Sustain Humanity


Monday, September 12, 2016

बाघ खा जायेगा, यह डर भी राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन से मिलने के मौका खोने के लिए काफी नहीं था! पलाश विश्वास

बाघ खा जायेगा, यह डर भी राष्ट्रपति डा. राधाकृष्णन से मिलने के मौका खोने के लिए काफी नहीं था!

पलाश विश्वास

जब हमने होश संभाला, तब भारत के राष्ट्रपति थे डाः सर्वपल्ली राधाकृष्णन।डॉक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन (५ सितम्बर १८८८ – १७ अप्रैल १९७५) भारत के प्रथम उप-राष्ट्रपति (१९५२ - १९६२) और द्वितीय राष्ट्रपति रहे। उनका जन्म दक्षिण भारत के तिरुत्तनि स्थान मे हुआ था जो चेन्नई से ६४ किमी उत्तर-पूर्व मे है। उनका जन्मदिन (५ सितम्बर) भारत में शिक्षक दिवस के रूप में मनाया जाता है। विश्वभर में बाहैसियत दार्शनिक जिनकी साख अभी बनी हुई​ ​ है। तब शायद में तीसरी में पढ़ता था। हरिदासपुर हाईस्कूल में।१९६४- ६५ की बात होगी।आज जैसे हम अपने गांव बसंतीपुर  से सीधे​ ​ सात किमी दूर पंतनगर विश्वविद्यालय जा सकते हैं, उस वक्त ऐसी सुविधा नहीं थी।सड़कें ही नहीं थीं।रूद्रपुर होकर जाना होता था। करीब १८ मील का रास्ता। जंगल से होकर गुजरना होता था। रास्ते में राहजनी का डर तो था ही, उन दिनों बाघ का आतंक भी था। कुछ ही दिन पहले मेरे सहपाठी शिवपुर के वरुण और मदन के बड़े भाई ​​को रूद्रपुर के रास्ते शाम को बाघ खा गया था।वे डाकघर में काम करते थे। दोस्तों के साथ रूद्रपुर से इवनिंग शो की फिल्म देखकर लौट रहे थे। वे सबसे पीछे थे। बाघ ने उनको दबोच​ ​ लिया तो बाकी लोगों के लिए करने को कुछ नहीं था। अगले दिन कास के जंगल में उनकी अधखायी लाश मिली थी। बाघ मारने शिकारी भी​ ​ बुलाया गया, पर बाघ का अता पता नहीं चला।और तो और, हमारे गांव और बगल के अर्जुनपुर के बीच पहाड़ी नदी के किनारे एक बाघ मारा​ ​ भी गया था। लेकिन पंतनगर विश्वविद्यालय में राष्ट्रपति दीक्षांत समारोह में आ रहे हैं और पिताजी उनसे मिलने जा रहे हैं, इस सूचना ने​ ​ हममें इतनी सनसनी भर दी कि बाघ का डर भी काफूर हो गया। हमने तुरंत तय कर लिया कि हमें राष्ट्रपति से जरूर मिलना है।वैसे में पिताजी के साथ कहीं भी निकल पड़ने में कोई डर महसूस नहीं करता था। उनके साथ कई कई दिनों तक चलने वाली पंचायत में भी मैं दूर के गांव तक चला जाया करता था। हर साल रूद्रपुर के ही अटरिया मेला तो जाना तय ही था, वहां से रात को ही साईकिल पर उसी रास्ते से लौटना होता था और बाघ का डर वही था।इसलिए अपनी जिद पर कायम रहने के लिए मुझे कुछ ज्यादा बहादुरी की जरुरत भी नहीं थी।

आंधी पानी का मौसम। पिताजी हमें अपने साथ ले जाने का जोखिम उठाना नहीं चाहते थे।क्योंकि कार्यक्रम शाम का था, लौटने में देर रात ​​हो जानी थी। मैं स्कूल से लौटकर अपने साथियों के साथ कबड्डी खेलने लगा। एकदम कीचड़ से लथपथ। तभी खबर मिली कि पिताजी अपने एक साथी के साथ साईकिल से पंतनगर के लिए रवाना हो गये। मैं बिना घर लौटे, उसी हालत में भूत की तरह पीछे पीछे दौड़ पड़ा और पिताजी को रास्ते में मीलभर दौड़कर पकड़ ही लिया। उन्हें घर लौटना पड़ा। मैं नहा धोकर साईकिल के कैरियर पर सवार होकर राष्ट्रपति दर्शन को निकल ही पड़ा।तय था कि पिताजी के मित्र बरेली से पीटीआई के संवाददाता एनएम मुखर्जी राष्ट्रपति से मुलाकात के लिए वक्त लेकर रहेंगे। पर हुआ यह​ ​ कि राष्ट्र्पति अचानक अस्वस्थ हो जाने की वजह से नहीं आये। उनकी जगह दीक्षांत समारोह में उप राष्ट्रपति डा. जाकिर हुसैन आये। उनसे मुलाकात तो नहीं हो सकी, लेकिन मुखर्जी साहब ने उनका दीक्षांत भाषण सुनने का इंतजाम जरूर करा दिया। इसीसे हम जोश में भर गये। कार्यक्रम समाप्त होते न होते आंधी पानी की शुरुआत हो गयी। पंतनगर में तब कोई परिचित नहीं था। कम से कम रूद्रपुर तक जरूर आना था,जहां शरणार्थी शिविर की हाल ही में स्थापना हो गयी थी।

