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Wednesday, July 29, 2015

अपमान, बेदखली, जातीय अत्याचार, आगजनी, फौजी कब्जा, मजलूमों की पीट पीट कर होने वाली हत्याएं, जनसंहार, हत्या, जेल, फांसी: यह इस मुल्क का सामूहिक विवेक है. याकूब मेमन की फांसी कुछ घंटे पहले, विष्णु शर्मा ने इस मुल्क में एक मुसलमान और उसमें भी एक कश्मीरी मुसलमान की आजमाइश का एक खाका खींचने की कोशिश की है. भाग-1


सामूहिक विवेक

Posted by Reyaz-ul-haque on 7/29/2015 06:46:00 PM
अपमान, बेदखली, जातीय अत्याचार, आगजनी, फौजी कब्जा, मजलूमों की पीट पीट कर होने वाली हत्याएं, जनसंहार, हत्या, जेल, फांसी: यह इस मुल्क का सामूहिक विवेक है. याकूब मेमन की फांसी कुछ घंटे पहले, विष्णु शर्मा ने इस मुल्क में एक मुसलमान और उसमें भी एक कश्मीरी मुसलमान की आजमाइश का एक खाका खींचने की कोशिश की है. 

भाग-1

‘अफजल गुरु की फांसी पर तुम क्या कहते हो, यासिर’, उसने पूछ ही लिया। सुबह जब से टीवी में यह समाचार आना शुरू हुआ है तब से अफलज की मौत पर मैंने उतना नहीं सोचा जितना इस सवाल के पूछे जाने के बारे में! मेरे नाम यासिर है और मैं कश्मीरी हूं। क्या इसलिए यह जरूरी है कि कसाब, यासिन मलिक, हाफिज सईद पर मेरे पास हमेशा एक जवाब हो। और यह भी कि जवाब देते वक्त मेरी शक्ल में ‘सॉरी’ शब्द का एक एक हर्फ साफ दिखाई देता हो। SORRY

हमारा एक दफ्तर है। दफ्तर में हम सात लोग हैं। समाचार चैनल के इस ब्यूरो में बस मेरा ही नाम यासिर है और मैं ही कश्मीरी हूं। अब पूरा एक साल होने को है मुझे यहां काम करते हुए और अब मुझे यह पता होता है कि किन खबरों पर चार गर्दनें मेरी ओर घूम जाती हैं। मुझे अहसास हो ही जाता है। मुझे मुड़ कर देखना नहीं पड़ता। मैं कीबोर्ड पर उंगलियां ठकठकता रहता हूं। मुझे पता है इतने दिनों में ये चार गर्दनें भी इतनी ‘संवेदशील’ हो गई हैं कि घूमने के लिए अक्ल के हुक्म की मोहताज नहीं हैं। बस झट से घूम जाती हैं। मेरे पड़ोस में रहने वाले फैज़ के कुत्ते की तरह। हाथ में कुछ हो न हो बस फेंकने का इशारा करो और वो लेने दौड़ पड़ता है।

आपस में ये लोग कैसी बातें करते हैं?

‘तिलक, वो फिल्म देखी?’

‘न मोहन भाई, टाईम ही नहीं मिला।’

‘किसी दिन वल्लभ के घर पार्टी करते है, क्यों जवाहर?’

‘किसी और दिन क्यों आज ही चलों।’

लेकिन मेरे पहुंचते ही जैसे पाकिस्तान ने हमला कर दिया हो। अचानक सब के सब देशभक्त हो जाते हैं।

‘क्यों यासिर, कब तक ऐसा चलेगा यार?’

‘क्या?’

‘यही यार सालों ने सर काट दिए हमारे जवानों के। मतलब ह्यूमन राईट्स कोई चीज है कि नहीं।’

मैंने भी तो सुन रक्खा है इस ह्यूमन राईट्स के बारे में। अक्सर इसे बोलते भी सुना है। पर न जाने क्यों यहां इसकी भाषा हमेशा हिंदी होती है। जैसे ही यह भाषा बदलता है वैसे ही राईट्स का तलफ्फुज़ बगावत हो जाता है। और बागी की सजा मौत है।

फिर ऐसा नहीं है कि तिलक, मोहन, वल्लभ और जवाहर को ह्यूमन राईट्स की, अभिव्यक्ति की आजादी की चिंता नहीं है। है। अभी हाल में इन लोगों ने ‘विश्वरूपम्’ पर लगी रोक के खिलाफ खूब नारेबाजी की थी। मुफ्ती आज़म ने जब कश्मीरी बैंड के खिलाफ फतवा जारी किया था तब भी इन लोगों ने जमीन-आसमान एक कर दिया। ‘कानून से बड़ा कोई नहीं हैं’, वल्लभ ने कहा था। जिसे अन्य तीनों ने हर थोड़े अंतराल के बाद दोहराया था। फिर सबने मिल कहा था, ‘साला इस देश का गृह मंत्री है कि पाकिस्तान का? कुछ नहीं मिला कहने को तो ‘हिंदू आतंकवाद’ कह दिया। ऐसे साले गद्दारों को तो चैराहे पर फांसी देनी चाहिए। क्यों यासिर?’

