 में 'जाति का खात्मा' नामक विषय पर लाहौर में होने वाले सम्मेलन में अध्यक्षता करने के लिए बुलाया गया था। अम्बेडकर ने इस अवसर के लिए अपने अध्यक्षीय भाषण की तैयारी की और इसे जात-पात तोड़क मण्डल के पास भेज दिया। इसे पढ़कर मेजबानों को लगा कि इससे हंगामा हो जाएगा और यह उनके अधिकतर लोगों को मान्य नहीं होगा। अम्बेडकर भी अड़ गए और अंततोगत्वा यह सम्मेलन नहीं हुआ। अम्बेडकर ने अपने भाषण को छपवा दिया और इसकी प्रतियों की खूब बिक्री हुई। भारत में जाति का जो जकड़न उस समय था उसके आधार पर हम कह सकते हैं कि यह भाषण क्रांतिकारी था और यह जातीय भावनाओं पर कुठाराघात करता था। आज इस भाषण की फिर से बहुत चर्चा हो रही है और कई जगह से इसके छपने की खबर मिली है। हमारे वक्ता ने इस पर सवाल उठाया कि अचानक इस पर आज इतना ध्यान फिर क्यों दिया जा रहा है। हालांकि उन्हें इसका कोई जवाब नहीं मिला।

            अम्बेडकर के इस भाषण की एक प्रमुख प्रस्थापना यह थी — ''मैं इस बात को जरूर कह सकता हूं कि इस बात से संत राम जी वाकिफ हैं और वे इस बात को मानेंगे कि उनके एक पत्र के जवाब में मैने लिखा था कि जाति व्यवस्था को तोड़ने का असली तरीका अंतर्जातीय खान-पान व अंतर्जातीय विवाह आयोजित करने में नहीं है बल्कि उन धार्मिक धारणाओं को खत्म करने में है जिस पर जाति टिकी हुई है —।'' (भाषण अंग्रेजी में है और अनुवाद हमारा है। यह भाषण कलम्बिया यूनिवर्सिटी, संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा प्रकाशित किया गया है। पृष्ठ संख्या 6 से)

     इस प्रस्थापना को एक तरह से पूरे भाषण का सार बताते हुए हमारे वक्ता ने कहा कि जाति तोड़ने के लिए धार्मिक धारणाओं पर हमला करने पर अम्बेडकर द्वारा बल दिया जाना उस समय निहायत ही जरूरी था। जाति को धार्मिक अनुमोदन (sanctification)  मिला हुआ था। शास्त्रों की सत्ता पर चोट, मनुस्मृति पर चोट करना जरूरी था क्योंकि यह विचारधारात्मक संघर्ष था। विचारों के क्षेत्र में मनुस्मृति की सत्ता को चुनौती दिया जाना दिमाग को मुक्त करता था और जाति के खिलाफ संघर्ष के लिए तैयार करता था। इस बात पर जोर देते हुए भी हमारे वक्ता ने कहा कि समस्या का समाधान यदि केवल धर्म के खिलाफ संघर्ष में खोजा जाए या फिर धर्म परिवर्तन में खोजा जाए तो यह गलत होगा। उन्होंने कहा कि इस भाषण के 20 साल बाद अपने जीवन के अंतिम दिनों में अम्बेडकर'बुद्धम शरणम् गच्छामिकरते हैं लेकिन जाति समस्या बनी ही रह जाती है। हमारी ही धरती से गए सम्राट अशोक की संतान, महेन्द्र एवं संघमित्र ने श्री लंका के लोगों को बौद्ध तो बना लिया लेकिन वहां भी जाति व्यवस्था है। इसी तरह हमारे देश में इस्लाम व ईसाई धर्म के मानने वालों के बीच भी जाति पाई जाती है। वक्ता ने अरूंधति राय के 'God of Small Things' (छोटी चीजों के देवता) की चर्चा की जिसमें लेखक ने केरल के सिरियाई क्रिश्चनों द्वारा अपने को ब्राह्मण मानने का जिक्र किया है और दिखाया है कि उनमें वैसा ही हैवानियत वाला ब्राह्मणवाद पाया जाता है।

¹यह बहुत ध्यान देने योग्य बात है कि अम्बेडकर के भाषण में एक सिरे से हिन्दू धर्मशास्त्रों की सत्ता को खारिज किया गया और इसके लिए उन्होंने बहुत तर्क दिए हैं। उन्होंने शास्त्रों के तर्कसंगत पुनर्विवेचन (reinterpretation)को गलत बताया है। बहुधा धर्म की सत्ता को आधुनिक जगत में पुनःस्थापित करने के लिए ऐसा किया जाता है। अम्बेडकर ने इस चेष्टा की आलोचना की है। यह हिन्दू पुनरूत्थानवाद के खिलाफ भी जाता है। यह एक प्रगतिशील बात है।

इसके साथ यह भी कहा जाना चाहिए कि अम्बेडकर स्पष्ट रूप से कहते हैं कि वे धर्म-विरोधी नहीं हैं। वे अंग्रेज विद्वान बर्क को उद्धृत कर धर्म की जरूरत की बात करते हैं। इसीलिए अम्बेडकर दूसरे धर्म की शरण में चले जाते हैं।

यहां इस बात को कह देने की जरूरत है कि वक्ता ने अम्बेडकर के भाषण के सार को पकड़ा और धर्म को प्रधान चीज बताते हुए उनके उदाहरणों पर टिप्पणी नहीं की जो गलत थे। मसलन, अम्बेडकर आयरलैण्ड की लड़ाई में कैथोलिक धर्म का हाथ देखते हैं और वहां के प्रांत अल्स्टर की आयरलैण्ड की स्वतंत्रता में दिलचस्पी नहीं होने की वजह उनका प्रोटेस्टेंट होना बताते हैं। बात क्या है? अलस्टर प्रांत में बड़े पैमाने पर इंग्लैण्ड और स्कॉटलैण्ड के लोगों को बसाया गया और वह प्रांत केवल धार्मिक दृष्टि से अलग नहीं था बल्कि वहां की राष्ट्रीयता भी अलग थी और ब्रिटेन द्वारा बसाए गए वहां के लोग होने के नाते ये ग्रेट ब्रिटेन का भाग बने रहना चाहते थे। आयरलैण्ड का संघर्ष राष्ट्रीय स्वतंत्रता का संघर्ष रहा है।