मैं मना रहा था कि किसी तरह रूद्रपुर पहुंच जाये। सुबह घर जा सकते हैं। आंधी काफी तेज थी। पानी भी खूब ​​बरस रहा था।ऊपर से जंगल का रास्ता। घुप्प अंधेरा। तेज दौड़तीं गाड़ियों की रोशनी से ही साइकिलें चल रही थीं, जो रूद्रपुर में भी नहीं ​
​रुकी। हम कौए की तरह भीगे हुए बाघ का आतंक पार कर घर लौटे आधी रात के करीब।​डाक्टर राधाकृष्णन समस्त विश्व को एक शिक्षालय मानते थे । उनकी मान्यता थी कि शिक्षा के द्वारा ही मानव दिमाग़ का सद उपयोग किया जाना संभव है । इसीलिए समस्त विश्व को एक इकाई समझकर ही शिक्षा का प्रबंधन किया जाना चाहिए । एक बार ब्रीटेनके एडिनबरा विश्वविधायालय मे भाषण देते हुए डाक्टर सर्वपल्ली राधाकृष्णन ने कहा था कि मानव को एक होना चाहिए । मानव इतिहास का संपूर्ण लक्ष्य मानव जाती कि मुक्ति है । जब देशो कि नीतियो का आधार विश्व शांति कि स्थापना का प्रयत्न करना हो । डॉ. राधाकृष्णन अपनी बुद्धिमतापूर्ण व्याख्याओं, आनंददायी अभिव्यक्ति और हँसाने, गुदगुदाने वाली कहानियों से अपने छात्रों को मंत्रमुग्ध कर दिया करते थे। वे छात्रों को प्रेरित करते थे कि वे उच्च नैतिक मूल्यों को अपने आचरण में उतारें। वे जिस विषय को पढ़ाते थे, पढ़ाने के पहले स्वयं उसका अच्छा अध्ययन करते थे। दर्शन जैसे गंभीर विषय को भी वे अपनी शैली की नवीनता से सरल और रोचक बना देते थे।
​​
​तब हम नागरिक शास्त्र या राजनीति विज्ञान नहीं पढ़ रहे थे। किसी प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री से मिलने के लिए हमने कभी ऐसी जिद की हो, याद नहीं आता। वैसे घर में राजनेताओं का आना जाना लगा ही रहता था। हमने नारायण दत्त तिवारी और कृष्ण चंद्र पंत  को भी कभी ज्यादा भाव​ ​ नहीं दिये। लेकिन राष्ट्रपति के बारे में एक उत्तेजक आदर भाव जरूर था, जो नेहरु के लिए भी नहीं था। क्या यह इसलिए कि तब राष्ट्रपति कोई राजनेता नहीं थे, बल्कि राजनीति से परे सार्वजनिक जीवन के निर्विवाद आइकन। बचपन में कोई विचारधारा दिमाग में तो थी नहीं, लेकिन देश के प्रथम नागरिक के प्रति असंभव सम्मानभाव था।​​भारत के राष्ट्रपति या भारतीय राष्ट्रपति राष्ट्रप्रमुख और भारत के प्रथम नागरिक हैं, साथ ही भारतीय सशस्त्र सेनाओं के प्रमुख सेनापति भी हैं। सिद्धांतः राष्ट्रपति के पास पर्याप्त शक्ति होती है। पर कुछ अपवादों के अलावा राष्ट्रपति के पद में निहित अधिकांश अधिकार वास्तव में प्रधानमंत्री की अध्यक्षता वाले मंत्रिपरिषद के द्वारा उपयोग किए जाते हैं।राष्ट्रपति को भारत के संसद के दोनो सदनों (लोक सभा और राज्य सभा) तथा साथ ही राज्य विधायिकाओं (विधान सभाओं) के निर्वाचित सदस्यों द्वारा पाँच वर्ष की अवधि के लिए चुना जाता है। पदधारकों को पुनः चुनाव में खड़े होने की अनुमति दी गई है। वोट आवंटित करने के लिए एक फार्मूला इस्तेमाल किया गया है ताकि हर राज्य की जनसंख्या और उस राज्य से विधानसभा के सदस्यों द्वारा वोट डालने की संख्या के बीच एक अनुपात रहे और राज्य विधानसभाओं के सदस्यों और राष्ट्रीय सांसदों के बीच एक समानुपात बनी रहे। अगर किसी उम्मीदवार को बहुमत प्राप्त नहीं होती है तो एक स्थापित प्रणाली है जिससे हारने वाले उम्मीदवारों को प्रतियोगिता से हटा दिया जाता है और उनको मिले वोट अन्य उम्मीदवारों को तबतक हस्तांतरित होता है, जबतक किसी एक को बहुमत नहीं मिलती। उपराष्ट्रपति को लोक सभा और राज्य सभा के सभी (निर्वाचित और नामजद) सदस्यों द्वारा एक सीधे मतदान द्वारा चुना जाता है।भारत के राष्ट्रपति नई दिल्ली स्थित राष्ट्रपति भवन में रहते हैं, जिसे रायसीना हिल के नाम से भी जाना जाता है। राष्ट्रपति अधिकतम दो कार्यकाल तक हीं पद पर रह सकते हैं। अब तक केवल पहले राष्ट्रपति डा. राजेंद्र प्रसाद ने हीं इस पद पर दो कार्यकाल पूरा किया है।उस वक्त हमें यह ब्यौरा मालूम न था।

