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Saturday, October 1, 2016

हिंदुत्व की राजनैतिक ताकतों को हराने के लिए उत्तर प्रदेश में बसपा ही अभी अंतिम विकल्प : भंवर मेघवंशी

हिंदुत्व की राजनैतिक ताकतों को हराने के लिए उत्तर प्रदेश में बसपा ही अभी अंतिम विकल्प : भंवर मेघवंशी
भंवर मेघवंशी राजस्थान के प्रगतिशील दलित आंदोलन के एक प्रमुख स्तम्भ है और आज के हालातो पर उनकी लेखनी बेबाक जारी है। उन्होंने देश भर के जनांदोलनों के साथ लगातार हिस्सेदारी की है और गाँव गाँव साम्प्रदायिकता, जातिवाद, महिला हिंसा, वैश्वीकरण, विस्थापन आदि के प्रश्नों पर जनजागरण किया है. राजस्थान में भीलवाड़ा जिले के एक छोटे से गाँव सिरडीयास में 25 फरवरी 1975 को दलित बुनकर परिवार में जन्मे भंवर मेघवंशी को महज 13 साल की उम्र में ही कट्टरपंथी आर एस एस जैसे संगठन ने अपने साथ जोड़ लिया ,जिसके साथ उन्होंने तकरीबन पांच साल तक सक्रिय रूप से काम किया .वे अपने गाँव की शाखा के मुख्य शिक्षक रहे ,बाद में कार्यवाह बने और अंततः जिला कार्यालय प्रमुख के पद तक भी पंहुचे .उन्होंने बाबरी मस्जिद तोड़ने के लिए हुई पहली कारसेवा में भी शिरकत की ,मगर अयोध्या पंहुचने से पहले ही गिरफ्तार हुए तथा 10 दिन आगरा की जेल में रहे .बाद में एक घटना से उनका आर एस एस की दलित विरोधी सोच और नफरत एवं कट्टरता की विचारधारा से मोहभंग हो गया और उन्होंने संघ से अपना नाता तोड़ लिया और खुलकर आर एस एस का विरोध करना प्रारम्भ कर दिया .
आर एस एस छोड़ने के बाद मेघवंशी ने एक फुल टाइम कार्यकर्ता के रूप कौमी एकता ,भाईचारे और शांति एवं सदभाव के लिए काम शुरू किया जो आज तक जारी है .उन्होंने 2002 में गुजरात में हुए अल्पसंख्यकों के नरसंहार के विरुद्ध जमकर आवाज उठाई ,गुजरात पीड़ितों के लिए बने पीपुल्स ट्रिब्यूनल के सदस्यों के साथ दस्तावेजीकरण किया और लेख लिखे .साम्प्रदायिकता और जातिवाद के खिलाफ जमकर संघर्ष करते हुए उन्होंने 2000 से वर्ष 2012 तक डायमण्ड इंडिया नामक मासिक पत्रिका का संपादन एवं प्रकाशन किया .
भंवर मेघवंशी ने एक स्वतंत्र पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में सदैव अपनी कलम शांति ,आपसी सदभाव ,भाईचारे और सोहार्द्र के लिए काम किया। उन्होंने अल्पसंख्यक समुदाय के बारे में व्याप्त स्टीरियो टाईप मिथ्स को तोड़ने और सच्चाई को सामने लाने का काम किया है . भंवर जी से आज के ज्वलंत प्रश्नों पर मैंने विस्तारपूर्वक बातचीत की जो यहाँ प्रस्तुत है।
विद्या भूषण रावत : - भंवर जी, आज के दौर में दलित आंदोलन की सबसे बड़ी चुनौती क्या है ?
भंवर मेघवंशी : आज दलित आन्दोलन को कई प्रकार की चुनोतियों को झेलना पड़ रहा है ,यह बाहरी चुनौतियां भी है और भीतरी भी .जिस प्रकार से साम्प्रदायिक शक्तियाँ दलित आन्दोलन को हजम कर रही है वह चिंताजनक स्थिति है ,आज बड़े पैमाने पर दलित नेतृत्व संघ भाजपा द्वारा बिछाये गए जाल में फंस गया है ,सत्ता का झूठा लालच देकर उनकी जुबानें बंद कर दी गई है .दलितों के चुने हुए प्रतिनिधि दलितों की बात नहीं करते ,नौकरशाही ओर सत्ता में बैठे लोग दलित आवाजों के दमन में लगे हुये है .अभी संघ का एक एजेंडा चल रहा है कि या तो अपने साथ ले लो ,अगर नहीं आये ,उन्हें फंसा दो . इस तरह हम देख रहे है कि दलितों का दमन और तीव्र होता जा रहा है . दलित आन्दोलन अपनी स्वाभाविक उग्रता को खो रहा है ,वह कई बार भ्रमित नजर आता है ,उसे समझ नहीं आता है कि वो किनके साथ खड़ा हो ,उसे अपने दोस्तों और दुश्मनों की शिनाख्त करने में आज काफी मुश्किल हो रही है .समुदाय के बीच में पनप आये दलाल लोगों ने आन्दोलन की मूल भावना को ही विकृत कर दिया है .अधिकांश दलित लीडर उम्र के थका देने वाले पड़ाव पर पंहुच गए है .चुनौतियां बेहद नई है ओर समाधान पुरातन है .नई पीढ़ी का दलित आन्दोलन कुछ अलग चाहता है ,पर उसे दिशा नहीं मिल पा रही है .भीतरी चुनौतियां भी उभर रही है ,दलितों के मध्य के जातिय अंतर को अब जातिवाद का रूप दिया जा रहा है .कई दलित जातियां स्वयं को इस हद तक मजबूत करने में लगी है कि उन्होंने जाति उच्छेद के काम से लगभग मुंह ही मोड़ लिया है .दलित समुदाय के भीतर जातियों को मजबूती देने का काम जाति तोड़ने के बड़े उद्देश्य की प्राप्ति में सबसे बड़ी बाधा बनकर उभर रहा है . यह हमारे आन्दोलन को कमजोर बना रहा है .संघ की विघटनकारी राजनीती के लिए यह स्थिति मुफीद है ,इसलिए वो दलितों के मध्य के छोटे मोटे फर्क को दुश्मनी के स्थायी भाव में बदलने की कोशिस में लगा रहता है .