            जाति के धार्मिक अनुमोदन (sanctification) को सबसे बड़ी चीज मानते हुए अम्बेडकर ने धर्मशास्त्रों की सत्ता के खिलाफ संघर्ष को ही जाति तोड़ने का तरीका माना है। उनकी बात धर्म परिवर्तन तक जाती है। हमारे वक्ता इसे अम्बेडकर की समझ का गलत पक्ष बताते हुए जाति के अस्तित्व के गैर-धार्मिक पक्ष (secularity of caste existence) पर जोर दिया। हां, वास्तविकता के धरातल पर देखें तो हम पाते है कि अम्बेडकर ने भी जरूर महाड़ में अस्पृश्यता के खिलाफ आंदोलन छेड़ा जो धार्मिक नहीं था और उन्होंने मजदूर आंदोलनों में भी भागीदारी की। जाति के गैर-धार्मिक पक्ष पर बोलते हुए वक्ता ने जाति के विभिन्न तरह के इस्तेमाल की बातें रखीं। कई लेखक आज के दिन में (और अपने विश्व विकास रिपोर्ट, 2001 में विश्व बैंक भी) जाति को सामाजिक पूंजी (social capital) के रूप में चित्रित करते हुए तिरूफर में गुंडर जाति के लोगों द्वारा अपने ही जातीय सम्बंधों द्वारा बड़ा निर्यातक व्यवसायी समूह बनाने का जिक्र किया है, तमिलनाडू के नदारों का भी जिक्र किया है। जाति का इस्तेमाल वोट के समय खासा दिखता है और जनतांत्रिक राजनीति में जाति का खूब इस्तेमाल होता है। जातिवाद की परिघटना का जिक्र यहां होना जरूरी है जिसके तहत जाति का इस्तेमाल वर्गीय हितों को साधने में किया जाता है जाति के घरेलू बाजार का इस्तेमाल डॉक्टर, वकील कैसे करते हैं यह आसानी से देखा जा सकता है। आज किसी जाति को किसी तरह के काम करने की रोक नहीं है जैसा कि पुराने भारत में था और हम सामाजिक गतिशीलता भी देख सकते हैं। जाति व्यवस्था के इन बदले रूपों की चर्चा करने पर हमें इसके गैर-धार्मिक पक्ष दिखाई पड़ते हैं और जिसे अम्बेडकर को मानने वाले प्रखर बुद्धिजीवी, आनंद तेलतुम्बडे ने बड़े ही सटीक ढंग से ''जाति का बने रहना या डटे रहना'' (the persistence of caste) कहा है (उनकी एक पुस्तक इसी नाम से प्रकाशित हुई है)। वक्ता ने तेलतुम्बड़े द्वारा इसी किताब में की गई टिप्पणी का जिक्र किया जिसमें वे विचार करते हैं कि जाति आज जिस रूप में पाई जाती है उससे जाति शब्दावली का प्रयोग ही बेमानी सा लगता है। लेकिन इसको छोड़ा भी नहीं जा सकता वक्ता का कहना था कि जाति जिस रूप में आज है और जैसे बदलाव उसमें आए हैं उसे धार्मिक चश्मे से नहीं देखा जा सकता और न ही धर्म के खिलाफ लड़ाई उसका समाधान है। उसे उसके गैर-धार्मिक धरातल पर परास्त करना होगा। जाति के खिलाफ लड़ाई धर्म के खिलाफ संघर्ष भी रहा है। पेरियार का द्रविड़ आंदोलन अनिश्वरवादी था, बिहार के रोहतास के क्षेत्र में पिछड़ी जातियों में 'अर्जक समाज' का बोलबाला रहा है जिसने जाति विरोधी लड़ाई में धर्म विरोध भी किया। फिर आज जाति भी रह गई और लोग फिर से धार्मिक कर्मकाण्ड कर रहे हैं। वक्ता ने बात को रखते हुए अपने पूर्व वक्ता से पूछा कि आपने तो जाति विरोधी आंदोलन में भागीदारी की थी और जाति संरचना को तोड़ने का भी काम किया। टूटा क्या और बना क्या रह गयाजाति व्यवस्था के इस पक्ष पर ध्यान देना जरूरी है जिसे तेलतुम्बडे 'जाति का डटे रहनाकहते हैं जबकि वे उसमें यहां बदलाव तक देखते हैं कि इस शब्दावली को बेमानी तक मानने की सोचते हैं।

¹हम यहां पर तेलतुम्बडे को उद्धृत करना चाहेंगे ताकि उनकी बात उनकी जुबानी सुन ली जाए। वे अपनी पुस्तक 'जाति का बने (डटे) रहना' में लिखते हैं — ''बेशक जातीय स्थिति आज इतनी संश्लिष्ट बन गई है कि जाति शब्दावली का प्रयोग करना बेमानी साबित होने लगा है, और यह बेहतर होगा कि जल्दी उसे (किसी दूसरी शब्दावली से) परिस्थापित करने का सोचा जाए।'' (अनुवाद हमारा है। अंग्रेजी मूल में – " Indeed, the caste situation today has become so complex that the caste idiom is proving increasingly futile, and the earlier one thinks of substituting it the better". p. 51)

            लेकिन फिर भी विश्लेषण के लिए जाति शब्दावली का प्रयोग आज भी छोड़ा नहीं जा सकता। वे आगे लिखते हैं– '' तथापि एक विश्लेषणात्मक कोटि के रूप में जाति को खारिज कर देना गलत होगा। जरूरत इस बात की है कि वर्तमान में पाई जाने वाली जातीय गत्यात्मकता की समझदारी को तेज किया जाए।''– " To think, however, of discarding caste as an analytical category altogether would be counterproductive. What is needed is to sharpen the understanding of caste dynamics as they now exist." p.51)]