मैं क्या कहता? कह तो देता कि तुम साले गृह मंत्री के बयान के जीते जागते सबूत हो। पूछ तो लेता कि क्या उस दाढ़ियल गुजराती से, जो हर दशहरा वाले दिन हथियारों की पूजा करता है, जिसके लिए तुम्हारे दिल दिवानों की तरह धड़कते है, असंख्यक लोग आतंकित नहीं रहते हैं। मैं पूछना चाहता था कि कैसे यह आतंकवाद नहीं है, लेकिन मैने जाने दिया। एक बार ऐसा कहा था, तो तिलक चीखने लगा। ‘तो तू क्यों नहीं चला जाता पाकिस्तान। तुम लोग यहां रहते क्यों हो। साले खाते यहां का हो लेकिन सोचोगे वहां के बारे में। कुछ तो शर्म करो बे।’

ऐसा नहीं है कि उसने इस सब के लिए बाद में माफी नहीं मांगी। उसने बाद में आ कर कहा था, ‘सॉरी यार मैंने कुछ ज्यादा ही कह दिया। लेकिन तू देख तो रहा है न, क्या हो रहा है इस देश में? मैं तुझे कुछ नहीं कह रहा। तू तो हमारा अपना है। लेकिन कुछ लोग समझते नहीं कि उनके एक कदम से सारी कौम का नाम खराब होता है।’ मैने इस बार भी कुछ नहीं कहा बस सर हिलाता रहा। शायद उन्हें उम्मीद है कि एक दिन मैं भी ए वेन्सडे फिल्म का नसीरूद्दीन शाह बनूंगा।

भाग-2

इस शहर में यह मेरा दूसरा साल है। मैं तो आना ही नहीं चाहता था। मां ने मिन्नतें कीं तो चला आया। वहां रह भी कहां पाता। गुमशुदा हो जाता, मर जाता या खामोश हो जाता। वहां बाजार जाते वक्त, स्कूल जाते वक्त सतर्क रहना पड़ता है। एक दिन ‘अबे बहनचोद, उधर से निकल’, सुनते ही मैं लौट आया था और फिर कभी बाजार नहीं गया। यहां भी बाजार कभी नहीं जाता। चुपचाप अपने कमरे में लेटा टीवी देखता रहता हूं। वहां पुलिस के हाथों में बंदूक है, यहां के लोग पुलिस की आखें हैं।

जब से आईआईएमसी में दाखिला लिया तभी से ज़ाकिर नगर के इसी कमरे में रहता हूं। जाना चाहता हूं यहां से पर जा नहीं पा रहा हूं। शुरू शुरू में यह शहर कितना खुशनुमा लगता था। बाद में मैं इससे भी डरने लगा। दो चार लोग एक साथ ऊपर नीचे होते हैं तो लगता है किसी की तलाशी हो रही है, किसी को लेने आए हैं। मगर शुरू में ऐसा बिलकुल नहीं था। मैं कॉलेज के बाद अक्सर सीसी बाजार चला जाता था। लोगों से मुलाकात करता था। फिल्म देखने जाता था। लेकिन उस दिन जैसी बात उस रेढ़ी वाले ने की उसके बाद सीसी को मैने अलविदा कह दिया। भाई दिल्ली घूमने आए थे। हम उनके लिए एक पैंट खरीद कर लाए। पैंट पीछे से फटी निकली। लौटाने गए तो साले ने लेने से ही मना कर दिया। मन तो किया कि साले को पीट दूं लेकिन फिर मकान मालिक की वह बात याद आ गई जो उसने मकान किराए से देते हुए कही थी। ‘देखों भाई, सब कुछ करो लेकिन पुलिस घर पर नहीं आनी चाहिए। हमें यहीं रहना है।’ हम दोनों भाई लौट आए। पैंट मैंने रिक्शे में ही छोड़ दी।

हिंदुस्तान में केरल है, मुम्बई है और भी बहुत सी जगहें हैं जहां मैं जाना चाहता हूं। मेरे मुल्क के लोग जाते हैं। लेकिन कोई अकेला नहीं जाता। हमें साथ चलना होता है। अब मैं अकेला रहता हूं इसलिए कहीं नहीं जाता। हर तीन-चार माह में एक बार कश्मीर जाता हूं। फिर आ जाता हूं।