विद्या भूषण रावत ; रोहित वेमुला की सांस्थानिक हत्या के बाद लगा के अम्बेडकरी और वामपंथी ताकते साथ आएँगी लेकिन JNU के चुनावो ने दोनों के बीच में खायी को और बड़ा बना दिया है। आप क्या सोचते हैं इस सन्दर्भ में।
भंवर मेघवंशी : हां यह बात सही है कि रोहित वेमुला के सांस्थानिक मर्डर के बाद अम्बेडकरी और वामपंथी ताकतें एक साथ आई .जय भीम ओर लाल सलाम का नारा एक साथ गुंजायमान हुआ .उम्मीद जगी कि यह जुगलबंदी आगे बढ़ेगी .यह समय की मांग भी रही .यह संतोष का विषय रहा कि भारत के वामपंथियों ने जाति के सवाल को स्वीकारना शुरू किया और वे अम्बेडकरवादी आन्दोलन के साथ खड़े दिखाई देने लगे .मगर हाल ही में जवाहर लाल नेहरु यूनिवर्सिटी छात्र संघ चुनाव में लेफ्ट यूनिटी और बाप्सा के आमने सामने आने से लोगों को लगा कि रोहित के मामले में बना एका ख़त्म हो गया है ,जिस पर कई लोगों ने चिंता व्यक्त की है ,लेकिन मैं थोडा अलग तरह से इस पूरे घटनाक्रम को देखता हूँ .
हमें समझना होगा कि भारत के वामपंथी कभी भी अम्बेडकरवादी समूहों के स्वाभाविक दोस्त नहीं रहे है ,सदैव ही ये दो धाराएँ रही है .रोहित के मुद्दे पर ये सडकों पर संघर्ष में एकसाथ थे ,इसका मतलब यह तो नहीं कि उनके मध्य कोई वैचारिक एकता बन गई .मेरे ख्याल से वह एक मुद्दे पर तात्कालिक एकता थी ,जिसे एक न एक दिन ख़त्म होना ही था .फिर ऐसे मुद्दे आयेंगे तो ऐसी क्षणिक एकता फिर से बनेगी ओर बिगड़ेगी भी .रही बात जेएनयू चुनाव की तो इसे विचारधाराओं के संघर्ष के रूप में देखना अभी जल्दबाजी होगी .इससे वामपंथियों को अपने भीतर देखने का मौका मिलेगा .बाप्सा और लेफ्ट यूनिटी को न्यूनतम सांझे मिलन बिंदु ढूंढने चाहिए .चुनावी संघर्ष दोस्त ओर दुश्मन की विभाजक रेखा नहीं बननी चाहिए.
विद्या भूषण रावत : वामपंथियो ने तो बहुत गलतिया की है। न केवल जाति की स्वीकार्यता के विषय में बल्कि वर्ग चरित्र में भी उनका नेतृत्व कभी भी गरीबो के हाथ में नहीं था। लेकिन जब हम राजनैतिक आंदोलन करते है तो हर एक आंदोलन की एक स्वस्थ आलोचना होनी चाहिए क्योंकि अगर हम सभी में कमिया नहीं होती तो ब्राह्मणवाद कभी इतना मज़बूत नही होता। इसलिए ये भी जरुरी है के अम्बेडकरवादी या दलित आंदोलनों के जो विभिन्न ध्रुव है उनकी भी कमियों और अवसरवाद पर बोला जाये। आज का समय केवल कम्युनिस्टो की कमी निकालने से नहीं होगा बल्कि स्वस्थ रूप से सभी सम्बंधित आंदोलनों के कमियों को समझकर एक नए आंदोलन की रुपरेखा बनाने का होना चाहिए
भंवर मेघवंशी : आपकी बात से मेरी सहमती है कि आज का वक़्त सिर्फ वामपंथियों की कमियां निकालने का नहीं है ,पर सवाल जरुर उठाये जाने चाहिए .इसका जवाब कौन देगा कि वामपंथियों ने जाति के सवाल को कालीन के नीचे क्यों दबाये रखा आज तक ,उनके यहाँ नेतृत्व में दलित आदिवासी लोग क्यों नहीं आगे आ पाए .आप वर्ग की बात तो करेंगे लेकिन वर्ण की बात को नहीं स्वीकारेंगे यह नहीं चल सकता है .आप गरीबी का ढोल तो पीटेंगे मगर जाति की तरफ से आँख मूंद लेंगे ,यह नहीं चल सकता है .भारतीय वामपंथ को ईमानदारी से इस देश के परिप्रेक्ष्य में उसी तरह से ब्राह्मणवाद से भी लड़ना होगा ,जिस तरह वे पूंजीवाद और साम्राज्यवाद से लड़ने की बात करते है .
मुझे भी लगता है कि दलित बहुजन आन्दोलन को भी अपने भीतर झांकना होगा ,अगर वह अपनी स्वस्थ आलोचना स्वयं कर सके तो उसके हक़ में यह बहुत अच्छा होगा ,अम्बेडकरी आन्दोलन को भी अपने जातिवादी चरित्र से छुटकारा पाना होगा तथा उसे ब्राह्मणवाद से भी बचना होगा .
विद्या भूषण रावत : दलित बहुजन आंदोलन की बहुत चर्चा होती है लेकिन उसका मेल बिंदु केवल गैर ब्राह्मणवाद है। दोनों ध्रुवो को साथ आने के लिए क्या कोई सकारात्मक कार्यक्रम की जरूरत नहीं है। जैसे कम्युनिस्तो ने जाति को नहीं माना वैसे ही अगर हम ये सोच ले के बहुजन ध्रुवीकरण के अंदर सारे तत्त्व एक से हैं तो बहुत बड़ी भूल होगी। बाबा साहेब ने जातियो के वर्गीकरण के बारे में साफ़ कहा था के ये 'ग्रेडेड इनएकवलिटी' है , हर एक जाति एक एक ऊपर चढ़ी है और अपने को दूसरे से बड़ी मानती है। अपने आपसी संबंधों के बारे में जब हमारी समानता का कोई सिद्धांत नहीं बनेगा तो एकता कैसी ?