            जाति व्यवस्था में आए बदलावों पर जब ध्यान दिया जाएगा तो आज उसके खिलाफ की लड़ाई को हमें गैर-धार्मिक धरातल पर यानी भौतिक दुनिया में लड़ना पड़ेगा। वक्ता ने कहा कि आज दलितों के साथ जो अत्याचार हो रहे हैं उसका भी स्वरूप बदल गया है। जातीय हिंसाबेइज्जतीबंधन सवर्ण जाति के लोगों के हाथों उनके लिए रोजमर्रे का व्यक्तिगत मामला था। लेकिन आज ये अत्याचार दलितों के व्यक्तिगत रोजमर्रे के जीवन से हट कर दलितों के खिलाफ सामूहिक हिंसा के रूप में दिखाई पड़ते हैं उनकी बढ़ी हुई दावेदारी की प्रतिक्रिया के रूप में दिखाई पड़ते हैं। पहले यह सवर्णों के साथ उनके रिश्तों में देय था, आज वे स्वतंत्र हैं और इसीलिए उनकी दावेदारी के खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से सामूहिक रूप से कहर बरपाया जाता है।

¹चूंकि हम तेलतुम्बडे की बात करते आ रहे हैं तो इस मसले पर भी हम उनके विचार को सामने रखना चाहेंगे। वे भी ऐसा ही सोचते हैं, फिर भी उनका निवारण अम्बेडकर के निवारण के करीब दिखता है जब वे लिखते हैं — ''(जातीय अत्याचार को रोकने के लिए) कई तरह की रणनीति अपनाई जा सकती है, वह इस पर निर्भर करती है कि कहां और कैसे इस प्रक्रिया को रोकने की बात होती है। यह उसके स्रोत में भी हो सकता है — यानी जातीय विचारधारा के स्तर पर। यदि कोई दूसरी विचारधारा से इसके धार्मिक मायाजाल को उतार फेंके या दूसरा उपाय लगाया जाए तो अत्याचारों को अंजाम देने वाले सम्भावित लोगों के दिमाग पर असर डाला जा सकता है। यह क्लासकीय जाति विरोधी आंदोलन की उस रणनीति से मेल खाता है जिसने जाति की जड़ को हमारे धर्मशास्त्रों में बताया और उसका सामना किए।'' यहां हम इसकी अंग्रेजी भी दे दे रहे हैं — "There may be several strategies to accomplish it (the expression of caste in terms of atrocities) , depending on where and how one decides to block the process. It may be at its source – at the level of caste ideology. If one could strip it of its religious mystQue with a counter-ideology, or by any other means, atrocities may be prevented by impacting the mindsets of their potential perpetrators. This is akin to the strategy of the classical anticaste movement that diagnosed the roots of caste as lying in the scriptures and set out to confront them." (ibid. p.51).

            फिर भी आगे वे लिखते हैं कि — ''उसके भौतिक रूप में भी अत्याचार से निपटा जा सकता है।  दलितों के खिलाफ अत्याचार केवल उनकी सापेक्षिक कमजोरी के कारण है — संख्यागत, भौतिक और सामाजिक। इस कमजोरी को कैसे खत्म किया जा सकता है? रणनीतिक विकल्प के ये रूप हो सकते हैं कि दलितों को अपने को अंदर से ताकतवर बनाना होगा या फिर उनकी ताकत की बाहर से सम्पूर्ति करनी होगी।'' यहां फिर हम इसका अंग्र्रेजी अनुवाद दे रहे हैं –       " One can also tackle atrocity in its physical form. The root reason for atrocities against dalits is simply their relative weakness – numerical, physical and social. How is this weakness to be removed? The strategic options could be in terms of strengthening dalits from within or supplementing their strength from without." p.51]

            हमारे वक्ता ने दलितों द्वारा इज्जत के लिए संघर्ष की बात की जो बिहार जैसे प्रांतों में कम्युनिस्ट (व नैक्सलाइट) आंदोलन द्वारा संचालित हुआ। अत्याचारों के खिलाफ प्रतिहिंसा करके भी उन्होंने अपनी ताकत का इजहार किया जिससे प्रतिगामी शक्तियां सहम गईं। यहां हम फिर यह कहना चाहेंगे कि अम्बेडकर के भाषण के सार को हमारे वक्ता ने विचारधारात्मक संघर्ष में बताया था जो हिन्दू धर्मशास्त्रों व मनुस्मृति की सत्ता को खारिज करता था और उनका कहना था कि यह दिमाग को जातीय बंधन से मुक्त करते हुए संघर्ष की पृष्ठभूमि तैयार करता था। मार्क्सवादी होने के नाते सामाजिक जीवन में विचारों के महत्त्व को हम कैसे नकार सकते हैं। जाति के खिलाफ विचारधारात्मक संघर्ष की आज भी जरूरत है और वह शायद धर्मशास्त्रों की सत्ता के खिलाफ संघर्ष से आगे बढ़कर आधुनिक जनवादी विचारों के क्षेत्र की चीज बन गई है। हमारे वक्ता ने इसी दृष्टि से यह भी कहा कि किस तरह से निम्न जातियों का जातीय संघर्ष ब्राह्मणवाद का शिकार हो जाता है। इतिहास में हमने देखा है कि किस तरह से विभिन्न जातियों ने 1931 के सेंसस में अपने को क्षत्रिय गिनाया, किस तरह से जनेऊ धारण कर उन्होंने जातीय क्रमबंधता में अपने को द्विज की कोटि में लाने के प्रयास किए और इस तरह से ऊँची जातियों के वर्चस्व का सामना किया। ये संघर्ष अपने अंतर्य में जातीय उत्पीड़न व दर्जेबंदी के खिलाफ होते हुए भी जातीय व्यवस्था का निषेध तक नहीं पहुंचते थे और अंदर से जाति के खिलाफ की ही लड़ाई थे और इस तरह से ब्राह्मणवाद के लिए जगह छोड़ जाते थे। ताजा उदाहरण के रूप मे वक्ता ने बताया कि यह निम्न जातियों में देखा जाता है कि समृद्धि आने पर बहु-बेटियों को घर की चहारदीवारी के अंदर धकेल दिया जाता है। जिन जगहों पर हिन्दू रीति-रिवाजों के खिलाफ संघर्ष हुआ और नास्तिकता तक बातें गईं वहां संघर्ष करने वाली पिछड़ी जातियों के लोगों के सामाजिक-आर्थिक उत्थान के बाद आज फिर से हिन्दू धर्म का बोलबाला दिखाई पड़ता है। फिर ऐसी लड़ाइयां, जो निर्दिष्ट जातीय कामों के खिलाफ थीं, भी ब्राह्मणवादी व्यवहार के लिए गुंजाइश छोड़ देती थी। जैसा कि रविदास लोगों द्वारा मरे हुए गोमांस का सेवन बंद करना गाय का चमड़ा छीलने के उनके परम्परागत काम को छोड़ने के साथ भी जुड़ा हुआ रहा है। यह एक प्रगतिशील आंदोलन रहा है और विद्रोह भी। प्रेमचंद के उपन्यास 'कर्मभूमि' में इसका अच्छा साहत्यिक वर्णन मिलता है। फिर भी एक बात तो है कि गोमांस से परहेज करना सवर्ण हिन्दू परम्पराओं को मानने के बराबर है और इस तरह से यह ब्राह्मणवाद के लिए जगह देता है इसी तरह से हिन्दू रीति-रिवाजों को मानना हिन्दू समाज में दाखिले का एक उपाय रहा है और हम पाते हैं कि ऐसे लोगों को हिन्दू समाज के अंदर लाने के लिए हिन्दूवादी ताकतों द्वारा इस तरह के भी अभियान चलाए गए हैं। अमृत लाल नागर की पुस्तक 'नाच्यो बहुत गोपाल' में इसका अच्छा वर्णन मिलता है। ऐसे में आधुनिक जनवादी आधार पर जाति विरोधी संघर्ष को चलाना बहुत जरूरी है।