राष्ट्रपति पद को लेकर जब पहलीबार विवाद शुरू हुआ डा. जाकिर हुसैन के निधन के बाद, तब भी हम प्राइमरी स्कूल हरिदासपुर के छात्र थे।​​ डा​. वीवी गिरि को इंदिरा गांधी ने अपनी मर्जी से राष्ट्रपति बनाया तो कांग्रेस का विभाजन ही हो गया। लेकिन जनज्वार पर सवार इंदिरा​ ​ गांधी को १९७४ तक ज्यादा चुनौतियों का सामना नहीं करना पड़ा। विवादित ढंग से चुने जाने के बावजूद डा. गिरि के समय तक राष्ट्रपति वाकई देश के पहले नागरिक हुआ करते थे। याद रहे कि 1969 में राष्ट्रपति पद का चुनाव हुआ था। प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने इस पद के लिए पहले नीलम संजीव रेड्डी का नाम सुझाया था। पर बाद में उन्हें लगा कि रेड्डी स्वतंत्र विचार के व्यक्ति हैं और उनकी हर बात नहीं मानेंगे, इसलिए इंदिरा जी ने निर्दलीय उम्मीदवार वीवी गिरि का समर्थन कर दिया। इंदिरा गांधी ने अपने दल के सांसदों व विधायकों यानी मतदाताओं से अपील कर दी कि वे अपनी अंतरात्मा की आवाज पर वोट दें।इस सवाल पर कांग्रेस में फ़ूट पड़ गयी और कुछ अन्य दलों की मदद से इंदिरा गांधी ने श्री गिरि को विजयी बनवा दिया।बाद में गिरि के चुनाव को चुनौती देते हुए याचिका दायर कर दी गयी। याचिका में मुख्य आरोप यह लगा कि राष्ट्रपति के चुनाव प्रचार के दौरान ऐसे परचे छापे और वितरित किये गये जो संजीव रेड्डी के चरित्र को लांछित करते थे। श्री रेड्डी कांग्रेस के ऑफ़िसियल उम्मीदवार थे। इस मामले की सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति एसएम सिकरी की अध्यक्षता में पांच सदस्यीय पीठ का गठन किया गया। मुकदमा सोलह सप्ताह तक चला. सी के दफ्तरी गिरि के वकील थे। मुकदमे में 116 गवाहों के बयान हुए। इक्कीस दस्तावेज पेश किये गये. अंतत सुप्रीम कोर्ट ने गिरि के खिलाफ़ पेश याचिकाएं खारिज कर दीं।
​​
​लेकिन आपातकाल के पतवे पर जिसतरह तत्कालीन राष्ट्रपति फखरुद्दीन अली अहमद से दस्तखत कराये गये, उससे राष्ट्रपति पद की गरिमा जो गिरने लगी , उसमें फिर कोई ठहराव नहीं आया। बतौर संस्था राष्ट्रपति पद आलंकारिक भी नहीं रहा। उसके सारे अलंकार सत्ता दल के हितों के लिए गिरवी पर रखे जाते रहे।प्रसिद्ध वैज्ञानिक डा.एपीजे अब्दुल कलाम के कार्यकाल में थोड़ा फर्क जरूर महसूस हुआ। लेकिन तरह तरह के कोटे और राजनीतिक समीकरण से जैसे सत्तादल ने देश के सर्वोच्च पद की गरिमा खत्म कर दी, वह बेनजीर है। दलित राष्ट्रपति के बाद पहली महिला राष्ट्रपति का कार्यकाल भी हमने देख लिया। दलित राष्ट्रपति हो जाने से भारत में जाति प्रथा का उन्मूलन तो होना नहीं था, पर जीवन के विभिन्न क्षेत्रों में​ ​ बहिष्कृत, अस्पृश्य समुदायों के सशक्तिकरण की जरूर उम्मीद थी। इसीतरह पहली बार निर्वाचित महिला  राष्ट्रपति से देश को काफी कुछ​ ​ उम्मीदें थीं। लेकिन राष्ट्रपति प्रतिभा देवी पाटिल की भूमिका न सिर्फ पार्टी बल्कि कारपोरेट हितों के रक्षाकवच बनने तक में सीमित रह ​​गयी। उनका बेटा विवाद में फंसा और उन पर जमीन हड़पने तक के आरोप भी लगे।