भंवर मेघवंशी : दलित बहुजन एकता के सारे तत्व एक से नहीं है ,सिर्फ मंचीय ध्रुवीकरण परिलक्षित होता है जो गाहे बगाहे ब्राह्मणवाद को कोसते रहते है .मगर इस मिलन बिंदु से आज कुछ भी उम्मीद नहीं लगाई जा सकती है ,बहुजन विचार में शामिल जो पिछड़ा तबका है ,वह आज मनुवाद का सबसे बड़ा संवाहक बना नजर आता है .पाखंड ,पूजा पाठ तथा धर्म कर्म में आकंठ डूबा हुआ .वह जो आज ब्राह्मणवाद का हरावल दस्ता है ,उससे ब्राह्मण से लड़ने की उम्मीद करना बचकानी बात होगी .दलित अत्याचार के प्रकरणों को उठाकर देखिये कई इलाकों में 90 प्रतिशत मामलों के मुख्य अभियुक्त ओबीसी से आते है .जो पिछड़ा रोज दलित को जूता मार रहा है ,उसके साथ कैसी एकता ? धरातल के हालात तो बेहद भयंकर है ओर हमारे आसमानी नेता है जो कभी दलित पिछड़ा एकता ओर कभी मूलनिवासी एकता का राग अलापते रहते है .बहुजन ध्रुवीकरण एक कोरी कल्पना है .अब तो बहुजन के नाम से जाने जाने वाले संगठन ही ब्राह्मण नेता चलाते है .पिछड़े जब तक मनुवाद के अग्रिम मोर्चे पर खड़े दिखेंगे ओर दलितों पर अत्याचार करेंगे तब तब वे हमारे उतने ही बड़े दुश्मन है ,जितने कि कथित उच्च वर्णीय लोग है .

विद्या भूषण रावत : रोहित वेमुला के मामले को मीडिया ने बहुत उछाला। बहुतो को लगा शायद अब मीडिया दलित प्रश्नों पर बहुत संवेदनशील हो गया है लेकिन डेल्टा मामले तो लगभग दबा दिया गया। अभी गावो में बहुत क्रूर घटनाक्रम होता है और मीडिया भूल जाता है। भागना के लोग पिछले ४ वर्ष से आंदोलन कर रहे हैं लेकिन अभी भी न्याय के इंतज़ार में हैं और अब उनके पास न दलित संगठन आते न वामपंथी ? मीडिया तो खैर गया ही नहीं ? क्यों हो रहा है ऐसा ?
भंवर मेघवंशी : रोहित के मामले को मुख्यधारा मीडिया ने कोई ख़ास तव्वजो दी हो ऐसा मैं नहीं मानता ,हां जब सोशल मीडिया ने इस मुद्दे को बहुत बड़ा बना दिया तब प्रिंट और इलेक्ट्रोनिक माध्यमों ने अपने जातिवादी चरित्र के मुताबिक नेगेटिव रिपोर्टिंग शुरू की .रोहित की जाति पर भ्रम पैदा किया ,उसे गोमांस भक्षी देश विरोधी तत्व के रूप में निरुपित किया .हर संभव कोशिस यह की कि कैसे भी करके रोहित वेमुला को बदनाम कर दिया जाये ,लेकिन अच्छा यह हुआ कि वैकल्पिक मीडिया ने इस मनुवादी मीडिया को धूल चटा दी ओर वे रोहित के मामले को दबा नहीं पाये .रही बात डेल्टा मेघवाल मामले की ,तो यहाँ भी मीडिया की भूमिका नकारात्मक ही रही .पहले डेल्टा का चरित्र हनन का प्रयास हुआ और बाद में मामले को ठन्डे बस्ते में फेंक दिया .रोहित के मामले में आरोपी सरकारी लोग थे ,मगर डेल्टा के मामले में विज्ञापन देने वाले समुदाय के लोग थे .जिनका अख़बारों ओर टीवी चेनल्स पर मालिकाना हक है ,उन्हीं की जमात के लोग जब आरोपी बने तो मीडिया उनके आगे पूंछ हिलाने लग गया .दलितों पर होने वाले अत्याचार सेक्सी स्टोरी नहीं होते .दलित महिलाओं का बलात्कार जातिवादी मीडिया की संवेदनाओं को नहीं जगाता .भगाना हो चाहे डांगावास ,डेल्टा हो या उना दलित अत्याचार ,सिर्फ सोशल मीडिया ही इन मुद्दों को आगे बढ़ा रहा है .वैसे भी मीडिया ज्ञापन देने वालों से ज्यादा विज्ञापन देने वालों की परवाह करता है .
विद्या भूषण रावत : आप तो राजस्थान के बहुत से आंदोलनों से जुड़े रहे हैं जैसे मज़दूर किसान शक्ति संगठन , भोजन का अधिकार अभियान, पी यू सी एल इत्यादि। क्या तथाकथित मुख्यधारा के आंदोलनों में दलितों के जगह बची है या उनका केवल एक लेबल की तरह इस्तेमाल हो रहा है।
भंवर मेघवंशी : मुख्यधारा की किसी भी चीज़ में दलितों के लिए कभी जगह नहीं थी और न ही आज है .सभी जगह दलित सिर्फ दिखाने की वस्तु भर होते है .सामाजिक आंदोलनों का चरित्र भी इससे भिन्न नजर नहीं आता . कहीं पर भी स्वतंत्र दलित नेतृत्व स्वीकारा नहीं जाता .पिछलग्गू दलित सबको प्रिय है ,बोलनेवाले .सवाल उठानेवाले दलित कहीं भी पसंद नहीं किये जाते .मेरा मानना है कि सिविल सोसाइटी को भी लोकतान्त्रिक और समावेशी बनना होगा तथा दलितों को सिर्फ लेबल की तरह इस्तेमाल करने से बचना होगा .