जारी…..

About The Author

पार्थ सरकार। लेखक कम्युनिस्ट सेंटर ऑफ इंडिया (सीसीआई) से जुड़े हुए हैं। उनका यह आलेख पटना के संस्कृतिकर्मी अनीश अंकुर के जरिए हम तक पहुँचा है।

पिंक रेवोल्युशन- एक बार फिर राजनीति में पहचान से जुड़े मुद्दे

पिंक रेवोल्युशन- एक बार फिर राजनीति में पहचान से जुड़े मुद्दे

पिंक रेवोल्युशन- एक बार फिर राजनीति में पहचान से जुड़े मुद्दे

मजबूत नेता नहीं होता तानाशाहीपूर्ण और एकाधिकारी

 -राम पुनियानी

विघटनकारी राजनीति के पुरोधाओं ने यह वायदा किया था कि इस (2014) चुनाव में वे केवल विकास और सुशासन से जुड़े मुद्दों पर बात करेंगे। परन्तु यह शायद केवल कहने भर के लिये था। जहाँ गुजरात के विकास, मजबूत नेता, सुशासन आदि के बारे में जमकर प्रचार किया जा रहा है वहीं ऐसा प्रतीत होता है कि कुछ लोगों को यह एहसास हो गया है कि इस प्रचार का गुब्बारा कभी भी फूट सकता है क्योंकि कई अध्ययनों और रपटों से यह सामने आया है कि गुजरात में हालात वैसे नहीं हैं, जैसे कि बताए जा रहे हैं। लोगों को यह भी समझ में आ रहा है कितानाशाहीपूर्ण और एकाधिकारी नेतामजबूत नेता नहीं होता। मजबूत नेता वह होता है जो सबको साथ लेकर चलता है। अतः, अब इन ताकतों के पास इसके अलावा कोई रास्ता नहीं बचा है कि वे एक बार फिर पहचान और आस्था से जुड़े मुद्दों पर वापस लौटें।

मांस और बीफ के निर्यात में वृद्धि के मुद्दे को लेकर यूपीए-2 सरकार पर हल्ला बोलते हुये नरेन्द्र मोदी ने 3 अप्रैल 2014 को एक सभा में भाषण देते हुये कहा कि भारत में ''पिंक रेवोल्युशन'' की खातिर मवेशियों को काटा जा रहा है। पिंक रेवोल्युशन से आशय मांस व बीफ के व्यापार व निर्यात से है। हमारे देश में बीफ (गौमांस) भक्षण एक अत्यंत संवेदनशील धार्मिक मुद्दा है। परन्तु इसके बाद भीभारत दुनिया का सबसे बड़ा बीफ निर्यातक बन गया है और उसने ब्राजील को पीछे छोड़ दिया है। केन्द्रीय खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय की ताजा रपट के अनुसार, भारत ने 2012-13 में 18.9 लाख टन बीफ का निर्यात किया, जो कि पांच वर्ष पहले के आंकड़े से 50 प्रतिशत ज्यादा है। ''आधिकारिक रूप से से देश में गौवध पर प्रतिबंध है इसलिये हमारे देश में बीफ, मुख्यतः भैंस का मांस होता है। भैंसों के मामले में भी सिर्फ नरों और अनुत्पादक मादाओं का वध किया जाता है'', पशुपालन विभाग के एक अधिकारी ने कहा।

गौमांस, भारत की खानपान सम्बंधी परंपरा का अंग रहा है। वैदिक काल में यज्ञों के दौरान गायों की बलि दी जाती थी। जैसे-जैसे खेती का विकास होता गयागौवध पर प्रतिबंध लगाये जाने लगे क्योंकि कृषि कार्य के लिये बैलों की जरूरत होती थी। अमेरिका में एक बड़ी सभा में बोलते हुये स्वामी विवेकानंद ने कहा था, ''आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि प्राचीन संस्कारों के अनुसार, जो हिन्दू गौमांस नहीं खाता वह अच्छा हिन्दू नहीं माना जाता था। कुछ मौकों पर उसके लिये बैल की बलि देकर उसका भक्षण करना आवश्यक माना जाता था।'' (शेक्सपियर क्लब, पसाडेना, कैलिफोर्निया में 'बौद्ध भारत' विषय पर 2 फरवरी 1900 को बोलते हुये, द कंपलीट वर्क्स ऑफ़ स्वामी विवेकानंद, खंड-3, अद्वैत आश्रम, कलकत्ता, 1997, पृष्ठ 536)।