कहा यह जा रहा है कि कुल मिलाकर कांग्रेस राष्ट्रपति पद के लिए दो उम्मीदवारों पर अपना दांव लगा सकती है। हालांकि इसकी आधिकारिक घोषणा अभी कांग्रेस ने नहीं की है पर कयास लगाया जा रहा है कि वह प्रधानमंत्री के तकनीकी सलाहकार सैम पित्रोदा पर अपना दांव लगा सकती है। हालांकि उसे उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी भी कम नहीं भा रहे हैं क्योंकि एक तो वह अल्पसंख्यक समुदाय से हैं दूसरे वर्तमान में वह उपराष्ट्रपति भी हैं। पर सैम पित्रोदा का यहां पलड़ा भारी दिख रहा है क्योंकि कांग्रेस के कई बैठकों में वह वतौर सदस्य शिरकत कर चुके हैं। इसलिए माना जा रहा है कि सैम को कांग्रेस राष्ट्रपति को अपना उम्मीदवार घोषित कर सकती है।सैम पित्रोदा कोई मामूली उम्मीदवार नहीं हैं। उनके तार वाशिंगटन से जु़ड़े हैं। कांग्रेस के लिए सबसे बड़े सरदर्द बनी ममता बनर्जी पित्रोदा की सलाह से ही पोरिबर्तन का माहौल बना रही हैं। पित्रौदा को उम्मीदवार बनाने पर ममता के लिए एतराज करना मुश्कल होगा। खुली अर्थव्यवस्था के पहले आइकन रहे हैं पित्रौदा, कांग्रेस उन्हें  उम्मीदवार   बनाये तो  विदेशी पूंजी और अमेरिका दोनों को आर्थिक सुधारों के भविष्य के बारे में आश्वस्त​ ​ किया जा सकेगा।

इस बार यह भी कहा जा रहा है कि किसी आदिवासी को राष्ट्रपति बनाने की तैयारी है।केंद्रीय कृषि मंत्री शरद पवार ने कहा कि देश के अगले राष्ट्रपति के लिए एक गैर राजनीतिक उम्मीदवार आदर्श पसंद हो सकता है। उन्होंने इस बात का खंडन किया कि उनकी पार्टी ने पीए संगमा का संभावित उम्मीदवार के रूप में समर्थन किया है।पवार ने नवी मुंबई में लड़कियों के हॉस्टल का उद्घाटन करने के बाद कहा, 'अगले राष्ट्रपति के लिए यूपीए और एनडीए दोनों के पास अपनी पसंद का उम्मीदवार जिताने के लिए आवश्यक संख्याबल नहीं है । इसलिए मैं समझता हूं कि एक गैर राजनीतिक व्यक्ति एक आदर्श पसंद हो सकता है।'

जब पूरे देशभर में जब आदिवासियों के विरुद्ध युद्ध जारी है, बाकी समुदायों से उनको अलग थलग रखा जा रहा है, संविधान की पांचवी या छठीं अनुसूची के तहत आदिवासियों को हासिल अधिकार कहीं नहीं मिल रहे। उनके जनप्रतिरोध को माओवादी करार देकर सैन्य दमन चल रहा है सर्वत्र, ऐसे संगीन हालात में किसी शिबू सोरेन, अजित जोगी या पीए संगमा को राष्ट्रपति बना दिये जाने से क्या हालात बदल जायेंगे?