विद्या भूषण रावत - राजस्थान में अम्बेडकरवादी या दलित आंदोलनों की क्या स्थिति है।
भंवर मेघवंशी : राजस्थान पारम्परिक रूप से एक सामन्ती स्टेट रहा है .यहाँ विद्रोह की कोई भी सामाजिक राजनीतिक या सांस्कृतिक धारा नहीं रही है .यहाँ तक कि भक्तिकाल में भी यहाँ कबीर या रैदास जैसे लोग नहीं पैदा हुए .यहाँ तो दास्य भाव शाश्वत रहा है .तो मानसिक दासता सदियों से बरकरार रही है .दलित मुक्ति की लडाई में भी राजस्थान का योगदान नगण्य रहा है .पूना पैक्ट के वक़्त राजस्थान के कतिपय दलित नेता बाबा साहब के विरोध में पर्चे बाँट रहे थे .यहाँ कबीर ,फुले .अम्बेडकर के दलित के बजाय गाँधी के हरिजन और पार्टियों के बंधुआ दलित लीडर ही ज्यादा रहे है .आज़ादी के बाद हेडगेवार –गोलवलकर के भक्त दलित ओर गाँधी नेहरु को पूजने वाले दलितों के हाथ में दलित आन्दोलन की बागडोर रही .फिर समाजवादी किस्म के राजनीतिक दलित आन्दोलन पैदा हुये ,जिन्होंने सामाजिक न्याय के नारे तो लगाये .पर उसके नेतृत्व में वही जातियां प्रमुखता से आगेवान रही जो शोषक जमातें थी .
1992 में कुम्हेर भरतपुर में दलितों के सामूहिक नरसंहार के बाद राजनीती से परे एक दलित आन्दोलन उभरने लगा ,जो बाद में एनजीओकरण का शिकार हो गया .प्रोजेक्ट बेस्ड दलित आन्दोलन ने भी दलित आन्दोलन की स्थितियां ख़राब की है . आज राजस्थान का दलित आन्दोलन बिखराव का शिकार है .व्यक्तिवादी अहम् की लडाइयों के चलते कई छोटे छोटे खेमे बन गये है .कुछ लोग तो दलित के नाम पर सिर्फ अपनी जाति या परिवार का समूह बना बैठे है ,जबकि आज राजस्थान दलित अत्याचार .छुआछुत ओर भेदभाव का सबसे बड़ा गढ़ बन गया है .पर संतोष की बात यह है कि डांगावास दलित संहार के पश्चात दलित युवा पीढ़ी ने स्वतः स्फूर्त आन्दोलन खड़ा किया तथा संघर्ष कर विजय पाई है .राजस्थान के दलित युवा आन्दोलन ने अपने खामोश राजनीतिक नेतृत्व को पूना पैक्ट की खरपतवार करार दिया है तथा जातिवादी समूहों कू भी नकारने का काम किया है .सामाजिक संगठनों के नाम से दशकों से दुकानदारी चला रहे लोगों को भी बहुत सारे सवालों का सामना करना पड़ा है .धीरे धीरे ही सही परन्तु डांगावास से लेकर डेल्टा तक के मामलों में एक आत्मनिर्भर दलित अम्बेडकरवादी आन्दोलन का उभर एक सुखद घटना मानी जा सकती है .

विद्या भूषण रावत : क्या दलित संगठनों को बिलकुल अलग होकर काम चलना चाहिए आवश्यकता अनुसार निर्णय लेने चाहिए क्योंकि ---जब वामपंथी शक्तिया साथ न दे तो क्या विकल्प है, या दलित बहुजन अल्पसंख्यको को अब एक नयी पहल करनी होगी ताकि उनकी बुनियाद मज़बूत हो और वे राजनैतिक तौर पर अपनी ताकत का एहसास करवा सके .
भंवर मेघवंशी : दलित संगठनों को अलगाव के साथ काम करने की जरूरत नहीं है .उन्हें स्वतंत्र ओर आत्मनिर्भर होने की जरूरत है .उन्हें अपने फैसले खुद लेने ही चाहिए .वामपंथी हो या अन्य किसी प्रगतिशील धारा के लोग हो ,अगर वे साथ नहीं दे तब भी दलित संगठनों को अपने बूते सब कुछ कर पाने का माद्दा रखना होगा .दलित ,आदिवासी ,घुमंतू ओर अल्पसंख्यक समुदाय के लोगों को एक साथ आ जाना चाहिए ,हमें पिछड़ों को साथ लेने का मोह फ़िलहाल छोड़ देना चाहिए .अभी तमाम उत्पीडित तबको की एकता कायम करने की जरूरत है .अगर हम ऐसा कर पाते है तो हम राजनीतिक रूप से भी बड़ी ताकत निर्मित कर सकते है .
विद्या भूषण रावत : अस्मिताओं राजनीती जरुरी है या विचारधारा की ? हालाँकि लोग कहते हैं के अस्मिताओं में भी विचारधारा होती है -लेकिन ऐसा गलत भी है /क्योंकि अस्मिताओं का इस्तेमाल करने में संघ परिवार सबसे आगे है। लोग कैसे समझे के सामने वाला आदमी मेरा है. वो सजातीय हो सकता है लेकिन अपने समुदायों के हितो का दलाल भी ?
भंवर मेघवंशी : मुझे लगता है कि दलित आन्दोलन का अस्मितादर्शी राजनीती का काल बीत चुका है .अस्मिता राजनीति का आज सर्वाधिक फायदा संघ गिरोह के लोग उठा ले जाते है .वे अस्मिताओं का हमसे बेहतर इस्तेमाल करना जानते है .हमें आब अपनी राजनीति विचारधारा पर केन्द्रित करनी होगी .अगर हम दीर्घजीवी बदलाव चाहते है तो यह जरुरी हो जाता है कि हम बुद्ध ,फुले .शाहू ,कबीर ,रैदास ओर अम्बेडकर की मानवतावादी समानतावादी विचारधारा को स्थापित करने का काम करना होगा .अब सजातीय से आगे बढ़कर समविचारी से नाता जोड़ना होगा .