यही बात रामकृष्ण मिशन, जिसकी स्थापना स्वामी विवेकानंद ने ही की थी, द्वारा प्रकाशित अन्य अनुसंधानात्मक पुस्तकों से भी सिद्ध होती है। उनमें से एक में कहा गया है, ''वैदिक आर्य, जिनमें ब्राह्मण भी शामिल थे, मछली, मांस और यहां तक कि गौमांस भी खाते थे। किसी भी प्रतिष्ठित मेहमान को सम्मान देने के लिये गौमांस परोसा जाता था। यद्यपि वैदिक आर्य गौमांस खाते थे तथापि दुधारू गायों को नहीं मारा जाता था। गाय के लिये एक शब्द प्रयोग किया जाता था 'अघन्य' (कभी नहीं मारी जा सकने वाली)। परन्तु अतिथि के लिये एक शब्द था 'गोघ्न' (वह जिसके लिये गौवध किया जाता है)। केवल सांडों, दूध न देने वाली गायों और बछड़ों का वध किया जाता था'' (सी कुन्हन राजा, 'वैदिक कल्चर', सुनीति कुमार चटर्जी व अन्य द्वारा संपादित ''द कल्चरल हैरीटेज ऑफ़ इंडिया'' खंड-1 में उद्धत, द रामकृष्ण मिशन, कलकत्ता, 1993, पृष्ठ 217)। इतिहासविद् डी एन झा द्वारा किए गये अनुसंधान से भी यह जाहिर होता है कि भारत में गौमांस भक्षण की परंपरा थी। यही बात डाक्टर पांडुरंग वामन काने ने अपने बहुखंडीय ग्रंथ ''भारतीय धर्मग्रंथों का इतिहास'' में कही है जिसमें वे वेदों से उद्धृत कर लिखते हैं, 'अथो अनम व्या गौ' (गाय सचमुच एक भोजन है)।

कृषि आधारित समाज के उदय के साथ गाय को एक पवित्र पशु का दर्जा दे दिया गया। इसका कारण स्पष्ट था। खेती में बैलों की जरूरत होती थी और गौवध से बैलों की कमी हो जाने का खतरा था। आमजनों को गायों को मारने से रोकने के लिये उसे धर्म से जोड़ दिया गया। अक्सर यह दुष्प्रचार किया जाता है कि मुस्लिम बादशाहों ने भारत में गौमांस भक्षण की परंपरा शुरू की। यह सही नहीं है। सच तो यह है कि भारत की बहुसंख्यक हिन्दू जनता की भावनाओं का सम्मान करते हुये, मुस्लिम बादशाहों ने भी गौवध पर प्रतिबंध लगाए। बाबर की अपने पुत्र हुमायूँ को लिखी वसीयत (जिसे राष्ट्रीय संग्रहालय में प्रदर्शित किया गया है) इस तथ्य को सिद्ध करती है।

''पुत्र, इस हिंदुस्तान देश में कई धर्म हैं। अल्लाह का शुक्रिया अदा करो कि उसने हमें यहां का राज दिया। हमें अपने दिल से सभी भेदभाव मिटा देने हैं और हर समुदाय के साथ उसकी रस्मों-रिवाजों के अनुरूप न्याय करना है। इस देश के लोगों के दिलों को जीतने के लिये और प्रशासन के कार्य से उन्हें जोड़ने के लिये गौवध से बचो…'' (मूल से अनुवाद राष्ट्रीय संग्रहालय द्वारा)।

इस प्रचार में कोई दम नहीं है कि भारत में गौमांस भक्षण मुगल बादशाहों ने शुरू किया। सच यह है कि अंग्रेजों ने भारत में सबसे पहले गौवध और गौमांस भक्षण की परंपरा शुरू की। उन्होंने  सेना के बैरकों में खटीकों की नियुक्ति की जिनका काम गायों को काटकर सेना के लिये गौमांस का प्रदाय सुनिश्चित करना था। अंग्रेजों की फूट डालो और राज करो की नीति के कारण धर्म के नाम पर राजनीति शुरू हुई और गाय और सुअर, सांप्रदायिक हिंसा भड़काने और धार्मिक आधार पर समाज को ध्रुवीकृत करने के औजार बन गए। गौवध के नाम पर कई बार देश के विभिन्न इलाकों में साम्प्रदायिक हिंसा भड़की है। केरल और पश्चिम बंगाल को छोड़कर, देश के सभी राज्यों में गौवध पर प्रतिबंध है।  वर्तमान में गौवध करने पर कड़ी सजा का प्रावधान है और इसलिये, जिसे हम बीफ कहते हैं, वह मुख्यतः भैंस का मांस होता है। अभी हाल में गोहाना में कुछ दलितों को इस आरोप में जान से मार दिया गया था कि उन्होंने गाय की चमड़ी के लिये उसकी हत्या की है।

गौमांस कई समुदायों के खानपान का हिस्सा रहा है, विशेषकर दलितों और आदिवासियों के व दक्षिण भारत के निवासियों के। मटन की बढ़ती कीमत के कारण, बीफ, गरीबों के लिये प्रोटीन का समृद्ध स्त्रोत है यद्यपि कुछ लोग इसके स्वाद के खातिर भी इसे खाते हैं। अभी हाल में मैं पूर्वी यूरोप गया था। मैंने देखा कि हमारे दल में शामिल एक हिन्दू परिवार के रोजाना के भोजन में बीफ अवश्य सम्मिलित रहता था।