अपने बचपन में आदमखोर बाघ से हम डरते नहीं थे। अब वे जंगल भी बचे नहीं हैं। पर सीमेंट का जो बीहड़ है और जिसपर प्रोमोटर बिल्डर राज का जो कब्जा है, उसके चप्पे चप्पे पर आदमखोरों का आतंक है और हम इस आतंक के साये में जीने को अभिशप्त हैं।


महाराष्ट्र सरकार द्वारा राष्ट्रपति प्रतिभा पाटील की बेटी की अगुवाई वाले एक ट्रस्ट को महंगी जमीन आवंटित करने के मामले पर विवाद शुरू हो गया है। पुणे जिले के के मुलशी तालुका स्थित जांभे गांव में दो व्यावसायिक रूप से अहम प्लॉट इस शैक्षिक ट्रस्ट को दिए गए हैं। ट्रस्ट में राष्ट्रपति पाटील की बेटी ज्योति राठौर के साथ-साथ महाराष्ट्र के ग्रामीण विकास मंत्री जयंत पाटील भी दखल रखते हैं।अखबारों में प्रकाशित एक खबर के मुताबिक ये दोनों प्लॉट मुंबई-पुणे हाईवे और हिंजेवाड़ी आईटी पार्क से 5 किलोमीटर के अंदर और प्रमुख औद्योगिक टाउनशिप पिंपरी और चिंचवड़ से 10 किलोमीटर के अंदर हैं।गांव वालों और ग्राम पंचायत के कुछ सदस्यों ने बताया कि मुंबई-पुणे एक्सप्रेस वे और आईटी पार्क से करीब होने की वजह से इस इलाके में जमीन की कीमत एक करोड़ रूपए प्रति एकड़ हो गई है। राठौर के महाराष्ट्र महिला उद्यम ट्रस्ट को 6.72 लाख रूपए में 7.93 हेक्टेयर का प्लॉट आवंटित किया गया है। इसमें मैदान के लिए 30 वर्षों तक दिया जाने वाला 1 रूपए सालाना किराया भी शामिल है। योजना के मुताबिक 27,300 वर्गमीटर जमीन का रेजिडेंशल स्कूल के लिए, 20,000 वर्ग मीटर कॉलेज के लिए और 32,000 वर्ग मीटर खेल के मैदान के लिए इस्तेमाल होना है। ​
​​
​अब फिर राष्ट्रपति पद का चुनाव सामने है।गौरतलब है कि राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल का कार्यकाल जुलाई महीने में खत्म हो रहा है। राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाले आवास को लेकर नए विवाद के घेरे में आ गई हैं। पुणे के पूर्व सैन्य अधिकारियों के एक संगठन का आरोप है कि श्रीमती पाटिल के लिए इस घर को बनाने के लिए पांच एकड़ भूमि एलाट की गई है। श्रीमती पाटिल इस वर्ष जुलाई में सेवानिवृत्त होंगी।सेवानिवृत्त लेफ्टीनेंट कर्नल सुरेश पाटिल का आरोप है कि पुणे में श्रीमती पाटिल का आवास बनवाने के लिए सरकार ने खड़की स्थित छावनी की 2.6 लाख वर्ग फुट जमीन एलाट की है। सुरेश पाटिल पुणे स्थित एक गैर सरकारी संगठन ग्रीन थंब के घटक जस्टिस फार जवान से जुड़े हैं। उनका कहना है कि इस जमीन पर करीब 4500 वर्ग फुट के हिस्से पर उनका घर बनवाने के लिए ब्रिटिश काल के दो बंगले गिरवा दिए गए।उन्होंने सवाल उठाया कि श्रीमती पाटिल के लिए यह घर बनवाने के लिए इतनी जमीन और एलाट करने की क्या जरूरत थी। उल्लेखनीय है हाल ही में एक आरटीआइ याचिका से प्रतिभा पाटिल की विदेश यात्राओं पर 205 करोड़ खर्च होने की बात सामने आई थी।सेवानिवृत्त कर्नल ने कहा कि उन्होंने इस मामले में सेना की दक्षिणी कमान के से सूचना के अधिकार के तहत कई बार जानकारी मांगी लेकिन कोई जबाव नहीं मिला।