भाग-3

अक्सर मुझे कुछ भले लोग मिलते हैं। मेरे दोस्त बन जाते हैं। लेकिन फिर न जाने क्यों मुझे यह यकीन दिलाने के लिए कि वे मेरे अच्छे दोस्त हैं मुझ से कुरआन मांगते है। कुरआन तो कहीं भी मिल सकता है। पढ़ने के लिए मेरा ही इंतजार कर रहे थे क्या। मैं फिर भी कहीं से ढूंढ़ कर ला देता हूं।

‘यार देखो, सभी धर्मों में एक ही बात है।’ उसने कुरआन हाथ में लेते हुए कहा।

‘जी’, मैंने उसका दिल रखने के लिए कह दिया।

‘कब तक हम आपस में लड़ते रहेंगे, भाई? हमें मिल कर रहना सीखना होगा। हमारे नौजवान भटके हुए है।’

‘मैं आप की इस बात से एकदम सहमत हूं’, मैंने उससे कहा।

‘एकदम’, उसने एक बड़े भाई की तरह मेरे कंधों पर हाथ रख दिया।

मैंने फिर कहना शुरू कर दियाः ‘न जाने क्या पढ़ाया जाता है इन्हें। न इतिहास का पता है, न भूगोल का। बस कश्मीर हमारा, कश्मीर हमारा की रट लगाए रहते हैं।’

‘बिलकुल।’

‘हां। अरे, कब से कश्मीर तुम्हारा हो गया। कश्मीर कश्मीरियों का है। जबरन सेना घुसेड़ दी, कब्जा कर लिया। कलम तुम्हारा, कागज़ तुम्हारा लिख दिया कश्मीर हमारा। खुद ही इन लोगों ने हिंदोस्तान का ऐसा नक्शा बनाया कि वह वह ‘मां’ दिखाई देने लगा। अरे कौन समझाए इन लोगों को कि धरती गोल है। जो तुम्हें सर दिखता है वह दूसरे को पैर दिखता है, तीसरे को...।’ मैं ऐसा कह ही रहा था कि वह उठ कर चला गया। कुरआन ले जाना भी भूल गया।

भाग-4

‘स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है’, तिलक ने कोई आठ-नौ बार कहा था लेकिन ठीक से नहीं हो पाया। भगत सर ने मुझसे कहा कहने के लिए तो मैंने एक ही बार में ठीक से कह दिया। उन्होंने मुझे तिलक का रोल दे दिया। हम सब आईआईएमसी के वार्षिक समारोह की तैयारी कर रहे थे। उस साल के समारोह का थीम ‘1857’ था। भगत सर का लिखा नाटक 1857 से 30 जनवरी 1948 के हिंदुस्तानी इतिहास की झांकी था।

आनंद, जो अंग्रेज बना था, मोहन, जो गांधी बना था, से कहता हैः ‘अगर अंग्रेज हिंदुस्तान से चले गए तो यहां निरंकुशों का राज हो जाएगा। हैंडिल नहीं कर पाओगे तुम।’

गांधी के किरदार में मोहन कहता है, ‘मैं विदेशी दयावान मालिकों की अपेक्षा स्वदेशी निरंकुशों के अधीन रहना अधिक पसंद करूंगा।’

हमने वह नाटक बामुश्किल एक साल पहले खेला था लेकिन इन सालों को कुछ याद ही नहीं है। अभी अभी कुछ ही दिन पहले ये मोहन इसी न्यूज रूम में चीख रहा था, ‘कश्मीर को एक मिनट के लिए हिंदुस्तान से अलग कर दो, साले चला नहीं पाएंगे।’ और इस तिलक के बच्चे के लिए ‘स्वराज’ कहने वाला हर कश्मीरी आतंकवादी है। कभी कभी सोचता हूं इतिहास का कोई मतलब-वतलब होता भी है कि नहीं।

वापस: भाग-1

‘अफजल गुरु की फांसी पर तुम क्या कहते हो, यासिर?’

‘मुझे क्या कहना चाहिए, मालिक?’

‘भाजपा से सारे चुनावी मुद्दे छीन लिए कांग्रेस ने।’

‘यही तो मैं कहना चाहता था। अफजल आतंकी नहीं था। वो एक चुनावी मुद्दा था। कल तक मारा नहीं यह सोच कर कि वोटों पर असर पड़ेगा। आज मार दिया कि वोटों पर असर पड़ेगा। सालों, वह आदमी था, मेंढक नहीं कि उस पर लोकतंत्र का प्रयोग कर रहे थे तुम लोग। साले आतंकियों, कितनी दहशत फैलाओगे बे तुम लोग।’

‘ये क्या बोल रहा है, भाई तू?’

‘चुपबे साले। एक बार और मुझे भाई कहा ना तो तेरा वो हाल करूंगा कि...’

तिलक, जवाहर और वल्लभ सब अपनी अपनी अपनी सीटों पर जा कर बैठ गए। अब साले कम से कम मेरे आगे तो कुछ नहीं बोलेंगे। अब भले एक दिन ये लोग मुझे भी सूली पर लटका ही क्यों न दें।
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