विद्या भूषण रावत : आपकी आत्मकथा एक बेहतरीन दस्तावेज है के जहाँ हमें 'अपनों' को समझने की जरुरत होती है। मैं समझता हूँ हमारे देश में हर एक का अपना राष्ट्रवाद है और उसके ताकतवर लोग उसे इस्तेमाल करते रहते हैं। हम सब अपने अपने समूहों को नियंत्रित करना चाहते हैं और उसके लिए सिद्धांत गढ़ते हैं जिसमे विलन दुसरी जाति, धर्म या देश होता है। . ये विलन सुविधा के अनुसार बनाये जाते हैं लेकिन ज्यादादर मामलो में हम स्वयं ही विलन रहते हैं ?
भंवर मेघवंशी : शायद आत्मकथा के लिहाज से यह जल्दबाजी कही जायेगी ,क्योंकि अभी बहुत कुछ करना बाकी है ,लेकिन इस आपबीती को कहना भी बहुत जरुरी है .हालाँकि उसे कोई भी प्रकाशक छापने का साहस नहीं कर पाया .नए दौर के मीडिया ने उसे लोगों तक पंहुचाया है . हिन्दू तालिबान में मैंने अपनों पर भी और अपने पर भी सवाल उठाये है .आपका यह कथन बहुत महत्वपूर्ण है कि हम अपनी सुविधा के अनुसार खलनायक गढ़ लेते है जो कि प्राय किसी अन्य जाति ,धर्म या संप्रदाय के होते है .नियंत्रण की राजनीति जिसे वर्चस्व का संघर्ष कहना मुझे ज्यादा ठीक लगता है ,वह हमारी कमजोरियों तथा महत्वाकांक्षाओं की पूर्ति के लिए किये जाने वाले गलत फैसलों को भी सिद्धांतों का बाना पहना देता है .दलित नेतृत्व ओर दलित संगठनों को अपने आलोचकों का आदर करना सीखना चाहिए .कोई तो होना चाहिए जो हमारे अन्दर के खलनायक पर भी सवाल खड़े कर सके .राष्ट्र की पूरी अवधारणा ही ताकत ओर सत्ता के बेजा इस्तेमाल से जुडी हुयी है ,इसलिए हर दौर में हर समूह का अलग राष्ट्रवाद होगा और उसका उपयोग भी सब अपनी सुविधा के अनुसार ही करेगे .अंततः राष्ट्र .राष्ट्रीयता और राष्ट्रवाद की पूरी बहस ही एक किस्म का फर्जीवाडा ही है .
विद्या भूषण रावत : आप एक लेखक है और बहुत नया लेखन आ रहा है। कैसे देखते नए दौर के दलित लेखन को ?
भंवर मेघवंशी- यह ख़ुशी की बात है कि बहुत सारा दलित लेखन आ रहा है ,उसमे अब भी पीड़ा का भाव बेहद घनीभूत है ,आत्मकथाएं अब भी आत्मव्यथाएं ही बनी हुई है .आज प्रतिरोध का साहित्य विपुलता से आ रहा है .कई भाषाओँ में आ रहा है .फिर भी वह कथित मुख्यधारा साहित्य को टक्कर नहीं दे पा रहा है .हमें दलित साहित्य को मानवता का साहित्य बनाना होगा .वह सिर्फ दलितों का ,दलितों द्वारा, दलितों के लिए साहित्य नहीं होना चाहिए .हर भारतीय उसे चाव से पढ़े .सबको लगे कि इसे पढना बेहद जरुरी है .हमें प्रतिरोध के साहित्य को भी लोकप्रिय बनाना होगा और उसकी पंहुच का दायरा विस्तृत करना होगा .हिंदी पट्टी के दलित लेखकों को नवाचार करने चाहिए .आनंद नीलकंठन के पौराणिक उपन्यास असुर तथा अजेय को पढ़िए ,आपको लगेगा कि किसी केडर केम्प में बैठकर आप बात सुन रहे है .नीलकंठन ने रावण .दुर्योधन .कर्ण जैसे पात्रों के ज़रिये ब्राह्मणवाद पर भारी चोट मारी है .यह तो एक उदहारण मात्र है ,मेरा मत है कि हमें दलित साहित्य जो कि वस्तुत समतावादी साहित्य है .उसके स्वरों को मुख्यधारा के स्वरों में तब्दील करना होगा .
विद्या भूषण रावत : क्या हम बहुत ज्यादा 'चिंतक 'तो नहीं हो गए क्योंकि भूमिहीन किसानों, मज़दुरों,गांव में मैला धोने वालो, बाल श्रमिको, आर्थिक उदारीकरण, निजीकरण के मुद्दे धीरे धीरे हमारे आंदोलनों से गायब हो गए हैं। ये सारे प्रश्न तो आंबेडकरवादियो के एजेंडे में होनी चाहिए ?
भंवर मेघवंशी- हम चिन्तक हो पाते तब भी हम समाज के लिए उपयोगी जीव साबित होते .मगर हम चिंतित प्राणी हो गए है .सदैव रुदन .शाश्वत रुदन करनेवाले .जो बुद्धिजीवी है हमारे समाज के उनको इतना ज्ञानाभिमान हो गया है कि वो किसी और ही लोक में जीते है .आज समाज में क्या हो रहा है .उससे सरोकार रखे बगैर हम कैसे चिंतक है .आज भी अगर हमारे करोड़ों भाई बहन रोटी के अभाव में भीख मांगने पर मजबूर है .लाखों लोग आज भी मैला उठा रहे है .हमारी बहुत बड़ी आबादी घर .खेती या शमशान की भूमि तक से महरूम है .हमारे लाखों बच्चे कचरा बीन रहे है ,सड़कों पर ज़िन्दगी बसर कर रहे है तो हमें सोचना पड़ेगा कि आखिर इस आर्थिक उदारीकरण .वैश्वीकरण और निजीकरण ने हमको क्या दिया है .अगर जनता के ये मुद्दे हमारे विमर्श और आन्दोलनों से गायब है तो मानकर चलिये कि हम किसी और ही युग में जी रहे है .इस देश के तमाम वंचित ,पीड़ित गरीब जन के बुनियादी मुद्दे अम्बेडकरी आन्दोलन के एजेंडे में लाने होंगे तभी हमारा आन्दोलन जन आन्दोलन होगा .