पुणे के पास खडकी सैन्य छावनी में प्रतिभा पाटिल के लिए एक बंगला बन रहा है। 2.61 लाख वर्गफुट में बननेवाले इस बंगले में रिटायरमेन्ट के बाद प्रतिभा देवीसिंह पाटिल निवास करेंगी। उन्होंने इच्छा व्यक्त की है कि वे दिल्ली में रहने की बजाय पुणे में रहेंगी। लेकिन सेना की इस जमीन पर प्रतिभा ताई के लिए बननेवाला बंगला अवैध है। यह न सिर्फ सेना की जमीन पर गैरकानूनी से निर्मित किया जा रहा है बल्कि इसके लिए सेना ही अपने फण्ड से पैसे भी दे रही है।सामाजिक कार्यकर्ताओं और मीडिया द्वारा यह सवाल उठाये जाने पर प्रतिभा देवी सिंह पाटिल के लिए बन रहे भव्य आवास पर राष्ट्रपति भवन ने लंबी-चौड़ी सफाई दी है। उसका कहना है कि, "पुणे में लिया जाना वाला यह वर्तमान आवास एक घर है जिसमें पहले लेफ्टिनेंट कर्नल स्‍तर का अधिकारी रहता था। यह घर पुराना था। इसलिए इसे रहने के उपयुक्‍त बनाने के लिए इसकी मरम्‍मत आवश्‍यक थी। इसमें कुछ फेरबदल किए गए, ताकि सेवानिवृत्ति के बाद इसे राष्‍ट्रपति के निवास की आवश्‍यकता के अनुसार बनाया जा सके। राष्ट्रपति भवन ने यह भी कहा है कि, "राष्‍ट्रपति टैरिटोरियल सेना कैडिटों को उपलब्‍ध कराए जाने वाले निवास की राह में नहीं आ रही हैं। इसलिए यह कहना तर्कसंगत नहीं है कि राष्‍ट्रपति के निवास के लिए प्रयुक्‍त किया जाना वाला भूखंड केवल सैनिकों के आवास के लिए ही प्रयोग किया जाना चाहिए। चूंकि राष्‍ट्रपति ने कैंटोनमेंट एरिया में रहने की इच्‍छा जाहिर की है इसलिए उसे सैनिकों के कल्‍याण के प्रति उदासीनता और लापरवाही के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।"

लेकिन इस खबर को सबसे पहले उजागर करनेवाली पत्रिका मनीलाइफ की ताजा रिपोर्ट राष्ट्रपति भवन के इन दावों का खंडन करती है। उसमें तीन बातें खास तौर पर उठाई गई हैं। एक, रिटायरमेंट के बाद राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल के लिए बनाए जा रहे दो बंगले रक्षा भूमि की ए1 भूमि की श्रेणी में आते हैं। इसका कानूनी अभिप्राय यह हुआ कि इस भूमि का इस्तेमाल केवल सैनिक उद्देश्य के लिए हो सकता है। इसे किसी भी सूरत में सिविलियन इस्तेमाल में नहीं लाया जा सकता। सवाल उठता है कि क्या सेवानिवृत होने के बाद भी प्रतिभा देवी सिंह पाटिल सेना की सर्वोच्च कमांडर बनी रहेंगी? नहीं तो वे किस हैसियत से केवल सैनिक मकसद के लिए नियत भूमि पर घर बनाकर रह सकती हैं?

राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने सात समुंदर पार की खूब यात्राएं कीं। इन दौरों पर देश के सरकारी खजाने से तकरीबन 205 करोड़ रुपये खर्च हुए हैं। यह अपने आप में एक रेकॉर्ड है। उन्होंने इस मामले में देश के पूर्व राष्ट्रपतियों को काफी पीछे छोड़ दिया है। यह खुलासा सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) अर्जियों से हुआ है। ये अर्जियां 3 साल पहले डाली गई थीं, अधिकारियों ने इनका जवाब देने में कोई खास दिलचस्पी नहीं दिखाई थी।

आरटीआई के मुताबिक, राष्ट्रपति प्रतिभा पाटिल ने अपने कार्यकाल में 12 विदेश यात्राएं कीं। इस दौरान वह 79 दिन तक विदेशों में रहीं। राष्ट्रपति ने ब्राजील, मेक्सिको, चिली, भूटान, वियतनाम, इंडोनेशिया, स्पेन, पोलैंड, रूस, ताजिकिस्तान, ब्रिटेन, साइप्रस, चीन, लाओस, कंबोडिया, संयुक्त अरब अमीरात, सीरिया, मॉरिशस, साउथ कोरिया, स्विट्जरलैंड और ऑस्ट्रेलिया जैसे 22 देशों का दौरा किया।

राष्ट्रपति की विदेश यात्रा पर जो कुल 205 करोड़ रुपये खर्च किए गए, उनमें एयर इंडिया को 169 करोड़ चुकाए गए। अब भी एयर इंडिया के 16 करोड़ रुपये का बिल बाकी है। इस दौरान विदेश मंत्रालय ने ठहरने के इंतजाम, डेली अलाउंस और अन्य चीजों पर 36 करोड़ रुपये खर्च किए।