प्रश्न यह है कि क्या हमें अपनी पसंद का भोजन करने की स्वतंत्रता है या नहींयूपीए-2 पर पिंक रेवोल्यूशन  लाने का आरोपदरअसलइस मुद्दे का साम्प्रदायिकीकरण करने का प्रयास है। भाजपा के प्रवक्ता टीवी चैनलों पर यह दावा कर रहे हैं कि बीफ के निर्यात को प्रोत्साहन देने की नीति के कारण हमारे देश में दूध के उत्पादन और खेती पर बुरा असर पड़ रहा है। सरकार की वर्तमान नीतियों में कोई भी कमी हो परन्तु एक बात स्पष्ट है और वह यह है कि हमारा दुग्ध उत्पादन लगातार बढ़ रहा है और अगर कृषि उत्पादन में कमी आ रही है तो उसका कारण मवेशियों की घटती संख्या नहीं है। इस तरह के दावे करने वालों को पहले अध्ययन करना चाहिए। उन्हें यह समझना चाहिए कि जो लोग मवेशी पालते हैं, उनमें से अधिकांश गरीब और नीची जातियों के होते हैं और वे दूध न देने वाले बूढ़े मवेशियों का बोझा नहीं उठा सकते। खाद्य व अर्थशास्त्र का प्राकृतिक चक्र, बीफ उत्पादन में वृद्धि के लिये जिम्मेदार है और इस मुद्दे का साम्प्रदायिकीकरण नहीं किया जाना चाहिए। हमें अपनी कृषि आधारित अर्थव्यवस्था को आगे ले जाना है। पशुपालन, कृषि से जुड़ा हुआ व्यवसाय है और उसका साम्प्रदायिकीकरण, हमारे प्रजातांत्रिक समाज के मूल्यों के विपरीत है।   (मूल अंग्रेजी से हिन्दी रूपांतरण अमरीश हरदेनिया)

 (लेखक आई.आई.टी. मुंबई में पढ़ाते थे और सन् 2007 के नेशनल कम्यूनल हार्मोनी एवार्ड से सम्मानित हैं।) 

About The Author

Ram Puniyani was a professor in biomedical engineering at the Indian Institute of Technology Bombay, and took voluntary retirement in December 2004 to work full time for communal harmony in India. He is involved with human rights activities from last two decades.He is associated with various secular and democratic initiatives like All India Secular Forum, Center for Study of Society and Secularism and ANHAD.

सवर्ण-बहुल गाँव में मतदान का एक दिन

सवर्ण-बहुल गाँव में मतदान का एक दिन

सवर्ण-बहुल गाँव में मतदान का एक दिन

संजीव कुमार

सीवान (बिहार)। बुद्ध की ज्ञान भूमि गया से 50 किमी पूर्व में स्थित चारों दिशाओं से पक्की सड़क से जुड़ा नवादा शहर से 5 किमी पश्चिम में बसा सिसवां गाँव में 90% से अधिक आबादी भूमिहारों और ब्राह्मणों की है। इस गाँव की गिनती हमेशा से जिले के सबसे अधिक आबादी वाले संपन्न गांवो में होती रही है। यहाँ लगभग ढाई हजार से भी अधिक मतदाता नामांकित हैं। तीन दशक पूर्व तक इस गाँव में कुछ मुसहर, कहार जैसे दलित जातियों के लोग भी इस गाँव में रहते थे। पर आज उनपर सूअर पालने, गन्दा रहने और गाँव को गन्दा करने का आरोप लगाकर उन्हें गाँव से कुछ दूरी पर पूर्व और पश्चिम दिशा में गाँव के नदी और नहर किनारे पृथक कर बसाया जा चुका है। इस गाँव में बिजली, टेलीफोन, पुस्तकालय, स्वस्थ्य केंद्र, आदि सत्तर के दशक से ही उपलब्ध है पर वहीँ से 200-300 मीटर की दूरी पर नदी किनारे जातीय भेदभाव का परिचायक मुसहरों की उस बस्ती में आज भी बिजली का एक बल्व तक नहीं है। कहने को तो बहुत कुछ है इस गाँव के बारे में पर फ़िलहाल चुनाव का माहौल है, इसलिए चुनाव के बारे में बात हो तो बेहतर हो।

10 अप्रैल को यहाँ नवादा में चुनाव होना था। 27 वर्ष का हो गया हूँ पर घर से बाहर दिल्ली में पढ़ाई करने के कारण आज तक कभी मतदान नहीं किया था। पहली बार लगा कि अगर इस बार मतदान नहीं किया तो मुझे शायद मुझसे मतदान का हक़ छीन लिया जाना चाहिए, आखिर हमारा विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र आज खुद ही अपना गला घोंटने को तत्पर जो दिख रहा है। हूँ तो विद्यार्थी और वो भी सेल्फ-फाय्नेंसड, हजार रूपये खर्च कर मतदान करना महंगा लग रहा था पर क्या करें मन जो नहीं मान रहा था। 10 अप्रैल को सुबह लगभग पांच बजे गाँव पहुंचा तो सफ़र से थका आँख को नींद लग गई। मतदान तो 7 बजे से ही शुरू हो गया था पर मुझे मतदान केंद्र पहुंचते- पहुंचते तक़रीबन आठ साढ़े आठ बज गए। मतदान केंद्र जाने से पहले मैंने मुसहरों की उस बस्ती में जाना अधिक जरूरी समझा जहाँ के लोग मुझे कुछ वर्षों से आशा की नजर से देखा करते थे। मैंने वहां जाकर लोगों को जितना जल्दी हो सके मतदान करने को कहा, पर ज्यादातर लोग खेतों में मजदूरी करने जा चुके थे और दोपहर तक ही लौटते।