विद्या भूषण रावत :जो बाबा साहेब को सही ढंग से मानता होगा तो उसके लिए मनुवाद और पूंजीवाद सबसे बड़े दुश्मन हैं। आज दलित खड़ा हुआ है। नये युवा आ रहे हैं लेकिन आंदोलन एक 'रिएक्शन भी है। हालाँकि जो हमारे साथ घटित हो रहा है उसका मुंहतोड़ जवाब तो देना होगा और गुजरात, हैदरबाद आदि की घटनाओ ने साबित कर दिया है के दलित अब चुप नहीं रहेंगे लेकिन समाज बदलाव की अम्बेडकरवादी मुहीम तो चलती रहनी चाहिए ताकि एक प्रबुद्ध भारत का निर्माण हो सके। आपको इसके लिए सबसे महत्वपूर्ण क्या लगता है ?
भंवर मेघवंशी : प्रतिक्रिया भी जरुरी है ओर तात्कालिक जवाब देना भी कभी कभार बहुत आवश्यक हो जाता है .इसलिए उना और हैदराबाद के मुद्दों पर हुयी त्वरित प्रतिक्रियाओं का मैं तहेदिल से इस्तकबाल करता हूँ.यह संकेत है कि दलितों की नई पीढ़ी बिल्कुल भी बर्दाश्त नहीं करेगी .लेकिन इसके पीछे कि साजिश को भी समझना होगा कि कहीं वे हमें अत्याचारों के चक्रव्यूह में तो नहीं फंसा रहे है ताकि हम अपनी सारी उर्जा सिर्फ इसी के विरोध में खर्च करते रहे ओर वे लोग आराम से हम पर राज करते रहे . मनुवाद और पूंजीवाद एक दूसरे के पूरक है .दोनों ही हमारे दुश्मन है .हम मनुवाद से तो लडाई करते है और पूंजीवाद का समर्थन करते है ,तब लडाई भौंथरी हो जाती है .बाज़ार और ब्राहमणवाद एक दूसरे से जुड़े हुए है ,किसी भी एक का साथ देना दूसरे को प्राण वायु पंहुचाने जैसा है .हमें प्रबुद्ध और समृद्ध भारत बनाना है सिर्फ आर्थिक समृद्धि मात्र नहीं .हर तरह से सक्षम और आत्मनिर्भर ,प्रगतिशील एवं वैज्ञानिक चेतना से लेश भारत बनाना होगा ,जो मनु और पूंजी के गुलामों से पूर्णत मुक्त भारत होगा .इसके लिए हमें सांस्कृतिक एवं आर्थिक मोर्चों पर अपनी भागीदारी के लिए काम करना होगा ,अभी हमारी सारी लड़्त राजनीतिक बराबरी और सामाजिक समानता के लिए चल रही है पर इस शास्त्रीय गुलामी और आर्थिक गैरबराबरी को ख़त्म करने की दिशा में हमारे प्रयास अभी भी नाकाफी दिखाई पड़ते है .इन मोर्चों पर ध्यान देना होगा .
विद्या भूषण रावत : आप आर एस एस के संपर्क में कैसे आये. क्या उन्होंने आपको ढूंढा या आप कौतूहलवश उसमे गए ?
भंवर मेघवंशी- बचपन में खेलकूद की इच्छा ने अनायास ही मुझे आर एस एस तक पहुंचा दिया.मैं जब सातवीं कक्षा का विद्यार्थी था, तब हमारे भूगोल के अध्यापक जी ने मेरे गांव में आ कर हम बच्चों को इकट्ठा करके खेल खिलाना शुरू किया. बाद में वे गीत भी सिखाने लगे.थोड़े दिन बाद उन्होंने हर दिन बिठाकर कुछ बातें भी बतानी शुरू कर दी.बाद में भगवा ध्वज भी लगाया जाने लगा.हमने खाकी निकर और काली टोपी पहनना शुरू कर दिया .हमें यह बताया गया कि हम इश्वर की योजना से संघ की शाखा के लिये चुने गये है. हम भाग्यशाली है कि हमें अपनी मातृभूमि की सेवा करने का अवसर मिला है.शुरू में तो कौतुहलवश तथा खेलकूद के लालच में ही मैं उन तक गया ,पर बाद में उन्होंने मेरी क्षमताओं को पहचानते हुये मुख्यशिक्षक ,कार्यवाह बनाते हुये जिला कार्यालय प्रमुख तक बनाया.
विद्या भूषण रावत : संघ में गैर मुस्लिमो को शामिल करने का एक उत्साह बना रहता है , कुछ इमोशन, कुछ देश भक्ति और कुछ धर्म की रक्षा का नाटक।
भंवर मेघवंशी : राष्ट्रवाद की भावना तथा धर्मो रक्षति रक्षित: की बातें तो महज दिखावा है,असल में मुस्लिमों का डर दिखा कर तथा इसाईयों के प्रति नफरत का भाव पैदा करके वे लोगों को शामिल कर लेते है.
विद्या भूषण रावत : मुझे आज भी याद है के बाबरी मस्जिद के ध्वंश से करीब दो दिन पूर्व में एक सज्जन के पास हरयाणा गया था और जो शब्द अपने कहे वही उस वक़्त उन्होंने कहे के ' अब की बार कार सेवा' अच्छे से होगी। क्या आपको पता था के अबकी बार मस्जिद गिरनी ही है।
भंवर मेघवंशी -बिल्कुल पता था.यह तो पूर्वनियोजित ही था. बाबरी मस्जिद तोडना ही कारसेवा का असली मकसद था.