अब एक नजर पूर्व प्रेजिडेंट्स की विदेश यात्राओं पर
एपीजे अब्दुल कलामः कलाम ने अपने पूरे कार्यकाल के दौरान 7 विदेश यात्राएं कीं। वह 47 दिन तक 17 देशों के विदेशी दौरे पर रहे।

के.आर. नारायणनः पूर्व राष्ट्रपति के.आर. नारायणन ने 6 देशों का दौरा किया और वह 46 दिनों तक विदेश यात्रा की। इस दौरान उन्होंने 10 देशों का दौरा किया।

शंकर दयाल शर्माः पूर्व राष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा ने अपनी 5 साल की अवधि में 4 विदेशी यात्राएं कीं। उन्होंने 16 देशों का दौरा किया।

भारत के राष्ट्रपतियों की सूची
श्रीमती प्रतिभा पाटिल ने बुधवार को भारत के 12वें राष्ट्रपति (13वाँ कार्यकाल) पद की शपथ ग्रहण की। उनके पूर्ववर्ती राष्ट्रपतियों की सूची इस प्रकार है-

राजेन्द्र प्रसाद 26 जनवरी 1950 से 13मई 1962
सर्वपल्ली राधाकृष्णन 13 मई 1962 से 13 मई1967
जाकिर हुसैन 13 मई 1967 से 03 मई 1969
वीवी गिरि (कार्यवाहक) 3 मई 1969 से 20 जुलाई 1969
मोहम्मद हिदायतउल्ला (कार्यवाहक) 20 जुलाई 1969 से 24 अगस्त 1969
वीवी गिरि 24 अगस्त 1969 से 24 अगस्त 1974
फखरुद्‍दीन अली अहमद 24 अगस्त 1974 से 11 फरवरी 1977
बीडी जत्ती (कार्यवाहक) 11 फरवरी 1977 से 25 जुलाई 1977
नीलम संजीव रेड्‍डी 25 जुलाई 1977 से 25 जुलाई 1982
ज्ञानी जैलसिंह 25 जुलाई 1982 से 25 जुलाई 1987
रामास्वामी वेंकटरामन 25 जुलाई 1987 से 25 जुलाई 1992
शंकरदयाल शर्मा 25 जुलाई 1992 से 25 जुलाई 1997
केआर नारायणन 25 जुलाई 1997 से 25 जुलाई 2002
एपीजे अब्दुल कलाम 25 जुलाई 2002 से 25 जुलाई 2007

अब राष्ट्रपति पद को लेकर जो खिचड़ी पक रही है, उसमें राष्ट्रहित कम, राजनीतिक समीकरण और बाध्यताओं की गूंज ज्यादा है।जिस प्रकार पूर्व राष्ट्रपति वीवी गिरि और संजीव रेड्डी के चुनाव के समय कांग्रेस के नेताओं ने पार्टी से ऊपर उठकर वीवी गिरि को राष्ट्रपति बनाया था, उसी प्रकार इस बार भी कांग्रेस की पसंद का राष्ट्रपति बनना नामुमकिन हैं।मसलन बदले हुए हालात में उत्तर प्रदेश चुनाव में काग्रेस समेत दूसरे दलों को मात दे चुकी सपा अब राष्ट्रपति चुनाव में भी अपनी बड़ी भूमिका साबित करना चाहती है। राष्ट्रपति चुनाव जून में है, लेकिन राजनीतिक व रणनीतिक लिहाज से पार्टी ने अभी से दूसरे दलों को टटोलना शुरू कर दिया है। खास तौर पर उन दलों से जिन्हें काग्रेस से परहेज है। कोशिश राष्ट्रपति पद के लिए एक ऐसा प्रत्याशी सामने लाने की है, जिसका विरोध करना दूसरे दलों के लिए मुश्किल हो।अब जबकि राष्ट्रपति प्रतिभा देवी सिंह पाटिल का कार्यकाल खत्म होने में तीन महीने से भी कम समय रह गए हैं, ऐसे में उनके उत्तराधिकारी की संभावनाओं की चर्चा तेज होना लाजिमी है। राष्ट्रपति पद के लिए जो नाम सबसे ज्यादा चर्चा में हैं उनमें प्रसिद्ध तकनीक प्रचारक सैम पित्रोदा और उपराष्ट्रपति हामिद अंसारी का नाम है। पित्रोदा और अंसारी के अलावा प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह, वित्तमंत्री प्रणब मुखर्जी, पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम, मुख्य चुनाव आयुक्त एसवाई कुरैशी,पश्चिमी बंगाल के पूर्व गवर्नर गोपाल कृष्ण गांधी, रक्षा मंत्री एके एंटनी, कांग्रेसी सांसद करण सिंह, स्पीकर मीरा कुमार, पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल के नामों पर भी सुगबुगाहट है।दिल्ली में 10 जनपथ के करीबी होने की वजह से पंजाब के गवर्नर और नगर प्रशासक शिवराज पाटिल को देश का नया राष्ट्रपति बनाए जाने की प्रबल संभावना है।कांग्रेस पार्टी ने अगला राष्ट्रपति बनाने के लिए नए चेहरे की तलाश तेज कर दी है। इसके लिए कांग्रेस नेतृत्व संभावित नामों के प्लस व माइनस प्वाइंट पर डिटेल में चर्चा कर किसी एक पर सहमति बनाने में जुटा है। खासतौर पर ऐसे नाम का चयन करने के प्रयास हो रहे हैं जिस पर ज्यादा से ज्यादा सहयोगी दल सहमत हो सकें। लोकसभा चुनाव में दो साल का समय शेष रह गया है जिस वजह से राष्ट्रपति पद ऐसे व्यक्ति को सौंपने के प्रयास हो रहे हैं जो पार्टी को मजबूती दिला सके।कांग्रेस को अपना राष्ट्रपति बनाने के लिए समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी के समर्थन की जरूरत होगी। समाजवादी पार्टी के पूर्व राष्ट्रपति एपीजे अब्दुल कलाम या किसी अन्य नाम को समर्थन देने से कांग्रेस के समक्ष अपना राष्ट्रपति बनाने में मुसीबत खड़ी हो सकती है।