इधर मतदान केंद्र पर धड़ल्ले से मतदान हो रहा था। बहुत कम ही मतदाता दिख रहे थे जिन्होंने एकल मतदान का प्रयोग किया हो। सभी अपने वोट को अंत के लिए बचाकर जितना जल्दी हो सके किसी प्रकार की कोई अशान्ति होने से पहले गाँव से बाहर रहने वाले अपने भाई, बहन या गाँव के किसी भी हम उम्र के बदले मतदान कर रहे थे। वैसे इसमें गाँव की औरतें, मर्दों से आगे थी या यूँ कहें कि उन्हें आगे करवाया जाता था ताकि मतदान अधिकारी ज्यादा विरोध नहीं कर पायें। आखिर भारत जैसे पुरुष-प्रधान देश में नारियों को अबला का सम्मान मिलने का उन्हें और उन्हें यह सम्मान देने वाले पुरुषों को इसका कुछ तो फायदा मिलना ही चाहिए। एक-एक मतदाता अपनी पांचो उंगली स्याही से रंगाने के बाद भी दम नहीं ले रहे थे, आखिर भगवन ने उन्हें 10 उंगली जो दी थीं। और अगर भगवन का दिया दस उंगली भी कम पड़े तो वैज्ञानिकों की लेबोरेटरी से दूर गाँव की ओपन लेबोरेटरी से इजात घरेलु नुस्खे कब काम आयेंगे। एक से अधिक मतदान देने का पहला देशी मन्त्र है अंगुली पर स्याही लगते ही अंगुली को अपने बालों में घुसा कर रगड़ दीजिये और फिर बाहर जाकर पपीते के दूध से स्याही पूरी तरह छुड़ा कर दोबारा मतदान के लिए तैयार हो जाइये। अब मतदान अधिकारी भी क्या करें? एक तो वो अपने घर से सैकड़ों मील दूर थे, खाना पानी के लिए स्थानीय ग्रामीणों पर ही निर्भर थे और ऊपर से सवर्णों का गाँव जो लड़ने झगड़ने में कभी पीछे नहीं रहते। ऐसे गाँव में मतदान अधिकारीयों को भी बल तभी मिल पता है जब गाँव के मतदाता बंटे हुए हों या कम से कम कुछ लोग बोगस (दूसरे के नाम पे मतदान) मतदान का विरोध करने वालें हों। हालाँकि इस गाँव के मतदाता मुख्यतः दो उम्मीदवारों (जदयु और बीजेपी) में लगभग बराबर बंटे हुए थे पर दोनों पक्ष ने आपसी समझौता कर लिया था और दोनों पक्ष ही अपने अपने उम्मीदवार को बोगस मतदान करने में धड़ल्ले से जुटे थे।

वैसे गाँव के बाहर रहने वालों का अनुपात गाँव के दलितों और मुसहरों में सबसे अधिक था पर बोगस मतदान के मामले में उनका योगदान नगण्य था। गाँव के मुसहर और दलित बोगस तो छोडिये, वो तो अपने खुद के मताधिकार के प्रयोग से डरते थे। कल तक वो गाँव के सवर्णों से डरते थे तो आज पुलिस और रक्षाकर्मियों से डरते थे। आज तक ये लोग सवर्णों के अधिपत्य से स्वतंत्र नहीं हो पाये हैं। आज इनके वोटों का कुछ भाग एक तीसरे यादव वर्ण के उम्मीदवार को जा भी रहा है तो वो सिर्फ इसलिए कि गाँव का ही एक सवर्ण उस यादव उम्मीदवार से पैसे लेकर उन दलितों से उसे मत दिलवा रहा है। गाँव के आधे से अधिक दलित और मुसहर उस एक सवर्ण की बात इस लिए मान रहे हैं क्योंकि वो सवर्ण उनके लिए महाजन है और गाँव का ज्यादातर दलित और मुसहरोंने उससे कर्ज ले रखा है। हालाँकि कुछ ऐसे मुसहर थे जो स्वतंत्र रूप से भी राजद के उस यादव उम्मीदवार को ही अपना वोट देना चाहते थे। लेकिन गरीबी की मार ने इन दलितों को उनके मतदान केन्द्रों से हजारों मील दूर दिल्ली, पंजाब और कलकत्ता आदि शहरों में धकेल दिया था। जो बचे-खुचे गाँव में ही रह गए थे, पर वो तो सवर्णों की तरह पाने घरवालों के बदले उनका मतदान तो दे नहीं सकते थे। डरते जो थे, अब सताए हुए वर्ग पर तो हर कोई हाथ साफ़ करना चाहता है फिर चाहे वो गाँव के सवर्ण हो या शुराक्षकर्मी या फिर मतदान कर्मी।

वैसे इस गाँव के मतदाताओं के झुकाव और समर्थन को मैं वर्गीकृत कर सकूँ तो एक वर्गीकरण साफ़ झलकता है जिसमे तीस वर्ष से कम उम्र के ज्यादातर मतदाता बीजेपी के समर्थक हैं जबकि जदयू के ज्यादातर समर्थक चालीस और पचास को पार किये हुए हैं। कुछ परिवार तो ऐसे दिखे जिसमें पिता ने जद यू को मत दिया पर नवयुवक बेटे ने बीजेपी को। वैसे ये वर्गीकरण वहां दलितों पर लागू नहीं हो सकता है क्योंकि इनके हर उम्र वर्ग के मतदाता बीजेपी विरोधी है। जो लोग जद यू के समर्थक हैं वो अपनी मर्जी से मतदान नहीं कर रहे हैं बल्कि अपने सवर्ण मालिकों के आधिपत्य में वो मतदान कर रहे हैं जबकि ज्यादातर दलित नवयुवक रोजगार की तलाश में गाँव से बाहर हैं।

लगभग तीन बज चुके थे और मतदाताओं की भीड़ लगभग नगण्य हो चुकी थी। उधर गाँव के पास ही दो अन्य सवर्ण बहुल गाँव से बीजेपी के उम्मीदवार को थम्पीइंग मतदान की सूचना मतदान केंद्र के पास जमावड़ा लगाये लोगों के मोबाइलों पर आ रही थी। ज्यादातर लोग विचलित नजर आ रहे थे। आखिर गाँव के इज्जत का सवाल था। इज्जत? हाँ भाई, जिला का सबसे बड़ा सवर्ण बहुल गाँव और मतदान के मामले में पीछे ! आखिर गाँव के दोनों खेमे (बीजेपी और जदयू) में वोटों का बटवारा कर थम्पीइंग मतदान करने का गुप्त समझौता हो गया। तीसरा उम्मीदवार का समर्थक? उसमें तो एक ही सवर्ण था जिसने सौ से डेढ़ सौ वोट के लिए राजद उम्मीदवार से पैसे लिए थे और वो टारगेट वह मुसहरों और दलितों के वोट के सहारे पूरा कर चुका था। लेकिन एक और रोड़ा था, ??