विद्या भूषण रावत : संघ आज भी दलितों और आदिवासी गाँवों की और जा रहा है। राजस्थान, गुजरात, मध्य प्रदेश, उसका उदहारण है। क्या कारण है के लोग उनके कार्यक्रमो में भाग लेते हैं। क्या अम्बेडकरवादी, बहुजनवादी, समाजवादी, वामपंधी और कोई वादी लोगो के पास जनता की सांस्कृतिक महत्वाकांक्षा को लेकर कोई कार्यक्रम नहीं है या हमने लोगो के पास जाना छोड़ दिया है। ये बात सही है के हिंदुत्व के लोगो के पास पैसो की कमी नहीं है लेकिन उसका जो कर्मठ कार्यकर्ता है, जो दूर दराज से आता है वो तो अपनी वैचारिक प्रतिबद्धता के साथ काम करता है।
भंवर मेघवंशी : संघ के लोग मिशनरीज लोगों की तर्ज पर आज सुदूर दुर्गम इलाकों तक में फैल गये है.वे शहरों की वाल्मीकि बस्तियों में मौजूद होते है तो जंगल पहाड़ों में आदिवासियों के बीच भी.सेवा के काम के जरिये वे अपनी विचारधारा को स्थापित करते है.लोगों के सुख दुख में साथ दिखाई पड़ते है.वे लोगों की जरूरतों को समझकर उनकी पूर्ति करते है,जबकि हम लोग सिर्फ सिद्धांत बताते है और भाषण पिलाते है.हमारी धरातल पर उपस्थिति निरंतर घट रही है ,जबकि संघ सम्प्रदाय के प्रचारक गण लोगों के बीच घुलमिल गये है.वामपंथ,अम्बेडकवाद,समाजवाद,बहुजनवाद तथा अन्य गैरसंघवादी ताकतों के लोगों ने वाकई आम जन के बीच जाना छोड़ दिया.ये लोग या तो चुनावी बहसों में नजर आते है या खोखले बौद्धिक विमर्शों में.बात केवल पैसे की नहीं है, प्रतिबद्धता की भी है.आरएसएस के पास आज पैसे की कमी नहीं है,यह सर्वमान्य सत्य है,मगर हमें यह भी याद रखना है कि चाहिये कि उसके पास समर्पित कैडर का संख्याबल भी है.उसका कैडर कहीं भी जाने के लिये तैयार है.
विद्या भूषण रावत : अम्बेडकरवादी सांस्कृतिक परिवर्तन की धारा आपके राज्यो मध्य प्रदेश, गुजरात और राजस्थान में कितनी मज़बूत है।
भंवर मेघवंशी : ग़ुजरात तो अभी बदलाव का संवाहक बना हुआ ही है. मध्यप्रदेश और राजस्थान में अन्दर ही अन्दर बहुत उबाल आया हुआ. सांस्कृतिक परिवर्तन की धारा का तेज बहाव आने को तत्पर है.सही पहल करने वाले ईमानदार नेतृत्व की जरूरत है.
विद्या भूषण रावत : संघी प्रोपगंडे का मुकाबला कैसे हो , कभी गाय, कभी बीफ, कभी भारत माता , कभी गंगा और पाकिस्तान और मुसलमान तो चौबीस घंटे उनके जुबान पर रहता है। ज्यादातर ये राष्ट्र और सांस्कृतिक प्रश्न है जिसमे लोग आसानी से बहक जाते हैं क्योंकि लोगो को लगता है देश की और संस्कृति की बात है। दलित, पिछड़े, आदिवासी इसको कैसे रेस्पोंड करे .
भंवर मेघवंशी : हम प्रोपेगंडे का मुकाबला तथ्य और सत्य पर आधारित कथ्य से ही कर सकते है. संघ झूठ बनाने तथा उसे सच की पैंकिंग करके फैलाने की विश्व की सबसे बड़ी फैक्ट्री है.गाय,गंगा,गायत्री,गौमाता,भारतमाता,बीफ ,राष्ट्रवाद,देशभक्ति, वंदेमातरम् ये सब इनके उपकरण मात्र है.असल मकसद तो इस देश के मेहनतकश गरीब गुरबा का शोषण करते रहना है.उन्होनें संघ और राष्ट्र को एक दूसरे का पूरक बना दिया है.भाजपा को वोट देने को राष्ट्रभक्ति से जोड़ दिया है.गाय जैसे जानवरों की रक्षा को संस्कृति का सवाल बना दिया है. हमें अपने लोगों तक असली बात को पहुंचाना होगा.देश ,समाज और संस्कृति के मूल्यों की गैर साम्प्रदायिक व्याख्या करनी होगी.जनता के मध्य सीधी बहस करनी होगी.मुझे पक्का यकीन है कि इस हिन्दुत्व के जहरीले राजनीतिक विषाणु को मात सिर्फ दलित विचारधारा ही दे सकती है.हमें पूरी शिद्दत से संघ सम्प्रदाय को एक्सपोज करना चाहिये.
विद्या भूषण रावत : आपने कहा के वामपंथियो ने जाति को कभी समझा नहीं इसलिए उनके और दलितों के बीच में गैप रहेगा। इस पूरे राजनैतिक परिदृश्य में तो ब्राह्मणवादी फासीवादी ताकतों को हराने के लिए एक समझ तो विकसित करनी होगी। कई स्थानों पर दलित मुसलमानो की अच्छी संख्या है और कई जगह पर नहीं। इसलिए वैचारिक तौर पर हमें अपने साथी तो बनाने पड़ेंगे और ये एक लंबी लड़ाई है जो जैसा आपने कहा विचारधारा की मबबूती से आएगी। लंबे समय में आप दलितों, आदिवासियों की लड़ाई में किस प्रकार के लोगो का साथ चाहते हैं।
भंवर मेघवंशी : ब्राहमणवादी फासीवाद से मुकाबला करने के लिये कई प्रकार के एलायंस बनाने होंगे. जहां जहां हम न्यूनतम् साझे मिलन बिन्दूओं के जरिये वामपंथ के साथ चल सकते है,हमें बेहिचक वामपंथ के साथ चलना चाहिये.जहां हमारे पास बहुजन विकल्प हो ,उनके साथ जाने में भी कोई बुराई नहीं है.अगर हम कहीं धार्मिक अल्पसंख्यकों के साथ स्वयं को सहज पाते है तो उनके साथ भी चलने पर विचार करना चाहिये.हमारा विचार शत्रु बहुत व्यापक औऱ विशाल है.उससे कई मोर्चों पर कई सारे समूहों के साथ मिलकर लड़ना होगा.