सूत्रों के मुताबिक सपा राष्ट्रपति चुनाव में अपनी भूमिका व प्रत्याशी को लेकर पूरी तरह गंभीर है। उस लिहाज से काम भी शुरू कर दिया गया है। बीते दिनों कोलकाता में तृणमूल काग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी से सपा के राज्यसभा सदस्य किरनमय नंद की मुलाकात वैसे तो शिष्टाचारवश थी, लेकिन बातचीत राष्ट्रपति चुनाव के मसले पर भी हुई।कई मामलों में केंद्र सरकार के सामने मुसीबत खड़ी करने वाली ममता बनर्जी राष्ट्रपति पद के लिए जुलाई में होने वाले चुनाव में भी मुलायम सिंह यादव का साथ देकर कांग्रेस के लिए परेशानी खड़ी कर सकती हैं। सपा की पूरी कोशिश दूसरे दलों के प्रमुख नेताओं से किसी एक प्रत्याशी के नाम पर सहमति बनाने की है। उसकी अनौपचारिक कोशिशें शुरू हो गई हैं।

आगामी 24 अप्रैल से संसद के बजट सत्र का दूसरा हिस्सा शुरू हो रहा है। उस दौरान सभी दलों के प्रमुख नेता दिल्ली में होंगे। यह मुहिम तब और रफ्तार पकड़ेगी। सपा यह मानकर चल रही है कि पूर्व राष्ट्रपति कलाम को एक बार फिर से राष्ट्रपति बनाने पर जरूरी नहीं है कि सभी दलों में सहमति बन ही जाए। या फिर कलाम खुद ही तैयार न हों। पार्टी की नजर में एक और प्रत्याशी है, वह भी मुस्लिम समुदाय से है। महत्वपूर्ण पद पर है, लेकिन राष्ट्रपति पद के चुनाव की घोषणा के पहले पार्टी उसके नाम का खुलासा नहीं करना चाहती। सपा को उम्मीद है कि उसकी तरफ से सुझाए प्रत्याशी के नाम पर शायद ही किसी दल की असहमति हो, लेकिन जब तक दूसरे दलों से पर्याप्त विचार-विमर्श नहीं हो जाता, पार्टी अपने पत्तों नहीं खोलना चाहेगी। विधानसभा चुनाव में भारी जीत में मुस्लिम मतदाताओं की अहम भूमिका को पार्टी ने काफी गंभीरता से लिया है। वह राष्ट्रपति चुनाव में भी अग्रणी भूमिका निभाकर अपनी जमीन को और मजबूत करना चाहती है।

इस बीच, भाजपा भी राष्ट्रपति चुनाव पर अपने पत्तो खोलने से बच रही है। पार्टी के एक नेता ने कहा, हो सकता है कि कोई चौंकाने वाला नाम आ जाए, जिस तरफ अभी किसी का ध्यान न हो।