मेरे द्वारा नरेन्द्र मोदी के खिलाफ गुजरात के डेवलपमेंट मॉडल पर चलाये जा रहे जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय, दिल्ली विश्वविद्यालय और इंडियन इंस्टिट्यूट ऑफ़ मास कम्युनिकेशन के विद्यार्थियों के समग्र अभियान की खबर गाँव वालों को पहले से थी। मतदान के दिन एकाएक मुझे देखकर मतदान केंद्र पर जमे बीजेपी के समर्थक सबसे अधिक आशंकित थे। लोग मुझसे पूछ रहे थे कि मैंने किसको मतदान किया, जिस पर मेरे एक ही जवाब था "उसको जो बीजेपी के उम्मीदवार को हराने के सबसे करीब हो"। मामला साफ़ था, मैं उस तीसरे उम्मीदवार का समर्थन कर रहा था जिसे दलितों का ही कुछ वोट मिला था। लोग मेरे ऊपर व्यंगात्मक रूप से समाज-विरोधी (वर्ण-विरोधी) होने का आरोप लगा रहे थे पर साथ ही साथ मेरे शिक्षा के स्तर का सम्मान भी कर रहे थे और मेरे द्वारा मोदी विरोधी अभियानों का भी सम्मान कर रहे थे। वो इस बात का भी सम्मान कर रहे थे कि मैं किसी एक खास उम्मीदवार को मतदान करने का आग्रह किसी से नहीं कर रहा था। उन्हें ये भी पता चल गया था कि जब मैं सुबह दलितों की बस्ती में गया था तो वहां के दलितों ने मुझसे यह सलाह मांगी कि वो किस मतदान करें तो मैंने उन्हें सलाह देने से मना कर दिया था और उनसे कहा कि ये अधिकार उनका है और ये फैसला उनको ही लेना है। मैंने सिर्फ उनसे इतना ही कहा कि गुजरात में मोदी जी की सरकार दलितों और आदिवासियों के लिए ही सर्वाधिक घातक रही है।

खैर, इधर मतदान केंद्र पर बीजेपी और जद यू के समर्थक मुझसे राजनीतिक बहस के बहाने या किसी कार्य के बहाने मुझे उलझाने की कोशिश में लगे थे। अब तक गाँव के लोगो ने गाँव के दो में से एक बूथ के सभी मतदान कर्मियों और शुराक्षकर्मियों से तालमेल बना लिया था। मैंने भी स्थिति भांप ली थी और लगातार मतदान केंद्र का चक्कर लगा रहा था। शुरक्षाकर्मी मुझे देखते ही भड़क जा रहे थे। इस बीच उनसे मेरी तीन चार बार झड़प हो चुकी थी। वो सभी लोगों को तो बिना रोके टोके मतदान केंद्र के अन्दर आने जाने दे रहे थे पर मुझे मतदान केंद्र के आस पास देखते ही चौकन्ने होकर मुझे केंद्र से दूर करने लगते थे। उसी दौरान मैंने मतदान भवन की खिड़की से थम्पीइंग होते देख लिया। इस बार मैं बेधड़क मतदान केंद्र में घुस गया और सुरक्षाकर्मियों समेत मतदान कर्मियों पर बरस पड़ा। खतरा देख सुरक्षाकर्मी मुझे मतदान केंद्र के अन्दर ही रहकर सब कुछ पर निगाह रखने को कहने लगे। पर बीजेपी और जद यू दोनों के समर्थक इससे होने वाले नुकसान को भांप गए। गाँव के कुछ लोग मेरे ऊपर हावी होने की कोशिश की पर समझदार लोगों ने मुझे समझा बुझाकर मनाने की कोशिश की। पर जब मैंने किसी की न सुनी तो गाँव वालों का साथ पाकर सुरक्षाकर्मी मेरे पर हावी होने लगे और मुझे जबरदस्ती मतदान केंद्र से बाहर करने लगे।

इस बीच ना जाने कहाँ से गाँव के कुछ लोग मेरे समर्थन में भी खड़े हो गए थे। मैंने इलेक्शन कमीशन के जिला कार्यालय में घटना की सूचना फ़ोन से दे दी और दस मिनट के अन्दर तीन गाड़ी सुरक्षाकर्मी और मतदान अधिकारी आ गए और मतदान खत्म होने के बाद ही वहां से गए। पर सवाल ये उठता है कि अगर मतदान केंद्र के अन्दर बैठ सभी मतदान कर्मी मिले हो तो कोई कितना रोक सकता है। मैं रात की ट्रेन पकड़ कर ही दिल्ली आ गया पर बाद में फ़ोन पर पता चला कि अतिरिक्त सुरक्षाकर्मियों के आने के बाद भी कुछ अनुचित मतदान हुए थे। हुआ यूं कि सुरक्षाकर्मी  वोटिंग मशीन के पास तो होते नहीं थे जिसका फायदा उठाकर मतदान पीठासीन अधिकार एक एक मतदाता के वोटिंग मशीन के पास जाने के बाद लगातार दस दस बार वोटिंग नियंत्रण मशीन दबाकर उन्हें दस दस वोट देने दिया।

खींच-तान कर गाँव में लगभग 50% मतदान हुआ। पूरे गाँव में शर्मिंदगी की लहर है कि ढाई हजार से ऊपर मतदाता होने के वावजूद गाँव से सिर्फ 1226 वोट ही पड़ पाए जबकि पड़ोस के ही एक अन्य सवर्ण बहुल गाँव में कुल 1900 मतदाता में से पंद्रह सौ से भी अधिक मतदान हुआ। गाँव के लोग इस बात से शर्मिंदा हैं कि वो भूमिहार समाज को और अपने उम्मीदवार गिरिराज सिंह को क्या मुंह दिखायेंगे। पर मैं इस बात से शर्मिंदा हूँ कि क्या यही है हमारी दुनियां का सबसे मजबूत लोकतंत्र?

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संजीव कुमार, लेखक रंगकर्मी व सामाजिक कार्यकर्ता हैं व छात्रों के मंच "भई भोर" व "जागृति नाट्य मंच" के संस्थापक सदस्य हैं।