विद्या भूषण रावत : आपने कहा के दलितों पे अत्याचार के मामलो में पिछड़ी जातियो का ज्यादा रोल है. मैं ये मानता हूँ के ये भी एक सिंपल स्टेटमेंट है के क्योंकि पिछडो की categorisation देखेंगे तो इसमें भूमिहीन तबका वो दलितों का नेचुरल साथी है। जो थोड़ा जमीन जायदाद के मामले में धनी है वो भले ही ब्राह्मण ठाकुरो को गरियाले लेकिन दलितों के नेतृत्व में काम करने को तैयार नहीं लेकिन ये तो ग्रेडेड इन एक़ुअलिविटी वाली बात है जब हम ऊपर वाले के साथ जुड़ना चाहते है लेकिन नीचे वाले के नेत्रेत्व में आने को तैयार नहीं ? क्या आप पिछडो में बदलाव की उम्मीद नहीं करते ?
भंवर मेघवंशी : दलितो पर दबंग पिछड़ों का अत्याचार महज सिंपल स्टेटमेंट नहीं है.यह ग्रासरूट की सच्चाई है.आप एट्रोसिटी एक्ट के तहत दर्ज मुकदमों का विश्लेषण कर लीजिये,आप मेरी स्थापना को तथ्यात्मक पायेंगे. मैं हवा में बात नहीं कर रहा हूं.पिछड़ों का भूमिहीन तबका भले ही आर्थिक तल पर दलितों के नजदीक दिखाई देता हो,मगर वह सामाजिक स्तर पर उसी ब्राहम्णवादी ऊंच नीच की मानसिकता से ग्रस्त है.दलितों का नेतृत्व जिस दिन पिॆछड़ों द्वारा स्वीकार लिया जायेगा तथा भेदभाव व अन्याय अत्याचार बंद कर दिया जायेगा,तब ही बदलाव की उम्मीद बलवती होगी.
विद्या भूषण रावत : जैसे के मैंने कहा, कोई भी राजनैतिक लड़ाई केवल नकारात्मक नहीं हो सकती। बुद्ध ने अपना रास्ता दिखाया और पूरी दुनिया में बौद्ध धर्म गया और उसने बड़े बदलाव दिखाए। बुद्ध ने तो दुश्मनो का नाम तक नहीं लिया. बाबा साहेब ने राजनैतिक लड़ाई लड़ी, हमें अधिकार दिलवाये लेकिन आखिर में ये भी समझ आया के सांस्कृतिक परिवर्तनों के बिना हम राजनैतिक लड़ाई भी नहीं जीत सकते। क्या आप समझते हैं के बौद्ध संस्कृति की और गए बिना हमारी लड़ाई अधूरी है और केवल राजनैतिक परिवर्तन प्रबुद्ध भारत के निर्माण के लिए नाकाफी है।
भंवर मेघवंशी : -राजनीतिक बदलावों को स्थाई करने के लिये सांस्कृतिक परिवर्तनों की आवश्यकता पड़ती है.बु्द्ध का मार्ग वैग्यानिक चेतना और शांति का सम्यक मार्ग है.यहीं दलितों के लिये श्रेयकर भी है.इसको अंगीकार किये बिना ब्राह्मणवाद से मुक्ति संभव ही नहीं है.
विद्या भूषण रावत : उत्तर प्रदेश का चुनाव देश के लिए सबसे महत्वपूर्ण है। क्या कहेंगे इस प्रश्न पर ?
भंवर मेघवंशी : उत्तरप्रदेश का चुनाव इस अंधकार के समय में एक रोशनी ला सकता है .बाज़ार और मनुवाद की ताकतों को अगर वहां से मात मिल सके तो यह हमारे देश की सेहत के लिए बहुत अच्छा होगा .यह सिर्फ चुनाव नहीं है ,इसे जनमत संग्रह के रूप में लेना चाहिए. यह बडबोले पंतप्रधान के आधे कार्यकाल के प्रति रायशुमारी भी हो सकता है .इसलिए इस चुनाव का अपना एक महत्व है .सारी पार्टियाँ भी इसे युद्ध की तरह लड़ रही है .इसे राजनीतिक दलों के मध्य चुनावी संघर्ष से ज्यादा विचारधाराओं के बीच का संघर्ष बनाना होगा .मुझे तो लगता है कि नफरत की राजनीति करनेवालों को इसमें हारना ही चाहिये .
विद्या भूषण रावत : उत्तर प्रदेश के चुनावो को आप नरेंद्र मोदी और हिंदुत्व के लिए रेफेरेंडम मान रहे है। वह बसपा और समाजवादी पार्टी आमने सामने हैं। आप किस और लोगो को वोट के लिए कहेंगे। मैं जानता हूँ ये एक कठिन प्रश्न हो सकता है लेकिन जैसा मेरा मानना है लोगो को '' बीजेपी'को हराने वाली पार्टी को वोट देने के लिए कहने का मतलब है उनको भ्रमित करना। इसलिए हम सभी साथियो से साफगोई से अपीलकरने को कह रहे हैं। लोग किसको चुने और क्यों ?
भंवर मेघवंशी : -इसमें कोई कठिनाई नहीं है.पहला लक्ष्य तो बीजेपी हराना होना चाहिये,दूसरा जीतने वाली गैरभाजपाई पार्टी को वोट देना होना चाहिये. सपा और बसपा आमने सामने है,हालांकि भाजपा बार बार यह कह रही है कि उसका मुकाबला समाजवादी पार्टी से है.सारे मीडिया हाउसेज की नजर मे भी यूपी के मुख्य प्लेयर सपा,भाजपा और कांग्रेस है. उनकी नजर में बसपा कहीं है ही नहीं. क्या यह आकलन ठीक है. मैं तमाम अंतर्विरोधों व असहमतियों के बावजूद उत्तरप्रदेश की जनता से अपील करना चाहता हूं कि वह बहन मायावती को राज में लाने के लिये हाथी पर बटन दबायें.ऐसा इसलिये कह रहा हूं ,क्योंकि सपा अपनों की वजह से इस बार अपने आप ही हार रही है. कांग्रेस की खटिया तो बिछ गई है.राहुल गांधी मेहनत भी कर रहे है ,पर बहुत ज्यादा हासिल होने वाला है नहीं. भाजपा को जीतने नहीं देना है,ऐसे में फिलहाल बसपा ही अंतिम विकल्प बचता है.